NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
आंदोलन
घटना-दुर्घटना
मज़दूर-किसान
समाज
स्वास्थ्य
विज्ञान
भारत
राजनीति
जश्न मनाते हुक्मरान और डली भर गुड़, ग्लास भर दूध के इन्तजार में मरते बच्चे
दुनिया की तेजी से बढ़ने वाली तीसरी, चौथी, अर्थव्यवस्था होने का भरम पाले देश - भारत - जिसका खुद का नाम एक साहसी बालक के नाम पर रखा बताया जाता है, उस भारत के लकदक हुक्मरान इतना सा भी इन्तजाम नही कर पाये ; और बच्चे मर गये।
बादल सरोज
21 Jun 2019
Badal Saroj

दो रुपये में आठ के भाव आने वाली एक पैरासिटामोल की गोली, ओआरएस घोल या ग्लूकोज़ का एक पाउच वो न हो तो दो चम्मच शक्कर या एक डली गुड़, माथे पर ठंडी पट्टी रखने के लिए बित्ते भर कपड़ा और एक किलो बर्फ : सिर्फ इतना भर मिल जाता तो दिल दहलाने वाली संख्या बन गए मुज़फ़्फ़रपुर के बच्चों में से अधिकांश जुलाई से शुरू होने वाले अपने स्कूल का बस्ता तैयार कर रहे होते।

दुनिया की तेजी से बढ़ने वाली तीसरी, चौथी, अर्थव्यवस्था होने का भरम पाले देश - भारत - जिसका खुद का नाम एक साहसी बालक के नाम पर रखा बताया जाता है, उस भारत के लकदक हुक्मरान इतना सा भी इन्तजाम नही कर पाये ; और बच्चे मर गये। हठी और अहंकारी निर्ममता की हद यह है कि बच्चे अभी भी मरते जा रहे हैं। मुज़फ़्फ़रपुर के बच्चों की मौत का स्कोर डबल सेंचुरी की ओर बढ़ रहा है। 

वहीँ ठीक इस विभीषिका के बीच सफाई देने के लिए बुलाई प्रेस कांफ्रेंसों में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांड़े क्रिकेट विश्वकप के स्कोर को जानने के लिए उतावले हैं तो केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे नींद की झपकी लेते हुए "चिंतन-मनन" कर रहे हैं । इनके साथ कवि की तरह "यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है" की रियायत भी नहीं ली जा सकती क्योंकि यही हैं जो लोकतंत्र की चकरघिन्नी भूलभुलैया से ऊपर चढ़कर हुक्मरान बनने की ऊंचाइयों तक जा पहुंचे है। 

बच्चों की मौतें जितनी विचलित करने वाली थी उससे कम जुगुप्सा जगाने वाली नहीं थी ठीक उसी समय दिल्ली में चल रही हिंदुत्व के स्वयंभू चक्रवर्ती सम्राट की ताजपोशी और उनकी शान में सप्तम स्वर में गाई जा रही विरूदावलियां। सन्नाटे में सुनाई न दे जायें पीड़ा के आर्तनाद, मृत्यु की पदचाप इसलिये जब सैकड़ों बच्चे अंतिम सांसें ले रहे थे ठीक उस समय उनके बटुक अपने क्षणिक इष्टदेव के गगनभेदी जैकारों से संसद के चौबारे गुंजा रहे थे। उनकी सृष्टि के सारे शंख, भोंपू, ढोल और मृदंग दिखाऊ-छपाऊ मीडिया के चारण और भाट समवेत स्वरों में इस पाशविक आल्हाद को हर घर घर तक पहुंचाने में जुटे थे। 

खबर तो ब्रह्मा का अवतरण है, बच्चों का क्या है वे तो मरते रहते हैं। कौनसे पहली बार मरे हैं। दो साल पहले ही तो वे पटापट गोरखपुर में मरे थे। सांस भर ऑक्सीजन के अभाव में अकेले एक अस्पताल में दो रात क़त्ल की रात बन गयी थीं और सैकडां भर का दम घुट गया था। सिर्फ गोरखपुर ने साल भर में 1317 बच्चो की टाली जा सकने वाली रिकार्डेड मौतें भुगतीं । कुछ बिगड़ा योगी आदित्य नाथ और उनकी सरकार का ? बिहार के इसी मुजफ्फरपुर ने इसी मोदी-नीतीश सरकार के शासन तले 2014 में 355 बच्चों की मौतें देखी थीं और इसी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का बड़ा और आधुनिक अस्पताल बनाने का जुमला सुना था। उस कथित अस्पताल की नींव तो नहीं खुदी बच्चों की कब्रों की खुदाई होती रही। कोई शिकन दिखी हर्षवर्धन के हर्षित प्रफुल्लित चेहरे पर ? नहीं !! ढिठाई के परम वैभव के गिरोह को शर्म नहीं आती। 

