NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
भारत
राजनीति
क्या होता यदि उत्तराखंड में केदारनाथ फिल्म रिलीज़ हुई होती?
क्या सचमुच उत्तराखंड के लोगों की भावना एक फिल्म से आहत हो रही थी? जो इस समय इंटरनेट पर इस फिल्म को ढूंढ़ रहे हैं। या फिर ये वर्ष 2019 की मेगा रिलीज (लोकसभा चुनाव) से पहले की तैयारी की पटकथा है।
वर्षा सिंह
13 Dec 2018
FILM KEDARNATH

क्या होता यदि उत्तराखंड में केदारनाथ फिल्म रिलीज़ हुई होती? क्या हिंदू-संगठन राज्य की कानून व्यवस्था के लिए खतरा थे? क्योंकि फिल्म रिलीज न होने देने का दबाव सरकार पर हिंदू संगठनों ने ही बनाया और कानून व्यवस्था का मसला बताकर सभी ज़िलों के ज़िलाधिकारियों ने फिल्म रिलीज न होने देने का फैसला लिया।

क्या सचमुच उत्तराखंड के लोगों की भावना एक फिल्म से आहत हो रही थी? जो इस समय इंटरनेट पर इस फिल्म को ढूंढ़ रहे हैं। या फिर ये वर्ष 2019 की मेगा रिलीज (लोकसभा चुनाव) से पहले की तैयारी की पटकथा है- कि देशभर में, और राज्य में, जिन भी तरीकों से संभव हो, सांप्रदायिक माहौल तैयार किया जाए।

सबसे पहले भारतीय फिल्मों की एक प्रशंसक की बात समझिये। कोटद्वार की हिना जोशी बताती हैं कि “कोटद्वार से बिजनौर नजदीक होने की वजह से कई लोगों ने बिजनौर जाकर ये फिल्म देखी। उन लोगों ने फिल्म की बहुत तारीफ की। ख़ासतौर पर सारा अली ख़ान की। मेरा तो बहुत मन था इस फिल्म को देखने का। मगर अब इसे कैसे देख पाउंगी”

उत्तराखंड फिल्म एसोसिएशन के सदस्य मदन दुकलान कहते हैं कि “बिना फिल्म देखे, फिल्म का विरोध किया गया। जो लोग फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उन्होंने फिल्म देखी तक नहीं है। फिर जिन लोगों ने फिल्म बनाई उन्होंने ये तो नहीं कहा था कि वे केदारनाथ की त्रासदी पर कोई डॉक्युमेंट्री बना रहे हैं।” 

मदन दुकलान कहते हैं कि राज्य में फिल्मों की शूटिंग को बढ़ावा देने के लिए फिल्म विकास परिषद का गठन किया गया है। राज्य सरकार फिल्म नीति बना रही है। फिल्मकारों को यहां फिल्म शूटिंग के प्रस्ताव दिये जा रहे हैं। लेकिन यदि फिल्मों की रिलीज पर प्रतिबंध लगेंगे तो फिर कौन यहां फिल्म शूटिंग के लिए आएगा। दुकलान सवाल उठाते हैं कि ऐसे में सेंसर बोर्ड की भी क्या अहमियत है। सेंसर बोर्ड ने तो फिल्म पर कोई आपत्ति नहीं की। फिर कुछ संगठनों की आपत्ति से फिल्म रिलीज को क्यों रोका गया।

केदारनाथ फिल्म सात दिसंबर को देशभर में रिलीज हुई। फिल्म केदारनाथ त्रासदी की पृष्ठभूमि पर हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के की प्रेम कहानी पर बनायी गई है। इस कहानी पर कुछ हिंदूवादी संगठनों ने ऐतराज जताया और फिल्म रिलीज पर प्रतिबंध की मांग की। इसके साथ ही बदरी-केदार मंदिर समिति को भी फिल्म की ये कहानी पसंद नहीं आई। उन्होंने भी फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की थी।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फिल्म रिलीज पर रोक लगाने के लिये दाखिल याचिका खारिज कर दी थी।

