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कोरोना और मानसिक स्वास्थ्य : युद्ध के भीतर जारी एक और युद्ध  
मंदी जनित अवसाद कोई कपोल-कल्पना नहीं बल्कि कड़वी हक़ीक़त है। अतीत के अनुभव और सर्वेक्षण इस बात को साबित करते हैं कि किसी महामारी के दौरान इसके ख़तरे काफ़ी बढ़ जाते हैं। सवाल यह है कि कैसे इस सबका प्रबंधन किया जाए।

 
भारत डोगरा
17 Jun 2020
mental health

आज से ठीक एक महीने पहले जब दुनिया पहले से ही कोरोनावायरस महामारी के सबसे बड़ी तबाही के दौर से गुजर रही थी, ऐसे में भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस पूरी दुनिया को मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आगाह कर रहे थे। उन्होंने सभी देशों की सरकारों, नागरिक समूहों और स्वास्थ्य अधिकारियों से मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित मसलों पर गंभीरता से ध्यान देने की अपील की।  

 13 मई को कोविड-19 और मानसिक स्वास्थ्य विषय पर गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र की नीतियों की ब्रीफिंग का शुभारंभ करते हुए कहा था कि “मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में दशकों से की गई उपेक्षा और बेहद कम निवेश के बाद आज कोरोनावायरस महामारी परिवारों और समुदायों को अब अतिरिक्त मानसिक तनाव पहुंचाकर बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।" गुटेरेस ने इस बात से भी ख़बरदार किया कि “इस महामारी पर काबू पा लेने के बावजूद पीड़ा, तनाव और अवसाद लोगों और समुदायों को अपनी जकड़ में काफी लम्बे समय तक रखने जा रहे हैं।"

यूएन महासचिव की ओर से जारी मानसिक स्वास्थ्य की रिपोर्ट में कहा गया है कि "इस संकट की वजह से पूरे समाज के मानसिक स्वास्थ्य और सेहत पर गंभीर असर पड़ा है" और इस बारे में आगाह किया गया है कि "काफी लम्बे समय तक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामलों में उछाल का दौर जारी रहने वाला है।" वहीँ संयुक्त राज्य अमेरिका में वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी 26 मई की रिपोर्ट में सूचित किया है कि देश के करीब एक तिहाई नागरिकों में क्लिनिकल बैचेनी या अवसाद के लक्षण नजर आ रहे हैं, जिसे इसने "कोरोनोवायरस महामारी द्वारा वसूले गए मनोवैज्ञानिक नुकसान के सबसे निश्चित और खतरनाक संकेत के बतौर" गिनाया है।

भारत में भी किये गए सर्वेक्षणों में इस व्यापक प्रवृत्ति की पुष्टि हुई है। मई माह के दौरान एक नागरिक समाज संगठन, मानस फाउंडेशन की ओर से दिल्ली में 1200 ऑटोरिक्शा चालकों के बीच व्यापक पैमाने पर फोन आधारित अध्ययन में पाया गया है कि उनमें से 75% लोगों में घबराहट और चिंता के लक्षण देखने को मिले थे। जबकि ऐसे भी कई लोग थे जिनमें नींद को लेकर अनियमितताओं की शिकायत मिली है।

इस तथ्य से तो सभी लोग पूर्व परिचित हैं ही कि लॉकडाउन जैसे हालात में घरेलू हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखने को मिलती है जिसका मुख्य शिकार महिलाओं और बच्चों को होना पड़ता है। इसकी वजह से केवल शारीरिक हिंसा या चोट की स्थिति ही नहीं पैदा होती, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव काफी लम्बे समय तक जारी रहते हैं। इस बीच 20 से 31 मार्च के बीच में भारत में बच्चों के लिए जारी किये गए एक प्रमुख हेल्पलाइन को करीब 92,000 एसओएस कॉल प्राप्त हुए, जो कि हम सभी के लिए एक गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी मई की रिपोर्ट में इस महामारी के दौर में भारतीय आबादी के बीच में बढ़ते तनाव का भी जिक्र किया है। इसमें यूएनएफपीए द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण का हवाला दिया गया है,  जिसके शोध में पाया गया है कि "[भारत में] कुल 34% पुरुषों की तुलना में 66% महिलाएं तनावग्रस्त पाई गई हैं।" इनमें से भी जो महिलाएं गर्भवती या जिनको हाल ही में मातृत्व के अनुभव से गुजरना पड़ा है उनमें स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बना पाने और समाज से सहयोग मिल पाने को लेकर “विशेष तौर पर चिंतित बने रहने की संभावना” व्यक्त की गई है। संयुक्त राष्ट्र ने पाया है कि "कुछ परिवारों में ऐसी व्यवस्था पाई गई है जिसमें महिलाओं के जिम्मे देखभाल के अतिरिक्त कार्यभार जैसे कि घर पर ही बच्चों के स्कूल का कामकाज और बड़े बूढों की देखभाल का काम भी शामिल हो चुका है।"

