NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
घटना-दुर्घटना
भारत
राजनीति
बाघों के साथ तेंदुओं पर भी देना होगा ध्यान, नहीं तो बढ़ेंगे हमले
जब तक हम इस जंगली जानवर और उसकी जरूरत को समझेंगे नहीं, मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटना बेहद मुश्किल है।
वर्षा सिंह
11 Oct 2019
leopard
फोटो साभार : scind.org

मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं जिस तेज़ी से उत्तराखंड में बढ़ रही हैं, लोगों की जान जा रही हैं, लोग बड़े पैमाने पर खेती-बाड़ी छोड़ रहे हैं, निश्चित तौर पर ये चिंता का विषय है और वन विभाग की नाकामी को दर्शाता है। प्रबंधन की कमी को रेखांकित करता है। काग़ज़ों और बैठकों में तो मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए नेशनल एक्शन प्लान तक बनाए जा रहे हैं लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बिल्कुल जुदा है।
leoperd attack_0.PNG
पौड़ी में गुलदार के हमले के बाद बच्ची की मौत पर प्रदर्शन करती महिलाएं

गुलदार के हमले में 4 मौत, दो गुलदार ढेर

9 अक्टूबर को अल्मोड़ा में गुलदार (तेंदुआ) के हमले में एक बुजुर्ग की मौत हो गई। 28 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच पिथौरागढ़, बागेश्वर और पौड़ी में गुलदार ने तीन बच्चों को अपना निवाला बनाया। दो बच्चों को हमला कर जख्मी कर दिया। स्थिति ये है कि अपने घर के आंगन में खेलते बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। मां की गोद से गुलदार बच्चों को छीन कर ले जा रहे हैं। इंसानों की मौत होती है तो हंगामा होता है, जिनके मवेशी गुलदार ले जाता है, वो भी संकट से घिर जाते हैं।
 
मानव-वन्यजीव संघर्ष तेज़ होने के बाद गुलदार को नरभक्षी घोषित करने और उसे खत्म करने की मांग तेज़ हो जाती है। तीन बच्चों की मौत के बाद पिथौरागढ़, बागेश्वर और पौड़ी में लोगों ने वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन किए गए। जिसके बाद वन विभाग ने पिथौरागढ़ में गुलदार को आदमखोर घोषित कर मारने के आदेश दिए। साथ ही बागेश्वर और पौड़ी में ट्रेंकुलाइज़ कर पकड़ने के आदेश जारी किए। पिथौरागढ़ में नरभक्षी गुलदार को शिकारी ने ढेर कर दिया। पौड़ी में लोगों के गुस्से को देखते हुए जंगल की कॉम्बिंग कर गुलदार को मार दिया गया। राज्य के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन को इसकी ख़बर तक नहीं लगी। न ही इसके आदेश दिए गए थे।
 
मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं यूं तो देशभर में सामने आती हैं। लेकिन करीब 70फीसदी वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड की स्थिति बिल्कुल अलग है। जंगली जानवरों के हमले यहां आपदा सरीखे हो गए हैं। वन विभाग और ग्रामीणों के बीच तालमेल का बिल्कुल अभाव है। बल्कि वन कानून ने लोगों को जंगल और जंगली जानवरों का दुश्मन बना दिया है। जबकि पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में वन विभाग और जंगल से सटे गांवों के बीच बेहतर सामंजस्य के चलते स्थितियां बहुत बेहतर हैं।
 
राज्य में जंगली जानवरों के हमले में होने वाली हर तीन में से दो मौत गुलदार के चलते होती है। जो ज्यादातर छोटे बच्चों पर हमला करता है। लेकिन खासतौर पर इस जंगली जानवर के बारे में जानकारी बहुत कम जुटायी गई है। इन पर शोध और अध्ययन कम किए गए। पिछले एक दशक में गुलदार के व्यवहार में भी बदलाव देखा जा रहा है।
 
गुलदार के लिए जंगल में भोजन नहीं

उत्तराखंड वन विभाग को ये तक नहीं पता कि राज्य में कितनी संख्या में गुलदार मौजूद हैं। उनके रहने के लिए हमारे जंगलों में जगह नहीं है। जिससे गुलदार के बच्चे शिकार करना नहीं सीख पा रहे। जंगल में उनके लिए पर्याप्त भोजन मौजूद नहीं है। जिससे वे अपने भोजन के लिए जंगल से जुड़े रिहाइशी इलाकों पर निर्भर हैं। कूड़े का प्रबंधन नहीं होने से जंगली जानवर भोजन के लिए कूड़े की तरफ आकर्षित होते हैं और इस वजह से भी रिहायशी इलाकों में गुलदार की घुसपैठ बढ़ती जा रही है।
 
