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क्या 'ए' मुझे इस स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना देगा?
मुझे यक़ीन नहीं है कि ‘ए’ मुझे इस स्वतंत्रता दिवस पर कोई संदेश भेजेगा। हम दोनों पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्रता दिवस, दिवाली, ईद, नववर्ष और गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते रहे हैं। लेकिन यह साल कुछ अलग है। बीती शाम, मैं ये सोचती रही कि घाटी में हाल के घटनाक्रम पर ‘ ए' के विचार क्या होंगे।
स्मिता खनीजो
10 Aug 2019
jammu and kashmir
फोटो साभार : गूगल

कुछ वर्षों पहले जब अपने परिवार के साथ कश्मीर की यात्रा पर थी तो मैं ' ए' से मिली थी। जब मैं बच्ची थी तो मुझे अपने माता-पिता के साथ कश्मीर घूमने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और हमेशा अपनी बेटी को वहां ले जाने की लालसा रही। इसलिए जब भी हवाई जहाज़ का किराया कम होता तो मैं बिना देर किए हुए उसे बुक करा लेती। मैं डल झील में शिकारे की सवारी और सेब और बेर के पेड़ों की भूली हुई यादों को फिर से अनुभव करना चाहती थी।

फरवरी की एक साफ सुथरी सुबह में हम घाटी में उतरे, कांच के केबिन के बाहर के दृश्य इतने आकर्षक थे कि मुझे सुरक्षा जांच के कई स्तर पर ध्यान ही नहीं गया। हम में से कुछ की अच्छी तरह से तलाशी ली गई थी, कुछ की नियमतः, कुछ बैग रख लिए गए और कुछ को तलाशी के लिए खोला गया। मैंने इस दृश्य को सिर्फ नज़रअंदाज़ करने का दिखावा किया और खुद से कहा कि मैं इस जगह अपनी ज़िंदगी भर के अनुभव की श्रृंखला में एक छुट्टी के दौरान आयी हूं।

गुलमर्ग के लिए हमारी पहले से बुक किए गए टैक्सी ड्राइवर 'ए' दरवाज़े के बाहर था। मैं जल्दी से अंदर गई और बातचीत करने की कोशिश की, जिसपर उसने आश्चर्यजनक रूप से हां-ना में प्रतिक्रिया दी। उसके रवैये से निराश होकर मैंने उसको शेष यात्रा के दौरान अनदेखा करने का फैसला किया। उसकी उम्र 20 वर्ष से कुछ ज़्यादा रही होगी लेकिन इस उम्र से ज़्यादा उम्र का लगता था और उसने रास्ते भर बहुत कम बात की।

जबकि अगले कुछ घंटों के लिए उत्साह ने मुझे झकझोर दिया, बाकी सभी लोग कार में चुप थे। कुछ मिनटों के बाद आखिरकार मैंने हर जगह बंदूकधारी लोगों की बड़ी संख्या में मौजूदगी और हाल में आई बाढ़ के दृश्य को देखा। क़ुदरत की ख़ूबसूरती का लुत्फ़ उठाने से ये जगहें सभी को परेशान कर रही थीं। इस एहसास से खुद को अलग करने के लिए मैंने 'ए' के साथ बात करने की फिर से कोशिश की और एक बार फिर उसने सिर्फ 'हां और ना' में सिर हिलाया। उसकी ये छोटी सी प्रतिक्रियाएं तकलीफ़ पहुंचाने वाली थीं।

गुलमर्ग में ताज़ा हिमपात का नज़ारा उस ख़ुशी को वापस ले आया और हम दिन के बचे हिस्सों में एक-दूसरे पर बर्फ का गोला फेंकने में मसरुफ रहे। इस जगह पर मौजूद कई पर्यटक लकड़ी के तख़्त पर बर्फ पर 250 से 200 रुपये में स्लेजर खींचने वाले व्यक्ति से सवारी कर रहे थे। ईमानदारी से, यह वास्तव में एक अच्छ दृश्य नहीं था क्योंकि स्लेजर खींचने वाला दुबला पतला व्यक्ति मोटे आदमी को बर्फ पर सवारी करा रहा था। लेकिन सभी पर्यटक - पुरुष, महिलाएं और बच्चे आनंद लेने के प्रवासी दासता के तरीकों से अनजान थे।

