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जटिल मनोवैज्ञानिक रणनीतियों पर आधारित हैं यह चुनाव
हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया देश की जनता के अवचेतन मन में एक खास विचारधारा को स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। यह कोशिश की जा रही है कि आरोपित आभासी मुद्दों पर लोग सोचना प्रारंभ करें, इन्हें बुनियादी मुद्दों पर तरजीह दें और उन समाधानों को स्वीकार करें जो उन्हें सुझाए जा रहे हैं।
डॉ. राजू पाण्डेय
25 Mar 2019
सांकेतिक तस्वीर

प्रायः सभी राजनीतिक विश्लेषक आने वाले लोकसभा चुनावों को अत्यंत महत्वपूर्ण मान रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे हिंदुस्तान की तासीर पर असर डालेंगे। इन चुनावों में सरकार का प्रदर्शन तो एक मुद्दा होगा ही लेकिन सत्ताधारी दल की विचारधारा की राष्ट्र व्यापी स्वीकृति या नकार के लिए यह चुनाव एक जनमत संग्रह की भांति होंगे। इन चुनावों में सरकार और सत्तारूढ़ दल ने जो किया है उससे अधिक चर्चा इस बात पर हो रही है कि दुबारा सत्ता में आने पर वे क्या कर सकते हैं। क्या सत्तारूढ़ दल और उसकी विचारधारा को पोषित करने वाले आनुषंगिक संगठन जिस आक्रामक और हिंसक बहुसंख्यकवाद की दबी जबान से वकालत करते रहे हैं देश की जनता उस पर चलने के लिए स्पष्ट जनादेश देगी? एक ऐसे देश में जहां जातिभेद सामाजिक-आर्थिक शोषण का एक प्रमुख औजार है क्या  शोषित-पीड़ित जनता को धर्म के नाम पर शोषकों के खेमे में लाया जा सकता है? क्या संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से समावेशी राष्ट्रवाद से संकीर्ण राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर होने के लिए देश सहमत होगा? क्या राष्ट्रपति प्रणाली या अन्य ऐसी किसी पद्धति के माध्यम से एक ऐसे तानाशाह की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने हेतु देश की जनता तैयार होगी जो उसे दमनात्मक अनुशासन में रखकर संचालित करे?  यह कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका उत्तर आने वाले लोकसभा चुनावों में मिलेगा।

इन चुनावों में देश की जनता को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने के सत्तारूढ़ दल के उस अभियान की शक्ति और सामर्थ्य का परीक्षण होगा जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से निरंतर चलाया जा रहा है। हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया देश की जनता के अवचेतन मन में एक खास विचारधारा को स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। यह कोशिश की जा रही है कि आरोपित आभासी मुद्दों पर लोग सोचना प्रारंभ करें, इन्हें बुनियादी मुद्दों पर तरजीह दें और उन समाधानों को स्वीकार करें जो उन्हें सुझाए जा रहे हैं। सत्तारूढ़ दल के रणनीतिकार मीडिया की निष्पक्षता के भ्रम को बनाए रखते हुए उसके माध्यम से इस प्रचार अभियान को चला रहे हैं ताकि इसकी स्वीकार्यता बनी रहे। विकास को जमीन पर उतारने के बजाय सत्तारूढ़ दल का ज़ोर इस बात पर रहा है कि वह मीडिया के माध्यम से लोगों में विकसित और खुशहाल होने का बोध उत्पन्न कर सके। तथ्यों को गौण और महत्वहीन बनाकर भावबोध को उभारने की कोशिशें लगातार जारी हैं। पुलवामा और बालाकोट प्रकरण यह दर्शाते हैं कि देश की रक्षा नीति और विदेश नीति का मूल्यांकन प्रयासों और उनकी सफलता के वस्तुनिष्ठ और व्यवहारिक आकलन के स्थान पर एक भावनात्मक उन्माद के आधार पर करने के लिए लोगों को मीडिया के माध्यम से किस तरह प्रेरित किया गया। सत्तारूढ़ दल यह जानता है कि युद्ध से अधिक चुनावी उपयोगिता युद्धोन्माद की है। इस तरह के अनेक प्रयोग पिछले पांच वर्षों में हुए हैं। नोटबन्दी