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जल संकट : आपका आरओ कितना पानी बर्बाद करता है?
हमारे सामने पानी बर्बाद होता रहता है और हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता है कि हमारे देश में तकरीबन 75 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता है।
अजय कुमार
02 Jul 2019
RO
फोटो साभार: The Hindu

पानी को पानी की तरह समझना ही पानी की बर्बादी का कारण है। हम जिस प्यूरीफायर का इस्तेमाल पानी को साफ करने के लिए करते हैं, उसे इस्तेमाल करते समय एक बात साफ दिखती है कि हम पानी के मोल को नहीं समझ रहे हैं। हमारे सामने पानी बर्बाद होता रहता है और हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता है कि हमारे देश में तकरीबन 75 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता है। 

एक अनुमान के मुताबिक एक लीटर पानी साफ करने के लिए आरओ फ़िल्टर तकरीबन 3-4 लीटर पानी बर्बाद करता है। कहने का मतलब यह है कि एक लीटर पानी के लिए हमारे घरों में अमूमन 3 से 4 लीटर पानी को बिना किसी इस्तेमाल के बहा दिया जाता है। इस तरह से अगर 250 परिवारों की एक कॉलोनी है और हर दिन तकरीबन 100 लीटर पानी इस्तेमाल करती है और आरओ से एक लीटर साफ़ पानी निकालने पर केवल 2 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है तो इसका मतलब है कि एक कॉलोनी में तकरीबन 25हजार लीटर पानी हर रोज बर्बाद किया जाता है। 

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते है कि लुधियाना शहर में, हर दिन आरओ पानी शुद्ध करने वाली मशीनों द्वारा 1.5 करोड़ लीटर पानी बर्बाद किया जाता है। इसका मतलब है कि अकेले लुधियाना शहर में हर महीने 45 करोड़ लीटर अच्छी गुणवत्ता का पानी बर्बाद होता है। यह घरेलू स्तर पर पानी का एक आपराधिक अपव्यय है जब पूरे देश में जल संकट एक गंभीर मुद्दा बन गया है।

मुझे जो आश्चर्यजनक लगता है, वह यह है कि किसानों से पानी की हर बूंद को बचाने के लिए बहुत तेजी से ड्रिप इरिगेशन अपनाने के लिए कहा जाता है। लेकिन हमारे अपने घरों में, हमें RO मशीनों का उपयोग करने में कोई समस्या नहीं है जो कि प्रत्येक 10-लीटर शुद्ध पानी के लिए, 30-लीटर पानी बर्बाद करता है। हेमा मालिनी केंट आरओ मशीनों की ब्रांड एंबेसडर हैं, उसके साथ एक राजनीतिक प्रतिनिधि भी हैं लेकिन मैंने उन्हें कभी नहीं देखा कि उन्होंने पानी की बर्बादी पर चिंता व्यक्त की हो। न ही मैंने मशहूर उद्योगपति आनंद महिन्द्रा को कभी देखा है कि आरओ पर कभी बात करे जबकि वह ड्रिप इरिगेशन के बहुत बड़े पक्षधर हैं। क्या हमें अपने घरों में हर दिन बर्बाद होने वाले पानी के बारे में बात नहीं करनी चाहिए? क्या पानी की हर बूंद को बचाना भी हमारी जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए? क्या हम तकनीक से बिगड़ते हुए रास्ते को अपनाने के लिए ठीक है? 

आरओ मशीन का पहली बार इस्तेमाल साल 1949 में फ्लोरिडा में किया गया था। इस मशीन का असल मकसद खारे पानी वाले समुद्र से पीने लायक पानी निकालना था।  लेकिन इसका इस्तेमाल वहां भी किया जाने लगा जहां पर पानी का खारापन उतना अधिक नहीं था जितना समुद्र का होता है।

इसके दो नुक़सान हुए। पहला तो पानी की बहुत अधिक बर्बादी और दूसरा पानी में मौजूद जरूरी लवणता और खनिज पदार्थ भी आरओ से बाहर होने लगे। यानी शरीर को वह पोषक तत्व भी मिलने कम हो गए जिनकी जरूरत थी।  

साल 2015 में तो यह स्थिति और अधिक खराब थी। ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैण्डर्ड के मुताबिक जितना पानी वाटर प्यूरीफायर मशीन में डाला जाता था, उसका केवल 20 फीसदी पानी ही साफ होकर बाहर आता था। यानी तकरीबन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता था। इतनी बड़ी बर्बादी को रोकने के लिए दिल्ली स्थिति  'गैर लाभकारी संगठन' ने याचिका दायर की। इस याचिका पर इस साल29 मई को सुनवाई करने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह फैसला लिया कि आरओ बनाने वाली कम्पनियाँ वैसी डिजाइन वाली मशीनें नहीं बनाएंगी, जिसमें पानी डालने पर 40 फीसदी से अधिक पानी बर्बाद हो जाए। यानी कम से कम तकरीबन 60 फीसदी पानी को साफ़ करना जरूरी है। और यह भी फैसला दिया कि पानी साफ़ करने के स्तर को बढ़ाकर 75 फीसदी तक ले जाने वाली मशीनें बननी चाहिए। 

