NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कम होती नौकरियों के साथ कम होती आमदनी से तबाह हो रही लोगों की ज़िंदगी
नौकरियों की किल्लत तो है ही, इसके अलावा जो कहीं ज्यादा चिंता की वजह है, वह है — जिनकी नौकरियां बच गयी है, उससे होने वाली आमदनी में आती गिरावट।
सुबोध वर्मा
09 Aug 2021
कम होती नौकरियों के साथ कम होती आमदनी से तबाह हो रही लोगों की ज़िंदगी

भारत के लोग सरकार की अदूरदर्शी नीतियों और महामारी के कुप्रबंधन से पैदा होने वाले गंभीर आय संकट की चपेट में हैं। इस आर्थिक तबाही की वजह का एक हिस्सा तो यह है कि नौकरियां की संख्या सिकुड़ गयी है।

इस तबाही का एक और हिस्सा है, जिसके बारे में ज्यादा बात नहीं होती है और वह है-मौजूदा नौकरियों से होने वाली आमदनी में गिरावट। यह इस सच्चाई को दिखाता है कि समय-समय पर नौकरियों की स्थिति में सुधार होती रहती है और बेरोजगारी में उतार-चढ़ाव आता रहता है, इस दरम्यान अर्थव्यवस्था को नुकसान इसलिए होता रहता है क्योंकि आय नाकाफी होती है। जिन लोगों ने पिछले दो दौर के लॉकडाउन में अपनी कमाई का स्रोत खो दिया है, वे अभी तक आय के उस स्तर तक नहीं पहुंच पाये हैं, जो दो साल पहले था। ऊपर से मुद्रास्फीति उनकी छोटी सी आमदनी में और भी सेंध लगाती जा रही है।

नौकरियों को लेकर मायूसी

आइये,सबसे पहले नौकरियों की स्थिति पर एक नजर डालते हैं। जैसा कि सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के आंकड़ों के आधार पर नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है कि कामकाजी आबादी का हिस्सा जनवरी 2020 (महामारी से पहले) के मुकाबले जुलाई 2021 में लगभग 42.9% से घटकर 40.2% हो गया है। यानी कि इसमें 2.7 प्रतिशत अंकों की गिरावट आयी है, जो लगभग 1.3 करोड़ की गिरावट होगी। यह महामारी के दौर में हुआ नुकसान है।

लेकिन, अगर इसकी तुलना जनवरी 2018 से की जाए, तो महामारी से काफी पहले यह गिरावट 3.2 प्रतिशत अंक की है। यानी कि लगभग ऐसे लोगों में 1.5 करोड़ की गिरावट आ गयी है, जो या तो काम कर रहे हैं या काम करने के लिए तैयार हैं। यह एक अजीब स्थिति है, क्योंकि भले ही आबादी बढ़ रही हो, और भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो (या था), लेकिन अब काम पाने वाले लोगों की संख्या कम हो गयी है!

इस खिन्न कर देने वाली स्थिति की दीगर तबाही के अलावे ऊपर दिए गए चार्ट में एक और अहम बिंदु है और वह है-महामारी से पहले ही गिरावट का शुरू हो जाना। जनवरी 2019 और जनवरी 2020 के बीच कामगारों की संख्या में पहले से ही गिरावट होनी शुरू हो गई थी। कोरोनावायरस के सामने आने से पहले ही अर्थव्यवस्था डूब रही थी। महामारी ने इतना भर किया कि जो जहाज़ पहले से ही रिस रहा था,उसमें और बड़ा छेद कर दिया।

जैसा कि ऊपर दिखाया गया है कि श्रम बल की भागीदारी दर में दोनों शामिल हैं-यानी, जो काम कर रहे हैं और जो बेरोजगार हैं, लेकिन काम की तलाश में हैं। दूसरे शब्दों में, यह रोजगार में लगे हुए और बेरोजगार लोगों का योग है।

आइए,अब हम बेरोजगारी की स्थिति की तरफ देखते हैं।

जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है कि बेरोजगारी में धीमी, लेकिन लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। जनवरी 2018 में बेरोजगारी दर लगभग 5% थी। भारत के महामारी की चपेट में आने से ठीक पहले जनवरी 2020 में यह बढ़कर 7.2% हो गयी थी।

पहले लॉकडाउन (अप्रैल-मई 2020) के दौरान बेरोजगारी उस ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी,जिस स्तर पर उसे पहले कभी नहीं देखा गया था, लेकिन लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बाद सामान्य स्तर पर वापस आ गयी थी। लेकिन,गर्मी के महीनों में बढ़कर 11% से ज्यादा हो जाने के बाद सीएमआईई के मुताबिक यह जुलाई 2021 में लगभग 7% हो गई थी।

