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किसान और महिला संगठनों की नज़रों में बजट 2018 किसान और महिला विरोधी
"बजट किसानों, खेतिहर मजदूरों और गरीबों की माँगों को पूरा करने में विफल रहा।"
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
02 Feb 2018
Translated by महेश कुमार
जेटली
Newsclick Image by Sumit Kumar

अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि मोदी की अगवायी वाली एनडीए सरकार के अंतिम पूर्ण बजट में गंभीर खामियाँ हैं। उन्होंने बजट को जन-विरोधी और मज़दूर वर्ग विरोधी बताया है और बताया कि सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए बजट कैसे तेज़ी से निजी क्षेत्र के निवेश पर निर्भर है।

अखिल भारतीय किसान सभा ने कहा कि सरकार यह दावा करते हुए किसानों को लुभाने की कोशिश कर रही है कि उसने रबी सीजन के लिए किसानों के राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों के मुताबिक पहले से ही एमएसपी बढ़ा दी है। उन सिफारिशों के अनुसार, एमएसपी उत्पादन की लागत से कम से कम 50 प्रतिशत ऊपर होनी चाहिए। हालांकि, इन सिफारिशों को पूरा करने के लिए 2018-19 रबी सीजन के लिए घोषित एमएसपी पर्याप्त नहीं हैं। विज्ञप्ति के मुताबिक, "यह तथ्यों का एक झूठा पुलिंदा है"

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अखिल भारतीय किसान सभा ने यह भी बताया कि उत्पादन लागतों की गणना भी व्यापक रूप से विवादित है, क्योंकि किसानों के संगठनों और कृषि लागत पर बने आयोग ने सरकार की लागत पर गणना के नुस्खे नकार दिया है। इन समर्थन मूल्यों के लाभ को किसानों तक पहुँचाने  के लिए कोई उचित खरीद व्यवस्था भी नहीं है।

अखिल भारतीय किसान सभा ने एक और बात कही उसके मुताबिक़ किसानों को बड़े कर्ज से मुक्त करने के लिए कोई पहल की घोषणा नहीं की गई है, क्योंकि वे इस क़र्ज़ में वर्षों से किसान विरोधी किसान नीतियों की वजह से फँसे है। हालांकि सरकार का दावा है कि कृषि ऋण में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि बजट कई महत्वपूर्ण कारकों को ध्यान में लेने में विफल रहता है, जैसे उत्पादन की बढ़ती लागत आदि। बजट कृषि ऋण के वितरण में असमानताओं को संबोधित करने के भी नाकामयाब रहा है।

अभी भी, केवल 41 प्रतिशत क़र्ज़/क्रेडिट छोटे और सीमांत किसानों को दिया जाता है, जिन्हें वित्तीय सहायता की जरुरत पड़ती है। 14 प्रतिशत क़र्ज़ कॉर्पोरेट्स और संस्थानों को 1 करोड़ रुपये से अधिक ऋण दिया जाता हैं।

अखिल भारतीय किसान सभा आगे मनरेगा के मसले गंभीर स्थिति पर प्रकाश डालता है। देश की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी अधिनियम में कोई वृद्धि नहीं हुई है। यह आश्चर्यजनक है कि 56 प्रतिशत से अधिक मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है और 15 प्रतिशत मजदूरी चाहने वाले पिछले साल बेरोजगार रहेए हैं। मनरेगा ने कार्य दिवसों के लिए लगातार बजट में कटौती और गिरावट देखी है। "कृषि के लिए बजट प्रस्तावों का उद्देश्य कॉर्पोरेट कृषि व्यवसायों की सहायता करना है और किसानों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए कोई भी दृष्टि नहीं है। किसानों, कृषि मजदूरों और गरीबों की मांगों को पूरा करने में बजट विफल रहता है। "

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने बताया कि ऐसे गरीब विरोधी बजट परिवारों को और महिलाओं को किस प्रकार प्रभावित करते हैं, जिन्हें बेरोजगारी के बढ़ते संकट का बोझ उठाना पड़ता है जो कि गतिरोध और जीएसटी के मद्देनजर आया है।

'कृषि और ग्रामीण क्षेत्र' और 'महिला रोजगार और स्वास्थ्य' की सरकारी घोषणाओं के बावजूद इस बजट की कुछ प्रमुख प्राथमिकता होने के कारण जेंडर बजट का आकार कम हो गया है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजट में कुल व्यय का 0.95 प्रतिशत के साथ मात्र 1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई है। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की रिलीज के मुताबिक, "यह कुछ भी नहीं है, बल्कि देश की गरीब महिलाओं और श्रमिकों और किसानों का अपमान है।"

बजट भाषण ने महिलाओं किसानों पर जोर दिया है, लेकिन महिला किसानों के लिए जेंडर आवंटन विशिष्ट रूप बेहद कम है। यहां तक कि ग्रामीण हाट जैसी पहल की घोषणाएं के मद्देनज़र, जो कि किसानों को अपने उत्पाद को सीधे खरीदार को बेचने की सहूलियत की बात करती है, उनके कार्यान्वयन के लिए आवंटित छोटी मात्रा को देखते हुए यह सब खोखला लगता है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के बजट में केवल 1400 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है।

हालांकि वित्त मंत्री इस बजट के माध्यम से फिर से रोजगार बढ़ाने का दावा कर रहे हैं, जबकि कौशल विकास और आजीविका के बजट में कमी आई है। मध्यम और लघु स्केल एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) के लिए आबंटन कम है, केवल उद्यमों के लिए दिया जा रहा टैक्स छूट जो कि रुपये के रूप में टर्नओवर 100 करोड़ है। "यह प्रभावी रूप से छोटे पैमाने के 90 प्रतिशत उद्यमों को बाहर कर देता है जहां महिला कार्यबल का एक बड़ा काम करता हैं।"

पिछले कुछ महीनों में आशा कर्मचारियों सहित योजना कर्मचारियों द्वारा उनके वेतन में वृद्धि के लिए भारी आंदोलन हुआ, लेकिन उन मांगों गौर नहीं किया गया और मिड डे मील स्कीम के लिए 500 करोड़ रुपये और आईसीडीएस के लिए 1090 करोड़ रुपये के साथ केवल मामूली वृद्धि देखी गई।

महिलाओं की शिक्षा को देखते हुए, लड़कियों को शिक्षित करने के लिए योजनाओं का बजट 64 करोड़ रुपए कम हो गया है। महिलाओं की सुरक्षा को भी निर्भया निधि के साथ संबोधित नहीं किया गया है, जो 500 करोड़ रुपये के साथ स्थिर है।

अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति दोनों ने इस बजट के विरोध में देश भर में किसानों और महिलाओं का आह्वान किया ताकि यह बताया जा सके की इस बजट से आम आदमी में कितना असंतोष है।

बजट 2018
किसान
महिला
अरुण जेटली

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