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भारत
राजनीति
झारखंड : कोयला का काला कारोबार; सभी हैं हिस्सेदार
न्याय की आशा के लिहाज से हाईकोर्ट के नए निर्देश थोड़ा सुकून देनेवाले हो सकते हैं लेकिन झारखंड जैसे कोयला बाहुल्य क्षेत्र वाले प्रदेश में कौन नहीं जानता है कि यहाँ बरसों बरस से जारी कोयले के काले व्यापार का विस्तार कितना अपार और अपरंपार है।
अनिल अंशुमन
21 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर। साभार : प्रभात खबर

झारखंड हाईकोर्ट ने 18 जनवरी को राज्य की कोयला परियोजनाओं में धड़ल्ले से हो रहे अवैध कारोबार को रोकने की दिशा में झारखंड सरकार को उच्च स्तरीय समिति बनाने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट का यह निर्देश उस याचिका की सुनवाई के बाद दिया गया है जिसमें याचिकाकर्ता ने पलामू प्रमंडल स्थित चतरा ज़िले की कोयला परियोजनाओं में सीसीएल के अधिकारियों, पुलिस–प्रशासन और तथाकथित नक्सलियों के गठजोड़ से हो रहे कोयले के अवैध कारोबार की जांच कर रोक लगाने की मांग की है।

मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ की ओर से सरकार को दिये गए निर्देशनुसार इस उच्च स्तरीय कमेटी को उस इलाके में जारी कोयले के अवैध कारोबार और इस पर दर्ज़ मामलों की सही जांच के लिए इनपर दायर मुकदमों पर नज़र रखनी होगी, ताकि सभी प्रक्रियाएँ समय पर हो सकें। इस मामले में चतरा एसपी की रिपोर्ट के बाद लगभग दर्जन भर लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज़ किया जा चुका है।

न्याय की आशा करने के लिहाज से हाईकोर्ट का यह निर्देश थोड़ा सुकून देनेवाला हो सकता है। लेकिन झारखंड जैसे कोयला बाहुल्य क्षेत्र वाले प्रदेश में कौन नहीं जानता है कि यहाँ बरसों बरस से जारी कोयले के काले व्यापार का विस्तार कितना अपार और अपरंपार है। माननीय हाईकोर्ट ने तो चतरा जैसे छोटे ज़िले के कोयला इलाके में जारी अवैध कारोबार को रोकने के लिए सरकार को कमेटी बनाने का निर्देश जारी किया है। लेकिन इससे ज़्यादा बड़े इलाकों में तो इससे भी बड़े पैमाने पर और ऊपर से नीचे तक संस्थाबद्ध ये कारोबार बड़े मजे से फल–फूल रहा है। चतरा ज़िले में हर दिन होने वाले करोड़ों के अवैध कोयला व्यापार में टीपीसी जैसे जिन नक्सलियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है दरअसल वे सभी आपराधिक उग्रवादी गिरोह हैं। जिनका माओवाद–नक्सलवाद या किसी वाम विचारधारा से दूर–दूर का भी रिश्ता नहीं है। इस सच को राज्य का शासन – प्रशासन सुविचारित राजनीतिक योजना के तहत कभी सामने आने ही नहीं देना चाहता है। क्योंकि इससे राज्य में ‘माओवाद उन्मूलन’ के नाम पर होने वाला सारा खेल ही चौपट हो जाएगा। आज इस प्रदेश में माओवाद धारा को छोड़कर शेष जितने भी तथाकथित नक्सली दस्ते सक्रिय और प्रभावी हैं उनके निर्माण व संचालन में, सत्ता व राज्य पुलिस–प्रशासन तंत्र की मुख्य भूमिका रही है। 2003 में ही भाकपा माले के विधायक महेंद्र सिंह ने राज्य विधानसभा में इस मामले पर तत्कालीन भाजपा गठबंधन सरकार को घेरा था तो सरकार कोई ठोस जवाब नहीं दे पायी थी। जिसका ताज़ा उदाहरण चतरा से सटे लातेहार ज़िले के ‘बकोरिया फर्जी मुठभेड़ कांड’ के मामले में देखा जा सकता है। जिसमें राज्य पुलिस पर जेजेएमपी नामक तथाकथित उग्रवादी गिरोह के इस्तेमाल का सीधा आरोप लगा है।