राज्य सरकार ने भी पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की अध्यक्षता में फिल्म रिलीज के फैसले के लिए एक समिति का गठन किया था। समिति ने शासन स्तर पर फिल्म रिलीज पर प्रतिबंध नहीं लगाया। हालांकि जिलाधिकारियों पर जिले की कानून व्यवस्था को देखते हुए रिलीज का फैसला छोड़ दिया गया।

पहले पांच जिलों में फिल्म रिलीज नहीं की गई। फिर हिंदू संगठनों के विरोध को देखते हुए राज्यभर में फिल्म रिलीज नहीं हुई। तो कानून व्यवस्था कैसे बिगड़ रही थी। क्योंकि आम जनता तो कहीं भी फिल्म के विरोध में आगे नहीं आई। सिर्फ कुछ हिंदू संगठन ही आगे आए।

पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने इस मुद्दे पर कहा कि जब कोई निर्माता-निर्देशक राज्य में फिल्मों की शूटिंग के लिए अनुमति लेता है तो हम फिल्म की कहानी नहीं पढ़ते। उन्होंने आवेश में कहा कि आगे से इस बारे में कानून बनाया जाएगा और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने पर हर्जाना भी देना पड़ सकता है।

रुद्प्रयाग में केदारसभा के अध्यक्ष विनोद शुक्ला कहते हैं कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी है, लेकिन जैसा सुना है, उस आधार पर फिल्म प्रदर्शित नहीं की जानी चाहिए। वे कहते हैं कि जब केदारनाथ में फिल्म की शूटिंग हो रही थी, तब ही हम लोगों ने ऐतराज किया था। उनके मुताबिक फिल्म को लेकर पूरी घाटी में आक्रोश है। विनोद शुक्ला का कहना है कि केदारनाथ में लोग धर्म की भावना से आते हैं, पैसा कमाने नहीं आते हैं।

केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित पंडित लक्ष्मी नारायण जुगरान ने भी फिल्म नहीं देखी है। उनका कहना है कि केदारनाथ जैसी पवित्र जगह पर तैयार फिल्म में इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए।

इससे पहले केदारनाथ में कपाट खुलने के अवसर पर इस वर्ष एक लेज़र शो भी किया गया था। लेज़र शो में केदारनाथ पर डॉक्युमेंट्री दिखाई गई थी। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दिखाया गया था। केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित पंडित लक्ष्मी नारायण जुगरान कहते हैं कि हमने उस लेज़र शो का भी विरोध किया था। उस शो में तथ्य भी गलत दिखाये गये थे।

राज्य में महिला सामाख्या की डायरेक्टर रह चुकीं गीता गैरोला सवाल करती हैं कि जब केदारनाथ में मंदिर की दीवार पर लेज़र शो दिखाया जा सकता है, जिसमें  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दिखाया गया था, तब इन्हीं धार्मिक संगठनों की भावनाएं क्यों नहीं आहत हुईं थीं। वे कहती हैं ये सारी बातें राजनीति के तहत की जा रही हैं। किसी ने फिल्म देखी तक नहीं है। इससे पहले पद्मावत फिल्म को लेकर जिस तरह की राजनीति की गई, वैसी ही राजनीति उत्तराखंड में करने की कोशिश की गई। उत्तराखंड के लोग इन राजनीतिक लोगों के हाथों में कठपुतली की तरह खेल रहे हैं। उनका कहना है कि जिसे नहीं देखना है, वे फिल्म न देखे।

गीता कहती हैं कि ये वर्ष 2019 में होने वाले चुनाव की पटकथा है। फिर उत्तराखंड में फिल्म रिलीज न करके नुकसान अपना ही हो रहा है, इससे फिल्म पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की प्रदेश इकाई की अध्यक्ष इंदु नौडियाल कहती हैं कि बिना देखे-समझे एक फिल्म की रिलीज़ रोक दी गई। पूरे देश में एक खास किस्म का माहौल तैयार किया जा रहा है। उत्तराखंड में पहले ऐसा कभी नहीं होता था, लेकिन अब धीरे-धीरे यहां भी सांप्रदायिक ताकतें पैर पसार रही हैं। अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस तरह के बवाल किये जा रहे हैं।