बच्चे उनकी फ़िक्र में नहीं हैं। जिसे जीतने का वे जश्न मना रहे थे बच्चे उस चुनाव के जिक्र में भी कहाँ थे ? खेल के मैदान, स्कूल के कमरों से गायब होते होते बच्चे अब पार्टियों के इलेक्शन मैनिफेस्टो से भी नदारद हो गये हैं। लोकसभा के 2019 के आमचुनावों में - एक सीपीआई एम के अपवाद को छोड़कर जिसने विस्तार से बच्चों की मुश्किलों के सारे पहलुओं को दर्ज किया था, समाधान सुझाये थे - बच्चे किसी के चुनाव घोषणापत्र में नहीं थे। दुनिया की सर्वाधिक युवा और किशोर आबादी वाले देश का पूरा चुनाव स्वास्थ्य, बाल कुपोषण, शिक्षा और बच्चे-बच्चियों की सलामती की चर्चा तक किये बिना फ़र्जी मुद्दों पर गुजर गया । अब अगर मुजफ्फरपुर के मौत की सेंचुरी बनाते बच्चे हुक्मरानों की चिंता में नही है तो इसमें अचरज की बात क्या है - जब वे हमारे चुनावी जिक्र में ही नहीं थे तो फिर हुक्मरानों की फिक्र में क्यों होंगे ? 

बच्चों की मौतें सिर्फ एक सांख्यिकीय आंकड़ा भर नहीं है। उनका एक सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल भी है। उन्हें मच्छर या एन्सेफिलाइटिस का विषाणु या चमकी बुखार नहीं मारता वे अपनी कमजोरी की वजह से अपनी जिंदगी की लड़ाई हारते हैं। कमजोरी जो उन पर थोपी जाती है।

मध्यप्रदेश के सीधी जिले के चौफाल गाँव में वर्ष 2013 में एक ही गाँव के 44 बच्चों की मौत के खिलाफ लड़ रही सीपीएम की इकाई ने "जीवन मृत्यु तो ऊपर वाले के हाथों में है" कहने वाले कलेक्टर को सौंपने के लिए जब मृतकों की सूची बनाई थी तो यह भयावह सच सामने आया कि जिस चौफाल में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के भाई का परिवार रहता है, जहां जिले के सबसे बड़े अनाज व्यापारी की भी कोठी हैं वहां मरने वाले सभी 44 बच्चे गोंड आदिवासी परिवारों के थे। इन मौतों के बाद गाँव के स्कूल में आपात मेडीकल कैंप लगाए बैठे डॉक्टरों के समूह के प्रमुख ने गीली आँखों के साथ भरी आवाज में इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि "कुनैन की गोलियां बाद की गाड़ियों में आईं कामरेड, मैं तो अपनी गाड़ी समोसे, केले और दूध के पैकेट्स भर के लाया था। बिना यहां आये ही मुझे पता था कि मौतों को रोकने के लिए कुनैन से ज्यादा जरूरी एक केला, एक समोसा और एक कप दूध है।" चौफाल का सच मुजफ्फरपुर से गोरखपुर होते हुए पूरे हिन्दुस्तान का सच है। 

खुद नीतीश-मोदी सरकार के अमंगली मंत्री मंगल पांड़े ने माना है कि बाल कुपोषण से निबटने की कोई योजना उनके स्वास्थ्य विभाग और बिहार सरकार के पास नहीं है। आइसीडीएस के आंगनबाड़ी कार्यक्रम का भी बुरा हाल है। जाहिर है कि हालात इस बात की आश्वस्ति बिलकुल नहीं देते कि कल इस तरह की मौतें नहीं होंगी।

