NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कहीं अल्पसंख्यक अधिकारों की क़ब्रगाह न बन जाये झारखंड !
सुनियोजित तरीके से वर्तमान सरकार की देख रेख में इस प्रदेश को अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है।
अनिल अंशुमन
27 Dec 2018
रामगढ़ का अलीमुद्दीन मॉब लिंचिंग कांड (फाइल फोटो)
Image Courtesy: Hindustan

प्रायः हर महत्वपूर्ण विश्व दिवसों पर झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री की ओर से अखबारों में जारी होने वाले संदेश का कभी भी विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के अवसर पर नहीं आना गौर करने वाला है। वैसे भी, जो पार्टी केंद्र और इस प्रदेश के शासन में है, अल्पसंख्यकों के अधिकारों से उसे बहुत मतलब नहीं रहता है। बल्कि इसके विपरीत उसकी पूरी राजनीति का मुख्य ताना बाना ही अल्पसंख्यक विरोधी बहुसंख्यक उन्माद की राजनीति को लेकर बुना जाता है। देश के संविधान की दिन रात दुहाई देने वाले इस सरकार के नेता–प्रवक्ता इसी संविधान द्वारा देश के अल्पसंख्यकों को दिये गए अधिकारों पर कभी नहीं बोलते हुए दीखेंगे। क्योंकि वे भली भांति जानते हैं कि अल्पसंख्यक विरोध ही उनकी राजनीति कि आधार-पूंजी है। इसीलिए अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की घटनाओं पर अपने शासन में ‘कानून का राज’ का भ्रम टिकाये रखने के लिए दिखावे की सख्त कार्रवाई करने का खूब शोर मचाते हैं। लेकिन फौरन ‘कानून के छेदों’ का इस्तेमाल कर कांड में गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को न सिर्फ बचा लेते हैं बल्कि सार्वजनिक तौर पर उनका अभिनन्दन–महिमामंडन कर उनकी सामाजिक हैसियत बढ़ाते हैं।       

ये चर्चा-ए-आम है कि जब से एक खास विचारधारा वाली राजनीति की सरकार शासन में क़ाबिज़ हुई है, देश के अल्पसंख्यकों के अधिकार बेमानी बनाए जा रहें हैं। जिसकी सफल प्रयोगशाला के रूप में झारखंड को बनाया जा रहा है, जहां अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की सुनियोजित घटनाओं के दोषियों को कानून के जरिये सज़ा देने का दिखावा भी किया जाता है और बाद में मैनेज कानूनी प्रक्रियाओं के जरिये सभी को बरी भी कर ‘न्याय की जीत’ दर्शाया जाता है। इसे राज्य में घटित कई चर्चित कांडों में साफ तौर पर देखा जा सकता है।

इसी 21 दिसंबर को प्रदेश के लातेहार ज़िला स्थित बालूमाथ मॉब लिंचिंग कांड के सभी 8 नामजद अभियुक्तों को अपर ज़िला सत्र न्यायालय ने उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है। 18 मार्च 2016 को बालूमाथ के झाबर गाँव में घटित यह बार्बर कांड देश की पहली दिल दहला देनेवाली घटना थी जिसमें मुस्लिम समुदाय के छठवीं में पढ़ रहे बच्चे समेत एक नौजवान को तथाकथित ‘गौ रक्षकों’  ने पीट पीट कर पेड़ से ज़िंदा फांसी पर लटका दिया। देश से लेकर विदेशों तक इस कांड के लिए सरकार की निंदा हुई थी। पुलिस ने पहले तो तत्परता से कांड के सभी दोषियों को गिरफ्तार करने का दिखावा किया लेकिन 90 दिन बीत जाने के बाद भी कोर्ट को रिपोर्ट नहीं भेजकर उनकी जमानत का आधार दे दिया था। देखना है कि निचले कोर्ट का यह फैसला कबतक टिका रहता है।

29 जून’17 को ख़बरों की सुर्खियों में आए रामगढ़ मॉब लिंचिंग कांड के 11 नामजद दोषियों को ज़िला सत्र अदालत ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी लेकिन 29 जून’18 को राज्य के हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए सभी दोषियों को तत्काल ज़मानत दे दी। हाईकोर्ट ने दोषियों के खिलाफ पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किए गए वीडियो की वैधता पर ही सवाल उठाकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक का नाम नहीं होने को अपने फैसले की दलील बताया। मृतक अलीमुद्दीन के नाम का ज़िक्र पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रिम्स प्रशासन ने यह कहकर नहीं दर्ज़ किया कि उसकी मौत अस्पताल में नहीं हुई है। जेल से बाहर निकले अभियुक्तों का ‘माननीय’ केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा जी ने सार्वजनिक तौर पर नागरिक अभिनंदन कर ‘राजधर्म’ निभाया।

30 अक्टूबर’16 को जामताड़ा के मुस्लिम युवा मिन्हाज़ अंसारी पर मोबाइल में विवादित पोस्ट लगाने का आरोप मढ़कर ज़िला के नारायणपुर थाने में थाना प्रभारी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता ने पीट पीटकर मार डाला और रिपोर्ट में मौत की वजह इंसेफलाइटिस संक्रमण लिख दिया। जिसका पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई सबूत नहीं मिला और मौत की वजह आंतरिक रक्तस्राव पाया गया। मृतक के परिजनों ने एसपी कार्यालय में लिखित एफआईआर दर्ज कर नारायण पुर थाना प्रभारी व विहिप नेता को मुख्य अभियुक्त बनाया लेकिन एसपी कार्यालय से समुचित कारवाई के आश्वासन के बावजूद आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। दो बरस बाद खबर मिली है कि विभागीय जांच में कांड के नामजद दोषियों की संलिप्तता सही पायी गयी है और कार्रवाई होनी है।

