NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
"मैं एक टैक्स पेयर हूं, मैं सरकार को निर्देश देता हूं कि…"
जेएनयू के विरोध में "मेरा टैक्स...मेरा टैक्स" का ताना देने वालों को #StandWithJNU के साथ सोशल मीडिया ख़ासकर फेसबुक पर जवाब दिया जा रहा है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
13 Nov 2019
jnu

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का मसला जब भी आता है, तब सोशल मीडिया पर एक ख़ास तबके की ओर से 'मेरा टैक्स' का सवाल उठाते हुए छात्रों पर ताना मारा जाता है कि वे उनके टैक्स के पैसे पर ऐश कर रहे हैं, राजनीति कर रहे हैं। इन्हीं सवालों को लेकर आज #StandWithJNU के साथ सोशल मीडिया ख़ासकर फेसबुक पर इस सबका जवाब दिया जा रहा है।  
आर्थिक मामलों के जानकार मुकेश असीम अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : "मैं टैक्स पेयर होने के नाते सरकार को निर्देश देता हूँ कि मेरे टैक्स का पैसा बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होना सबसे उचित है। इस पैसे का प्रयोग सभी के लिए सार्वजनिक मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था में ही किया जाना चाहिए।


मेरे टैक्स का पैसा अंबानी अडानी टाटा बिडला को सब्सिडी व कर्ज और टैक्स माफी के लिए इस्तेमाल होना या मंत्रियों सांसदों विधायकों अफसरों गवर्नरों दलालों ठेकेदारों अपराधियों की अय्याशी में खर्च होना मुझे स्वीकार नहीं।
जो सरकार एक नागरिक और टैक्स पेयर होने के नाते मेरे निर्देश के विपरीत शुल्क बढाकर आम जनता को शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करती है, मैं उस सरकार में अविश्वास व्यक्त करता हूँ।"


मुकेश असीम यह भी लिखते हैं कि पिछले सालों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने जिन पूँजीपतियों धन्नासेठों का 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज राइट ऑफ किया है, वो आम जनता के टैक्स के पैसे से अय्याशी कर रहे हैं। टैक्स पेयर के पैसे से की जा रही उनकी अय्याशी बंद करने के लिए यह कर्ज उनकी संपत्ति जब्त कर वसूल की जानी चाहिेए। इसी तरह पिछले महीने देशी विदेशी पूँजीपतियों व धन्नासेठों का जो डेढ लाख करोड़ रुपये टैक्स माफ किया गया उसे रद्द कर उसकी पूरी वसूली की जानी चाहिए।
उस पैसे को देश के प्रत्येक नागरिक के लिए समान सार्वजनिक मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा के लिए खर्च किया जाना चाहिए। इसके लिए हर जिले में कम से कम एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय व पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज स्थापित करना चाहिए और सभी निजी शिक्षण संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए।

लेखक-शिक्षक हिमांशु पाण्डया भी इसी तर्ज पर अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : "मैं टैक्स पेयर हूँ। मेरी मांग है कि मेरे टैक्स से प्राप्त राशि का प्राथमिक उपयोग शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हो। शिक्षा मुफ्त हो, स्कूलों-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक हों। अस्पताल में कोई शुल्क न हो, दवाएँ मुफ्त मिलें, सभी अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर हों। जेएनयू या एम्स जैसे उच्च स्तरीय संस्थान गरीब आदमी की पहुंच में रहें। ऐसे स्तरीय विश्वविद्यालय या अस्पताल और बनें। ढेर सारे जेएनयू हों।

मैं नहीं चाहता, मेरे टैक्स से प्राप्त राशि कॉरपोरेट सेक्टर के लुटेरों को सब्सिडी देने और डूबत खाते जाने वाला ऋण देने में खर्च की जाए। न मेरे पैसे से ऊंची अश्लील मूर्तियां बनें, न धार्मिक आयोजनों में ये पैसा फूंका जाए। मेरे पैसे से सांसदों को मिलने वाली अपार सुविधाएं और उनकी अय्याशियाँ भी बंद होनी चाहिए।"

इसी अंदाज़ में आज फेसबुक पर #StandWithJNU ट्रेंड कर रहा है। इसके अलावा देश में एक समान शिक्षा और फ्री शिक्षा की बात करने वाले और जेएनयू के चाहने वालों की ओर से कुछ दूसरे सवालों का भी जवाब देने की कोशिश की गई है।