देहरादून में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की टीम मध्य हिमालयी क्षेत्र में जंगली जानवरों को लेकर अध्ययन कर रही है। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ एस. कुमार कहते हैं कि गुलदार के लिए जंगलों में बहुत ही कम भोजन उपलब्ध है। गुलदार के लिए इंसान आसान शिकार हैं। इसके साथ ही गांवों के पालतू कुत्तों का वे आसानी से शिकार कर लेते हैं। जबकि जंगल में एक शिकार के लिए उसे कम से कम 20 बार प्रयास करना पड़ता है। डॉ. कुमार कहते हैं कि जंगल में हिरन, सूअर जैसे जंगली जानवर भी लगातार कम हो रहे हैं। यही नहीं राज्य में जंगल की गुणवत्ता भी लगातार बिगड़ रही है। कटान पर प्रतिबंध के चलते ऐसी झाड़ियां उग आई हैं, जिसे हिरन-कांकड़ जैसे जीव नहीं खा सकते, इसलिए उनकी आबादी में गिरावट आ रही है।
 
गुलदार के पास जंगल में रहने की जगह नहीं

वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि बाघ और हाथी बहुल कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और राजाजी टाइगर रिजर्व वाले क्षेत्र में गुलदार को उसके हिस्से की जगह नहीं मिल रही। जहां बाघ रहते हैं, वहां गुलदार नहीं रहते। इसलिए वे जंगल और रिहायशी इलाकों से जुड़े गांवों में लगातार चलते हैं। डॉ. एस कुमार कहते हैं कि पौड़ी में उन्होंने अध्ययन के लिए कैमरा ट्रैप लगाए हैं। इन कैमरों में हर बार अलग गुलदार की तस्वीर कैद होती है। यानी एक गुलदार एक जगह नहीं ठहर रहा। वो लगातार चल रहा है। जब तक कि उसे अपनी टैरिटरी न मिल जाए। इस स्थिति में गुलदार आसपास के इलाकों से परिचित नहीं होते और लोगों पर हमला करते हैं। जंगल में पानी का संकट भी जंगली जानवरों को रिहायशी इलाकों की ओर ले जाता है। डॉ. कुमार कहते हैं कि जिस तरह से जंगली जीवों की संख्या में इजाफा हो रहा है, भविष्य में हमें इनके साथ रहना सीखना होगा। जिसके लिए बेहतर प्रबंधन की ज़रूरत होगी।

राज्य के जंगल में कितने गुलदार?

शिकारी जॉय हुकिल दस साल से अधिक समय से नरभक्षी जानवर का शिकार कर रहे हैं। वह कहते हैं कि बाघों पर हमारा पूरा ध्यान होता और गुलदार को हम गंभीरता से नहीं लेते। जॉय कहते हैं कि उत्तराखंड के जंगलों में रह रहे गुलदारों की 80 प्रतिशत आबादी भोजन के लिए रिहायशी क्षेत्रों और लोगों पर ही निर्भर है। आसान शिकार के लिए वे इंसानों पर हमला करते हैं। राज्य में गुलदारों की कितनी संख्या होगी, इस पर जॉय अपने अनुमान से बताते हैं कि हर ज़िले में एक हज़ार गुलदार लगा लो तो तेरह ज़िले में तेरह हज़ार। क्या वाकई इतने गुलदार होंगे? इस पर वे हंसते हुए कहते हैं कि तो एक जिले में 500 गुलदार लगा लो। उनके मुताबिक पूरे राज्य में कम से कम 7-8 हज़ार गुलदार मौजूद हैं। इससे ज्यादा भी हो सकते हैं। पिथौरागढ़ मे जॉय का 34वां शिकार था।
 
