NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
जिनकी ज़िंदगी ज़मीन है: तंजानिया में किसानों के संघर्ष
माउंटंदाओ वा विकुंडी व्या वकुलिमा तंजानिया तक़रीबन 200,000 छोटे-छोटे किसानों का एक नेटवर्क है। यह नेटवर्क ज़मीन पर कब्ज़ा करने और उन लोगों को अपराधी ठहराये जाने के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है, जिनकी रोज़ी-रोटी ज़मीन से ही चलती है।
पैन अफ्रीकैनिज़्म टूडे सेक्रेटैरियट
22 Feb 2022
Tanzania
पैन अफ़्रीकैनिज्म टुडे सेक्रेटैरियट के नुमाइंदों के साथ माउंटंदाओ वा विकुंडी व्या वाकुलिमा तंजानिया के सदस्य। फ़ोटो: स्पेशल एरेंटमेंट

कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंजिल्स का कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टो 21 फ़रवरी, 1848 को प्रकाशित हुआ था। अपने मेनिफ़ेस्टों में उन्होंने इतिहास को "उत्पीड़क और उत्पीड़ित" के बीच के संघर्ष के नतीजे के रूप में चित्रित किया था। इसके प्रकाशित होने के एक सदी से भी ज़्यादा समय बीत जाने के बाद फ्रांत्ज़ फैनन ने इस बात की फिर तस्दीक़ कर दी, जब उन्होंने इस बात को समझाया कि औपनिवेशिक लिहाज़ से 'एक नयी मानवता को स्थापित करने' का यह संघर्ष इस "द्वंद्वात्मक दुनिया" में होता है। आज तंजानिया में मोरोगोरो से 90 किमी पश्चिम में किलोसा के किसान "एक नयी व्यवस्था बनाने" को लेकर किये जा  रहे संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं और आख़िरकार इस बात की पुष्टि करते हुए उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों को समान रूप से मुक्त कर रहे हैं कि ज़मीन महज़ वस्तु नहीं,बल्कि एक सामाजिक अनिवार्यता होनी चाहिए।

तंजानिया के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का एक चौथाई से ज़्यादा का योगदान है। माउंटंदाओ वा विकुंडी व्या वाकुलिमा तंजानिया (MVIWATA) नामक 200,000 से ज़्यादा छोटे किसानों के एक नेटवर्क का मानना है कि हक़ीक़त में यह कहीं ज़्यादा है, क्योंकि तंजानिया में खपत होने वाले सभी खाद्य पदार्थों के उत्पादन का 95% छोटे-छोटे किसान करते हैं। दशकों के ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों और सिर्फ़ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की चिंता करने वाले नये प्रशासन की ओर से हाल ही में रूढ़ीवादी और पूंजीवादी रुख़ अख़्तियार करने के बाद से छोटे किसान इस देश के अवसरवादी निवेशकों और उनके सहयोगियों की ओर से ज़मीन के वस्तुकरण किये जाने के ख़िलाफ़ लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

भारत में नरेंद्र मोदी के प्रतिक्रियावादी कृषि क़ानूनों से लेकर शहरी ज़मीन पर जीवित रहने वाले दक्षिण अफ़्रीका के अबहलाली बासमजोंडोलो (ABM) के सदस्यों और ग्रामीण भूमि से अपना गुज़र-बसर कर रहे ब्राजील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (MST) के लोगों पर हमले हो रहे हैं और दुनिया के तमाम जगहों पर इस समय हम इस तरह के भूमि संकट का सामना कर रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में सत्ता में बैठे लोग इस सिद्धांत से दूर हो गये हैं कि 'ज़मीन ही ज़िंदगी है'। आम शहरी और ग्रामीण लोगों के जीवित रहने की क्षमता को कमज़ोर करने के लिए निजी हितों ने इन देशों के स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर ख़ुद को मज़बूती के साथ मिला लिया है। तंजानिया में जहां प्रगतिशील क़ानून सभी भूमि को "सभी नागरिकों की ओर से ट्रस्टी के रूप में राष्ट्रपति में निहित सार्वजनिक भूमि" के रूप में मान्यता देता है,वहीं सट्टेबाज़ पूंजी और भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के बीच घूमने वाले चक्र से पैदा होने वाली समस्या और भी विकट है।   