जेएनयू के छात्रों की उम्र को लेकर भी एक सवाल बार-बार उठता है कि इतनी बड़ी उम्र के छात्र यहां क्यों पढ़ रहे हैं। इसी का जवाब देते हुए पत्रकार कृष्ण कांत अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं : "अगर बच्चा पांच साल की उम्र में पढ़ाई शुरू करे तो करीब 17 की उम्र तक इंटरमीडियट पूरा होता है। 20 की उम्र तक ग्रेजुएशन। 22 में प्रोस्ट ग्रेजुएशन। अगर रिसर्च करना है तो आगे पांच साल और यानी उम्र पहुंची 27... इन पांच सालों में अगर रिसर्च कम्प्लीट न हुई तो कुछ महीनों का एक्सटेंशन। एडमीशन वगैरह में अगर एकाध साल बर्बाद हुए तो साल दो साल और मानिए। पोस्ट डॉक्टरेट करना है तो कुछ साल और चाहिए।

भारत का अद्भुद शिक्षा तंत्र है कि ये अपने ही रिसर्च स्कॉलर को अपने विश्वविद्यालय में पढ़ाने लायक नहीं मानते और सालों तक उसे फॉर्म डलवा डलवाकर रगड़ते हैं।

अब जरूरत थी इस तंत्र में सुधार की, लेकिन वह मेहनत का काम था। सरकार ठहरी शातिर। करना धरना कुछ है नहीं, तो उसने भाई लोगों को इस बहस में उलझा दिया है कि ये जेएनयू वाले सब्सिडी के पैसे पर 30 साल तक पढ़ते क्यों रहते हैं? इनसे कोई पूछे कि ये कौन जहान से आए हैं जहां बच्चा हाथ में उच्च शिक्षा की डिग्री लेकर अवतार लेता है।

अगर आप इस बहस में शामिल हैं कि जेएनयू वाला सब 30 साल तक क्यों पढ़ता है तो समझ लीजिए कि आप जड़ हैं। माने चलते-फिरते पाथर।

जो लोग उच्च शिक्षा के बारे में जरा-सा भी जानते हैं, वे ऐसे मूर्खतापूर्ण सवाल नहीं करते।

टैक्स सिर्फ नेताओं के चमचे नहीं देते। इस देश की हर आबादी टैक्स देती है। मजदूर, किसान, झुग्गी वाला, बेघर हर कोई अपनी ज़रूरत के सामान खरीदता है तो उसपर लगने वाला टैक्स अदा करता है। यह धूर्तता भरी निकृष्ट बहस बन्द करो।"

75610630_2499299323511557_4082876291890544640_o.jpg

एक अन्य मैसेज में कहा गया है : "व्हाट्सएप पर एक फेक न्यूज़ बहुत जोर शोर से फैलाई जा रही है कि यह सारी लड़ाई सिर्फ हॉस्टल कमरे का किराया 10 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये किये जाने के ख़िलाफ़ है। पढ़ने वाले को भी लगता है, 300 रुपये महीना तो कोई ज़्यादा नहीं है।

व्हाट्सएप के झांसे में न आएं, वह अधूरी और भ्रामक जानकारी देता है।

कमरा किराया बहुत सारे मदों में से एक मद है, शेष ढेर सारे मदों में वृद्धि का प्रस्ताव है। सबसे ज़रूरी समझने वाली बात ये है कि हॉस्टल के मेस-सफाई-रखरखाव आदि का खर्च और इसके लिए रखे गए कर्मचारियों का खर्च अब विद्यार्थियों से लिया जाएगा।

अब थोड़ा गणित समझें। 18 हॉस्टल, प्रति होस्टल 40 कर्मचारी, प्रति कर्मचारी 20000 रु - यह हुआ 17.28करोड़ सालाना। यदि प्रति कर्मचारी 25000 माने तो हुआ 21.6 करोड़ सालाना। इसे विद्यार्थियों से लिया जाएगा। औसतन एक विद्यार्थी जो अभी 3-5 हज़ार महीना होस्टल फीस देता है, वह छलांग मारकर 12-15 हज़ार हो जाएगी। इसमें अभी पानी,बिजली, इंटरनेट, पुताई,मरम्मत, आदि नहीं जोड़ा गया है यानी रकम इससे ज्यादा भी हो सकती है. और हाँ न्यू पेंशन स्कीम की तरह यह भी बाजार की दरों के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ गई है तो आप अगले महीने या साल की रकम के बारे में अनुमान भी नहीं लगा सकते और विरोध तो नहीं ही कर सकते।