गुलदारों के हमलों से बचने के लिए क्या सावधानियां बरती जाएं। राज्य में जंगली जानवरों के हमले में लगातार हो रहे हमलों को देखते हुए बहुत जरूरी है कि जंगल से सटे इलाकों में लोगों को लगातार सावधानियों को लेकर जागरुक किया जाए। उनसे लगातार बातचीत की जाए। जैसा कि अन्य राज्यों में होता है। लेकिन उत्तराखंड वन विभाग के पास इतने कर्मचारी ही नहीं हैं। राजाजी टाइगर रिजर्व को इसी वजह से देशभर के टाइगर रिजर्व में सबसे आखिरी पायदान 49वें नंबर पर रखा गया, क्योंकि यहां जंगल में पेट्रोलिंग के लिए भी पर्याप्त कर्मचारी नहीं।
 
लिव विद् लेपर्ड, जरूरी सावधानियां

जबकि टिहरी गढ़वाल में वन्य जीवों के हमलों से निपटने के लिए अपेक्षाकृत बेहतर प्रबंधन किया जा रहा है, जिसके अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं और वन विभाग की मदद से यहां जंगल से सटे गांवों में रैपिड रिस्पॉन्स टीम बनायी गई है। गांव के लोगों को टीम में शामिल किया गया है।

जंगली जानवर घर के आसपास न आएं, इसके लिए ये तय किया जाता है कि लोग अपने घरों के आसपास झाड़ियां न उगने दें। क्योंकि इन्हीं झाड़ियों में छिपकर गुलदार या दूसरे जानवर हमला करते हैं।
 
रात के समय रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था जरूरी है।
 
बच्चों को दिन या रात कभी भी अकेले जंगल के पास नहीं जाने दिया जाता। स्कूल से आते-जाते समय भी बड़े की निगरानी जरूरी है।
 
मवेशियों को रात में सुरक्षित तरीके से रखा जाता है ताकि मवेशी पर हमला करने के लिए जंगली जानवर न आएं।
 
रात में आवाजाही जरूरी होने पर आवाज़ की जाती है, जिससे जानवर नज़दीक नहीं आता।

 
जब तक हम इस जंगली जानवर और उसकी जरूरत को समझेंगे नहीं, मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटना बेहद मुश्किल है। जंगली जानवरों के चलते ही किसान खेती-बाड़ी छोड़ रहे हैं। राज्य में पलायन की वजहों में से एक जंगली जानवरों का हमला भी है। वन्यजीवों की संख्या बढ़ना इको सिस्टम के लिए अच्छा है लेकिन उसके चलते संघर्ष न बढ़े, इस पर ज्यादा बेहतर तरीके से काम करना होगा।

Leopard attack
human wild life conflict
Uttrakhand
Wildlife Institute of India

Related Stories

चमोली के सुमना में हिम-स्खलन से 10 की मौत, रेस्क्यू जारी, जलवायु परिवर्तन का असर है असमय बर्फ़बारी

ग्लेशियर टूटने से तो आपदा आई, बांध के चलते मारे गए लोगों की मौत का ज़िम्मेदार कौन!

आपदा के बाद मिले 3800 रुपये,  खेत में बचा दो बोरी धान

कितनी नीलम...कितनी सुधा...? : यूपी के बाद उत्तराखंड में इलाज न मिलने पर मारी गई एक मां


बाकी खबरें

  • RELIGIOUS DEATH
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
    27 Jan 2022
    कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • cb
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बीजेपी-कांग्रेस दोनों को पता है कि विकल्प तो हम दो ही हैं’
    27 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में 2000, 2007 और 2017 में भाजपा सत्ता में आई। जबकि 2002 और 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई। भाजपा और कांग्रेस ही बारी-बारी से यहां शासन करते आ रहे…
  •  नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    27 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • सोनिया यादव
    यूपी: महिला वोटरों की ज़िंदगी कितनी बदली और इस बार उनके लिए नया क्या है?
    27 Jan 2022
    प्रदेश में महिलाओं का उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने का औसत भले ही कम रहा हो, लेकिन आधी आबादी चुनाव जिताने का पूरा मददा जरूर रखती है। और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां उन्हें लुभाने…
  • यूपी चुनाव:  उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    27 Jan 2022
    यूपी में महिला उम्मीदवारों के लिए प्रियंका गांधी की तलाश लगातार जारी है, प्रियंका गांधी ने पहले उन्नाव रेप पीड़िता की मां पर दांव लगाया था, और अब वो सोनभद्र नरसंहार में अपने भाई को खो चुकी महिला को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License