NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
झारखंड : साल का पहला दिन आदिवासियों को आज भी शोक से भर देता है
देश की आज़ादी के दूसरे ही वर्ष 1948 की पहली जनवरी को खरसावाँ में ओडिशा राज्य की पुलिस ने सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों की जान ले ली थी। जिसकी देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने जालियाँवाला से भी बड़ा जनसंहार कहकर निंदा की थी।
अनिल अंशुमन
01 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर। साभार

1 जनवरी के दिन झारखंड प्रदेश के सिंहभूम ज़िला स्थित खरसावाँ संभवतः पहली ऐसी जगह है जहां के लोग नववर्ष की खुशी नहीं मनाते हैं। 1948 से ही वे इस दिवस को एक काले दिन के रूप में याद करके शोक मनाते हैं। क्योंकि देश की आज़ादी के दूसरे ही वर्ष 1948 की पहली जनवरी को यहाँ ओडिशा राज्य की पुलिस ने सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों की जान ले ली थी। जिसकी देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने जालियाँवाला से भी बड़ा जनसंहार कहकर निंदा की थी।

देश के इतिहास लेखन की मुख्यधारा में आज भी सही स्थान नहीं मिलने के बावजूद 1 जनवरी 1948 के खरसावाँ के भीषण जनसंहार कांड की स्मृतियाँ आदिवासी समुदाय में अब भी जीवंत हैं। जो केवल उनके मानस में सिर्फ शोक व उदासी के रूप में ही नहीं वरन अपने पृथक राज्य गठन की पहली उद्घोषणा के दिवस के रूप में भी अंकित है। इसे आज़ाद भारत के इतिहास में झारखंड राज्य गठन के सबसे पहले आंदोलन की शुरुआत भी कहा जा सकता है। जब आज़ादी के तुंरत बाद देश में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चलायी जा रही थी। ओडिशा सरकार पूरे सिंहभूम इलाके को अपने राज्य में ही शामिल करने पर अड़ी हुई थी। जिसके पक्ष में सरायकेला और खरसावाँ के राजा भी अपने पूरे दल-बल और लाव-लश्कर के साथ खड़े हो गए थे। जबकि इस क्षेत्र के सारे आदिवासी व मूलवासी समुदाय के लोग अपना पृथक झारखंड राज्य बनाने की मांग करते हुए इस इलाके के ओडिशा राज्य में विलय का पुरज़ोर विरोध कर रहे थे। उनका तर्क था कि अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहली बागवत ‘कोल विद्रोह’ उन्होंने ही किया था, इसलिए इस क्षेत्र की स्वायत्तता पर उनका ही हक़ है। इस मांग के विरोध में न ओडिशा सरकार बल्कि खरसावाँ- सरायकेला के राजा भी पूरी हठधर्मिता से पेश आ रहे थे।

kharsanwa 2.jpg

1 जनवरी को हुए कांड के बचे हुए प्रत्यक्षदर्शी रहे बुजुर्ग आदिवासियों के अनुसार 25 दिसंबर 1947 को खरसावाँ इलाके के चंद्रपुर स्थित जोजोडीह नदी के किनारे इलाके के सभी आदिवासी गांव के प्रतिनिधियों ने इकट्ठे होकर एक बड़ी बैठक की थी। जिसमें सर्वसम्मति से तय किया कि सिंहभूम क्षेत्र को ओडिशा राज्य में नहीं शामिल होने देना है और इसे अलग झारखंड राज्य के रूप में गठित करवाना है। इस फैसले की जानकारी देश के संविधान सभा सदस्य रहे व मशहूर हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा, जिन्हें आदिवासी समाज के लोग अपना सर्वमान्य नेता मानते थे समेत रांची व आसपास के सभी आदिवासी संगठनों व नेताओं को दे दी गयी थी। उसी मीटिंग में इस मुद्दे पर 1 जनवरी को खरसाँवाँ के बजार टांड के मैदान में इलाके के सभी आदिवसियों को इकट्ठा करने का निर्णय लिया गया। इसे संबोधित करने के लिए जयपाल सिंह मुंडा समेत कई अन्य वरिष्ठ आदिवासी नेताओं को भी बुलाया गया। जयपाल सिंह के आने की स्वीकृति की खबर सुनकर पूरे इलाके के आदिवासियों में उत्साह की ऐसी लहर फैली कि लोग तीन-चार दिन पहले से ही पूरे परिवार व सगे संबंधियों के साथ खरसाँवाँ चल दिये थे।