इसके साथ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का यह भी फैसला है कि जहां के पानी में 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ठोस पदार्थ हैं, वहां के पानी को साफ करने के लिए आरओ का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं।

NGT का कहना है कि  पानी में प्रति लीटर 500 एमजी तक होने पर आरओ काम नहीं करता उलटे वह उसमें मौजूद कई महत्वपूर्ण खनिजों को हटा देता है जिससे पानी से मिलने वाले मिनरल्स नहीं मिल पाते।

यहां पर पानी में मौजूद टीडीएस की मात्रा भी समझ लेनी चाहिए। TDS यानी पानी में घुले सूक्ष्म पदार्थ।

इनमेंसोडियम, फ्लोराइड,आयरन, क्लोराइड, कैल्शियम, मैग्निशियम, नाइट्रेट जैसे पदार्थ होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अध्ययन के मुताबिक प्रति लीटर पानी में 300 एमजी से नीचे TDS बेहतरीन माना जाता है, जबकि 800 से 900 एमजी खराब और इससे ज्यादा होने पर पानी को पीने योग्य नहीं माना जाता। TDS बढ़ने का मुख्य कारण तेजी से घटता जल स्तर है। इसके अलावा जमीन के अंदर पानी के बीच जो पत्थर या मिट्टी है, अगर वह क्षारीय हैं तब भी पानी में टीडीएस तेजी से बढ़ता हैं। 

यहाँ पर तमिलनाडु की हालत को भी उदाहरण के तौर पर समझना चाहिए। तमिलनाडु का जल स्तर बहुत नीचे चला गया है। यही कारण है कि तमिलनाडु में वाटर प्यूरीफायर के बहुत सारे प्लांट हैं। अगर ऐसी स्थिति है और तमिलनाडु जलसंकट की दौर से गुजर रहा है तो यह बात भी समझी जा सकती है कि बहुत मुश्किल से पानी मिलने के बाद भी पानी बर्बाद होता होता होगा। यही हाल पूरे देश में भी होने वाला है। क्योंकि हर जगह भूजल स्तर कम हो रहा है।  

वर्तमान में तथ्य यह है कि तकरीबन 60 करोड़ भारतीय पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। 75 फीसदी भारतीयों के पास पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है।

हर साल तकरीबन 2 लाख लोगों की मौत पानी की कमी की वजह से हो जाती है। यानी हर दिन तकरीबन 548 मौतें। पिछले केवल एक साल में तकरीबन 21 शहरों का भूमिगत जलस्तर हद से अधिक नीचे चला गया है। साल 2030 तक पानी की मांग पानी की उपलब्धता से दो गुनी अधिक हो जाएगी।

इन सारे आंकड़ों का इशारा साफ़ है कि अभी तक की भारतीय सरकारें पानी और जनता के बीच तालमेल बिठाने में पूरी तरह असफल रही हैं।  

ऐसे में आधुनिक जीवन शैली जमकर पानी का दुरूपयोग कर रही है। पानी को पानी की तरह बहा रही है। आरओ जैसी मशीनों से हर दिन करोड़ो लीटर पानी बर्बाद हो रहा है।

हमारे समाज में अमीरी और गरीबी की भयंकर खाई मौजूद है। गरीब और अमीर तबकों के बीच पानी के उपभोग में भारी अंतर होता है। मानकों के मुताबिक, दिल्ली में, प्रति व्यक्ति 120 लीटर प्रति दिन पानी मिलना चाहिए जबकि संपन्न कॉलोनियों में यह सप्लाई 300  लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन तक होती है जबकि गरीब कॉलोनियों में 40 -60 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन तक! अतः स्वच्छ पानी का वितरण यदि न्यायसंगत हो तो भी आरओ का सहारा कम होगा। 

यहाँ पर स्थानीय निकायों की जर्जर हालत भी जिम्मेदार है। अगर सरकार (यानी स्थानीय निकायों) की तरफ से पेय जल, पाइप द्वारा घरों तक नहीं पहुँचाया जायेगा तो लोग क्या करेंगे?  मजबूरन उन्हें निजी समाधान ढूंढ़ना पड़ता है। या तो पेयजल खरीदते हैं या फिर घरेलू आरओ लगा लेते हैं। इसलिए, पेयजल पहुँचाने में सरकारों की नाकामी एक स्पष्ट कारण है आरओ की बढ़ती लोकप्रियता का। इसमें कमी तभी लायी जा सकती है, जब हमारी सरकारें अपनी ज़िम्मेदारी समझें और हम भी अपनी जीवनशैली में बदलाव कर पाएं।

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