सुशांत राजपूत और सारा अली ख़ान की फिल्म जिस राज्य में शूट हुई, उसी राज्य में उसे बैन कर दिया गया। बल्कि अब राज्य की बीजेपी सरकार फिल्म के निर्माता को नोटिस देने की तैयारी में भी है। जबकि फिल्म देखने की इच्छा रखनेवाले इंटरनेट पर फिल्म आने का इंतज़ार कर रहे हैं।

film
KEDARNATH
Uttrakhand
kedarnath movie ban in uttarakhand
sara ali khan
sushant singh rajput
BJP Govt
Trivendra Singh Rawat
SATPAL MAHARAJ

Related Stories

भारतीय सिनेमा के एक युग का अंत : नहीं रहे हमारे शहज़ादे सलीम, नहीं रहे दिलीप कुमार

शैलेंद्र: किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... जीना इसी का नाम है

जल-जंगल-ज़मीन पर बनी फ़िल्म “स्प्रिंग थंडर” के निर्देशक श्रीराम डाल्टन से एक मुलाक़ात

मीरा नायर को ‘टीआईएफएफ ट्रिब्यूट’ पुरस्कार से नवाज़ा गया

‘...अनदर अनटोल्ड स्टोरी’ : और सुशांत सिंह की कहानी भी अनकही रह गई

‘हमारी फिल्मों का ‘ऑस्कर’ वाला ख्व़ाब’!

'छपाक’: क्या हिन्दू-मुस्लिम का झूठ फैलाने वाले अब माफ़ी मांगेंगे!

आर्टिकल 15 : एक आधी-अधूरी कोशिश!

पैड वुमन : हापुड़ से लॉस एंजेलिस तक का सफ़र

समानांतर सिनेमा के जनक मृणाल सेन नहीं रहे


बाकी खबरें

  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक : …अब साइकिल भी आतंकवादी हो गई...और कूकर...और मोटरसाइकिल!
    21 Feb 2022
    एक चुनाव की ख़ातिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साइकिल को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश आमतौर पर पसंद नहीं की जा रही है। मज़दूर-कामगार के लिए तो आज भी साइकिल ही उनकी मोटरसाइकिल और कार है। सोशल…
  • lalu
    भाषा
    चारा घोटाला : डोरंडा कोषागार गबन मामले में दोषी लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद की सज़ा
    21 Feb 2022
    रांची स्थित विशेष सीबीआई अदालत  ने डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये के गबन के मामले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को पांच साल कैद और 60 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनायी।
  • up
    अजय कुमार
    यूपी से बाहर का मतलब केवल बंबई और दिल्ली नहीं है बल्कि सऊदी, ओमान और कतर भी है!
    21 Feb 2022
    "योगी के समर्थक योगी के पांच काम गिनवा देंगे तो मेरा वोट योगी को चला जाएगा।"
  • hum bharat ke log
    नाज़मा ख़ान
    हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है
    21 Feb 2022
    नफ़रत के माहौल में तराने बदल गए, जिस दौर में सवाल पूछना गुनाह बना दिया गया उस दौर में मुसलमानों से मुग़लों का बदला तो लिया जा रहा है। लेकिन रोटी, रोज़गार, महंगाई के लिए कौन ज़िम्मेदार है ये पूछना तो…
  • European Union
    अब्दुल रहमान
    यूरोपीय संघ दुनियाभर के लोगों के स्वास्थ्य से बढ़कर कॉर्पोरेट मुनाफे को प्राथमिकता देता है 
    21 Feb 2022
    अपनी आबादी के अधिकांश हिस्से का टीकाकरण हो जाने के बावजूद कोविड-19 संबंधित उत्पादों पर पेटेंट छूट को लेकर अनिच्छा दिखाते हुए यूरोपीय संघ के नेतृत्व ने एक बार फिर से बिग फार्मा का पक्ष लिया है और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License