NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
क्या हम बेघरों के लिए घर बना सकते हैं?
मौसम के प्रतिकूल प्रभाव के कारण दिल्ली जैसे शहर में हर साल दर्जनों लोग मारे जाते हैं।
टीकेंद्र सिंह पंवार
04 Feb 2019
Translated by महेश कुमार
homeless

भारत का 70 वां गणतंत्र दिवस पूरे देश में हमेशा की तरह धूमधाम से मनाया गया। लोगों के विभिन्न वर्गों ने मीडिया में इस दिन की प्रासंगिकता के बारे में और भारतीय संविधान में अंतर्निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अंतर्निहित सिद्धांतों के बारे में विस्तार से लिखा है।इन तीनों महत्वपूर्ण विषयों के बारे में बहुत कुछ कहा गया और लिखा गया है, लेकिन हाल ही में ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट ने देश में प्रचलित आर्थिक असमानता पर प्रकाश डाला है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में आधी आबादी के निचले हिस्से की 50 फीसदी आबादी के बराबर धन/सम्पत्ति सिर्फ नौ अरबपतियों के पास हैं। कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 77.4 प्रतिशत हिस्सा देश के शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास है। देश के 119 अरबपति अपनी संपत्ति में प्रति दिन 2,200 करोड़ रुपये का मुनाफा जोड़ते हैं। ये चौंका देने वाले आंकड़े उन सिद्धांतों और देश में विकास की गति का मजाक उड़ाते नज़र आते हैं।

हालांकि, संपत्ति धारकों के पदानुक्रम की सीढ़ी में सबसे नीचे के लोग, शहरों में बेघर या पूरी तरह से आश्रयहीन हैं। मौसम के प्रतिकूल प्रभाव के कारण दिल्ली जैसे शहर में हर साल दर्जनों लोग मारे जाते हैं।2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1.7 मिलियन (17 लाख) से अधिक लोग बेघर हैं, जिनमें से 938,384 (10 प्रतिशत) शहरी क्षेत्रों से हैं। दिल्ली में, विभिन्न स्रोतों से उप्लब्ध बेघरों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े हैं। सरकार का अनुमान है कि यह लगभग 46,724 है जबकि आश्रय अधिकार अभियान (एएए) इस संख्या को 5 लाख से अधिक बताता है।

इन बेघर लोगों को अक्सर नागरिक और पुलिस प्रशासन परेशान करता है।दिलचस्प बात यह है कि ये वही लोग हैं जिन्हें हर साल चौराहे पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बेचते हुए देखा जाता है; लेकिन गणतंत्र दिवस से ठीक पहले, उन्हें शहर से बाहर निकाल दिया जाता है।2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से पहले, लगभग 300,000 बेघरों को राष्ट्रीय राजधानी से बेदखल कर दिया गया था। भारत में विकसित हो रहे विश्व स्तर के शहरों की शान में ये बेघर लोग एक काला धब्बा माना जाते हैं।

कुछ संबंधित नागरिकों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा इस संबंध में दायर रिट याचिका के बाद ही उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और सरकारों ने रैन बसेरों का निर्माण शुरू किया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है कि प्रत्येक व्यक्ति जो बेघर है उन्हे इस तरह के आश्रय में सोने का अधिकार है क्योंकि यह मौलिक / संवैधानिक ‘जीने के अधिकार’ के लिए अंतर्निहित है। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 पर टिप्पणी करते हुए जोर दिया कि “मनुष्य के लिए आश्रय, केवल उसके जीवन और शरीर की सुरक्षा भर नहीं है। यह घर ही है जहां उसे अपने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करता हैं। इसलिए, आश्रय का अधिकार का अर्थ केवल एक व्यक्ति के सिर पर छत का अधिकार नहीं है, बल्कि उन्हें एक इंसान के रूप में जीने और विकसित होने के लिए आवश्यक सभी बुनियादी ढाँचे का अधिकार है”. 

