NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
अर्थव्यवस्था
क्या फ्लिपकार्ट की बढ़त दुकानदारों को तबाह कर रही है?
बोदापाती सृजना
25 Nov 2014

भारत के ई-कॉमर्स क्षेत्र में काफी रोमांचक और खबरनुमा घटनाएं हो रही हैं। त्योहारों के महीने अक्तूबर में फ्लिपकार्ट जोकि भारत में ई-कॉमर्स का सबसे बड़ा शॉपिंग पोर्टल है, ने अक्तूबर 6 की शोपिंग के बारे में बड़ी धूमधाम से घोषणा की कि वह उसके लिए “अरबों की कमाई का दिन” था (अरबों की कमाई के दिन का क्या मायने है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है)। यह वह दिन था जब इसने बड़ी छूटों की घोषणा की, 30 से 80 प्रतिशत तक की छुट वह भी कई तरह के वस्तुओं पर। उस दिन बड़ी संख्या में लोगों ने उनकी वेबसाइट पर जाकर इसका फायदा उठाने की कोशिश की लेकिन उनके लिए यह छूट बड़ी निराशा भरी निकली और लोग खाली हाथ ही वापस लौट गए।  

                                                                                                                          

यह कई ग्राहकों के लिए एक असफलता थी जिसके लिए फ्लिपकार्ट  को माफ़ी मांगनी पड़ी, बिजनेस प्रेस में इसको लेकर एक भय था। बावजूद इस गड़बड़ी के फ्लिपकार्ट  ने उस दिन अकेले ही अपने 2014-15 के सकल माल के टारगेट का 10% (600 करोड़ रूपए) हासिल कर लिया।   

6 अक्तूबर को केवल फ्लिपकार्ट  ही अकेले व्यापार नहीं कर रहा था। ‘यह हमारे लिए एक और दिन है” की टैग लाइन के साथ स्नैपडील ने फ्लिपकार्ट  की वेबसाइट से लौटे निराश ग्राहकों को ढांढस बढाने की कोशिश की। इसने भी एक दिन में अपने सकल माल की कीमत का करीब 600 करोड़ रूपए का व्यापार किया। कोई बड़ी बात नहीं है, एमेज़ोन ने भी चतुराई से एक डोमेन खरीदा जिसका नाम  www.bigbillionday.com रखा। जो लोग भी “बिग बिलियन डे’ की खोज कर रहे थे अंततः उन्होंने एमेज़ोन की वेबसाइट से माल खरीदा।

पिछले कुछ महीनों से इन झड़पों और एक-दुसरे से आगे निकलने की होड़ में बढ़ोतरी हुयी है। जाने-माने शोपिंग पोर्टल बड़ी आक्रामकता से उस ई-कॉमर्स बाज़ार पर कब्ज़ा करने की होड़ में है जो अभी नया है पर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है।

खुदरा बाज़ार में इनका हिस्सा अभी केवल एक प्रतिशत ही है फिर भी जो लोग इस व्यापार से शारीरिक रूप से जुड़े हैं उन्हें अभी से ही ई-कॉमर्स से खतरा महसूस होने लगा है। ई-कॉमर्स के पास अपने सारे माल को न केवल एक जगह दिखाने की सुविधा है यानी इन्टरनेट पर बल्कि उनके पास भौतिक खुदरा के मुकाबले अधिक निहित लागत और मूल्य निर्धारण करने की सुविधा है। उनके अपने कोई बड़े खर्च नहीं है; उन्हें स्टोर का किराया नहीं देना पड़ता है। भौतिक स्टोर न होने की वजह से उन्हें मजदूरों का खर्च, फ्लोर मेनेजर, स्टोर क्लर्क, सेल्स पर्सन, हाउसकीपर और अन्य जुड़े स्टाफ की तनख्वाह के खर्च को वहन नहीं करना पड़ता है। व्यापार के व्यापक चरित्र के चलते वे सप्लायर से माल सस्ते में खरीदते हैं, यही वजह है वे भौतिक खुदरा व्यापारी से भी सस्ता माल बेचते हैं।

अभी तक ई-कॉमर्स महानगरों की आबादी तक सिमित है, वह भी वेबसाइट पर जाने वाले, कंप्यूटर और स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले वर्ग तक सिमित है। यह वही वर्ग है जिन्हें बड़े कॉर्पोरेट अपने ब्रांड स्टोर जैसे प्रोवौग, पंतालूंस, प्लेनेट एम, स्पेंसर आदि की तरफ आकर्षित करते हैं। इस समय छोटे दुकानदारों के मुकाबले ई-कॉमर्स से ये ब्रांड स्टोर ज्यादे घबराए हुए हैं। ई-कॉमर्स के साथ प्रतियोगिता के चलते भारत में प्रति स्क्वायर फुट के हिसाब से खरीदारी में कमी आ रही है। यह कमी खासतौर पर संगीत, इलेक्ट्रॉनिक्स, किताबों और कपड़ों की खरीद में देखी जा सकती है। ई-कॉमर्स के साथ प्रतियोगिता के चलते पिछले तीन सालों से बड़े खुदरा व्यापारी जैसे शोपेर्स स्टॉप ने नए स्टोर खोलने कम कर दिए हैं। प्लेनेट एम जोकि संगीत का बड़ा खुदरा व्यपारी है ने 2011 से 2013 के बीच करीब 100 स्टोर बंद कर दिए हैं।

