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कौन से राष्ट्र के निर्माण में पढ़ाई जाएगी आरएसएस की भूमिका?   
नागपुर विवि ने बीए (इतिहास) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में आरएसएस पर एक चैप्टर शुरू करने का ऐलान किया है। दिलचस्प ये है कि जिस चैप्टर को हटा कर आरएसएस का इतिहास पढ़ाया जाएगा, वो चैप्टर "सांप्रदायिकता का उदय और विकास" के बारे में था। 
सत्यम् तिवारी
10 Jul 2019
कौन से राष्ट्र के निर्माण में पढ़ाई जाएगी आरएसएस की भूमिका?    

महाराष्ट्र के नागपुर में, जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय है, उसी नागपुर के राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में एक बड़ा बदलाव किया गया है। बीए (इतिहास) द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में आरएसएस के इतिहास पर एक चैप्टर विश्वविद्यालय में शुरू करने का ऐलान किया गया है।

इस विषय के पाठ्यक्रम में कुल 4 भाग हैं : पहले भाग में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन को पढ़ाया जाता है, दूसरे भाग में "भारत-छोड़ो आंदोलन", “असहयोग आंदोलन" के बारे में पढ़ाया जाता है, और इसी विषय के तीसरे भाग में क्रिप्स मिशन इत्यादि के साथ अब आरएसएस का इतिहास पढ़ाया जाएगा। चौथे भाग में सुभाष चंद्र बोस और माउंटबेटन प्लान इत्यादि पढ़ाया जाता है।
 
RSS old syllabus.jpg

                  पुराने पाठ्यक्रम की फोटो

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                                                      नया पाठ्यक्रम की फोटो

आरएसएस के इतिहास को पढ़ाये जाने वाले इस भाग का नाम: “राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका" है। विडंबनाएँ यहीं समाप्त नहीं होती हैं। एक और दिलचस्प बात ये है कि जिस चैप्टर को हटा कर आरएसएस का इतिहास पढ़ाया जाएगा, वो चैप्टर "सांप्रदायिकता का उदय और विकास" के बारे में था। 
विश्वविद्यालय के इस क़दम का कांग्रेस की छात्र विंग ने विरोध किया है और ये विषय न हटाने पर विरोध प्रदर्शन करने की बात कही है। एनएसयूआई का कहना है कि आरएसएस ने "राष्ट्र निर्माण" में कोई सहयोग नहीं किया है, बल्कि आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई में भी भाग नहीं लिया था। 
एनएसयूआई के इस तर्क पर वीसी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “ये विषय एमए में पहले से था, हमने बीए में इसे इसलिए जोड़ा है ताकि छात्रों को इसके बेसिक समझ में आ सकें। इस विषय में 1885-1947 तक ही आरएसएस के काम की बात है, उसके बाद की नहीं।" 
वीसी ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि इस विषय में कांग्रेस के इतिहास को भी पढ़ाया जा रहा है। साथ ही ये भी कहा है कि वो हर किसी की मांग पर विषयों को हटा नहीं सकते। 
इस क़दम का पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता अशोक चव्हाण ने खुला विरोध करते हुए कहा है, “छात्रों को ये भी बताना चाहिए कि कैसे आरएसएस ने भारत-छोड़ो आंदोलन, संविधान और तिरंगे का विरोध किया था।" ग़ौर-तलब है कि आज़ादी के बाद आरएसएस ने 52 साल तक तिरंगे का विरोध किया था और उसकी जगह पर भगवा झण्डा फहराया था। 
इस विषय का नाम "राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका" है, तो आइये हम बात करें कि दरअसल आरएसएस की राष्ट्र-निर्माण में क्या भूमिका रही है। 
आरएसएस : पहचान और काम
आज़ादी के बाद सन् 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। महात्मा गांधी की हत्या और संघ पर प्रतिबंध लगाए जाने के करीब महीने भर बाद पटेल ने नेहरू को 27 फरवरी, 1948 को एक चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी में पटेल ने लिखा कि संघ का गांधी की हत्या में सीधा हाथ तो नहीं है लेकिन ये जरूर है कि गांधी की हत्या का ये लोग जश्न मना रहे थे। पटेल के मुताबिक गांधी की हत्या में हिंदू महासभा के उग्रपंथी गुट का हाथ था। इसके साथ ही इस हत्या में सावरकर के शामिल होने की बात भी सामने आई थी। हालांकि ये प्रतिबंध एक साल बाद 1949 में हटा दिया गया, जब आरएसएस ने ये वादा किया कि वो राजनीति से दूर रहेगा। आज संघ अपने आपको एक सांस्कृतिक संगठन बताता है।
इसके अलावा, आरएसएस के प्रमुख रहे गोलवलकर के बारे में ये बात साफ तौर पर कही  जाती है कि वे हिटलर के पक्के समर्थक थे, और एक जगह उन्होंने लिखा था कि नाज़ी जो नीतियाँ अपना रहे हैं, वो 'अल्पसंख्यकों' से लड़ने में हमें फ़ायदा देंगी। 
आरएसएस गांधी का हमेशा से विरोधी रहा था, और आज़ादी की लड़ाई के वक़्त तरह-तरह के आंदोलनों का भी विरोधी रहा था। "भारत छोड़ो आंदोलन" का आरएसएस ने खुले तौर पर विरोध किया था।