के समय और उसके बाद आम जनता को हुई घोर असुविधा को इस तर्क के आधार पर स्वीकार्य बनाने की चेष्टा की गई कि जनता की त्याग, तपस्या और संघर्ष तथा बलिदान उसके शोषकों के काले धन पर शिकंजा कसने में सहायक हैं। आज का -मैं भी चौकीदार अभियान- भी जनता में यह भावबोध उत्पन्न करने की कोशिश है कि वह देश में निर्णय लेने की प्रक्रिया और भ्रष्टाचार से संघर्ष का एक भाग है जबकि हकीकत यह है कि आम जनता न तो निर्णयात्मक स्थिति में है न ही विकास प्रक्रिया का एक भाग है बल्कि वह तो सरकार के कॉरपोरेट समर्थक निर्णयों और पूंजीवादी विकास की शिकार है और उसे कदम कदम पर भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है। 

एक प्रदेश तक सीमित लोकप्रियता और विवादित छवि युक्त श्री नरेंद्र मोदी के अभ्युदय और उनकी राष्ट्रव्यापी एवं अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के पीछे एक सुनियोजित मीडिया कैंपेन की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। विपक्ष आज भी मीडिया द्वारा प्रक्षेपित मोदी जी की लार्जर दैन लाइफ छवि के तिलस्म को तोड़कर असली मोदी को उजागर करने हेतु संघर्ष कर रहा है। असली मोदी के कार्यकाल का अतिशय उदार मूल्यांकन भी उन्हें एक अत्यंत औसत प्रधानमंत्री ही सिद्ध कर सकता है। सामान्यतया राजनेता अपनी जनकल्याणकारी नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचार प्रसार करते हैं और मीडिया की सहायता से इनके लाभों को जनता तक पहुंचाते हैं। किंतु मोदी जी मार्केटिंग और ब्रांडिंग के लिए नीतियां और कार्यक्रम तैयार करते हैं। मोदी सरकार की जिन योजनाओं और कदमों को गेम चेंजर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है उनका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तन लाने से अधिक एक ऐसे महानायक की छवि को उकेरना है जो चौंकाने वाले, असंगत और अनपेक्षित निर्णय लेता है क्योंकि वह प्रज्ञा और मेधा की दृष्टि से आम जनता से कई युग आगे है। मोदी है तो मुमकिन है- जैसे नारे एक आत्ममुग्ध राजनेता का एकालाप कहे जा सकते हैं। संभवतः यथार्थ से इनकी असंगति का अनुभव करने की क्षमता मोदी जी ने खो दी है या फिर अपनी तमाम असफलताओं के बावजूद वे अपने निर्लज्ज आत्मविश्वास से जनता को इस हद तक चकित कर देना चाहते हैं कि वह यह मानने को मजबूर हो जाए कि इतना आत्मविश्वास तो किसी कामयाब राजनेता के पास ही हो सकता है। धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर अपने दक्षिणपंथी समर्थकों को निराश करने वाले मोदी उनमें यह भाव पैदा करने में सफल होते दिखते हैं कि भले ही उन्होंने किया कुछ नहीं है लेकिन इन विषयों पर यदि कोई कुछ कर सकता है तो वे मोदी ही हैं। यहां तक कि भ्रष्टाचार, कालेधन और रोजगार जैसे मुद्दों पर भी -जिनमें मोदी मुकम्मल रूप से नाकाम रहे हैं- जनता में यह धारणा उत्पन्न करने की कोशिश जारी है कि यदि कोई चमत्कार होना है तो वह मोदी द्वारा ही मुमकिन है। मोदी और उनके रणनीतिकार चुनाव को मोदी की उपलब्धियों से अधिक मोदी से अपेक्षाओं पर केंद्रित करना चाहते हैं। चुनाव धीरे धीरे ‘मोदी ने क्या किया’ से ‘मोदी क्या कर सकता है’ की ओर ले जाए जा रहे हैं। मोदी की इस लार्जर दैन लाइफ छवि को विपक्ष भी तब स्वीकारने लगता है और आलोचना के जरिए ही उनके व्यक्तित्व की कथित विशेषताओं को अतिरंजनापूर्ण स्वीकृति देने लगता है जब वह मोदी की तुलना फासीवादी विचारधारा के उन बड़े नामों से करने लगता है जिन्होंने पूरे विश्व को अपनी नकारात्मक शक्ति से झकझोर दिया था। इस तरह मोदी जी के वास्तविक खोखलेपन, वाचालता, अवसरवादिता, प्रदर्शनप्रियता और स्वांग पर चढ़ाए गए फौलादी व्यक्तित्व वाले मजबूत नेता के मुलम्मे को नई चमक मिल जाती है। इस पूरी कवायद का हासिल यह है कि मुद्दों के बजाए मोदी पर चुनावी चर्चा केंद्रित होती जा रही है।