शाम के आख़िर तक हमें अपनी बच्ची के साथ बर्फ से होकर गुजरने के लिए मदद की ज़रूरत थी। इस समय तक स्लेजर्स पर्यटकों से 20 रुपये तक की पेशकश कर रहे थे। हमने उनमें से एक को बच्ची को पकड़ने का अनुरोध किया जबकि हमने अन्य सामानों की देखरेख की।

रास्ते में हमने घाटी में उनके काम और ज़िंदगी को लेकर उनसे बातचीत की। असाधारण रूप से 'ए' की तरह वह कम बोलता। हमने सोचा कि उसके जैसे लोगों के लिए जीवन कितना कठोर है जो हाशिए पर हैं और मौसमी काम के ज़रिए खुद के लिए कुछ आमदनी कर पाते हैं। मैं घाटी में अशांति को लेकर उनके विचारों को जानने के लिए उत्सुक थी। लेकिन मेरी लड़की को आशीर्वाद देते हुए उन्होंने होटल के दरवाज़े पर अलविदा करते हुए कहा कि हम यही चाहते हैं कि शांति बनी रहे जो जीने के लिए बहुत है। उनकी चाहत ने डूबती भावना में छोड़ दिया। मैं यह सोचकर बिस्तर पर गयी कि क्या 'ए' भी ऐसा ही सोचता होगा।

अगले दिन मैं उत्सुकता से 'ए' के आने का इंतजार करने लगी क्योंकि मैं उसके साथ अपना विचार साझा करना चाहती थी। मैंने एक स्लेजर के जीवन को लेकर उसकी राय पूछी। उसने मुझे चुपचाप सुना लेकिन सिर्फ मेरे सवालों का हिचकिचाते हुए जवाब दिया। हो सकता है कि मेरे सवालों ने उसे तकलीफ़ दी हो इसलिए एक बार फिर मैंने नज़रअंदाज़ करने का फैसला किया और ख़ूबसूरत दृश्य पर अपना ध्यान केंद्रित किया। बाढ़ ने उस स्थान पर अपनी निशान छोड़ रखे थे और मेरे द्वारा बुक किए गए रहने के स्थान सहित कई स्थानों की मरम्मत हो रही थी। हमने जल्दी से अपना खाना ख़त्म किया और डल झील में सूर्यास्त के साथ इस सफर को खत्म करने का फैसला किया।

झील के किनारे हम शायद इस मौसम में पर्यटकों के पहले समूह थे क्योंकि कई शिकारे और हाउसबोट यूं ही पड़े थे। हम एक शिकारे पर बैठे, जो आसपास के कई हाउसबोटों से होकर गुजरा और हमें झील के दूसरे छोर पर ले गया। यह लंबी दूरी का सफर था। यही वह क्षण था जिसका मैंने इतने लंबे समय तक इंतजार किया था लेकिन किसी खुशी के बजाय मन में उदासी थी। मैं अपने ज़ेहन को वास्तविकता से दूर नहीं कर सकी

— झील की अर्थव्यवस्था पर निर्भर लोगों की परेशानी का दृश्य सता रहा था। शिकारे, स्थिर हाउसबोटों के आसपास शैवाल और फफूंद का बढ़ता दृश्य और उनसे निकलने वाली बदबू झील में मौजूद हर वस्तु ने समय के साथ खोए हुए गौरवशाली अतीत को बयां किया।

