NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
जीएसटी ने छोटे व्यवसाय को बर्बाद कर दिया
इस नई कर व्यवस्था ने बड़ी कंपनियों और कारोबारियों को जहाँ फायदा पहुँचाया वहीं छोटे और लघु उद्योगों को नष्ट कर दिया है जिसका असर नौकरियों पर पड़ा है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Jul 2018
जीएसटी

1 जुलाई 2018 को वस्तु तथा सेवा कर यानी जीएसटी के लागू हुए एक साल पूरा हो गया। मोदी सरकार ने इसे अप्रत्यक्ष कर के गड़बड़ी को समाप्त करने के लिए पेश किया था जो मौजूदा कर अनुपालन में सुधार के लक्ष्य को बेहतर करने के लिए था। इस एक वर्ष का अनुभव बताता है कि इससे बड़े व्यवसायियों को फायदा हुआ, जबकि छोटे और मध्यम व्यवसायी संघर्ष कर रहे हैं। अधिकांश सूक्ष्म या छोटे उद्यम संघर्ष कर रहे हैं। न्यूज़क्लिक ने कई मीडिया रिपोर्टों पर ग़ौर किया जिसने ज़मीनी स्तर पर जीएसटी के प्रभाव की समीक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के उद्योगों की जांच की थी।

द क्विंट ने गुजरात में सूरत के कपड़ा केंद्र में जीएसटी के प्रभाव का विश्लेषण करने वाली एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जीएसटी कानून के मुताबिक़ किसी भी इनपुट टैक्स क्रेडिट रिफंड की मांग से पावर लूम को रोका गया। पिछले साल जीएसटी के ख़िलाफ़ सूरत के कपड़ा कारोबारियों ने बड़े पैमाने पर विरोध करते हुए 20 दिनों के लिए सभी काम बंद कर दिए जिससे बाज़ार में 100 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। इसके बाद मोदी सरकार ने दिसंबर 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले जीएसटी दरों में कटौती की घोषणा की थी। हालांकि नुकसान पहले ही हो चुका था। सूरत के पांडेसर क्षेत्र में पावर लूम इकाइयां या तो आंशिक रूप से चल रही है या क्षमता से नीचे काम कर रही हैं। जबकि दूसरों को कबाड़ी में बेचा जा रहा है।

ज़री जोकि बनारस और कांचीपुरम साड़ी निर्माण को महंगा कर देता है उस पर भी जीएसटी का बोझ डाल दिया गया है। वास्तविक तथा कृत्रिम ज़री दोनों पर समान रूप से 12 प्रतिशत कर लगाने के बाद सूरत का फलता फूलता ज़री उद्योग मंदी के दौर से गुज़र रहा है। कई बैठकों के बाद जीएसटी परिषद ने वास्तविक सोने और चांदी की ज़़री पर कर 12 प्रतिशत से कम करके 5 प्रतिशत कर दिया। लेकिन निर्माताओं को अभी भी प्रत्येक 1 किलो ज़़री पर जीएसटी के रूप में 2000 रुपए का भुगतान करना पड़ता है जो कि मोटे तौर पर लगभग40,000 रुपए खर्च पड़ता हैं।

कारखानों में मासिक मज़दूरी का भुगतान करने वाले उन श्रमिकों के अलावा कपड़ा व्यवसाय में कई श्रमिकों को घर से काम करने के लिए कच्चे माल दिए जाते हैं। इन मज़दूरों को भी कार्यरत श्रमिक के रूप में जाना जाता है। ये श्रमिक भी जीएसटी के लागू होने से प्रभावित हुए।