कुल मिलाकर ये प्रतिबन्ध यदि 6 महीनों तक जारी रहते हैं तो यूएनएफपीए के हिसाब से 3.1 करोड़ "लैंगिक आधार पर हिंसा की अतिरिक्त घटनाएं होने की उम्मीद की जा सकती है" या हर तिमाही 1.5 करोड़ नए मामले देखने को मिल सकते हैं। इसलिए यह समस्या सिर्फ दिल्ली और भारत तक में ही सीमित न रहकर सारी दुनिया में व्यापक पैमाने पर फैल सकती है। संयुक्त राष्ट्र की इसी रिपोर्ट में लॉकडाउन के दौरान इटली और स्पेन में घरों की चहारदीवारी में बंद पड़े बच्चों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा था,  इस सम्बन्ध में उनके माता-पिता के बीच में सर्वेक्षण किया गया था। इसने पाया कि 77% बच्चों को अपना ध्यान केंद्रित कर पाने में कठिनाई हो रही थी जबकि 31% से लेकर 39% बच्चों में अकेलापन, घबराहट, बेचैनी और चिड़चिड़ापन देखने को मिल रहा है।

महामारी के दौरान सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक और उसके साथ जारी लॉकडाउन की वजह से बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी का संबंध मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की बढ़ती घटनाओं में परिलक्षित हो रहा है, जिसकी अंतिम परिणति कई बार आत्महत्याओं नजर आ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में हर साल तकरीबन 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं, अर्थात हर 40 सेकंड में एक मौत हो रही है। यदि इस बेहद विपरीत परिस्थितियों वाली वैश्विक आपदा के चलते इसमें 10% का इजाफा होता है तो दुनिया में एक वर्ष में 80,000 अतिरिक्त आत्महत्या से संबंधित मौतें देखने को मिल सकती हैं।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर सफल आत्महत्या के प्रयास के पीछे कम से कम 20 आत्महत्या के असफल मामले हो सकते हैं, या हर दो सेकंड में एक आत्महत्या की कोशिशें की जाती हैं। कई बार इसमें शामिल व्यक्ति और उनके परिवार वाले, दोस्तों, व्यावसायिक उद्यम, कार्यस्थल से जुड़े कर्मियों और ऐसे लोगों से सीधे तौर पर या परोक्ष रूप से जुड़े अन्य लोगों के लिए यह सब बेहद दर्दनाक साबित हो सकता है। जिस प्रकार की बेहद प्रतिकूल परिस्थितियाँ आज के दौर में देखने को मिल रही हैं, ऐसे में इस दर में यदि 10% की भी वृद्धि होती है तो इसका सीधा मतलब है कि दुनिया भर में एक साल में ऐसे प्रयासों में 16 लाख की वृद्धि देखने को मिल सकती है, जो कि अकल्पनीय अनुपात में त्रासदी में बढ़ोत्तरी की ओर इंगित करती है।

चाहे जितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, हर संभव कोशिशों के जरिये इन संभावनाओं को कम से कम करने के सभी प्रयासों को जी जान से अपनाने की आवश्यकता है। कोविड-19 को लेकर एक दृष्टिकोण निर्मित करने की जरूरत है जिसे तमाम सावधानियों के साथ अमल में लाया जाना चाहिये, लेकिन इसकी वजह से किसी प्रकार के आतंक फैलाने से बचना होगा। जो लोग परेशानियों में घिरे हैं वे लोग काउंसलिंग के लिए और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों और डॉक्टरों तक अपनी पहुँच बना सकें, इसे संभव बनाना भी काफी अहम है। हालाँकि यह मुश्किल काम है लेकिन इसे हर हाल में संभव बनाने के लिए मजबूत प्रयासों को अपनाने की आवश्यकता है। बेहतर तौर पर चलने वाले हेल्पलाइन इस अंतर को आंशिक रूप से भर सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में द नेशनल अलायन्स ऑफ़ मेंटल इलनेस ने चेतावनी दी है कि जो लोग अवसादग्रस्त और मुश्किलों में घिरे हैं, उन सबकी देखभाल किए जाने की आवश्यकता है, खासकर ऐसे लोगों को शराब, ड्रग्स, आग्नेयास्त्रों और सभी प्रकार के जहरीले पदार्थों विशेषकर कीटनाशकों से दूर रखने की आवश्यकता है।

एलायंस का कहना है कि हर साल आत्महत्या करने वालों में से तीन लोगों में से एक की मौत में जो बात निकलकर आती है उसमें पाया जाता है कि आत्महत्या की कोशिशों के दौरान वे शराब के नशे में थे। लेकिन दुर्भाग्यवश संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका उल्टा देखने को नजर आता है, कम से कम जब मामला आग्नेयास्त्रों से जुड़ा हो। हाल ही में एफबीआई ने अपनी जाँच में पाया है कि पिछले वर्ष की इसी माह की तुलना में मार्च 2020 में बंदूक की खरीद के लिए जब इन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच की गई तो आवेदनों में 73% की वृद्धि दर्ज हुई है।