जब हम राष्ट्र-निर्माण में आरएसएस की भूमिका की बात करते हैं, तो ये भी देखना चाहिए कि देश को 200 साल कि ग़ुलामी से आज़ाद करवाने में आरएसएस की क्या भूमिका थी! 
सरल शब्दों में कहा जाए, तो आरएसएस ने देश को आज़ाद करवाने के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि उसके उलट अंग्रेज़ों का समर्थन करते हुए देखा गया। 
आरएसएस के सावरकर जो शुरू में अंग्रेज़ों के विरोधी रहे थे, लेकिन अंडमान में काला पानी की सज़ा के दौरान उन पर हुई हिंसा ने शायद उन्हें डरा दिया था। इसलिए वहाँ से उन्होंने कई-कई चिट्ठियाँ अंग्रेज़ों को लिखीं और उसमें मांग की कि उन्हें छोड़ दिया जाए तो वे हमेशा अंग्रेज़ों के वफ़ादार रहेंगे। 
नागपुर के विश्वविद्यालय के वीसी जब ये कहते हैं कि संघ का इतिहास एक "राष्ट्रवादी" स्कूल का हिस्सा है, तो वो किस राष्ट्र की बात कर रहे हैं?आरएसएस ने आज़ादी के वक़्त कौन सा राष्ट्र चाहा था? एक ग़ुलाम राष्ट्र? या वो राष्ट्र जहाँ राष्ट्रपिता की हत्या कर दी जाए? 
और आरएसएस ने हमेशा से किस राष्ट्र निर्माण की बात की है? 
आज, जब देश की आज़ादी को 70 साल गुज़र गए हैं, ये कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत लगातार एक दक्षिणपंथी राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। आरएसएस जब राष्ट्र की बात करता है तो वो कैसा राष्ट्र चाहता है? आरएसएस चीफ़ मोहन भागवत, और अन्य कई लोगों ने ये बात खुल कर बोली हैं कि आरएसएस एक धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन है। एक संगठन जो हिन्दुत्व को बचाने-बढ़ाने के लिए काम करता है। हिन्दुत्व यानी एक देश जहाँ सिर्फ़ एक धर्म;हिन्दू धर्म के लोग रहेंगे। आरएसएस ने लगातार ये बात स्थापित की है कि उसकी राष्ट्र की परिभाषा दरअसल एक "हिन्दू राष्ट्र" की परिभाषा है। 
हम 1940 के बाद का इतिहास देख लें तो हम ये पाएंगे कि समय-समय पर आरएसएस ने अपने इस एजेंडे को पूरा करने के लिए भरसक प्रयास किए हैं। जब देश का विभाजन हुआ और दंगे भड़के, तो अल्पसंखयकों को मारने और भगाने में कई दक्षिणपंथी संगठनों के साथ आरएसएस की भी भूमिका कही जाती है। उसके बाद गांधी जी की हत्या भी इसी तर्क के साथ हुई कि वो मुसलमानों के हिमायती थे। उसके बाद 84 के सिख विरोधी दंगे, अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और तमाम दंगे, बयान और अन्य कार्रवाईयों को लेकर आरएसएस कठघरे में है।

इसकी हद ये है कि आज भी आरएसएस परोक्ष रूप से भारतीय संविधान से ज़्यादा मान्यता एक धार्मिक किताब मनुस्मृति को देता है। आरएसएस, जो प्रार्थना करता है तो कहता है, वो "हिन्दू धरती को प्रणाम कर रहा है।" 
आरएसएस, आज के वक़्त में 
आरएसएस जिसने हमेशा से राजनीति में शामिल न होने का दावा किया है, साफ़ तौर पर बीजेपी का समर्थक नज़र आता है। सीधे तौर पर आरएसएस बीजेपी का पितृ संगठन कहा जाता है। बीजेपी से प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपायी संघ के सदस्य थे, राम मंदिर के लिए रथयात्रा निकालने वाला लाल कृष्ण आडवाणी आरएसएस के सदस्य रहे और आज, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आरएसएस के सदस्य रहे हैं। 
जब आरएसएस के राष्ट्र निर्माण की बात होती है तो दरअसल ये उस एजेंडे को आगे बढ़ाने की बात है जो चाहता है कि देश एक ऐसे हिन्दू राष्ट्र में बदल जाए जहां दूसरे धर्मों को मानने वाले न रहें और अगर रहें तो दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर।

हमेशा से देखा गया है कि राष्ट्रवाद के नाम पर आरएसएस के साथ-साथ बीजेपी ने तरह-तरह के हथकंडे अपनाए हैं: चाहे वो वंदे मातरम् कहने का मुद्दा हो,भारत माता की जय का मुद्दा हो, गाय के नाम पर हत्या करने का मसला हो, या जो आज चल रहा है; जय श्री राम कहलवाने पर ज़ोर देने का मामला हो। 
ये समझने की ज़रूरत है कि आरएसएस ने राष्ट्र-निर्माण में कोई सहयोग नहीं दिया है, बल्कि भारत के विचार यानी संविधान की प्रस्तावना पर ही लगातार प्रहार किया है। संविधान की प्रस्तावना कहती है कि हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाएंगे। जहां सबके लिए न्याय होगा और विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता होगी। इसलिए आरएसएस का राष्ट्र निर्माण,हिन्दू राष्ट्र का निर्माण तो हो सकता है; लेकिन उस भारत का निर्माण नहीं हो सकता जिसका विचार हमारे संविधान ने हमें दिया है। 

 

 

 

 

 

 

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