हम एक-दूसरे के साथ बात किए बिना चुपचाप कार में बैठ गए। एक बाइलेन में ट्रैफिक जाम था जिसने मुझे खड़ा होने और अपने आसपास की स्थिति को जानने के लिए पर मजबूर कर दिया। हम संकरी लेन के बीच में थे और यह भयानक जाम था। अगर यह दिल्ली में होता तो जाम खुलने में घंटों लग जाते।

लेकिन अचानक कहीं से मदद करने वाला व्यक्ति आ गया और कुछ ही मिनटों में गाड़ियां चलने लगी। हम आश्चर्यचकित थे जिस तरह स्थानीय लोगों ने उस स्थिति को संभाला और ‘ए’ कितनी शांति से बैठा था और अपनी बारी का इंतजार कर रहा था- किसी तरह का गुस्सा नहीं और अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं और सभी शांत थें। हम कामना करते हैं कि दिल्ली इससे कुछ सीख सके।

आख़िरी दिन, एयरपोर्ट जाने के दौरान हर कोई इस बात का जायजा लेने में व्यस्त था कि क्या छूट गया और क्या ठीक रहा। लेकिन मैं हर स्थान पर सेना के जवानों का जायजा ले रही थी। बंदूकों और भावशून्य आंखों वाले सीधे खड़े भावहीन व्यक्ति का दृश्य डरावना था। मैंने अपने आप से कहा कि क्या यहां इन लोगों की ज़रूरत है? अचानक मैंने ' ए' की आवाज़ सुनी और उसने ' नहीं, बिल्कुल नहीं’ कहा। उसने आखिरकार बोल दिया। मैंने मुड़कर उसे आश्चर्य से देखा, इसलिए नहीं कि उसने ' नहीं’ कहा, बल्कि इसलिए कि उसने पहली बार खुद बोला था। सफर के दौरान हम दोनों उसके बाद बात नहीं किए।

शेष यात्रा में कार में हम सभी लोग घाटी की स्थिति पर चर्चा करते रहे कि किस तरह हमने आम लोगों से मुलाकात की और उनके जीवन में इस उथल-पुथल का कितना असर रहा। ‘ए’ इस चर्चा में शामिल नहीं हुआ और फिर चुप रहा। हम मुख्य भू-भाग की अपनी ज़िंदगी में वापस आ गए थे और कश्मीर का सफर पूरा हो गया था।

उस साल दिवाली पर मुझे ' ए’ से स्वास्थ्य और शांति की कामना करते हुए एक एसएमएस मिला। इसने घाटी में शांति और सद्भाव की चाह, हमारे बीच मूक संवेदना और सहानुभूति की यादें वापस ला दीं। तब से हम एक-दूसरे को नव वर्ष, ईद, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की बधाई दे रहे हैं।

लेकिन इस साल क्या वह मुझे स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देगा? मुझे यक़ीन नहीं है। वास्तव में मुझे यह भी नहीं पता कि वह कैसा है? कश्मीर में लोगों के साथ संचार के रास्ते बंद हैं। मुझे नहीं पता है कि हाल की राजनीतिक घटनाओं ने उन्हें और अन्य लोगों को कैसे प्रभावित किया है? बंदूकधारियों से घिरे उनके जैसा जीवन मैंने नहीं जिया। मुझे नहीं पता कि उनके जैसे आम लोग इन घटनाक्रमों को कैसे देखते हैं।

हालांकि, मुझे पता है कि मुझे यह निर्णय लेने का अधिकार नहीं है कि लिया गया राजनीतिक निर्णय ' ए’ और उसके जैसे लोगों के लिए बेहतर है। और मुझे आशा है कि ' ए' को खुद को व्यक्त करने का मौका मिले और चुप रहने के लिए मजबूर न हो।

घाटी में सुरक्षा और शांति की प्रार्थना के साथ।

स्मिता खनीजो, लैंगिक समानता के अधिकार से जुड़ी कार्यकर्ता हैं। व्यक्त किए गए विचार निजी हैं और यह वर्ष 2015 की सच्ची घटना पर आधारित हैं।

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