मनोवैज्ञानिक रणनीतियों से परिपूर्ण इस चुनाव में विपक्ष के अब तक के प्रयास निराशा उत्पन्न करने वाले हैं। देश के एक बड़े भाग में राज्यों में भी भाजपा की सरकारें रही हैं। इन प्रदेशों में केंद्र और राज्य सरकारों की समवेत विफलता के ख़िलाफ़ लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। जिन प्रदेशों में विरोधी क्षेत्रीय दलों की राज्य सरकारें हैं वे केंद्र सरकार तथा भाजपा के अहंकार, दबाव की राजनीति और सौदेबाजी की प्रवृत्ति से त्रस्त हैं। यहां तक कि भाजपा के सहयोगी क्षेत्रीय दल भी स्वयं को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करते रहे हैं। ऐसी दशा में विपक्ष के पास भाजपा को पराजित करने का सहज अवसर उपलब्ध है। किंतु विपक्ष का महागठबंधन रूपाकार लेता नहीं दिखता। न तो विपक्षी दल अभी तक एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर पाए हैं जिसे भाजपा के संकीर्ण राष्ट्रवाद और बेलगाम आर्थिक उदारीकरण के विकल्प के तौर पर पेश किया जा सके, न ही वे यह संदेश दे पाए हैं कि भले ही उनके पास सर्वमान्य नेता नहीं है किंतु राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर नेतृत्व और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के सवाल उनके लिए गौण हैं। कांग्रेस भाजपा की रणनीतियों की काट ढूंढ़ते ढूंढ़ते अपनी मौलिकता खो रही है। चाहे वह हिंदुत्व का मामला हो या राममंदिर का या गोरक्षा का या फिर भारत पाकिस्तान संबंधों से जुड़े सवाल हों कांग्रेस की जवाबी रणनीतियों में भाजपा की लाइन के अनुकरण की एक क्षीण किंतु स्पष्ट प्रवृत्ति देखने में आती है। हो सकता है कि कांग्रेस के रणनीतिकार यह मानते हों कि सॉफ्ट हिंदुत्व की चर्चा या राममंदिर के समर्थन में बयानबाजी या भाजपाई राष्ट्रवादियों की तर्ज पर लगाए गए नारे भाजपा के वोट बैंक को कांग्रेस की ओर ला सकते हैं किंतु इस तरह वे सर्वसमावेशी कांग्रेसवाद और कांग्रेस पार्टी की समृद्ध और मूल्यवान विरासत की अनदेखी कर देते हैं। कांग्रेस और कांग्रेसवाद देश की कई पीढ़ियों के जीवन को प्रेरित करता रहा है और धुर दक्षिणपंथ की ओर देश की जनता के आंशिक और अल्पकालीन रुझान को स्थायी मानकर अपनी बुनियाद को नकार देना कांग्रेस की बड़ी भूल हो सकती है। यही स्थिति राहुल और मोदी की प्रतिद्वंद्विता में देखने में आती है। मोदी ने अपने कार्यकाल में राजनीतिक विमर्श को भाषा और कथ्य की दृष्टि से बहुत निचले स्तर पर ले जाने का कार्य किया है और राहुल गांधी जब शब्द दर शब्द, संवाद दर संवाद मोदी को उन्हीं के स्तर पर गिरकर उत्तर देने की कोशिश करते हैं तो बहुत हताशा होती है। चाहे वह बेलगाम बयानबाजी हो, विदेशों में इवेंट मैनेजरों द्वारा तैयार मेगा शो का आयोजन हो या सोशल मीडिया पर फैलाई गई गंदगी हो राहुल मोदी को शॉट दर शॉट मैच करते नजर आते हैं। इस तरह वे नेहरू-इंदिरा-राजीव की उस गरिमामयी शैली को नकार देते हैं जिसमें चुनावी सभाओं में सारे राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर गहन चर्चा के बाद अंत में ससंकोच अपने प्रत्याशी का नामोल्लेख किया जाता था। वर्तमान चुनावी सभाओं के भाषण सत्तर और अस्सी के दशक की फॉर्मूला फिल्मों के संवादों की याद दिलाते हैं जिन पर सामने की सीटों से तालियां बजती थीं और सिक्के उछाले जाते थे। अब आम जनता को यह सिद्ध करना है कि फॉर्मूला फिल्मों की तरह राजनीति में भी सस्ते संवादों का युग बीत चुका है।