हालाँकि, इन आश्रयों पर एक सरसरी नज़र डालने से पता चलेगा कि क्यों इन्हें 'हॉरर सेंटर' कहा जाता है। - जैसा कि शहरी गरीबी पर काम करने वाले एक कार्यकर्ता सोनू हरि ने कहा है।दिल्ली में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा नियंत्रित दिल्ली नगर निगम और आम आदमी पार्टी द्वारा संचालित राज्य सरकार के बीच एक रस्साकशी जारी है। अतिरिक्त भूमिका दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा निभाई जाती है, जो एक बार फिर भाजपा शासित केंद्र के अंतर्गत आती है। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) एक राज्य निकाय है जिसे स्थायी आश्रयों के लिए भूमि लेने के लिए डीडीए और एमसीडी के साथ नियमित रूप से समन्वय करना पड़ता है। दिल्ली जैसे शहर में, राजनीतिक जिम्मेदारी केवल राज्य सरकार के अधीन ही नहीं होती है, बल्कि स्थानीय निकायों के पास भी होती है। चूंकि विभिन्न विभाग समानांतर प्रशासन के अधीन हैं, इसलिए भारी टकराव रहता है और समन्वय कम होता है।

काम के अधिकार और आश्रय के अधिकार के बीच एक दिलचस्प समानता है। उन लोगों की एक महत्वपूर्ण संख्या है जिन्हे सिर पर छत की आवश्यकता होती है, और उन्हीं के बिछ रोजगार की दर कम होती है। उनमें से कुछ के बीच किसी न ककिसी तरह की विकलांगता भी हैं जो उन्हें पूर्णकालिक नौकरी पाने से रोकती है। शहरी आश्रय गृह जो बंगला साहिब गुरुद्वारा के नज़दीक है के एक अध्ययन में, जिसे गुरुद्वारा के निकटता के कारण बाकी की तुलना में बेहतर माना जाता है, चौंकाने वाले परिणाम पाए गए हैं। यहां मौजूद कुल निवासियों में से, 50 प्रतिशत बेरोजगार थे। कुछ नौकरानियों के रूप में काम कर रही थी और 17 प्रतिशत से अधिक छात्र थे। 15 प्रतिशत से अधिक ने भीख मांगने का प्रयास किया था। शहर में प्रवासन का प्रमुख कारण रोजगार के अवसर थे, लेकिन इलाकों में ज्यादा किराया होने की वजह से उन्हौने यहां शरण ली। प्रवास का एक और प्रमुख कारण बाढ़ था जिसने उनके राज्यों में उनकी फसल को नष्ट कर दिया था। पारिवारिक झगड़े भी एक अनेक कारण में से एक था। बाल शोषण, यौन शोषण के मामले बड़े पैमाने पर सामने आए। रैन बसेरों से बच्चों का गायब होना कोई असामान्य बात नहीं है।

दुर्भाग्यवश, मोदी सरकार की बहुत सी योजना जिसे बहुत बड़बोले पन के साथ सराहा जाता है, वह है प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जिसने अपने लक्ष्य का 15 प्रतिशत भी हासिल नहीं किया है। जबकि मोदी सरकार को शहरी और ग्रामीण भारत दोनों में 2 करोड़ घर बनाने थे। ऐसा लगता है कि बेघर लोगों की इस इच्छा को पुरा करने में जिसे कि संविधान द्वारा आश्वत किया गया है इसे हासिल करने के लिए कई और गणतंत्र दिवस का इंतजार करना होगा।
 

homeless
republic day
DDA
MCD
pradhan mantri kaushal vikas yojna

Related Stories

शाहीन बाग़ : देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ!

शाहीन बाग़ ग्राउंड रिपोर्ट : जनता के पुरज़ोर विरोध के आगे झुकी एमसीडी, नहीं कर पाई 'बुलडोज़र हमला'

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

सुप्रीम कोर्ट ने जहांगीरपुरी में अतिक्रमण रोधी अभियान पर रोक लगाई, कोर्ट के आदेश के साथ बृंदा करात ने बुल्डोज़र रोके

संसद में तीनों दिल्ली नगर निगम के एकीकरण का प्रस्ताव, AAP ने कहा- भाजपा को हार का डर

दिल्ली के तीन नगर निगमों का एकीकरण संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश

दिल्ली नगर निगम चुनाव टाले जाने पर विपक्ष ने बीजेपी और चुनाव आयोग से किया सवाल

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

झंझावातों के बीच भारतीय गणतंत्र की यात्रा: एक विहंगम दृष्टि

विशेष: कौन उड़ा रहा है संविधान की धज्जियां


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License