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कर्नाटक : कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों से प्लास्टिक उत्पादक इकाईयों को करना पड़ रहा है दिक़्क़तों का सामना
गलाकाट प्रतियोगिता और कच्चे माल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी ने लघु औद्योगिक इकाईयों को बहुत ज़्यादा दबाव में डाल दिया है।
निखिल करिअप्पा
02 May 2022
plastic thumb

बैंगलोर: 59 साल के महेश चिक्का बसवैया काव्याश्री प्लास्टिक के प्रबंध निदेशक हैं। उनकी बैंगलोर के पीनया औद्योगिक क्षेत्र में तीन निर्माण इकाईयां मौजूद हैं। महंतेश अपने ग्राहकों के लिए प्लास्टिक पैकेज का निर्माण करते हैं। इसमें मेडिकल स्कूलों और सरकारी अस्पतालों से निकलने वाले बॉयोमेडिकल कचरे को इकट्ठा करने में इस्तेमाल होने वाली पैकेट, कर्नाटक दुग्ध संघ के लिए दूध के पैकेट और सरकार की मध्यान्ह भोजन योजनाओं के पैकेट शामिल हैं। लेकिन उन्हें कई ऑर्डर नुकसान पर पूरे करने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी ठेके ई-उपार्जन प्रक्रिया के ज़रिए पंजीकृत हो रहे हैं और इनकी दरें इसमें तय हो चुकी हैं, जिनमें बदलाव नहीं हो सकता।  इस बीच कच्चे माल की कीमतों में हुए इज़ाफे ने भी उनके मुनाफ़े को कम कर दिया है। वह कहते हैं वित्त वर्ष 2020 और 2021 उनके व्यापार के लिए बहुत बुरे रहे। बड़ी मुश्किल से वे अपनी लागत को वापस पा सके। लेकिन वित्त वर्ष 2022 तो और भी ज़्यादा बदतर रहा, जिसके चलते उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।

उनके धंधे में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में पोलिप्रोपायलीन (पीपी), कम घनत्व वाला पोलिएथलीन (एलडीपी) और उच्च घनत्व वाला पोलिएथलीन (एचडीपी) शामिल है। उनके आपूर्तिकर्ता रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (आरआईएल), भारतीय गैस प्राधिकरण (जीएआईएल), मैंगलोर रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (एमआरपीएल), आईओसी और ओएनजीसी शामिल हैं।

पिछले साल एक किलोग्राम पोलिप्रोपायलीन की कीमत 80 से 100 रुपये थी। अब इसकी कीमत 130 से 136 रुपये (जीएसटी को हटाए बिना) है। कच्चे माल की कीमत में हुए इजाफे के लिए यूक्रेन के युद्ध को वज़ह बताया जा रहा है। चूंकि यह एक वैश्विक बाज़ार है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में पूरी दुनिया में बढ़ोत्तरी हुई है।

महंतेश कहते हैं, "हमारे पास 50 कामग़ार हैं। उन्हें भुगतान करने की जरूरत होती है। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हमें अपनी मशीनरी को चलाना और इसके चलते नुकसान उठाना जारी रखना पड़ता है। इस क्षेत्र में बहुत प्रतिस्पर्धा है और कोई मुनाफ़ा नहीं है। अगर मैं ठेके की दर पर सामग्री की आपूर्ति नहीं करवा पाया, तो मेरा भुगतान जब्त कर लिया जाएगा, मैंने जो सुरक्षा निधि जमा की है, वह हाथ से निकल जाएगी और मुझे भविष्य के ठेकों से ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।"

2019 में प्लास्टिक के थैले पर लगाए गए प्रतिबंध से भी इस व्यापार को घाटा लगा है। 2019 में कर्नाटक सरकार ने एक बार ही उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक के थैलों पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि पर्यावरण प्रदूषण कम हो सके। जिन चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया, उनमें प्लास्टिक कप, चम्मच, प्लेट, फ्लेक्स, क्लिंग फिल्म, थर्माकोल से बने सामान और बिना बुने हुए पोलिप्रोपायलीन के थैले शामिल थे। महंतेश कहते हैं, "केंद्र सरकार ने 75 माइक्रॉन के प्लास्टिक थैले बनाने की अनुमति दी है। केवल कुछ ही राज्यों ने इन थैलों पर प्रतिबंध लगाया है। नतीजतन इन चीजों की राज्य में बड़े स्तर पर तस्करी होती है। आज हर बेकरी और सुपरमार्केट में आसानी से प्लास्टिक के थैले उपलब्ध हैं और सरकार ने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।"