1945 में अपने पैदा होने के बाद से ही किलोसा ज़िले में रह रहे जोसेफ़ ने बताया कि इस इलाक़े में भूमि की पहुंच और नियंत्रण में बदलाव देखा गया है। वह बताते हैं कि 1970 के दशक में किलोसा के आसपास के गांव आदर्श गांव थे; ये गांव इस हद तक आदर्श थे कि जूलियस न्येरेरे ने उन्हें आत्मनिर्भरता और विकास की मिसाल के तौर पर चिह्नित किया था। न्येरेरे इस इलाक़े में 1974 में आये थे और विकास और आत्मनिर्भरता के इस प्रमुख आदर्श गांव में एक नारियल का पेड़ लगाने के सिलसिले में यहां के निवासियों के साथ आ मिले थे।

आज इस देश के अधिकारियों और कथित 'निवेशकों' की मिलीभगत ने कई छोटे-छोटे किसानों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया है। बेदखल किसानों में अब्दुल तुंबो भी हैं,जिनके हाथ से 30 एकड़ ज़मीन निकल गयी है; नतीजतन, वह खेती के पिछले तीन मौसमों में कुछ भी खेती कर पाने में सक्षम नहीं है। वह कहते हैं, "मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मैं तंजानिया का हूं, क्योंकि इस देश में मेरे पास जो कुछ भी था, वह सब छीन लिया गया है।" उन्हें सात बार गिरफ़्तार किया जा चुका है और इस समय उन पर पांच अलग-अलग अदालती मामले लंबित हैं। उनके ख़िलाफ़ अंजाम पानी वाली तमाम आपराधिक कार्यवाही उस ज़मीन पर 'अतिक्रमण' करने को लेकर है, जो मूल रूप से उनके स्वामित्व वाली ज़मीन है।

अब्दुल तुम्बो पर उसी ज़मीन पर 'अतिक्रमण' करने को लेकर पांच मामले क़ायम किये गये हैं, जिस पर मूल रूप से उनका ही स्वामित्व था।

जब 77 साल के सैद अपनी ज़मीन के उस प्लॉट पर पहुंचे, जिसे उन्होंने हाल ही में सफ़ाई की थी और खेती के अगले सीज़न के लिए तैयार किया था,तो पता चला कि सरकारी अधिकारियों ने उस ज़मीन को उनसे पूछे बिना उन 'निवेशकों' में से किसी एक को दे दी थी, जो ज़मीन के प्लॉटों को इस क्षेत्र के छोटे-छोटे किसानों से लेकर इकट्ठा कर रहे हैं। उनके बारे में बताया गया कि वह पागल हैं, यह उनकी ज़मीन नहीं है, उन्हें न तो इस ज़मीन के लिए और न ही खेती के मौसम के लिए इसे तैयार करने में लगे उनके श्रम के लिए ही कोई मुआवज़ा दिया जायेगा, उन्हें सलाह दी गयी कि अगर वह उत्पात मचाते रहे,तो उन्हें जेल भेज दिया जायेगा।

हालांकि, एमवीआईडब्ल्यूएटीए भूमि-हथियाने की इस घिनौनी प्रक्रिया में देश के क़ानूनों के हथियार बनाये जाने के ग़लत इस्तेमाल से अपने कई सदस्यों का बचाने में सक्षम रहा है, जिसमें वे 27 किसान भी थे,जिनसे हमने बात की थी, लेकिन,इसके बावजूद किसानों की आजीविका पर ख़तरा मडरा रहा है। छोटे-छोटे किसानों को अपराधी बताने के मामले और इस नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत दिखाने वालों उन लोगों के ख़िलाफ़ क़ानून के ग़लत इस्तेमाल के ज़रिये  रोज़ी-रोटी से हाथ धो लेने का ख़तरा है,जो लोग पीढ़ियों से इन ज़मीनों जोतते रहे हैं।

किलोसा से इकानाना तक में फैले उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों के बीच के इस संघर्ष में भूमिहीनों की संगठित शक्ति ही इस भूमि संकट का एकमात्र व्यावहारिक समाधान है। जिन महिलाओं और पुरुषों का ज़मीन से रिश्ता खाद्य उत्पादन, गृह निर्माण और आख़िरकार समाज निर्माण में निहित है और जो लोग धन इकट्ठा करने की चाहत रखने वाले कुछ लोगों के बेरहम शोषण पर मानवता के सामाजिक कल्याण को तरज़ीह देते हैं,उन्हें ताक़तवर होना होना।

तंजानिया में किलोसा के छोटे-छोटे किसानों ने एमवीआईडबल्यूएटीए की छत्रछाया में ख़ुद को संगठित कर लिया है; दक्षिण अफ़्रीका में अबहलाली बासमजोंडोलो इसी तरह की भूमिका निभा रहा है, जबकि ब्राजील में एमएसटी भूमिहीन श्रमिकों की सामूहिक आकांक्षा को अभिव्यक्ति दे रहा है। इन स्वतंत्र संगठनों में किसानों की एकता और शक्ति के निर्माण की इस प्रतिबद्धता के बिना सैद और अब्दुल जैसे छोटे किसानों की दुर्दशा और भी बदतर हो सकती थी। किसान शक्ति के इन लोकतांत्रिक स्वरूपों की सराहना होनी चाहिए और उनका विस्तार किया जाना चाहिए।