अब तक, ऐसा लगता है जैसे ई-कॉमर्स के बढ़ने से केवल बड़े खुदरा व्यापारी ही आहात हुए हैं। लेकिन आने वाले समय में यह केवल बड़े खुदरा व्यापारियों तक ही सिमित नहीं रहेगा। अगर हम अमरीका की तरफ देखें, तो हम कह सकते हैं कि बड़े खुदरा व्यापार में यह क्षमता है कि वह ई-कॉमर्स के साथ प्रतियोगिता में खड़ा रह सके। वालमार्ट और टेस्को जैसे खुदरा व्यापारी ई-कॉमर्स के नये आयामों को अपना रहे हैं। वे भौतिक स्टोर में कमी ला रहे हैं और अपनी बिक्री को ऑनलाइन पेश कर रहे हैं। वे भी ई-कॉमर्स के रास्ते तरक्की कर रहे है या करने जा रहे हैं, वे ई-कॉमर्स और भौतिक खुदरा व्यापार के संगम “मल्टीचेनल मॉडल” को खुदरा व्यापार में पेश कर रहे हैं। उदहारण के तौर पर 2013 में वालमार्ट राजस्व बटोरने के मामले में एमेज़ोन, एप्पल और स्टेपल्स के बाद  अमरिका में चौथा खुदरा व्यापारी रहा। हालांकि यह एमेज़ोन से अभी काफी पीछे है, फिर भी यह अपनी ई-कॉमर्स व्यापार को तेज़ी से बढ़ा रहा है।

भारत में भी बड़े खुदरा व्यापारियों को इस प्रतियोगिता में आना होगा। कुछ खुदरा व्यापारी जैसे पंतालूंस और शोपेर्स स्टॉप अभी से ही ई-कॉमर्स मंच बनाना शुर कर दिया है। वे कैसे इसमें अपने आपको स्थापित कर पायेंगें अभी यह देखना बाकी है। लेकिन जो भी हो वे ई-कॉमर्स से प्रतियोगिता में एक दुकानदार होने से तो बेहतर स्थिति में ही रहेंगें।

ई-कॉमर्स के आने से पहले ही अमरीका में बड़े खुदरा व्यापारी जैसे वालमार्ट ने या तो परिवार द्वारा चलाये जा रहे स्टोरों को निगल लिया है या उन्हें अलग कर दिया है। उनका मॉडल बड़े सुपर स्टोर का है जोकि शहर के बाहर स्थित है। ये सुपरस्टोर सभी तरह के उपभोक्ताओं के लिए कई किस्मों की वस्तुओं का डिस्प्ले करते हैं। लोग अपनी कारों में आकर किसी भी तरह की वस्तू की खरीदारी कर सकते हैं जिसमें सब्जी से फर्नीचर तक शामिल है। स्टोर इतने बड़े हैं कि वालमार्ट के विशेष सुपरस्टोर का दायरा करीब 17,000 स्केयर मीटर है। वालमार्ट का मॉडल तो तथ्यों पर टिका रहा है या टिका हुआ है। एक तो अमरिकी ऑटोमोबाइल संस्कृति, जहाँ कार का होने कोई खास बात नहीं बल्कि एक जरुरत है। और दुसरे शहर और कस्बों के बाहर सस्ती ज़मीन का उपलब्ध होना।   

ये दोनों ही तथ्य वालमार्ट मॉडल को परिवार के स्टोर के मुकाबले प्रतोयोगी बना देते हैं। इसके परिणामस्वरूप अमरीका के खुदरा व्यापार में बड़े खुदरा व्यापार का प्रतिशत 86 है और परिवार द्वारा चलाये जा रहे खुदरा व्यापार का हिस्सा केवल 6 प्रतिशत है। तो अमरीका में ई-कॉमर्स जिसका बाज़ार प्रतिशत केवल 8% है, बड़े खुदरा के साथ प्रतियोगिता में है, यानी वह है वालमार्ट न कि छोटी दुकाने। लेकिन भारत में स्थिति कुछ ओर है। बावजूद कई झूठों के, बड़ा खुदरा  अभी तक दुकानदारों को हिला नहीं पाया है, जैसा कि इसने यु।एस। में किया। यहाँ छोटे परिवारों द्वारा चलाई जा रही दुकानें ज्यादा फायदे की स्थिति में हैं। अमरीका के विपरीत भारत में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए उन्हें बड़े शहरों की महंगी ज़मीन खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है जिससे उनका खर्च बढ़ जाता है। बिग बाज़ार का हर स्टोर शहर के केन्द्रीय हिस्से में मौजूद है, यहाँ खास चीज़ों की भरमार है, छोटी दुकाने ग्राहकों के घरों के साथ लगी हुयी हैं। परिणामस्वरूप बड़े स्टोर न तो दरें कम कर सकते हैं और न ही वे ग्राहकों को कोई ख़ास सुविधा दे सकते हैं।

