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भारत
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अर्थव्यवस्था
क्या हम बेघरों के लिए घर बना सकते हैं?
मौसम के प्रतिकूल प्रभाव के कारण दिल्ली जैसे शहर में हर साल दर्जनों लोग मारे जाते हैं।
टीकेंद्र सिंह पंवार
04 Feb 2019
Translated by महेश कुमार
homeless

भारत का 70 वां गणतंत्र दिवस पूरे देश में हमेशा की तरह धूमधाम से मनाया गया। लोगों के विभिन्न वर्गों ने मीडिया में इस दिन की प्रासंगिकता के बारे में और भारतीय संविधान में अंतर्निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अंतर्निहित सिद्धांतों के बारे में विस्तार से लिखा है।इन तीनों महत्वपूर्ण विषयों के बारे में बहुत कुछ कहा गया और लिखा गया है, लेकिन हाल ही में ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट ने देश में प्रचलित आर्थिक असमानता पर प्रकाश डाला है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में आधी आबादी के निचले हिस्से की 50 फीसदी आबादी के बराबर धन/सम्पत्ति सिर्फ नौ अरबपतियों के पास हैं। कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 77.4 प्रतिशत हिस्सा देश के शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास है। देश के 119 अरबपति अपनी संपत्ति में प्रति दिन 2,200 करोड़ रुपये का मुनाफा जोड़ते हैं। ये चौंका देने वाले आंकड़े उन सिद्धांतों और देश में विकास की गति का मजाक उड़ाते नज़र आते हैं।

हालांकि, संपत्ति धारकों के पदानुक्रम की सीढ़ी में सबसे नीचे के लोग, शहरों में बेघर या पूरी तरह से आश्रयहीन हैं। मौसम के प्रतिकूल प्रभाव के कारण दिल्ली जैसे शहर में हर साल दर्जनों लोग मारे जाते हैं।2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1.7 मिलियन (17 लाख) से अधिक लोग बेघर हैं, जिनमें से 938,384 (10 प्रतिशत) शहरी क्षेत्रों से हैं। दिल्ली में, विभिन्न स्रोतों से उप्लब्ध बेघरों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े हैं। सरकार का अनुमान है कि यह लगभग 46,724 है जबकि आश्रय अधिकार अभियान (एएए) इस संख्या को 5 लाख से अधिक बताता है।

इन बेघर लोगों को अक्सर नागरिक और पुलिस प्रशासन परेशान करता है।दिलचस्प बात यह है कि ये वही लोग हैं जिन्हें हर साल चौराहे पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बेचते हुए देखा जाता है; लेकिन गणतंत्र दिवस से ठीक पहले, उन्हें शहर से बाहर निकाल दिया जाता है।2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले, लगभग 300,000 बेघरों को राष्ट्रीय राजधानी से बेदखल कर दिया गया था। भारत में विकसित हो रहे विश्व स्तर के शहरों की शान में ये बेघर लोग एक काला धब्बा माना जाते हैं।

कुछ संबंधित नागरिकों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा इस संबंध में दायर रिट याचिका के बाद ही उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और सरकारों ने रैन बसेरों का निर्माण शुरू किया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है कि प्रत्येक व्यक्ति जो बेघर है उन्हे इस तरह के आश्रय में सोने का अधिकार है क्योंकि यह मौलिक / संवैधानिक ‘जीने के अधिकार’ के लिए अंतर्निहित है। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 पर टिप्पणी करते हुए जोर दिया कि “मनुष्य के लिए आश्रय, केवल उसके जीवन और शरीर की सुरक्षा भर नहीं है। यह घर ही है जहां उसे अपने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करता हैं। इसलिए, आश्रय का अधिकार का अर्थ केवल एक व्यक्ति के सिर पर छत का अधिकार नहीं है, बल्कि उन्हें एक इंसान के रूप में जीने और विकसित होने के लिए आवश्यक सभी बुनियादी ढाँचे का अधिकार है”. 

हालाँकि, इन आश्रयों पर एक सरसरी नज़र डालने से पता चलेगा कि क्यों इन्हें 'हॉरर सेंटर' कहा जाता है। - जैसा कि शहरी गरीबी पर काम करने वाले एक कार्यकर्ता सोनू हरि ने कहा है।दिल्ली में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा नियंत्रित दिल्ली नगर निगम और आम आदमी पार्टी द्वारा संचालित राज्य सरकार के बीच एक रस्साकशी जारी है। अतिरिक्त भूमिका दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा निभाई जाती है, जो एक बार फिर भाजपा शासित केंद्र के अंतर्गत आती है। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) एक राज्य निकाय है जिसे स्थायी आश्रयों के लिए भूमि लेने के लिए डीडीए और एमसीडी के साथ नियमित रूप से समन्वय करना पड़ता है। दिल्ली जैसे शहर में, राजनीतिक जिम्मेदारी केवल राज्य सरकार के अधीन ही नहीं होती है, बल्कि स्थानीय निकायों के पास भी होती है। चूंकि विभिन्न विभाग समानांतर प्रशासन के अधीन हैं, इसलिए भारी टकराव रहता है और समन्वय कम होता है।

काम के अधिकार और आश्रय के अधिकार के बीच एक दिलचस्प समानता है। उन लोगों की एक महत्वपूर्ण संख्या है जिन्हे सिर पर छत की आवश्यकता होती है, और उन्हीं के बिछ रोजगार की दर कम होती है। उनमें से कुछ के बीच किसी न ककिसी तरह की विकलांगता भी हैं जो उन्हें पूर्णकालिक नौकरी पाने से रोकती है। शहरी आश्रय गृह जो बंगला साहिब गुरुद्वारा के नज़दीक है के एक अध्ययन में, जिसे गुरुद्वारा के निकटता के कारण बाकी की तुलना में बेहतर माना जाता है, चौंकाने वाले परिणाम पाए गए हैं। यहां मौजूद कुल निवासियों में से, 50 प्रतिशत बेरोजगार थे। कुछ नौकरानियों के रूप में काम कर रही थी और 17 प्रतिशत से अधिक छात्र थे। 15 प्रतिशत से अधिक ने भीख मांगने का प्रयास किया था। शहर में प्रवासन का प्रमुख कारण रोजगार के अवसर थे, लेकिन इलाकों में ज्यादा किराया होने की वजह से उन्हौने यहां शरण ली। प्रवास का एक और प्रमुख कारण बाढ़ था जिसने उनके राज्यों में उनकी फसल को नष्ट कर दिया था। पारिवारिक झगड़े भी एक अनेक कारण में से एक था। बाल शोषण, यौन शोषण के मामले बड़े पैमाने पर सामने आए। रैन बसेरों से बच्चों का गायब होना कोई असामान्य बात नहीं है।

दुर्भाग्यवश, मोदी सरकार की बहुत सी योजना जिसे बहुत बड़बोले पन के साथ सराहा जाता है, वह है प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जिसने अपने लक्ष्य का 15 प्रतिशत भी हासिल नहीं किया है। जबकि मोदी सरकार को शहरी और ग्रामीण भारत दोनों में 2 करोड़ घर बनाने थे। ऐसा लगता है कि बेघर लोगों की इस इच्छा को पुरा करने में जिसे कि संविधान द्वारा आश्वत किया गया है इसे हासिल करने के लिए कई और गणतंत्र दिवस का इंतजार करना होगा।
 

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