कोरोनावायरस महामारी के विस्तार के तुरंत बाद ही जर्मनी के राज्य हेस्से के वित्त मंत्री थॉमस शेफर की दुखद आत्महत्या की सूचना प्राप्त हुई थी। अपने पीछे वे जो नोट छोड़ गए थे उसमें उन्होंने लिखा था कि इस मुश्किल की घड़ी में वे लोगों की आर्थिक मदद न कर पाने की वजह से असहाय महसूस कर रहे थे। इसे देखते हुए कोई भी साधारण परिवारों और आमजन की तकलीफों और तनावों के बारे में सहज अंदाजा लगा सकता है, जो अक्सर इससे भी काफी गहरे तनावों में घिरे होते हैं।

अमेरिका के ईस्ट टेनेसी में नॉक्स काउंटी में कोरोनावायरस जब अपने प्रसार के शुरुआती चरण में था, तभी वहां पर कई आत्महत्याओं की रिपोर्टों ने सुर्खियां बटोर ली थीं। उस दौरान अखबारों में इस बात को लेकर अफ़सोस जताया जा रहा था कि कोरोनवायरस की तुलना में आत्महत्याओं से कहीं ज्यादा मौतें हो रही थीं। द नॉक्स काउंटी के मेयर, ग्लेन जैकब्स ने सूचित किया था कि अमेरिका के इस हिस्से में मात्र दो सप्ताह के भीतर 12 लोगों की मौत आत्महत्याओं की वजह से हो चुकी थी। इस काउंटी की स्वास्थ्य निदेशक डॉ. मार्था बुकानन का भी कहना था "यह काफी चौंकाने और परेशान करने वाली परिघटना है और एक समुदाय के तौर पर हम सभी के लिए कुछ चीजों के बारे में सोचने के लिए वास्तव में चुनौतीपूर्ण है, जो उन चीजों में अपना योगदान दे सकता है।" वे अपनी बात में उस ओर इशारा कर रही थीं कि किस प्रकार से सरकारों द्वारा इस महामारी के मद्देनजर कई गतिरोध और प्रतिबंधों को थोपा गया है, जिसके फलस्वरूप ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं जो लोगों को आत्महत्या करने की ओर उत्प्रेरित कर रहे हैं।

3 अप्रैल को एक वैज्ञानिक अमेरिकी ब्लॉग में लिखते हुए, एड्रियाना पिनाय ने चेताया था कि 2003 में सार्स (SARS) प्रकोप के बाद बूढ़े लोगों के बीच में आत्महत्या की दर में वृद्धि देखी गई थी, जो कि वर्तमान संकट के बाद भी आने वाली चीज़ों की सूचक के तौर पर देखी जा सकती है। एमबी पेल और बेंजामिन लेसर ने 2007-2009 के दौरान रोजगार के क्षेत्र में आई व्यापक मंदी के बारे में रायटर में प्रकाशित रिपोर्ट जिसपर व्यापक स्तर पर चर्चा हुई थी, जिसमें 10,000 से अधिक लोगों की मौतें आत्महत्या की वजह से हुई थी। रिपोर्ट में इस बात को इंगित किया गया है कि "बेरोजगारी की दर में 20% की वृद्धि – एक पुर्वानुमान जो कि अब सभी पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में एक आम बात हो चुकी है- जो यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में 20,000 अतिरिक्त आत्महत्याओं की वजह उन लोगों के बीच में बन सकती है जो या तो नौकरियों से निकाल दिए गए हैं या तकरीबन खाली हो चुके जॉब-मार्केट में नौकरी की तलाश में प्रवेश कर रहे हैं।“

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता हारून रीव्स का भी अनुमान है कि यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में बेरोजगारी की दर में होने वाली हर एक प्रतिशत की वृद्धि की वजह से आत्महत्या की दर में भी तकरीबन 1% की वृद्धि देखने में आ रही है।

इन खतरों के मद्देनजर भारत में हेल्पलाइन और पेशेवर देखभाल के साथ ही ऑनलाइन और टेलीफोन के जरिये मदद पहुँचाने के प्रयासों की शुरुआत की जानी चाहिए। इसे आम जन में बिना किसी भय या आशंका को पैदा किये ही अंजाम देना चाहिए। इस विषय में जरुरी एहतियातों को समुदायों के बीच में बेहद शालीन तौर पर और ध्यानपूर्वक फैलाने की जरूरत है। पहले ही काफी कुछ नुकसान लोगों के बीच में भय के संचार के जरिये पहुँचाया जा चुका है।

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और सार्वजनिक हित के मुद्दों के विशेषज्ञ के तौर पर जाने जाते हैं। आपकी नवीनतम पुस्तकें प्रोटेक्टिंग अर्थ फॉर चिल्ड्रेन और प्लेनेट इन पेरिल हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रजी में प्रकाशित मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

War Within a War: Covid and Mental Health

mental health. covid-19
Depression
suicide
sushant singh rajput

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