NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
अधिकतर महिलाओं की पहुंच से बाहर मातृत्व लाभ : सर्वेक्षण
अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, रितिका खेड़ा और अनमोल सोमांची के निष्कर्ष जच्चा बच्चा सर्वे (जेएबीएस) पर आधारित हैं। यह सर्वे ग्रामीण भारत की गर्भवती और नर्सिंग महिलाओं par 2019 में किया गया था।
दित्सा भट्टाचार्य
12 Apr 2021
अधिकतर महिलाओं की पहुंच से बाहर मातृत्व लाभ : सर्वेक्षण
फोटो सौजन्य : स्क्रॉल डॉट इन

बड़ी तादाद में भारतीय महिलाएं मातृत्व लाभों से अभी भी वंचित हैं, जिनको वे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के अंतर्गत पाने की हकदार हैं। प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, रितिका खेड़ा और अनमोल सोमांची के हालिया लेख में यह बात उजागर की गई है। यह लेख जच्चा-बच्चा सर्वे पर आधारित है। ग्रामीण भारत में गर्भवती महिलाओं और नर्सिंग महिलाओं की स्थिति का पता लगाने के लिए यह सर्वेक्षण जून 2019 में किया गया था। देश के 6 राज्यों छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में हुए सर्वेक्षण का काम छात्र-कार्यकर्ताओं ने किया था। इन लोगों ने गर्भवती महिलाओं और आंगनबाड़ी केंद्रों में निबंधित नर्सिंग महिलाओं के यथासंभव इंटरव्यू भी लिये थे।

भारत के मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 की व्यापक स्तर पर सराहना की गई थी। इसके जरिये सवैतनिक लाभों के साथ मातृत्व अवकाश की अवधि पहले के 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई थी। हालांकि अर्थशास्त्रियों के लेख में इस बात को रेखांकित किया गया है कि अधिनियम का यह प्रावधान महिला कामगारों के छोटे से हिस्से को ही लाभान्वित कर पाता है। खासकर उन महिलाओं को ही जो औपचारिक और असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। इसमें कहा गया है, “वास्तव में, इस कानून का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भ्रामक धारणाएं बनाने के लिए किया जाता है कि भारत में मातृत्व अवकाश के प्रावधान सबसे ज्यादा उदार हैं। इस संदर्भ में कुछ महिलाएं अवश्य ही अन्य की तुलना में अधिक समान मानी जाती हैं : विशेष रियायत प्राप्त महिलाओं के सापेक्ष जो रोजगार क्षति-पूर्ति सिद्धांत (जैसा कि होना चाहिए) पर आधारित मातृत्व अवकाश पाने की हकदार हो जाती हैं, लेकिन ज्यादातर महिलाएं (संगठित क्षेत्रों में काम न करने वाली) इसी के चलते उन लाभों से वंचित हो जाती हैं, और उन्हें अल्प मात्रा में ही इसका फायदा मिल पाता है। इस घोर विषमता की तरफ शायद ही किसी का ध्यान जाता है।”

2013 में सभी भारतीय महिलाओं को मातृत्व लाभ पाने का कानूनी अधिकार दिया गया था, केवल उन महिलाओं को छोड़कर जो सरकार की नियमित कर्मचारी होने के कारण या अन्य कानूनों के प्रावधानों, भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के जरिये पहले से ही इसका लाभ ले रही थीं।

यह कहा गया है कि हर गर्भवती स्त्री और दुग्ध-पान कराने वाली मां मातृत्व लाभ पाने की हकदार होंगी, जिनके तहत उन्हें कम से कम 6,000 रुपये दिए जाएंगे। भारत सरकार ने आखिरकार 2017 में एनएफएसए की धारा-चार के तहत प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना के नाम से एक नई मातृत्व लाभ योजना बनाई। इसके लिए 2017-18 के केंद्रीय बजट में 2700 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया था। मातृत्व लाभ के मद में आवंटित यह राशि, अर्थशास्त्रियों के लेख के मुताबिक, आवश्यकता की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरा जैसी थी। सार्वजनिन मातृत्व अवकाश के लिए प्रति शिशु 6,000 रुपये की दर से प्रतिवर्ष कम से कम 14,000 करोड़ रुपये की दरकार होगी।