2017 में हजारीबाग के पेलावल गाँव की मुस्लिम महिला के अपनी पालतू गाय को ससुराल ले जाते समय पूरे परिवार के लोगों पर घेरकर जानलेवा हमला किया गया। उन्हें पीटते हुए नारा लगाया गया कि – बालूमाथ में लटकाकर मारा, यहाँ कीचड़-पानी में डुबाकर मारेंगे। जो संभव हो ही जाता लेकिन मौके पर पुलिस के पहुँच जाने के कारण इन्हें अधमरा कर छोडना पड़ा। पीड़ित परिवार की ओर से केस दर्ज होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

2018 के 13 जून को गोड्डा ज़िला के डेवटांड़ आदिवासी बाहुल्य इलाके के पिंडरा गाँव में पशु चोरी के नाम पर दो मुस्लिम व्यापारियों को पीट पीटकर मार डाला गया। जिन चार लोगों को पुलिस ने घटनास्थल के पास खड़ी बेलोरो गाड़ी से नशे में धुत हालत में गिरफ्तार किया, वे सभी बाहरी थे और घटना को अंजाम देने में उन्हीं की मुख्य भूमिका थी। चर्चा में यह भी बात आयी है कि पीटते समय जयश्रीराम के नारे लग रहे थे। इसी प्रकार 2017 के 28 जून को धनबाद इलाके के बुजुर्ग उस्मान अंसारी को घर के बगल में मरी हुई गाय पाये जाने पर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इसी साल 23 मई को सरायकेला–जमशेदपुर इलाकों में बच्चा चोर की अफवाह फैलाकर पुलिस के सामने 6 मुस्लिमों को सरेआम पीट पीटकर मार देने की घटना सर्वविदित है।

उक्त रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटनाओं का ज़िक्र इसलिए है कि किस प्रकार से बड़े ही सुनियोजित तरीके से वर्तमान सरकार की देख रेख में इस प्रदेश को अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। प्रायः हर घटना के बाद सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता व नेता ऐसी घटनाओं पर दुख तो व्यक्त करते हैं लेकिन अपनी सरकार की विफलता स्वीकारने की बजाय विरोध करने वालों को ही राजनीति नहीं करने की नसीहत देते हैं। अल्पसंख्यकों के हितों के लिए अपनी चिंता जताते हुए राज्य के माननीय मुख्यमंत्री ने 2016 के 20 अगस्त को ही भव्य सरकारी समारोह से राज्य अल्पसंख्यक निदेशालय के गठन करने की घोषणा की थी, जो आज तक पूरी नहीं हो सकी है। इधर राज्य का अल्पसंख्यक आयोग कागजी कवायद में व्यस्त है।

Jharkhand
Jharkhand government
minorities
attacks of minorities
violence against minorities
MINORITIES RIGHTS
human rights violation

Related Stories

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

झारखंड: भाजपा काल में हुए भवन निर्माण घोटालों की ‘न्यायिक जांच’ कराएगी हेमंत सोरेन सरकार

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : हेमंत सरकार को गिराने की कोशिशों के ख़िलाफ़ वाम दलों ने BJP को दी चेतावनी

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : …अब साइकिल भी आतंकवादी हो गई...और कूकर...और मोटरसाइकिल!
    21 Feb 2022
    एक चुनाव की ख़ातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साइकिल को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश आमतौर पर पसंद नहीं की जा रही है। मज़दूर-कामगार के लिए तो आज भी साइकिल ही उनकी मोटरसाइकिल और कार है। सोशल…
  • lalu
    भाषा
    चारा घोटाला : डोरंडा कोषागार गबन मामले में दोषी लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद की सज़ा
    21 Feb 2022
    रांची स्थित विशेष सीबीआई अदालत  ने डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये के गबन के मामले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद और 60 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनायी।
  • up
    अजय कुमार
    यूपी से बाहर का मतलब केवल बंबई और दिल्ली नहीं है बल्कि सऊदी, ओमान और कतर भी है!
    21 Feb 2022
    "योगी के समर्थक योगी के पांच काम गिनवा देंगे तो मेरा वोट योगी को चला जाएगा।"
  • hum bharat ke log
    नाज़मा ख़ान
    हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है
    21 Feb 2022
    नफ़रत के माहौल में तराने बदल गए, जिस दौर में सवाल पूछना गुनाह बना दिया गया उस दौर में मुसलमानों से मुग़लों का बदला तो लिया जा रहा है। लेकिन रोटी, रोज़गार, महंगाई के लिए कौन ज़िम्मेदार है ये पूछना तो…
  • European Union
    अब्दुल रहमान
    यूरोपीय संघ दुनियाभर के लोगों के स्वास्थ्य से बढ़कर कॉर्पोरेट मुनाफे को प्राथमिकता देता है 
    21 Feb 2022
    अपनी आबादी के अधिकांश हिस्से का टीकाकरण हो जाने के बावजूद कोविड-19 संबंधित उत्पादों पर पेटेंट छूट को लेकर अनिच्छा दिखाते हुए यूरोपीय संघ के नेतृत्व ने एक बार फिर से बिग फार्मा का पक्ष लिया है और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License