ऑल इंडिया ज़़री फेडरेशन के सचिव बिपिन जरीवाला ने क्विंट को बताया कि "ऑन जॉब-वर्क, मजदूर और श्रमिक जिन्होंने कभी अपनी ज़िंदगी में रसीद नहीं बनाई उन्हें जीएसटी के पेश होने के बाद अब उत्पादित वस्तुओं के मुताबिक़ हिसाब- किताब करना पड़ता है और जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है। चूंकि इन मज़दूरों के पास जीएसटी नंबर भी नहीं है और उनका कारोबार सालाना 20 लाख रुपए के क़रीब भी नहीं है तो हम कर का बोझ उठाते हैं और उन मज़दूरों को कम भुगतान करते हैं जो जॉब-वर्क करते हैं। अब वे कम पैसे मिलने की वजह से इस काम को छोड़ रहे हैं।"

इस उथल-पुथल के परिणामस्वरूप सूरत में हजारों ज़री इकाइयां बंद हो गई हैं। पावर लूम सेक्टर की तरह यूनिट मालिक यहां अपनी अपनी मशीन को कबाड़ी में बेच रहे हैं क्योंकि वे जीएसटी के बोझ को मैनेज करने में सक्षम नहीं हैं। 10 लाख रुपए की लागत वाली मशीनों को अब 2-3 लाख रुपए में बेचा जा रहा है। लगभग 70 प्रतिशत पूंजीगत नुकसान। नतीजतन एक उद्योग जिसने दस लाख मजदूरों को रोज़गार दिया आज इसमें केवल तीन लाख श्रमिक ही काम कर रहे हैं इसका मतलब है कि कुल 7 लाख नौकरियां समाप्त हो गई है।

व्यापारियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जीएसटी और नोटबंदी के दोहरे मार के चलते सूरत में कपड़ा व्यापार की सैकड़ों दुकानें बंद हो गईंं। खुदरा विक्रेताओं को जीएसटी लगाए जाने के बाद खरीदारों से बिल प्रति बिल भुगतान सुनिश्चित करना पड़ा इससे उनके कारोबार पर भारी असर पड़ा और कई लोगों ने इस व्यवसाय को ही छोड़ दिया।

जीएसटी के एक वर्ष पूरे होने पर द स्क्रॉल की एक रिपोर्ट अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर जीएसटी के प्रभाव की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है।

तमिलनाडु के होसुर में बड़ी विनिर्माण कंपनियों को इस कर से फायदा हुआ है क्योंकि होसुर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने कहा कि ये कर व्यापार के लिए कुल मिलाकर अच्छा था और इसके प्रतिकूल प्रभाव बहुत कम रहे हैं। होसुर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अधिकांश सदस्य अशोक लेलैंड, टाइटन और वेंकटेश्वर हैचरिज जैसी बड़ी कंपनियां हैं। इसके विपरीत होसुर स्मॉल एंड टिनी इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष ने स्क्रॉल से बात करते हुए कहा कि जीएसटी उन्हें और एसोसिएशन के अन्य सदस्यों को किस चोट पहुंचा रहा था। उनके अनुसार सबसे बड़ा मुद्दा ऑटो-पार्ट पुरजा निर्माताओं पर 28% कर था। उन्हें जो कर चुकाना पड़ता था उसका सिर्फ चारगुना ही नहीं बढ़ा बल्कि उनके काम के लिए आवश्यक पूंजी में 20% की बढ़ोतरी भी हुई। इन कंपनियों को बिक्री के समय जीएसटी का भुगतान करना पड़ता था लेकिन उनके ग्राहक 90 दिनों की क्रेडिट अवधि के बाद उन्हें भुगतान करते हैं जैसा कि व्यवसाय में मानक प्रथा है। नतीजतन कर भुगतान पर चूक से बचने के लिए सदस्य क़र्ज़ ले रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक़ तमिलनाडु में एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) की संख्या लगभग 50,000 कम हो गई। इसकी संख्या 2016-17 में जहाँ 2.67 लाख इकाई थी वहीं कम हो कर 2017 -18 में 2.18 लाख इकाई हो गई है।