ऐसा लगता है कि कांग्रेस के धावक जनांदोलनों और उपचुनावों के परिणामों के रूप में गूंजती व्यापक जनअसंतोष की स्टार्टिंग पिस्टल की आवाज़ समय पर सुनने में असफल रहे और चुनावों की रेस में भागना उन्होंने जरा देरी से प्रारंभ किया है। संभवतः तीन राज्यों में मिली चुनावी सफलता के बाद कांग्रेस को अपनी शक्ति और राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता का बोध हुआ और उसने पूरे देश में फैले पार्टी कैडर को पुनः जगाने की कोशिश प्रारंभ की। यह भी संभव है कि मोदी की करिश्माई छवि का मुक़ाबला करने में राहुल को असमर्थ पाकर उसने अपनी सर्वश्रेष्ठ नेत्री प्रियंका गांधी को मैदान में उतारा हो। हो सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व के यह प्रयास आने वाले वर्षों में कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर उसका खोया हुआ स्थान वापस दिला दें किंतु इन चुनावों की मांग तो वोटों के विभाजन के लिए समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन ही है। अपने कार्यकर्ताओं की निष्ठा और मनोबल को बचाए रखने के लिए कई राज्यों में शायद अकेले चुनावों में उतरना कांग्रेस नेतृत्व की विवशता रही हो लेकिन उसका यह कदम उसके साथी क्षेत्रीय दलों को उस पुराने कांग्रेसी अहंकार की याद दिलाता है जब वह क्षेत्रीय दलों को विघटित कर उनकी सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश बड़ी निरन्तरता से किया करती थी। प्रियंका की एंट्री कांग्रेस समर्थकों में नया जोश तो भर रही है लेकिन प्रियंका के सहज राजनीतिक कौशल, उनकी शालीन और मर्यादित अभिव्यक्ति, जनता से सहज संवाद स्थापित करने की उनकी कला और करिश्माई व्यक्तित्व को देखकर कोई भी सच्चा कांग्रेसी इस बात का अफ़सोस कर सकता है कि उन्हें राजनीति में लाने में पार्टी ने देर कर दी- शायद उन्हें एक दशक पहले आ जाना था। अब जब प्रियंका राजनीति में हैं तो उनकी तुलना राहुल के साथ अवश्य होगी और इस तुलना का परिणाम हम सब को पता है। राहुल और प्रियंका के न चाहते हुए भी पार्टी में उनके समर्थकों की टोलियां बनेंगी जो कालांतर में पृथक शक्ति केंद्रों का रूप ले लेगी। प्रियंका ने मतदाता के मन में भी एक दुविधा उत्पन्न कर दी है। मोदी जी के अहंकार, राहुल के प्रति उनकी अपमानजनक टिप्पणियों और नेहरू गांधी परिवार के प्रति उनकी अतार्किक कटुता ने राहुल के प्रति आम जनता में एक सहानुभूति की लहर पैदा कर दी थी। वे हिंदी फिल्मों के उस भोले नायक की भांति लग रहे थे जिसे पूरी फिल्म में अपमानित, तिरस्कृत और लांछित किया जाता है किंतु अंत में वह नायकोचित गुणों का प्रदर्शन कर विजयी होता है। प्रियंका का पदार्पण कहीं राहुल की सीमाओं को उजागर करने का जरिया न बन जाए। देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका का आकलन उनकी दो विशेषताओं की ओर ध्यानाकर्षण करता है- संकीर्ण प्रादेशिक हितों के प्रति इन दलों की घोर प्रतिबद्धता और इनके शीर्षस्थ करिश्माई नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में शिखर तक पहुंचने की दुर्दमनीय लालसा। यह दोनों ही विशेषताएं किसी भी गठबंधन की समरसता में बाधक हैं। इस बात को लेकर कयास लगाए जाते रहेंगे कि उत्तरप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय भाजपा को फायदा पहुंचाएगा या सपा-बसपा-रालोद गठजोड़ इससे लाभान्वित होगा अथवा कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त होगी। बहरहाल चुनावी परिदृश्य को देखकर कास्पारोव और कारपोव के बीच हुई कुछ अविस्मरणीय मुठभेड़ों की याद हो आती है जिनमें इन दिग्गजों ने ऐसी जटिल व्यूह रचना की थी कि विशेषज्ञों  के लिए परिणाम का अनुमान लगाना असंभव बन गया था।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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