NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए श्रम कानून से खिलवाड़
सत्यकी रॉय
23 Jun 2015

मोदी सरकार श्रम सुधारों को लागू करने के लिए बहुत उत्सुक दिखाई दे रही क्योंकि उद्योगपतियों की तरफ से इसकी मांग काफी लम्बे समय से की जा रही है. अक्तूबर 2014 में प्रधानमंत्री ने भारत में बनाओ नारे की रौशनी मेश्रम के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा श्रम से जुड़े मुद्दों को मजदूरों के नजरिये से देखने की जरूरत है बजाय मालिकों के. हालांकि तथाकथित श्र्मयोगी के नारे के पीछे वास्तविक चिंता भारत में मजदूरों की भयावह हालत को संबोंधित करना नहीं था. बल्कि इसका इस्तेमाल तो ‘इंडिया इंक’ को संतुष्ट करना था जो उनके प्रति दृढ़ सरकार के समय में अपने बेहतर वक्त की उम्मीद लगाए बैठे हैं. जैसा कि देश में बहुमत श्रम शक्ति बिना किसी काम के बैठी है इसलिए वह अतिरिक्त श्रम का फायदा उठाने की जुगत में हैं; लोग कम मजदूरी में गैर-मानवीय हालातों में काम करने को तैयार हैं. इसलिए भारत के नीचे के स्तर पर रहने की दौड़ जीतने के लिए एक आदर्श उम्मीदवार है. भारत में श्रम सुधारों का मतलब है मजदूर वर्ग के संस्थागत और कानूनी अधिकारों का सत्यानाश करना और दुनिया को बताना कि निरंकुश मुनाफा कमाने के लिए हमारा देश सबसे बेहतरीन जगह है.

                                                                                                                                      

पहला कदम लघु कारखाना (रोजगार और ससेवाओं की अन्य हालातों का विनियमन) कानून, 2014 को पेश करना था. जिन कारखानों में 40 मजदूर तक काम करते हैं यह कानून उन्हें 16 श्रम कानूनों की पकड़ से बाहर कर देता है जैसे फैक्ट्री एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ईएसआई अधिनियम और मातृत्व लाभ अधिनियम आदि. फैक्ट्री एक्ट हाल ही में बधाई गयी श्रमिकों की संख्या (बिजली के साथ) 10 से 20 और 20 से 40 (बिना बिजली के) पर ही लागू होगा. इसका मतलाब यह है कि करीब 12.6 लाख मजदूर संगठित विनिर्माण क्षेत्र में जो कि भारत की कुल फेक्टारियों की संख्या के 65 प्रतिशत हिस्से में काम करते हैं और जिनमे 40 मजदूर से कम काम करते हैं वे फेक्टरी एक्ट के मुताबिक़ श्रम कानूनों के दायरे में नहीं आयेंगे. औद्योगिक विवाद अधिनियम के अनुसार अब तक जिन फेक्टरियों में 100 मजदूर काम कर रहे हैं उन्हें छटनी से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी. इस कानून के तहत अब यह सीमा 100 मजदूरों से 300 मजदूर कर दी गयी है. ये सुझाव दर्शाते हैं कि इन बदलावों से भारत की 93 प्रतिशत फेक्टारियों में बिना सरकार की अनुमति के मजदूरों की छटनी की जा सकती है. ठेका श्रम अधिनियम में संसोधन के अनुसार अब निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में जो मजदूर श्रम कानून के दायरे में आयेंगे उनकी संख्या भे 20 से बढ़ाकर 50 कर दी गयी है.  सरकार 'व्यापार करने में आसानी' की रफ़्तार को बढाने के लिए श्रम कानूनों पर व उसके कार्यान्वयन की निगरानी में ढील देना चाहती है. जब श्रम कानूनों की धज्जिया उड़ाने से मुनाफ़ा बढ़ता है कोई कैसे उम्मीद कर सकता है कि वे कारखाना मालिक खुद श्रम कानूनों के कार्यान्वयन पर ध्यान रखेंगे? लेकिन सरकार रिटर्न और रजिस्टरों के स्वरूपों को सरल बनाने के नाम पर उन्हें 16 बड़े श्रम कानूनों को लागू करने से बचा रही है. उद्योग इस तरह की आजादी का खवाब बड़े लम्बे समय से देख रहे हैं और मोदी सरकार भारतीय कंपनियों की साख पर निर्भर करती है!

