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क्या जीडीपी के आंकड़ें बदलकर ज़मीनी हालात बदल जाएंगे मोदी जी?
देश बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। कभी नाम बदले जा रहे हैं तो कभी आंकड़े। सरकारें भरसक प्रयास कर रही हैं कि बदलाव को 'सकारात्मक' दिखाया जाए, पर क्या यह सभी बदलाव सकारात्मक हैं?
नवीन कुमार वर्मा
29 Nov 2018
सांकेतिक तस्वीर

केंद्र सरकार ने यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान जीडीपी में बढ़ोतरी के आंकड़ों को घटा दिया है। यह बदलाव लोकसभा चुनाव से ठीक पहले के आंकड़ों में किया गया है। जिसकी वजह से यूपीए सरकार के दौरान जीडीपी के आंकड़ों में एक से दो फीसदी से ज्यादा की कमी आ गई है। मोदी सरकार ने आंकड़ों को 2004-05 के आधार वर्ष के स्थान पर वर्ष 2011-12 के आधार वर्ष से बदल दिया है, जिस कारण विकासदर के आंकड़ों में बदलाव आ गया है। 

केंद्र की मोदी सरकार का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान के आंकड़े अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर पेश नहीं करते और अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से जानने के लिए यह किया जाना अति आवश्यक था ताकि अर्थव्यवस्था की एक बेहतर तस्वीर सामने आ सके। 

फैसले का आंकड़ों पर प्रभाव

मोदी सरकार के आंकड़ों में किए गए बदलाव के कारण यूपीए सरकार के कार्यकाल के वर्षों के विकासदर के आंकड़ों में गंभीर गिरावट देखने को मिल रही है। यह गिरावट इतनी ज्यादा है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास का सबसे ज्यादा विकास दर का आंकड़ा भी बच न सका। 
वर्ष 2010-11 नव उदारवादी नीतियों के बाद वह पहला वर्ष था जब भारतीय अर्थव्यवस्था ने दहाई के आंकड़े को पार किया। वर्ष 2010-11 में जीडीपी की विकास दर 10.3 फीसदी दर्ज की गई थी जिसे मोदी सरकार ने बदलकर 8.5 फीसदी कर दिया है। इसके अलावा 9 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर वाले तीन वर्षों के आंकड़ों में भी एक फीसदी की कमी की गई है। 

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी ताजा संशोधित आंकड़ों के अनुसार 2005-06 और 2006-07 के 9.3 और 9.3 फीसदी के विकास दर के आंकड़ों को घटाकर क्रमश: 7.9 और 8.1 प्रतिशत किया गया है। इसी तरह 2007-08 के 9.8 फीसदी के विकास दर के आंकड़े को घटाकर 7.7 फीसदी किया गया है। 

आख़िर क्या होती है जीडीपी?

ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) कहें या सकल घरेलू उत्पाद यह किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का पैमाना होता है। जीडीपी का आंकड़ा अर्थव्यवस्था के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में उत्पादन की विकास दर पर आधारित होता है। जीडीपी मापन में कृषि, उद्योग व सेवा क्षेत्र तीन प्रमुख घटक आते हैं। इन क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने या घटने के आधार पर जीडीपी दर तय होती है। क्‍योंकि उत्‍पादन की कीमतें महंगाई के साथ घटती बढ़ती रहती हैं इसलिए जीडीपी को दो तरह से प्रस्‍तुत किया जाता है। एक है आधार मूल्य, जिसके अंतर्गत जीडीपी की दर का मापन एक आधार वर्ष में उत्‍पादन की कीमत को आधार मानकर तय होता है जबकि दूसरा पैमाना वर्तमान मूल्य है जिसमें उत्‍पादन वर्ष की महंगाई दर शामिल होती है।

भारतीय सांख्यिकी विभाग उत्‍पादन व सेवाओं के मूल्‍यांकन के लिए एक आधार वर्ष तय करता है और इस वर्ष के दौरान की कीमतों को आधार बनाकर उत्‍पादन की कीमतों की तुलनात्‍मक वृद्धि दर तय की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जीडीपी की दर को महंगाई से अलग रखकर सही ढ़ंग से मापा जा सके। यूपीए के शासन काल में आधार वर्ष 2004-05 था जिसे वर्तमान मोदी सरकार ने बदलकर 2011-12 कर दिया है।

मोदी सरकार के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लिए इस फैसले ने एक नए राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक के बाद एक कई सारे ट्वीट करके पीएम मोदी और नीति आयोग पर निशाना साधाते हुए संशोधित जीडीपी आंकड़ों को एक मज़ाक बताया, वहीं वर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली इस फैसले के बचाव करते हुए कहते हैं कि विश्व के सबसे अच्छे मापदंडों के आधार पर आंकड़ों को बदला गया।

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लिए इस फैसले से कई सवाल तो उठते हैं। पहला सवाल तो यह उठता है कि क्या आंकड़ों को बदलकर मोदी सरकार अपने शासनकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था की खस्ताहाल हालत को छिपाने का प्रयास कर रही है? या आने वाले लोकसभा चुनाव में होने वाले तुलनात्मक अध्ययन को बदलना चाहती है ताकि वह यूपीए सरकार से आंकड़ों के आधार पर ज्यादा पिछड़ती नज़र न आए। वजह चाहे जो हो परन्तु आंकड़ों में बदलाव महज आंकड़ों तक सीमित है ज़मीनी स्तर पर इससे अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत को नहीं छिपाया जा सकता।

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