लेख के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं और दुग्ध-पान कराने वाली माताओं की विशेष आवश्यकताओं को यों ही छोड़ दिया गया है। इसमें कहा गया है, “हम यह जानकर स्तब्ध थे कि किस तरह-नमूने में लिए गए घरवारों की- उन महिलाओं पर बेहद कम ध्यान दिया जा रहा है जबकि गर्भवती स्त्रियों को पौष्टिक भोजन, ज्यादा आराम और स्वास्थ्य-देखभाल की विशेष जरूरत होती है। इन महिलाओं के परिजन या स्वयं ये महिलाएं खुद भी इस अवस्था में अपनी खास जरूरतों के प्रति लापरवाह थीं या इसकी कम जानकार थीं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में 48 फ़ीसदी गर्भवती महिलाएं और और 9 फ़ीसदी नर्सिंग महिलाओं को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि गर्भावस्था के दौरान उनका वजन बढ़ा है अथवा नहीं। इसी तरह, उन्हें गर्भावस्था और इसके बाद की अवधि में आराम की आवश्यकता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।”

लेख में कहा गया है कि मात्र 22 फ़ीसदी नर्सिंग महिलाओं ने बताया कि वह सामान्य अवस्थाओं के बनिस्बत गर्भावस्था में अधिक भोजन करने लगी थीं। सर्वे में शामिल मात्र 31 फ़ीसदी महिलाओं ने बताया कि वह गर्भावस्था के दौरान पहले की तुलना में अधिक पौष्टिक आहार लेती थीं। कहा गया है कि यह एक सामान्य कारण बताया जाता है कि बीमार होने और भूख की कमी होने की वजह से गर्भवती महिलाएं अधिक नहीं खा पाती हैं। लेख में कहा गया है, “संसाधनों का अभाव, इसमें कोई मदद नहीं करता: यही एक चीज है, जो ऐसे भोजन बनाने और उसे मुहैया कराने से रोकती है, जिन्हें गर्भवती महिलाएं स्वयं को बीमार महसूस करने या होने के दौरान उन्हें खा सकें।”

गर्भावस्था के दौरान कम पौष्टिक आहार मिलने से जच्चा और बच्चा दोनों का वजन घट जाता है। जच्चा-बच्चा सर्वे में नर्सिंग महिलाओं के हवाले से बताया गया है कि सम्पूर्ण रूप से लिये गये नमूने में नौ महीने की गर्भावस्था के दौरान औसत वजन मात्र 7 किलोग्राम ही बढ़ पाया था। यह भी कहा गया कि “ये आंकड़े इससे ज्यादा भी हो सकते हैं क्योंकि इनमें वे महिलाएं शामिल नहीं हैं जो गर्भावस्था के दौरान वजन में बढ़ोतरी होने की सामान्य बात से वाकिफ नहीं (26 फीसदी सभी नर्सिंग महिलाएं) थीं। कुछ महिलाएं तो शुरू से ही इतनी कम वजनी थीं कि गर्भावस्था के अंतिम चरण में भी उनका कुल वजन मात्र 40 किलोग्राम ही था।”

लेख के मुताबिक, गर्भवती और नर्सिंग महिलाएं स्वास्थ्य की गुणात्मक देखभाल से घनघोर रूप से वंचित थीं। उनमें से अनेक महिलाओं को स्थानीय आंगनबाड़ी या स्वास्थ्य केंद्रों पर कुछ बुनियादी सुविधाएं, जैसे टिटनेस के इंजेक्शन और आयरन टेबलेट दिए गए थे। लेकिन ये सब भी बुनियादी लाभों से बहुत दूर थीं। कहा गया है, “छोटे-छोटे कारक आसानी से बड़ा बोझ बन जाते हैं। यह बात प्रसव-पीड़ा या प्रसव के दौरान होने वाला खर्चा अथवा दोनों के बारे में कही जा सकती है। प्रसव के समय जटिलताएं बढ़ने पर महिलाओं को निजी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।”

लेख के निष्कर्ष में कहा गया है, “भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 में सार्वजनिन मातृत्व लाभ अधिकार एक ऐतिहासिक कदम है, किंतु उसकी अहमियत को, जैसी कि मालूम होती है, भारत सरकार और आम जनता ने भुला दिया है।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

Large Number of Women Do Not Have Access to Maternity Benefits: Survey

Maternity Benefits
National FOod Security Act 2013
Pradhan Mantri Matru Vandana Yojana
Jaccha Baccha Survey
Jean Dreze
Reetike Khera
Anmol Somanchi
Maternity Benefit Amendment Act 2017

Related Stories

कैसे भारतीय माताओं के लिए निर्धारित 84,000 करोड़ रुपयों से उन्हें वंचित रखा गया

केवल भोजन ही नहीं, गरीबों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार पर भी सोचना होगा : ज्यां द्रेज


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License