कोयले के अवैध कारोबार के खेल पर रोक लगाने का जिम्मा हाईकोर्ट द्वारा राज्य सत्ता–राजनीति को दिया जाना सही तो है लेकिन उसकी जमीनी हक़ीक़त में – बिल्ली को दूध की रखवाली का जिम्मा देना– जैसा ही है। तात्पर्य यह है कि न्यायपालिका कोयले के जिस अपार काले कारोबार पर रोक लगाने का जिम्मा विधायिका और कार्यपालिका को दे रही है, उस खेल का जन्म और संचालन इन्हीं के द्वारा हुआ और पूरी मजबूती से चल रहा है। झारखंड हाईकोर्ट जो चतरा जिले की चंद कोयला परियोजनाओं में हो रहे अवैध कारोबार पर सख्त हुआ है – तालाब की छोटी छोटी मछलियों को पकड़ने जैसा ही है। बड़ी मछलियों का सारा खेल तो शीर्ष (केंद्र) से खेला और संचालित किया जाता है। पिछले दिनों का चर्चित ‘कोल ब्लॉक घोटाला’ इसी खेल की एक छोटी बानगी है जो किसी तरह खुलकर सामने आ गया। जिसमें देश के पूर्व कोयला सचिव से लेकर झारखंड प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तक को सुप्रीम कोर्ट ने जेल और जुर्माने की सज़ा दी है। वहीं इस महाखेल में शामिल कुछ बड़ी व निजी कंपनियाँ द्वारा फर्जी कोयला व्यापार से शेयर बाज़ार में अरबों रुपये कमाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा सुनाई है। लेकिन क्या इससे यह महाखेल बंद हो गया अथवा काबू कर लिया गया?  बिल्कुल नहीं, वह बड़े आराम से दिन दूनी रात चौगुनी तरक़्क़ी करता जा रहा है और आगे भी जारी रहेगा। क्योंकि देश की शीर्ष सत्ता की राजनीति व अर्थनीति के संचालक इसके निर्माता–निर्देशक बने हुए हैं। जो इन दिनों वर्तमान सरकार के सहयोग और पूर्ण संरक्षण से देश से बाहर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक में कोयला कारोबार का संचालन कर रहें हैं।

देश में खनन क्षेत्र से जुड़े अवैध कारोबारों में कोयला का काला कारोबार हमेशा से ही नंबर वन पर रहा है। सनद रहे कि हिंदुस्तान में ‘माफिया’ शब्द का जन्म और प्रचलन देश की कोयला नगरी कहे जानेवाले धनबाद से ही हुआ है। आज भी इस अवैध कारोबार का महाखेल सत्ता-राजनीति व कंपनी लूट के दो मजबूत पहियों पर संचालित हो रहा है। जो कितने दिनों तक स्थायित्व ग्रहण किए रहेगा, इसकी भविष्यवाणी फिलहाल तो संभव नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट जैसे न्यायपालिका के शीर्ष निकायों द्वारा समय समय पर लिये जानेवाले हर छोटे–बड़े  संज्ञान का भी अपना महत्व है। क्योंकि जब तक देश में लोकतन्त्र प्रभावी है, न्यायपालिका को भी इससे संबल मिलता रहेगा। इस लिहाज से झारखंड हाईकोर्ट का वर्तमान कदम राज्य में जारी कोयले के अवैध कारोबार के महाखेल के बेलगाम होने पर प्रतीक के तौर पर ही सही लेकिन एक अंकुश लगाने जैसा प्रभाव तो डालेगा ही, साथ ही इस महाधंधे के शातिर महारथियों में असलियत खुलने का डर पैदा करेगा।

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