 jnu fee hike.PNG

अब थोड़ा गणित और समझिए ( यह सब जेएनयू छात्रसंघ द्वारा प्रस्तुत आंकड़े हैं ) जेएनयू के लगभग 2500 पीएचडी विद्यार्थी फेलोशिप पाते हैं। हॉस्टल में रहने के कारण उन्हें HRA नहीं मिलता। JRF का दिल्ली का HRA है 7500 रुपये यह हुआ 22.5 करोड़ सालाना। यानी समझे आप! जेएनयू के विद्यार्थी अपना खर्चा अप्रत्यक्ष रूप से खुद दे ही रहे हैं। विश्वविद्यालय बेशर्मी से पब्लिक फंड्स का दुरुपयोग कर इसे व्यवसाय में बदलना चाहता है।

अब एक और आंकड़ा जानिए। जेएनयू के 46 फीसदी विद्यार्थियों की पारिवारिक सालाना आय 1,44,000 रुपये से कम है यानी 12000 रुपये महीना (यह सार्वजनिक उपलब्ध आँकड़ा है, प्रवेश के समय विद्यार्थी को भरना होता है) अर्थात यह फीस वृद्धि जेएनयू के आधे के करीब विद्यार्थियों की पारिवारिक आय के बराबर सी है। अभी इन आंकड़ों में दिल्ली में होने वाले अन्य खर्चे - जिसमें किताबें और परिवहन जो शोधार्थी के लिए सबसे जरूरी है, वो जोड़े ही नहीं गए हैं।

सीधे सीधे गरीब विद्यार्थी के लिए फरमान है - जेएनयू तुम्हारे लिए नहीं है, बोरिया बिस्तर समेटो घर जाओ।"

#StandWithJNU
JNU
Fee Hike
tax payer
privatization of education
JNUSU

Related Stories


बाकी खबरें

  • एपी
    हादसा: चीन में यात्री विमान दुर्घटनाग्रस्त, 133 लोग थे सवार
    21 Mar 2022
    सरकारी प्रसारक ‘सीसीटीवी’ के अनुसार, विमान ‘चाइना ईर्स्टन 737’ टेंग काउंटी के वुझो शहर के पास दुर्घटनाग्रस्त हुआ।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    भाजपा सरकार के संरक्षण में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर रही है MP पुलिस: माकपा
    21 Mar 2022
    “श्योपुर और रायसेन में दोनों ही जगह विवाद समाज के वंचित तबकों आदिवासियों और मुस्लिम समुदाय में हुआ। प्रशासन की कार्यवाही ऐसी होनी चाहिए थी कि दोनों समुदायों में अलगाव और असुरक्षा की भावना खत्म होती।…
  • सुबोध वर्मा
    तो क्या सिर्फ़ चुनावों तक ही थी ‘फ्री राशन’ की योजना? 
    21 Mar 2022
    वर्तमान खाद्यान्न का स्टॉक वैधानिक सीमा से दोगुना है, जिस तरह का उत्पादन हुआ है, खरीद अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर की गई है फिर भी मोदी सरकार मुफ्त राशन योजना का विस्तार करने के मामले पर चुप है।
  • संजय कुमार
    यूक्रेन-रूस युद्ध का संदर्भ और उसके मायने
    21 Mar 2022
    2014 के बाद के यूक्रेन में रूसी अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न और धुर दक्षिणपंथी कार्रवाइयां इस युद्ध के लिए राजनीतिक संदर्भ प्रदान करती हैं, लेकिन पुतिन का झुकाव पहले से ही इस मसले के सैन्य समाधान की तरफ़…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सांसद गिरिराज सिंह के उकसावे पर बेगूसराय में उन्माद भड़काने की हो रही साजिश : भाकपा माले
    21 Mar 2022
    केन्द्रीय मंत्री ने एक मामूली घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा, “ यहां भी हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं, वो अब कहाँ जाएं? इसको लेकर विपक्षी दल भाकपा-माले ने गिरिराज सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि समस्तीपुर के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License