NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
समाज
भारत
राजनीति
ललित मुर्मू : व्यापक दृष्टि के देशज व्यक्तित्व का असमय जाना
ये एक विडम्बनापूर्ण कड़वा सच है कि आज भी लोकतान्त्रिक कहे जानेवाले राज-समाज और मीडिया जगत में हाशिये के सामाजिक व्यक्तित्वों-प्रतिभाओं को तथाकथित बहुसंख्यक सभ्य समाज अपने बराबर का स्थान नहीं देता है।
अनिल अंशुमन
19 Mar 2019
एक्टिविस्ट पत्रकार ललित मुर्मू नहीं रहे

झारखंड के पढ़े लिखे आदिवासी समाज का जागरूक हिस्सा और प्रगतिशील लोकतान्त्रिक समाज 10 मार्च को हुए अपने प्रिय एक्टिविस्ट पत्रकार ललित मुर्मू जी के असामयिक निधन से स्तब्ध है। हाल के समय में वे एकमात्र ऐसे सर्वमान्य और जीवंत संयोजन सूत्र थे जिनकी मान्यता प्रदेश के आदिवासी समुदाय और प्रगतिशील लोकतान्त्रिक समाज, दोनों में ही थी। उन्हें मूल झारखंडी समाज और शेष समाज के बीच का सेतु भी कहा जा सकता है, जिन्होंने जीवनपर्यंत झारखंडी समाज के सवालों और अन्य सामाजिक दायरे के सवालों के संघर्षों की जमीनी एकता के लिए काम किया। एक पत्रकार के रूप किसी भी सत्ता–शासन व नौकरशाह की जी हुज़ूरी करने तथा निजी स्वार्थपूर्ति से परे जनता के पक्ष के जीवंत और सक्रिय आवाज़ बने रहे। अखबारों की संस्थानिक पत्रकारिता के दौरान अपने स्वतंत्र उसूलों से समझौता करने की बजाय अखबार को ही छोड़ दिया। पिछले वर्ष जब प्रदेश के कई सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर ‘राजद्रोह’ लगाए जाने पर जहां प्रदेश के कई बौद्धिक व मीडिया महारथी अचानक से ‘मौन’ साध लिए, ललित मुर्मू जी ने ही सबसे अधिक मुखर होकर विरोध किया। वर्तमान चुनाव के मद्देनजर झारखंड की विपक्षी एकजुटता के प्रयासों के तहत 9 मार्च को साथियों के साथ रांची से दिल्ली जाते समय ट्रेन में अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

LALIT MURMU2.jpg

52 वर्षीय ललित मुर्मू जी झारखंड राज्य गठन आंदोलन के शुरुआती दौर की अगुआ युवा आदिवासी बौद्धिक एक्टिविस्ट वाहिनी के प्रमुख सदस्य रहे । प्रदेश के संथाल परगना स्थित साहेबगंज जिले के तालझरी गाँव के संथाल परिवार में जन्मे ललित जी ने प्रतिष्ठित स्कूल नेतरहाट स्कूल से पढ़ाई पूरी कर आगे की पढ़ाई के लिए रांची को ही मुख्य प्रवास बनाया। जहां झारखंड अलग राज्य गठन के होने वाले आंदोलनों में बढ़ चढ़कर शामिल होने लगे और जल्द ही पूर्णकालिक युवा आंदोलनकारी कार्यकर्ता बन गए। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही मुख्य धारा की मीडिया में आदिवासी समाज के सवालों को महत्व नहीं दिये जाने की उपेक्षापूर्ण स्थिति ने उन्हें पत्रकारिता में जाने को प्रेरित किया। ‘80–90 दशक के समय देश की कई प्रमुख पत्र–पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होने वाली उनकी कई रिपोर्ट काफी चर्चित रहीं। आदिवासी समाज व झारखंड आंदोलन के सवालों को व्यापक स्वर देने के लिए ‘वैकल्पिक मीडिया’ खड़ा करने के प्रयासों के तहत ही तत्कालीन झारखंड आंदोलन की पत्रिका “झारखंड खबर” से काफी समय तक जुड़े रहे। अपनी प्रतिभाशाली, तर्कपूर्ण और जुझारू लेखनी के जरिये झारखंड व आदिवासी समाज के जमीनी मुद्दों को पूरी बेबाकी से उठाकर उसपर गंभीर विमर्श का वातावरण बनाया। सरकारों की झारखंड–आदिवासी विरोधी नीतियों की आलोचना करने के साथ विरोधी पक्ष की भी गलतियों–कमियों को भी उजागर करना नहीं छोड़ा। केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार को बचाने में झामुमो नेताओं के रिश्वतकांड जैसे मामले को हर जोखिम उठाकर भी भी पूरी तल्खी के साथ उठाया। जिसके खिलाफ तत्कालीन झामुमो सांसदों ने लोकसभा में ‘विशेषधिकार हनन’ का मामला भी चलाया।