बड़े खुदरा का यह मॉडल छोटे शहरों में या दूर के इलाकों में घुसने में कामयाब नही है, जहाँ व्यापार छोटे स्तर पर होता है, जहाँ केवल छोटे दुकानदार ही वे सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं।

इसके परिणामस्वरूप आज 93% खुदरा व्यापार आज भी छोटे दुकानदारों(असंगठित क्षेत्र) के हाथ में है। अगर ई-कॉमर्स को भारत में सच्चे अर्थों में आगे बढ़ना है, इसे असंगठित क्षेत्र के खुदरा व्यापार पर कब्ज़ा करना होगा। दुकानदारों के मुकाबले इनके पास कुछ ख़ास मौके हैं जोकि भौतिक स्टोरों के पास नहीं है। लोगों को शॉपिंग करने घंटों के लिए स्थानीय बाज़ार तक जाना नहीं पड़ेगा; उन्हें केवल स्मार्टफोन, क्प्म्पुटर या टेबलेट पर आर्डर करना होगा। तामझाम को सुव्यवस्थित करना होगा, वेयरहाउसिंग और उच्च तकनीक के साथ जैसे की एमेज़ोन आदि करते हैं उसी दिन सामान की डिलीवरी। 

ई-कॉमर्स छोटे दुकानदार और बड़े स्टोर के मुकाबले वस्तुएं सस्ती दरों पर उपलब्ध करा सकते हैं। जैसा कि पहले कहा गया है कि जिस मात्रा में वे सप्लायर से माल खरीदते हैं उसके आधार पर वे उत्पादकर्ता और वितरक से वस्तुओं की कीमत काफी सस्ती दरों पर तय कर सकते हैं। भौतिक स्टोर न होने से श्रम और तामझाम के कीमत कम हो जाती है।

यह सभी करक खुदरा व्यापार में ई-कॉमर्स के दबदबे को बढा सकते हैं। इस समय, ई-कॉमर्स अपने तामझाम को स्थापित करने में लगी हुयी है, जिसमें तकनीक और वेयरहाउस का इंतजाम शामिल है। भारत में इन्टरनेट सुविधा का काफी कम स्तर पर होना भी शामिल है, यद्दपि स्मार्टफोन सस्ते हो रहे हैं, इसलिए इन्टरनेट का भी तेज़ी से बढ़ना तय है। जब ये सब चीज़े लाइन पर आ जायेंगी, ई-कॉमर्स में इतनी क्षमता है कि वह खुदरा व्यापार में शामिल लाखों लोगों के जीवयापन को खतरा पहुंचा देगा, जोकि भारत की कार्य शक्ति का 6 से 7 प्रतिशत हिस्सा है। पहले से ही, ई-कॉमर्स से प्रतियोगिता के चलते इलेक्ट्रोनिक वस्तुओं में डील कर रहे दुकानदार अपनी दुकानों को बंद कर रहे हैं। अगर सरकार अभी कोई कदम नहीं उठाती है तो यह स्थिति खुदरा क्षेत्र के अन्य उत्पादों में भी पैदा हो जायेगी। 

इससे पहले की यह खतरा सच्चाई में बदले सरकार को इस सम्बन्ध में कुछ करना होगा। विदेशी मुद्रा निवेश मल्टी ब्रांड रुल है लेकिन इस के तहत छोटे स्तर के खुदरा व्यापार के लिए कोई सुरक्षा मौजूद नहीं है। क्या ई-कॉमर्स मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में विदेशी मुद्रा निवेश को अनुमति नहीं दे रहे हैं? यहाँ सरकार को न केवल ई-कॉमर्स को नियमित करने की जरूरत है बल्कि छोटे खुदरा व्यापारियों को संस्थागत और तकनिकी समर्थन देने की भी जरुरत है, ताकि वे ई-कॉमर्स के साथ अच्छे ढंग से प्रतियोगिता में खड़े रह सके। बिना इस सुरक्षा के, छोटे खदरा व्यापारी बाज़ार से बाहर कर दिए जायेंगें, ऐसे ही जैसे विकसित देशों में मोम और पॉप स्टोर को बाहर कर दिया गया था।

(अनुवाद:महेश कुमार)

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

एमेजोन
एप्पल एंड स्टेपल्स
ई कॉमर्स
एफ.डी.आई
फ्लिपकार्ट
वालमार्ट
पंतालूंस
प्लेनेट एम

Related Stories

ज़ीरो रेटिंग: सस्ता इंटरनैट या इंटरनैट की बाड़ेबंदी

अध्यादेशों की सरकार और पतित होता लोकतंत्र


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License