दुनिया में भारत में 14 वर्ष से कम आयु वाले सबसे ज्यादा बाल मजदूर है. ये बाल मजदूर कृषि, लघु कार्यशाला, सड़कों पर कूड़ा बीनने, कुली, गलियों में सामान बेचने वाले व्यवसायों में काम करने के साथ-साथ  खतरनाक उद्योगों जैसे शीशा बनाने वाले उद्योग, खदानों, भवन निर्माण, कालीन बनाने, जरी बनाने तथा पटाखे बनाने जैसे उद्योगों में काम करते हैं. सरकार द्वारा प्रस्तावित बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन विधेयक के जरिए बाल श्रम अधिनियम, 1986 को संसोधित करना चाहती है. यह प्रस्तावित विधेयक यद्दपि 14 वर्ष से नीचे के बच्चों के लिए बाल श्रम पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने का प्रस्ताव करता है वहीँ यह कानून उन बच्चों की इजाज़त देता है कि स्कूल के बाद के समय में वे अपने परिवार की साहयता के लिए काम कर सकते हैं. इस प्रावधान से वास्तव में अनुबंधित आधार पर घर में बाल श्रम रोजगार और उसे बाहर आउटसोर्स करना आसान होगा। भारत में एक बच्चे की कानूनी परिभाषा के बारे में कई व्याख्याएं मौजूद हैं. बाल श्रम कानून के मुताबिक़ 14 वर्ष के कम आयु वाला बालक है. बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की कन्वेंशन के अनुसार वह व्यक्ति बालक है जिसकी आयु  18 वर्ष से कम है. प्रस्तावित विधेयक 'किशोर' जैसे टर्म का जिक्र करता है और इसका मतलब है वह व्यक्ति जिसकी उम्र 14 व 18 वर्ष के बीच में है. बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार बालक वह व्यक्ति है जिसने 18 वर्ष की उम्र हाशिल नहीं की है. विधेयक किशोरों को खतरनाक व्यवसायों जैसे खदान, जव्लान्शीन पदार्थ या विस्फोटक पदार्थों से जुड़े व्यवसायों में काम करने की अनुमति नहीं देता है जैसा कि अनुसूची में परिभाषित किया गया है. अन्य शब्दों में 14 से 18 साल के बच्चों को गैर खतरनाक उद्योगों में काम करने की अनुमति देता है जो कि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन है और यह कानून इसकी भी कमियां छोड़ देता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू इकाइयों में बिना रोक-टोक के काम करें. विधेयक हालांकि बाल श्रमिकों के पुनर्वास के प्रावधान के बारे में चुप है और 14 से 18 वर्ष के बाल श्रम के काम करने से उठे विवाद और उनकी काम करने के हालातों पर चर्चा के मामले में शांत है.

माध्यम कार्ग के विचार तंत्र में श्रम कानूनों पर चर्चा नहीं होती है. बड़े पैमाने पर समाज में स्पष्ट चुप्पी शायद नव-उदारवादी शासन द्वारा और अपनी सांस्कृतिक मशीन के जरिए लगता है इन सुधारों के लिए एक सामाजिक मंजूरी का काम कर रही है. लेकिन सुधारों के प्रति इतनी प्रतिबद्धता वैचारिक ज्यादा है बजाये इसके कि अक्सर तर्क दिया जाता है कि तत्काल उद्देश्य की आवश्यकता के लिए है. सरकार सुधारों को बढ़ावा इसलिए दे रही है ताकि श्रम बाजार में मौजूदा 'कठोरता' को कम किया जा सके. लेकिन वास्तविकता में श्रम बाज़ार कितना ‘कठोर’ है? अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार व्यक्तियों के अनुपात में अनौपचारिक रोजगार में कार्यरत (जिसमें अनौपचारिक और औपचारिक क्षेत्र शामिल है) 2009-10 में गैर कृषि क्षेत्र एमिन इनकी संख्या 83.6 प्रतिशत थी जोकि चीन के (32.6%) , ब्राज़ील (42.2%) से ज्यादा है. इसका मतलब साफ़ है कि भारत में बहुमत मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हैं. अगर हम कृषि को सिमें शामिल कर ले तो करीब 93 प्रतिशत मजदूर उनके काम के लिए काननों सहायता से बाहर हैं. दुसरे, फेक्टरी खंड में (जोकि फेक्टरी एक्ट १९४८ में आते हैं,) या उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार श्रमिकों की औसत की हिस्सेदारी कुल श्रमिकों का लगभग एक तिहाई है. इसलिए भी औपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों के एक तिहाई हिस्से को मालिकों ने उन कानूनी हकों से दूर कर दिया है जो स्थायी मजदूरों पर लागू होते हैं.

आखिर वह औसत श्रम लागत क्या है जिसे मालिकान ओर नीचे गिराना चाहते हैं? उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के डेटा के अनुसार 2012-13 में वेतन और अन्य सुविधाओं का औसत बहुत ही कम 2.17 प्रतिशत के स्तर पर था. क्या हम विश्विक स्तर पर प्रतियोगिता करने के लिए इसे और ज्यादा नीचे लाना चाहते हैं?

1980 के दशक में विनिर्माण उद्योग में पूरे मूल्य को जोड़ने के बाद(उत्पादन करने के अलावा) वेतन का औसत 26 प्रतिशत था और इस दशक के आधे में आते-आते यह 10 प्रतिशत रह गया और उसी समय में मुनाफा 5.3 प्रतिशत से बढ़कर 21.3 प्रतिशत हो गया. ये आंकड़े निश्चित रूप से साबित करते हैं कि वर्षों से श्रम द्वारा कमाए गए धन के महत्वपूर्ण हिस्से को उसने खो दिया है. इस परिवेश में शायद ही तर्कसंगत है कि श्रम सुधारों की दिशा में सरकार द्वारा अथक प्रयास 'उच्च' मजदूरी को नीचे लाने के उद्देश्य की आवश्यकता का कुछ लेना-देना है. यह तो लालची पूंजीपतियों के लिए सरकार की नंगी सेवा है ताकि वे श्रम प्रक्रिया पर नियंत्रण कर सके.

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

भाजपा
नरेन्द्र मोदी
एनडीए
अम्बानी
अदानी
राजस्थान

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

राजस्थान : जन आंदोलनों के साथ उभरता वामपंथी विकल्प

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

आठ साल से जारी है किसानों का बांगड़-बिरला सीमेंट प्लांट के खिलाफ संघर्ष

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

कोयला आयात घोटाला : अदानी समूह ने राहत पाने के लिए बॉम्बे हाइ कोर्ट का रुख किया

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

भाजपा शासित राज्य: सार्वजनिक परिवहन का निजीकरण

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License