कच्चे माल की कीमतों ने बैंगलोर स्थित शिवा पोलिकैप्स के प्रबंध निदेशक अश्वथ नारायण राव को भी प्रभावित किया है। पीनया में उनके धंधे में चार कर्मचारी काम करते हैं, वे ऑटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट और रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के लिए प्रिंटिंग और पैकेजिंग उपलब्ध करवाते हैं। उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड से 100 टन एलडीपी और पीपी खरीदी थी, ताकि वे प्लास्टिक पैकेजिंग तैयार कर सकें। छपाई के लिए उन्हें ब्यूटेनॉल और प्रिंटिंग इंक की जरूरत होती है। वे इन्हें स्थानीय बाज़ार से खरीदते हैं।

एक किलोग्राम एलडीपी पिछले साल 90 से 100 रुपये की आती थी, लेकिन अब इसकी कीमत 135 रुपये है।

वह नाराज़ होते हुए कहते हैं, "अगर हम अपने उत्पादों की कीमत 5 रुपये भी बढ़ा देते हैं, तो हमारे ग्राहक छटक जाएंगे। वे दूसरी जगह सस्ते विकल्प खोजेंगे। कोविड के बाद से ही खपत में भी गिरावट आई है।"

इस बीचत कच्चे माल की कीमतों का बढ़ना जारी है। एक किलोग्राम छपाई की स्याही पहले 2021 में 170 रुपये की आती थी, लेकिन अब इसकी कीमत 245 रुपये प्रति किलोग्राम है। इसी तरह एक किलोग्राम ब्यूटोनॉल की कीमत पहले 110 रुपये प्रति किलोग्राम होती थी, जो अब 160 रुपये प्रति किलोग्राम है। 

कच्चे माल में इस इजाफे ने उनके राजस्व और मुनाफ़े दोनों को ही प्रभावित किया है। वह कहते हैं कि वह बड़ी मुश्किल से पिछले दो सालों से अपनी लागत ही निकाल पा रहे हैं। वित्त वर्ष 2021 के लिए उनका राजस्व 1.3 करोड़ रुपये था, जो अगले साल घटकर 1 करोड़ रुपये रह गया। उनका मुनाफ़ा 2023 में और भी कम होने की संभावना है, क्योंकि कच्चे माल की कीमतों में और भी ज़्यादा तेजी आती जा रही है।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा

महंतेश ने बताया कि पीन्या में करीब़ 100 से 150 एमएसएमई यूनिट प्लास्टिक उत्पाद बनाने का काम कर रही हैँ. वे कहते हैं, "बाज़ार के बड़े खिलाड़ी प्रतियोगिता कम करने की कोशिश करते हैं और हमें बाज़ार से कीमतों का सहारा लेकर बाहर करने की कोशिश करते हैं। यह लोग बड़ी मात्रा में कच्चा माल खरीदते हैं और उस हिसाब से अपने उत्पादों की कीमत तय कर सकते हैं। हम आरआईएल जैसे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हैं, क्योंकि हम एक वक़्त पर कम मात्रा में ही माल ले सकते हैं।

बड़े खिलाड़ियों को है लाभ

बैंगलोर में प्लास्टोबैग के प्रबंध निदेशक मोहम्मद अशफाक कहते हैं, "आयातक अगर सऊदी अरब या कतर से बड़ी मात्रा में माल आयात करते हैं, तो वे कच्चे माल पर 7-8 फ़ीसदी तक का पैसा बचा सकते हैं। इससे उन्हें लघु और कुटीर उद्योगों के ऊपर बढ़त हासिल हो जाती है।"

यह चीज भी नीति निर्माताओं के लिए चुनौती है, जो सभी के लिए एक जैसी प्रतिस्पर्धा की ज़मीन तैयार करना चाहते हैं। अगर वे कच्चे माल पर ज़्यादा आयात शुल्क लगाते हैं, तो इससे स्थानीय बाज़ार में कीमतें बढ़ सकती हैं। अशफाक कहते हैं, "बाज़ार बढ़ रहा है, इसलिए कच्चे माल की जरूरत भी बढ़ रही है। अगर आप निर्माता को आयात करने की छूट नहीं दोगे, तो हम अपने उत्पादों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के बारे में नहीं सोच सकते। और मांग व आपूर्ति का नियम कहता है कि अगर कच्चे माल की कमी है, तो उत्पाद की कीमतें बढ़ेंगी। अगर आप आयात रोक देते हो, तो घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को अकेले ही पहले जितनी जरूरत का कच्चा माल उपलब्ध करवाना होगा। अगर उनके पास जरूरी मात्रा में कच्चा माल नहीं होगा, तो जमाखोरी शुरु हो जाएगी।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Karnataka: Plastic Processing Units Take a Hit From Soaring Raw Material Costs

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