केंद्र सरकार का अगले कार्यकाल का साफ़ संकेत उसका 100 दिन का अजेंडा देता है। इसमें कारपोरेट के लिए हर संभव असंभव छूट है, प्राकृतिक से लेकर अर्जित सम्पदा तक की हर मुमकिन नामुमकिन लूट है। उसमे अमरीका के दबाबों के लिए जगह है, यूएई के नबाबों के लिए जगह है, मोदी के सैरसपाटों की जगह है। मनु है, हिन्दूराष्ट्र है ; नहीं हैं तो बस बच्चे, उनके लिए ग्लास भर दूध, डली भर गुड़ और पूरे बांह की सूती शर्ट नहीं है। उनके माँ-बाप-बेरोजगार भाई बहिन और तीन चौथाई हिन्दुस्तानी नहीं हैं। सिरे से नहीं हैं। 
वे आश्वस्त हैं कि जो नहीं बचेंगे उनके न बचने से सरकार का कुछ पैसा बचेगा जिसे वह किसी अडानी, अम्बानी, मोदी, चौकुशी, माल्या के लिए स्थानांतरित कर सकते हैं। जो बच जाएंगे उन्हें भेड़िये अपनी शाखाओं में लेजाकर उनका मनुष्यत्व हरने के लिए तत्पर और सन्नद्ध हैं ही। 

अगर उनकी चली तो ऐसा ही होना है - असली सवाल है क्या उनकी चलने दी जाएगी !! इसी प्रश्न के उत्तर में निहित है बकाया बच्चों की लुभावनी मुस्कान और स्वस्थ जिन्दगी।

(ये लेख बादल सरोज के फेसबुक वॉल से लिया गया है। ये उनके निजी विचार हैं।)

aes
aes deaths
bihar AES
muzaffarpur
Muzaffarpur deaths
children death
bihar children

Related Stories

बिहार: मुज़फ़्फ़रपुर कांड से लेकर गायघाट शेल्टर होम तक दिखती सिस्टम की 'लापरवाही'

बिहार शेल्टर होम कांड-2: युवती ने अधीक्षिका पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- होता है गंदा काम

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामला : दोषी ने निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायाल में चुनौती दी

मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामला: न्यायालय ने 44 लड़कियों में से आठ लड़कियों को उनके परिवार को सौंपने की अनुमति दी

मुजफ्फरपुर में प्रशासनिक लापरवाही के चलते हुई बड़ी संख्या में बच्चों की मौत!

डेली राउंडअप : मुज़फ़्फ़रपुर पहुंचे नीतीश के ख़िलाफ़ फूटा लोगों का गुस्सा, एनजीओ ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ के खिलाफ सीबीआई ने दर्ज किया आपराधिक मामला


बाकी खबरें

  • अमरीका ने दी तीसरी डोज़ को मंजूरी पर क्या यह जरुरी है ?
    न्यूज़क्लिक टीम
    अमरीका ने दी तीसरी डोज़ को मंजूरी पर क्या यह जरुरी है ?
    18 Aug 2021
    एक तरफ जब अफ्रीका में केवल २.२ % लोगो को ही कोरोना वैक्सीन की दो खुराख़ मिली है, अमरीका में 50 % लोग पूरी तरह से वक्सीनेटेड हैं। अब अमरीका ने कुछ विशेष लोगो के लिए तीसरी डोज़ की भी मंजूरी दे दी है।…
  • DDA के पास दिल्ली के गांवों के विकास के लिए कोई योजना नहीं
    न्यूज़क्लिक टीम
    DDA के पास दिल्ली के गांवों के विकास के लिए कोई योजना नहीं
    18 Aug 2021
    दिल्ली मास्टर प्लान 2041 पर दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी डीडीए ने लोगों से अपने सुझाव देने को कहा है, पर क्या दिल्ली के गाँव में रहने वाले लोगों की राय इसमें शामिल होगी? क्योंकि इन गाँवो की बड़ी…
  • quit india
    एस एन साहू 
    अपने आदर्शों की ओर लौटने का आह्वान करती स्वतंत्रता आंदोलन की भावना
    18 Aug 2021
    स्वतंत्रता आंदोलन ने प्रेस की स्वतंत्रता और सबको साथ लेकर चलने के विचारों का समर्थन किया था और ये आदर्श भारत छोड़ो आंदोलन की विरासत हैं। ये इसलिए भी प्रासंगिक हैं क्योंकि भारत इस समय लोकतांत्रिक…
  • DUTA
    रौनक छाबड़ा
    केंद्रीय विश्वविद्यालयों में तदर्थ शिक्षकों की तादाद का सरकारी आंकड़ा “गुमराह” करने वाला
    18 Aug 2021
    डूटा ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जोर दे कर कहा कि पिछले महीने लोक सभा में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के विपरीत मौजूदा समय में दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 4500 तदर्थ शिक्षक…
  • anil deshmukh
    भाषा
    भ्रष्टाचार के मामले में दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की अनिल देशमुख की याचिका ख़ारिज
    18 Aug 2021
    मामले में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की गुहार लगाई थी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License