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राजनीति
झारखंड : दल-बदल के सियासी कीचड़ में खिला ‘कमल’
झारखंड विधानसभा के स्पीकर ने विधानसभा न्यायाधिकरण के अध्यक्ष की हैसियत से महज 2 मिनट में दलबदल कानून का सामना कर रहे 6 आरोपी विधायकों को ‘क्लीन चिट’ दे दी।
अनिल अंशुमन
27 Feb 2019
jharkhand assembly
Image Courtesy: jharkhandstatenews.com

प्राकृतिक रूप से यदि कीचड़ में कमल खिले तो सबको भाए। लेकिन जब मामला सियासत में फैली ‘क्षुद्र राजनीति’ के कीचड़ का हो तब इसमें किसी भी कमल का खिलना, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। 20 फरवरी को झारखंड के वर्तमान स्पीकर महोदय के कारनामे ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया। जिन्होंने विधानसभा न्यायाधिकरण के अध्यक्ष की हैसियत से महज 2 मिनट में दलबदल कानून का सामना कर रहे 6 आरोपी विधायकों को ‘क्लीन चिट’ दे दी। जिससे न सिर्फ इन सबों की विधायकी बचा दी बल्कि दल–बदल के अवसरवादी सियासी कीचड़ में “स्थिर सरकार” के कमल को पूरी मजबूती से खिलाए रखा।

ज्ञात हो कि 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था। आदर्श संसदीय मर्यादा की सदैव दुहाई देनेवाली भाजपा ने ‘जोड़–तोड़ की राजनीतिक डील’ से झारखंड विकास मोर्चा के 6 विधायकों को तोड़कर सदन में बहुमत साबित कर लिया। दिखावे के तौर पर 9 फरवरी ‘15 को इनके द्वारा स्पीकर के पास लिखित आग्रह करवा दिया कि उन्हें सदन में अलग से बैठने की अनुमति दी जाय। योजनानुसार स्पीकर महोदय ने भी फौरन संज्ञान लेकर अनुमति दे दी। इसके खिलाफ झारखंड विकास मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष और महासचिव ने विधानसभा न्यायाधिकरण में अपील दायर कर से इन सभी विधायकों पर ‘दल बदल कानून’ के तहत कार्रवाई करने की मांग की। लोकतान्त्रिक तक़ाज़ों के निर्वाहन के तहत न्यायाधिकरण में 12 फरवरी ‘15 से 12 दिसंबर ‘18 तक इस मामले की सुनवाई भी की गयी। जिसमें झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) की ओर से इन विधायकों के दल–बदल से जुड़े सारे साक्ष्य पेश किए गए। जबकि दल छोड़ने वाले विधायकों की ओर से यह तर्क दिया गया कि उन्होंने जेवीएम का भाजपा में विलय कर दिया है। हैरानी की बात है कि सुनवाई कर रहे न्यायाधिकरण के अध्यक्ष जी ने आरोपी विधायकों के ही तर्कों को सही करार देकर जेवीएम नेताओं के सभी तर्कों व सबूतों को अमान्य कर दिया।  

देश की संसदीय प्रणाली परंपरा में यह एक अजूबा ही कहा जाएगा कि एक राजनीतिक दल जिसकी ज़मीनी सक्रियता सदन और उसके बाहर एक विपक्ष की रूप में होने के बावजूद उसे सत्ता पक्ष का अंग घोषित कर दिया गया। भाजपा के प्रवक्तागण इन विडम्बनापूर्ण स्थितियों के लिए हमेशा झारखंड प्रदेश के निर्दलीय विधायकों और विपक्षी दलों को ज़िम्मेवार बताते रहे हैं। साथ ही उन पर ‘खरीद–फरोख्त और अवसरवादी जोड़–तोड़ की राजनीति’ करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। क्योंकि इस प्रदेश की पिछली कई सरकारें जोड़–तोड़ की अवसरवादी राजनीति से ही बनतीं और टूटतीं रहीं हैं। लेकिन राज्य की जनता के सामने यह भी एक खुला हुआ सच है कि इस गंदी राजनीति का सफल खेल सबसे अधिक भाजपा ने ही खेला है। मिसाल के तौर पर 2003 में सबने देखा कि किस प्रकार से बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा द्वारा 4 विधायकों को रातों रात निजी प्लेन से जयपुर ले जाया गया था। जहां उनसे ‘डील’ तय होने बाद ही वापस लाया गया और अर्जुन मुंडा की सरकार का बहुमत कराया गया। इसी घटना से प्रदेश की सत्ता–सियासत में जोड़–तोड़ से सरकार बनाने की अवसरवादी राजनीति की शुरुआत हुई। जिसका खामियाजा सबसे पहले भाजपा को ही भुगतना पड़ा क्योंकि कुछ महीनों में उन्हीं विधायकों ने भाजपा से सीखा हुआ दांव उसी पर चलाकर दूसरी सरकार बनवा दी। हालांकि अवसरवादी सत्ता सियासत के इस खेल में भाकपा-माले को छोडकर कांग्रेस समेत प्रायः सभी विपक्षी दलों ने खुलकर भाग लिया। इस खेल में हुई पराजय से बौखलाई भाजपा ने एक स्वर से जोड़–तोड़ से बनी विपक्षी सरकारों को कोसते हुए स्वयं को आदर्श राजनीति का संत घोषित कर राज्य की बदहाली का सारा ठीकरा इन्हीं पर फोड़ने लगी। 2014 का विधानसभा चुनाव ‘स्थिर सरकार’ के नारे पर लड़ा गया लेकिन बात तब भी नहीं बनी और सदन में बहुमत का आंकड़ा नहीं मिल सका। हालांकि आजसू के समर्थन से सरकार तो किसी तरह बन गयी थी लेकिन झारखंड विकास मोर्चा के 6 विधायकों को तोड़ लेने के बाद ही जाकर भाजपा की “स्थिर सरकार” कायम हो सकी।

झारखंड संभवतः देश का पहला ऐसा प्रदेश होगा, जिसके गठन के महज 18 वर्षों में सात बार सरकारें बन चुकी हैं। दल–बदल की अवसरवादी राजनीति के हमाम में यहाँ सबसे अधिक बेपर्दा होनेवाली राजनीतिक पार्टी भाजपा ही रही है। विधानसभा न्यायाधिकरण में अबतक दर्ज़ हुए दल-बदल के 28 मामलों में सबसे अधिक मामले भाजपा गठबंधन की सरकारों से ही जुड़े रहें हैं। वर्तमान की जिस ‘स्थिर सरकार’ के विकास की चर्चा खुद देश के प्रधानमंत्री घूम घूम कर कर रहें हैं, इसके गठन में 6 दल बदलू विधायकों की ‘डील’ के मामले को गायब कर देते हैं। जिनपर तत्काल मामला दर्ज़ होने के बावजूद चार बरस दो महीने तक सिर्फ सुनवाई ही होती रही। अब जबकि वर्तमान विधानसभा की अवधि समाप्त होने को है तो नतीजा भाजपा के पक्ष में सुनाकर न्यायाधिकरण की औपचारिकता पूरी कर दी गयी। इन्हीं संदर्भों में लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिक आदर्शों की हमेशा दुहाई देने वाली भाजपा की असलियत झारखंड में ही आसानी से देखी–समझी जा सकती है।

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DAL-BADAL
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