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क्या भारत की बैंकिंग प्रणाली तबाही की राह पर है?
भारतीय रिज़र्व बैंक की हाल की रिपोर्ट इस बात की भविष्यवाणी करती है कि बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में खराब क़र्ज़ बढेगा।
सुबोध वर्मा
28 Jun 2018
Translated by महेश कुमार
एनपीए

एक प्रसिद्ध नर्सरी की कविता कि जब हम्प्टी डम्प्टी गिरने के बाद टुकड़े-टुकड़े हो जाता है तो राजा के कारिंदे भी उसे जोड़ नहीं पाते हैं। भारत की विशाल बैंकिंग प्रणाली अभी तक उस चरण तक नहीं पहुँचा है लेकिन निश्चित रूप से हमारी बैंकिंग प्रणाली मुशिकल दौर का सामना कर रही है।

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) द्वारा 26 जून, 2018 को जारी की गई सबसे हालिया वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट, एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। खराब ऋण (जिसे सकल गैर-निष्पादित संपत्ति या जीएनपीए कहा जाता है) इस मार्च में 10 लाख करोड़ पहुँच जाएगा। चाहे फिर वह सार्वजनिक या निजी क्षेत्र द्वारा दिए क़र्ज़ होने सभी ऋणों का रिकॉर्ड 11.6 % बनता है।

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लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। आरबीआई की रिपोर्ट, जो कि समय-समय पर 'तनाव का परीक्षण' करती है, ने भविष्यवाणी की है कि मार्च 2019 तक यह सभी ऋणों का 12.2 % तक हो जाएगा।

एनपीए

खराब ऋण वे हैं जो ऋण लेने वाले निर्दिष्ट अवधि में वापस नहीं मिलते। आरबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि 85.6 % बुरा ऋण बड़े लेनदार, ज़्यादातर पूँजीपतियों के पास हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह अनुपात काफी हद तक स्थिर रहा है, ऐसे ऋण लेने वाले दो साल पहले तक 86.4 % खराब ऋण के लिए जिम्मेदार थे। ऐसा नहीं कि कुल दिए गये ऋण में कॉर्पोरेटों को दिए गये ऋण की हिस्सेदारी भी इतनी बड़ी होI दरअसल बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋण का केवल 54.8 % कॉर्पोरेट को दिया जाता है फिर भी ख़राब ऋण में उनकी हिस्सेदारी 86% हैI

जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर सुरजित मजूमदार ने कहा कि, "धीमी क्रेडिट वृद्धि के संदर्भ में खराब एनपीए की स्थिति देखी जानी चाहिए, जो धीमे निवेश को इंगित करता है। अर्थव्यवस्था में कोई माँग नहीं है इसलिए लिया गया ऋण कोई वापस नहीं दे रहा। इसलिए ऋण वापस नहीं करने की बढ़ती प्रवृत्ति दर्ज की गयी है।"

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यह संकट क्यों पैदा हुआ? मजूमदार ने कहा कि सरकार खुद निवेश करने के बजाय निजी क्षेत्र को और निवेश करने के लिए उकसा रही है और उसके लिए उन्हें अधिक से अधिक उधार लेने के लिए प्रोत्साहित कर रही है और यह संकट इसी का परिणाम बताया।

"सरकार निगमों और अन्य समृद्ध वर्गों पर कर लगाकर संसाधनों को बढ़ा सकती है और उन्हें बुनियादी क्षेत्रों या सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश कर सकती है। लेकिन नव उदारवादी सिद्धांत के मूल-मन्त्र- 'न्यूनतम सरकार' के प्रति वचनबद्ध है इसलिए वह ऐसा करने में अनिच्छुक है, जिससे बैंकिंग प्रणाली को खराब ऋण के बोझ के नीचे दफ़न होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।“

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उद्योग क्षेत्र ने मार्च 2018 में 22.8 % के सकल एनपीए अनुपात की रिपोर्ट की, जिसकी तुलना में कृषि में 7%, सेवाओं में 6% और खुदरा बिक्री में 2% रहा। उद्योग के भीतर, रत्न और आभूषण, बुनियादी ढाँचे, कागज़ और कागज़ उत्पादों, सीमेंट और सीमेंट उत्पादों और इंजीनियरिंग जैसे उप-क्षेत्रों के तनावपूर्ण अग्रिम अनुपात विशेष रूप से बढ़ रहे हैं।

आरबीआई के क्षेत्रीय जोखिम विश्लेषण में पाया गया कि इस क्षेत्र में गंभीर झटके की स्थिति में बिजली, कपड़ा और इंजीनियरिंग क्षेत्र बैंकिंग उद्योग के खराब ऋण में शामिल हो सकते हैं।

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रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि किस तरह दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) को बुरा ऋण वसूलने के लिए लागू किया जा रहा है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल द्वारा भर्ती 701 मामलों में से 525 अभी भी समाधान के संकल्प से गुज़र रहे थे। एनसीएलटी द्वारा बंद किए गए 176 मामलों में से 67 को अपील या समीक्षा के लिए बंद कर दिया गया, 22 को हल किया गया था और 87 को बिक्री के लिए /परिसमापन के लिए कहा गया।

हम्प्टी डम्प्टी दीवार से शायद अभी तक नहीं गिरा है, लेकिन राजा के कारिंदे निश्चित रूप से अक्षमता की उच्च डिग्री का प्रदर्शन कर रहे हैं - भारतीय लोगों के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है जिनके पैसे इन बैंकों में रखे है।

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