NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
किसानों की ज़िन्दगी -2#
मूलचंद और पार्वती कोल :अलाहबाद ज़िले के गिंज इलाके से आदिवासी किसान
विकास रावल
27 Dec 2017
Translated by सोनाली
किसानों की ज़िन्दगी

2017 में देश भर में किसान आन्दोलनों की लहर सी उठ गयी I ऐसा क्यों हुआ इसे समझने के लिए न्यूज़क्लिक देश भर के विभिन्न किसानों पर एक सिरीज़ लेकर आया है,जो कि किसानों के इंटरव्यू पर आधारित है और जिसे दिल्ली के छात्रों द्वारा सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनोमिक रिसर्च की मदद से बनाया गया है I इस श्रंखला की भूमिका यहाँ पढ़ें I

मूलचंद (40) इलाहाबाद से 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित गिंज नाम के गाँव का एक गरीब कोल किसान है I कोल एक आदिवासी समुदाय है जो उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश की सीमा के आस-पास के इलाकों में बसते हैं I इन्हें मध्य-प्रदेश में अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा हासिल है I लेकिन अचम्भे की बात है कि उत्तर प्रदेश में इन्हें अनुसूचित जाति मन जाता है I यह गाँव पहाड़ी इलाके में स्थित है I 2011 की जनगणना के मुताबिक इसकी जनसंख्या 2,246 थी I 2016 के सरकारी आँकड़ों के हिसाब से गाँव में एक उच्च प्राइमरी स्कूल है I लेकिन स्वास्थ्य सेवाएँ, डाकघर और बैंक नहीं हैं I गाँव में सार्वजानिक यातायात की कोई सुविधा नहीं है I खेती में काम आने वाले संसाधन गाँव में नहीं बिकते, यहाँ कोई भी सहकारी संस्था नहीं है, न ही कोई कृषि विस्तार केंद्र और न ही कोई सरकारी खरीद केंद्र I

मूलचंद ने घाटे और कर्ज़े की अर्थव्यवस्था की पोल खोली और बताया कि कैसे उनका परिवार बस अपना अस्तित्व भर बनाये रखने के लिए कड़ी मेहनत करने को मजबूर है I वो और उनकी पत्नी अपनी तीन बेटियों, एक बेटे और बहू के साथ रहते हैं I उनका सबसे बड़ा बेटा भूपेन्द्र पिछले तीन सालों से घर से दूर रहकर मुंबई में एक रेस्तरां में काम कर रहा है I

उनके पिता के पास 0.85 एकड़ ज़मीन थी, जो मूलचंद और उनके भाई के बीच बाँटी गयी I मूलचंद के हिस्से में 0.29 एकड़ ज़मीन आई I मूलचंद के खेत में पानी एक कनाल से पानी आता है I वो खरीफ के मौसम में धान और रबी में गेहूँ उगाते हैं I

उनके छोटे से खेत में पिछले साल बस 5 क्विंटल धान और 1 क्विंटल गेहूँ ही पैदा हुआ I उन्हें अपना भरण-पोषण करने के लिए 7 क्विंटल अनाज की ज़रूरत होती है, उनके खेत में पैदा होने वाला अनाज उनकी ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता I

इसलिए मूलचंद के पास न तो अतिरिक्त अनाज बचता है और न ही अगले साल इस्तेमाल करने के लिए बीज I पिछले साल उसे धान और गेहूँ दोनों के बीज खरीदने पड़े थे I साथ ही दोनों मौसमों में उन्हें थोडा-थोडा DAP और यूरिया भी खरीदना पड़ा I मूलचंद ने जो हमें बताया उससे पता चलता है कि उनके परिवार ने धान की पैदावार के लिए 1585 रुपए का सामान खरीदा और गेहूँ के लिए 1210 रूपये का I इनके परिवार ने मुश्किल से अपनी लागत की भरपाई की I

खेती का सारा काम खुद परिवार ने ही किया, उन्होंने किसी मज़दूर को नहीं रखा I अगर उनके श्रम को और अन्य संसाधनों को जोड़ा जाये तो उनके परिवार को धान की फ़सल पर 5025 रूपये और गेहूँ की फ़सल पर 2560 रूपये का नुक्सान हुआ I

अगर खेती से उन्हें कोई अतिरिक्त आय नहीं मिलती तो फिर वे खेती में लगने वाले सामान, खाना और परिवार कि अन्य ज़रूरत की चीज़ें कैसे खरीदते हैं ? इन सबके लिए और बाकि आकस्मिक खर्चों के लिए पैसे कमाने के लिए मूलचंद, पार्वती और भूपेन्द्र (मुंबई में) देहाड़ी मज़दूरी करते हैं I

भूपेन्द्र जिस रेस्तरां में काम करता है वहीं रहता और खाता है I इसलिए वो बचत करके हर महीने 5000 रूपये गिंज में अपने घर भेज पता है I मूलचंद और उनकी पत्नी पास ही की पहाड़ियों में पत्थर तोड़कर आजीविका कमाते हैं I जो ठेकेदार उन्हें काम देता है वो उन्हें 500 क्यूबिक फीट पत्थर तोड़ने के लिए 3000 रूपये देता है I 15 दिन की मेहनत के बाद वो इतना पत्थर तोड़ पाते हैं I

इनके परिवार को हमेशा ही पैसे की तंगी से जूझना पड़ता है और बार-बार ठेकेदार से उधार लेना पड़ता है I पिछले साल नोटबंदी के दौरान रबी के पुरे मौसम में ठेकेदार ने इन्हें पुराने नोट दिए I खेती का सामान और अन्य ज़रूरत की चीज़ें बेचने वाले दुकानदार उस समय 500 रूपए के नोट के बदले सिर्फ 400 रुपए का सामान ही दे रहे थे I दूसरे शब्दों में कहें तो नोटबंदी की वजह से पिछले साल रबी के मौसम में उपभोग की वस्तुएँ और खेती का सामान खरीदने के लिए 20 प्रतिशत ज़्यादा खर्चा करना पड़ा I

मई 2017 में मूलचंद और पार्वती को भूपेन्द्र की शादी का खर्चा उठाना पड़ा I इसके लिए भूपेन्द्र की कमाई से बचाए हुए रुपयों के आलावा उन्हें ठेकेदार से उधार लेना पड़ा I इसके साथ ही उन्होंने 22,000 रूपये में अपनी खेती की ज़मीन भी गिरवी रख दी I ग्रामीण भारत में इस तरह के अनौपचारिक कर्ज़े कर्ज़दार को अंततः बंधुआ ही बना देते हैं I इसलिए जब तक मूलचंद कर्ज़ नहीं चुका देता तब तक उन्हें अपनी ज़मीन देनदार को इस्तेमाल करने के लिए देनी होगी I

चूँकि उनकी ज़मीन गिरवी पड़ी है इसलिए इस साल वो खेती नहीं कर सकते I उनके पास बैंक से कर्ज़ लेने का उपाय नहीं है I जिस समय यह सर्वे किया गया तब इस परिवार पर 28,000 रूपये का कर्ज़ था I

मूलचंद ने कहा कि, “मुझे उम्मीद है कि पत्थर तोड़कर और भूपेन्द्र जो रूपये भेजता है उससे हम ये कर्ज़ चुका पायेंगे” I

विकास रावल जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं I

इस श्रंखला का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं I

किसानों की ज़िन्दगी
farmers crises
farmers suicide
tribals
BJP
Neo liberal policies

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License