पूंजीपतियों, ज़मींदारों, सट्टेबाज़ों और जिस सरकार को वे नियंत्रित करते हैं और जिसके पास सत्ता है,इन्हें स्वेच्छा से स्वीकार कर लेने से उन लोगों को मुक्ति के लिहाज़ से कुछ भी हासिल नहीं होना है, जिनका ये तमाम ताक़तें शोषण और उत्पीड़न करते हैं; किलोसा में किसानों को उत्पीड़कों के जुए से मुक्ति दिलाने वाली स्वतंत्रता की यह पुकार छोटे किसानों के संगठन के रूप में सामने आ रही है। हमें इन किसानों से आत्मविश्वास की सीख लेनी चाहिए, जो मार्क्स और एंगेल्स की उस व्याख्या को ज़मीन पर उतारने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि उनके पास पाने के लिए पूरी की पूरी दुनिया है और खोने के लिए महज़ उनकी ज़ंजीरें हैं !

साभार : पीपल्स डिस्पैच 

Abahlali base
Mjondolo
Mjondolo
Communist Manifesto
Friedrich Engels
Julius Nyerere
Karl Marx
Kilosaland rights
Landless Workers’ Movement
MST
Mtandao wa Vikundi vya Wakulima Tanzania
MVIWATA
small farmers

Related Stories

समाजवाद और पूंजीवाद के बीच का अंतर

महाशय, आपके पास क्या मेरे लिए कोई काम है?

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

एक महान मार्क्सवादी विचारक का जीवन: एजाज़ अहमद (1941-2022)

हम, अपने लिए, शासकों द्वारा निर्धारित भविष्य से इनकार करते हैं : कार्ल मार्क्स जयंती पर विशेष

मार्क्स और पूंजीवाद

वीरा साथीदार के दो साथी—अंबेडकर और मार्क्स

नए कृषि क़ानूनों से बढ़ेगा छोटे किसानों का शोषण

Friedrich Engels : 200 साल के बाद भी प्रासंगिकता और बढ़ी है

राक्षस अजेय नहीं होते


बाकी खबरें

  • Will the People with Guns Allow Our Planet to Breathe
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    क्या बंदूक़धारी हमारे ग्रह को साँस लेने देंगे
    11 Nov 2021
    जलवायु संकट से लड़ने के लिए जितनी बड़ी जिम्मेदारी अमेरिका को निभानी है वह उतनी ही छोटी जिम्मेदारी निभाने की जुगत में लगा रहता है। अगर दुनिया के विकसित देशों ने परंपरागत ऊर्जा स्त्रोतों के बजाए जलवायु…
  • parliament
    अनुराग तिवारी
    भारत का एक राष्ट्रपति देश में तब्दील होना और 'संसदीय तानाशाही' का जन्म
    11 Nov 2021
    इस 'संसदीय लोकतंत्र' के विचार ने भारत में चुनावी व्यवहार को समझने के तरीक़े को स्वाभाविक रूप से प्रभावित किया है।
  • हिरासत में मौत पर वामदलों ने कहा- बिहार ‘पुलिस राज’ में तब्दील होता जा रहा है
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिरासत में मौत पर वामदलों ने कहा- बिहार ‘पुलिस राज’ में तब्दील होता जा रहा है
    11 Nov 2021
    सीतामढ़ी के मेहसौल थाना में पुलिस की पिटाई से एक व्यक्ति की मौत तथा समस्तीपुर के रोसड़ा के सफाईकर्मी की थाने में हुई पिटाई के बाद इलाज के दौरान हुई मौत पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वामदलों ने कहा है…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 13,091 नए मामले, 340 मरीज़ों की मौत
    11 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.40 फ़ीसदी यानी 1 लाख 38 हज़ार 556 हो गयी है।
  • 21-year-old Muslim youth hanged himself from one and a half feet high tap
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    डेढ़ फ़ीट ऊंचे नल से फांसी लगाई 21 साल के मुस्लिम युवक ने : उत्तर प्रदेश पुलिस का दावा
    11 Nov 2021
    उत्तर प्रदेश के कासगंज में पुलिस हिरासत में 21 साल के अल्ताफ़ की मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि अल्ताफ़ ने शौचालय के नल से लटक कर फांसी लगा ली। मृतक के पिता का सीधा आरोप है कि उनके बेटे की हत्या हुई है…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License