असम में जीएसटी के तहत कच्चे बांस और बेत पर शुरुआत में 5 प्रतिशत लगाए गए और निर्मित उत्पादों पर 12 से 28 प्रतिशत के बीच कर लगाया गया था। नवंबर में संशोधन के बाद बांस और बेत उत्पादों पर अब 5 प्रतिशत कर लगाया जाता है। इसके अलावा बेत और बांस के फर्नीचर के लिए कर की दर 12 प्रतिशत तक कम कर दी गई है। केवल बेत फर्नीचर या अन्य मूल्यवर्धित वस्तुओं पर 18 प्रतिशत की उच्च दर का कर लगाया जाता है।

असम सरकार की हस्तशिल्प खुदरा दुकानों प्रागज्योति इम्पोरियम की चैन की गुवाहाटी शाखा का प्रबंधन करने वाले ज्ञानेंद्र कलिता ने अक्टूबर में Scroll.in को बताया था कि "जितना ग़लत हो सकता है उतना ग़लत हो चुका है"। जून 2017 में इम्पोरियम की औसत मासिक आय क़रीब 30 लाख थी जो सितंबर 2017 (नया टैक्स लागू होने से पहले का महीना) में घट कर12 लाख रुपए से भी कम हो गई।

बिक्री घटने के अलावा व्यापारियों को हर तीन महीने पर टैक्स रिटर्न दाख़िल करने के काम को निपटाना पड़ता था। हालांकि समय के साथ छोटे व्यवसायियों ने कर चुकाने की नई प्रक्रिया को समायोजित कर लिया है। उच्च टैक्स स्लैब के चलते बेत और बांस के फर्नीचर जैसे उच्च मूल्य वाले सामानों की बिक्री अभी भी प्रभावशाली नहीं है। असम सरकार के इम्पोरियम में फर्नीचर की आपूर्ति करने वाली कंपनी केनक्राफ्ट एंड अलाइड इंडस्ट्रीज के मालिक नवीन सूद ने स्क्रॉल को बताया था कि "फर्नीचर की बिक्री में 60% की कमी" आई थी।

जीएसटी के चलते मुंबई के प्रिंटिंग और पेपर उत्पाद क्षेत्र ने कई समस्याओं का सामना किया है। छोटे व्यवसायों के लिए नकद प्रवाह कम हो गया जिससे उद्योग में काफी गिरावट आई। इस कर के लागू होने के बाद इस उद्योग में खरीदारों की कमी दर्ज हुई और कारोबार में गिरावट आई। कार्यशील पूंजी की कमी भी हुई है जिसके चलते नियोक्ताओं को कई श्रमिकों को हटा दिया है। उत्पाद काफी महंगे हो गए हैं।

जीएसटी लागू होने के बाद छोटे व्यवसाय को काफी नुकसान पहुंचा है। हालांकि 20 लाख रुपए से कम कारोबार वाले व्यवसायों को जीएसटी नंबर की आवश्यकता नहीं है लेकिन ग्राहक केवल उनकारोबारियों के साथ काम करना चाहते हैं जो उन्हें जीएसटी नंबर दे सकते हैं ताकि वे क्रेडिट प्राप्त कर सकें। इसलिए छोटे व्यवसायियों का काम अब बड़ी कंपनियों के हाथों में चला गया है।

GST
जीएसटी
नरेंद्र मोदी
मोदी सरकार
अरुण जेटली
आर्थिक नीतियाँ

Related Stories

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

‘जनता की भलाई’ के लिए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंतर्गत क्यों नहीं लाते मोदीजी!

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

जीएसटी दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी के विरोध में दिल्ली के कपड़ा व्यापारियों ने की हड़ताल

कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि से एमएसएमई क्षेत्र प्रभावित, विरोध में उद्यमियों ने बंद किये शटर

अक्टूबर में आये जीएसटी में उछाल को अर्थव्यवस्था में सुधार के तौर पर देखना अभी जल्दबाज़ी होगी

2021-22 की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किये गए: आर्थिक झटके कार्यपद्धति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं 

तिरछी नज़र: 'नींद क्यों रात भर नहीं आती'

फ़ोटो आलेख: ढलान की ओर कश्मीर का अखरोट उद्योग


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License