1 जनवरी को खरसावाँ में आदिवासी जुटकर सरायकेला-खरसावाँ राजमहल पर हमला करेंगे की झूठी खबर फैलाकर ओडिशा सरकार ने एक दिन पहले ही रात के अंधेरे में भारी सशत्र पुलिसबल भेजकर पूरे इलाके में तैनात कर दिए। राजमहल में भी बंदूकधारी कारिंदों का पहरा बढ़ा दिया गया। शासन की इन तैयारियों से बेखबर हजारों हज़ार की संख्या में आदिवासी अल्ल सुबह से ही खरसावाँ बाज़ार टांड मैदान में जुटने लगे थे। उस दिन साप्ताहिक हाट भी थी इसलिए भीड़ बढ़ती ही जा रही थी लेकिन वहाँ काफी संख्या में तैनात सशत्र पुलिस बल की मौजूदगी पर किसी ने भी बहुत ध्यान नहीं दिया। निर्धारित समय से पूर्व ही सभा शुरू हो गयी लेकिन इसी दौरान सूचना आयी कि जयपाल सिंह मुंडा किसी कारणवश नहीं आयेंगे। जिससे थोड़ी अफरा तफरी होने से लोग इधर उधर होने लगे थे। वहाँ जुटी बीसियों हज़ार से भी अधिक आदिवासियों की संख्या जो लगातार बढ़ती ही जा रही थी, इससे हो रहे मनोवैज्ञानिक दबाव व उनकी भाषा भी नहीं समझ पाने और उनसे संवादहीनता की स्थिति ने वहाँ तैनात पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों व पुलिस बल को काफी डरा दिया। सभा से उठते जोशभरे नारों के शोर से इनका कलेजा बैठने लगा। हालांकि वहाँ एकत्र सभी आदिवासीयों का ध्यान सभा में की जा रहीं बातों पर ही लगा हुआ था। तभी बिना कोई पूर्व चेतावनी दिये पुलिस ने सभा को निशाना बनाकर फायरिंग शुरू कर दी। चंद मिनटों में बाज़ार टांडा मैदान अनगिनत लाशों व घायलों से पट गया। अचानक हुई गोलीबारी से मची भगदड़ में कई लोग तो जान बचाने के लिए उसी मैदान में बने इकलौते कुएं में ही कूद पड़े तो कइयों को पुलिस ने अधमरे हाल में लाकर फेंक दिया। बताया जाता है कि कुछ ही देर में वह भी लाशों से भर गया था। आज वह कुआं नहीं है क्योंकि गोलीकांड के बाद वहाँ पड़ी जिन लाशों को लेने कोई नहीं आया उन्हें उसी कुएं में डालकर सदा के लिए बंद कर दिया गया। सरकार के अनुसार इस गोलीकांड में मात्र 17 लोग ही मारे गए जबकि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मृतकों की संख्या हज़ार से भी अधिक होगी।

आज भी हर साल 1 जनवरी को हजारों लोग किसी पिकनिक स्थल पर जाने की बजाय खरसावाँ गोलीकांड में मारे गए लोगों की स्मृति में बने समाधि स्थल पर पूरे परिवार के साथ आते हैं और फूल चढ़ाकर नम आँखों से उन्हें याद करते हैं। आज आदिवासी समुदाय की ये गहरी पीड़ा है कि देश के सामाजिक-राजनीतिक जीवन के सभी क्षेत्रों में जो उपेक्षा – वंचना हो रही है, वही भेदभाव देश के इतिहास लेखन की मुख्यधारा में भी जारी है। जबकि इस देश की स्वतंत्रता की जंग लड़ने से लेकर राष्ट्र व झारखंड निर्माण कार्यों में इनकी भूमिका भी किसी से कम नहीं रही है। आज़ाद भारत में आदिवासी अस्मिता व स्वायत्तता की लड़ी गयी पहली जंग .... खरसावाँ गोली कांड  ... का सम्मानजनक रूप से दर्ज़ न होना, बताता है कि हमारे देश के आदिवासी समुदाय को अपनी जद्दोजहद आज भी जारी रखनी होगी ..... !

Kharsawan
Seraikela Kharsawan
Jharkhand
Adivasi
tribal communities
Kharsawan Massacre
1st january
new year
आदिवासी
खरसावाँ नरसंहार

Related Stories

गुजरात: पार-नर्मदा-तापी लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ने की तैयारी!

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला


बाकी खबरें

  • ukraine russia
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूक्रेन पर रूसी हमला जारी, क्या निकलेगी शांति की राह, चिली-कोलंबिया ने ली लाल करवट
    15 Mar 2022
    'पड़ताल दुनिया भर की' में, वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने यूक्रेन पर रूसी हमले के 20वें दिन शांति के आसार को टटोला न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के साथ। इसके अलावा, चर्चा की दो लातिन…
  • citu
    न्यूज़क्लिक टीम
    स्कीम वर्कर्स संसद मार्च: लड़ाई मूलभूत अधिकारों के लिए है
    15 Mar 2022
    CITU के आह्वान पर आज सैकड़ों की संख्या में स्कीम वर्कर्स ने संसद मार्च किया और स्मृति ईरानी से मुलाकात की. आखिर क्या है उनकी मांग? क्यों आंदोलनरत हैं स्कीम वर्कर्स ? पेश है न्यूज़क्लिक की ग्राउंड…
  • yogi
    रवि शंकर दुबे
    चुनाव तो जीत गई, मगर क्या पिछले वादे निभाएगी भाजपा?
    15 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भले ही भाजपा ने जीत लिया हो लेकिन मुद्दे जस के तस खड़े हैं। ऐसे में भाजपा की नई सरकार के सामने लोकसभा 2024 के लिए तमाम चुनौतियां होने वाली हैं।
  • मुकुल सरल
    कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते
    15 Mar 2022
    क्या आप कश्मीर में पंडितों के नरसंहार के लिए, उनके पलायन के लिए मुसलमानों को ज़िम्मेदार नहीं मानते—पड़ोसी ने गोली की तरह सवाल दागा।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः खेग्रामस व मनरेगा मज़दूर सभा का मांगों को लेकर पटना में प्रदर्शन
    15 Mar 2022
    "बिहार में मनरेगा मजदूरी मार्केट दर से काफी कम है। मनरेगा में सौ दिनों के काम की बात है और सम्मानजनक पैसा भी नहीं मिलता है।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License