झारखंड राज्य गठन के पश्चात इन 18 वर्षों में जोड़-तोड़ की अवसरवादी गठबंधन सरकारों से लेकर वर्तमान की तथाकथित ‘स्थिर सरकार’ में से किसी ने उन्हें वाजिब सम्मान नहीं दिया तो इसका एकमात्र मूल कारण रहा कि वे सदैव प्रदेश की जनता के सामाजिक जन मुद्दों के संघर्षों के साथ पूरी सक्रियता से जुड़े रहे। वर्तमान सरकार द्वारा जबरन ज़मीन अधिग्रहण के विरोध कर रहे आदिवासी व किसानों पर किए जा रहे राज्य–दमन , सीएनटी/एसपीटी संशोधन, गलत स्थानीयता नीति व सत्ता संरक्षण में कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा की जा रही खनिज लूट इत्यादि सवालों के विरोध में होने वाले हर जनप्रतिवाद की अगली पांत में खड़े हुए। प्रदेश के आदिवसी सवालों को धार देने तथा आदिवासी राजनीति का एक मजबूत वैचारिक स्तम्भ माने जाने के बावजूद वे आदिवसीयत की संकीर्णताओं से सदा दूर रहे। कहने को वे एक बड़े राजनीतिक दल के सदस्य भी रहे लेकिन झारखंड के जमीनी मुद्दों को उठाने और उनके समाधान की बहस–चर्चाओं को व्यापक बनाने के लिए कई जनसंगठनों व विपक्षी दलों की जमीनी सक्रियताओं में भी शामिल रहे। 

ये एक विडम्बनापूर्ण कड़वा सच है कि आज भी लोकतान्त्रिक कहे जानेवाले राज-समाज और मीडिया जगत में हाशिये के सामाजिक व्यक्तित्वों-प्रतिभाओं को तथाकथित बहुसंख्यक सभ्य समाज अपने बराबर का स्थान नहीं देता है। जिसके प्रतिवाद स्वरूप इन सामुदायों से भी जब अस्मितावाद का स्वर उठता है तो अधिकांश एकांगी ही हो जाता है। इन समुदायों में ऐसे लोग कम ही होते हैं जो अपनी अस्मितागत सामुदायिक विशिष्टता कायम रखते हुए भी व्यापक लोकतान्त्रिक – सामाजिक दायरे से भी अभिन्न रूप से जुड़े होते हैं। ललित मुर्मू जी इसी परंपरा की एक प्रतिभाशाली व मानवीय कड़ी रहे, जिनका असामयिक निधन उनके समुदाय से अधिक व्यापक लोकतान्त्रिक समाज के लिए अपूर्णीय क्षति है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Jharkhand
lalit murmu
Activists
journalist
tribal communities
Media

Related Stories

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

भारत में हर दिन क्यों बढ़ रही हैं ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएं, इसके पीछे क्या है कारण?

झारखंड: निजीकरण के ख़िलाफ़ असरदार रही बैंक हड़ताल, समर्थन में केंद्रीय ट्रेड यूनियनें भी उतरीं!

हमें आईना दिखाते किसान

क्या समाज और मीडिया में स्त्री-पुरुष की उम्र को लेकर दोहरी मानसिकता न्याय संगत है?

इरफ़ानः हम आगे बढ़ते हुए, पीछे के क़दमों के निशान मिटाते जा रहे हैं

कोरोना दौर में गलवान की खूनी झड़पें और मीडिया का युद्धोन्माद

बात बोलेगी : कोरोना काल में बेपर्दा हुई मीडिया की गंदगी

छत्तीसगढ़ : क्या सीएफ़आर से मिलेगा आदिवासियों को उनका हक़?

ए के रॉय : जनबल से धनबल और बाहुबल को मात देना वाला योद्धा  


बाकी खबरें

  • ram_navmi
    अफ़ज़ल इमाम
    बढ़ती हिंसा व घृणा के ख़िलाफ़ क्यों गायब है विपक्ष की आवाज़?
    13 Apr 2022
    हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लोग अपने जान-माल और बच्चों के भविष्य को लेकर सहम गए हैं।
  • varvara rao
    भाषा
    अदालत ने वरवर राव की स्थायी जमानत दिए जाने संबंधी याचिका ख़ारिज की
    13 Apr 2022
    बंबई उच्च न्यायालय ने एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में कवि-कार्यकर्ता वरवर राव की वह याचिका बुधवार को खारिज कर दी जिसमें उन्होंने चिकित्सा आधार पर स्थायी जमानत दिए जाने का अनुरोध किया था।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,088 नए मामले, 26 मरीज़ों की मौत
    13 Apr 2022
    देश में अब तक कोरोना से पीड़ित 5 लाख 21 हज़ार 736 लोग अपनी जान गँवा चुके है।
  • CITU
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: बर्ख़ास्त किए गए आंगनवाड़ी कर्मियों की बहाली के लिए सीटू की यूनियन ने किया प्रदर्शन
    13 Apr 2022
    ये सभी पिछले माह 39 दिन लंबे चली हड़ताल के दौरान की गई कार्रवाई और बड़ी संख्या आंगनवाड़ी कर्मियों को बर्खास्त किए जाने से नाराज़ थे। इसी के खिलाफ WCD के हेडक्वार्टस आई.एस.बी.टी कश्मीरी गेट पर प्रदर्शन…
  • jallianwala bagh
    अनिल सिन्हा
    जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान
    13 Apr 2022
    जलियांवाला बाग के नवीकरण के आलोचकों ने सबसे महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज कर दिया है कि नरसंहार की कहानी को संघ परिवार ने किस सफाई से हिंदुत्व का जामा पहनाया है। साथ ही, उन्होंने संबंधित इतिहास को अपनी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License