श्रम भागीदारी दरों में आयी गिरावट के लिहाज से 6-8% की यह बेरोजगारी दर मुनासिब नहीं है। इसका मतलब तो यही है कि बड़ी संख्या में लोग इतने निराश और हताश हो चुके हैं कि उन्होंने नौकरी की तलाश ही छोड़ दी है और बेकार होकर बैठ गए हैं। सीएमआईई जिस तरह का सर्वेक्षण करती है, उस तरह के किये जाने वाले सर्वेक्षणों के दौरान इन्हें 'बेरोजगार' की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए,तो बेरोजगारी की स्थिति बेरोजगारी दर से कहीं ज्यादा गंभीर है।

कम आमदनी की ओर वापसी

महामारी और लॉकडाउन के चलते भारत में कुल आमदनी को हुए नुकसान को लेकर बहुत सारे आकलन किये गए हैं। पिछले साल अर्थशास्त्री जयन जय थॉमस का आकलन था कि पहले लॉकडाउन के चलते भारत के कार्यबल को लगभग 4.12 लाख करोड़ रुपये की आय का नुकसान हुआ था। यह भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 2.2% है। उन्होंने बताया था कि इनमें से ज्यादातर नुकसान आकस्मिक श्रमिकों या खुद के रोजगार में लगे कम आय वाले श्रमिकों जैसे कामगारों को हुआ था। इस साल की शुरुआत में एक वित्तीय फर्म की ओर से कराये गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि महामारी के एक वर्ष में कुल आय का नुकसान 13 लाख करोड़ रुपये का था।

आय के इस बड़े पैमाने पर हुए नुकसान ने देश के विभिन्न आर्थिक स्तरों के घरेलू बजट को तबाह कर दिया है, इसने सिर्फ़ उन अमीरों को बख्श दिया है, जिनके पास इन अस्थायी हालात को थामने के लिए पर्याप्त संसाधन थे। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि संस्थागत बचत में गिरावट आई है और कर्ज इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि परिवार अपनी रोज-रोज की जरूरतों को पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने के लिहाज से बुरी तरह हाथ-पैर मार रहे हैं। अन्य सर्वेक्षणों से पता चलता है कि खाने की मात्रा में भी कमी आ गयी है, क्योंकि सरकार सिर्फ़ राशन कार्ड धारकों को ही सीमित मात्रा में मुफ्त अनाज मुहैया करा रही है और इस वजह से कम से कम अनुमानित 10 करोड़ लोग इस योजना से बाहर रह गये हैं।

इस तरह, देश की कामकाजी आबादी अपने कंधों पर असहनीय बोझ ढो रही है। इन्हीं हालात में नौकरियों में पहले की स्थिति में आने वाला यह कथित 'सुधार' भ्रामक हो जाता है, क्योंकि लोगों की आमदनी में अब भी सुधार होता हुआ नहीं दिख रहा है।

सीएमआईई की ओर से किए गए घरों के सर्वेक्षण से उपलब्ध सबसे हालिया आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी-अप्रैल 2021 के मुकाबले जुलाई 2021 में बड़े पैमाने पर 1.6 करोड़ नौकरियों की बढ़ोत्तरी हुई थी। यह कई क्षेत्रों को शामिल करता एक समग्र आंकड़ा है, जिनमें से कुछ क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी देखी गई थी और कुछ क्षेत्रों में गिरावट देखी गई थी।

छोटे-छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों की श्रेणी शायद सबसे कम कमाई करने वाले तबकों में से कुछ श्रेणियां हैं, इन श्रेणियों में 1.86 करोड़ की बढ़ोत्तरी देखी गयी है। इन श्रेणियों में 1.12 करोड़ वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें या तो कृषि क्षेत्र में रोजगार मिला था, या फिर जो किसान के रूप में या (ज्यादातर) खेतिहर मजदूरों के रूप में काम कर रहे थे।

कृषि से जुड़े रोजगार में आयी यह उछाल उस खरीफ की बुवाई से जुड़ी हुई है, जो मानसून के गलत समय पर आने के चलते थोड़ी देर से बोयी गयी थी। पिछले कई सालों के आंकड़ों से पता चलता है कि आमतौर पर जुलाई में इस तरह की उछाल आती है और उसके कुछ ही महीनों बाद इन लोगों का पलायन हो जाता है। ऐसे में ये रोजगार महज अस्थायी राहत होते हैं, इससे अर्थव्यवस्था में कुछ व्यवस्थित सुधार नहीं होता।

दूसरी तरफ, वेतनभोगी नौकरियों में 32 लाख की गिरावट आई है। ये ऐसी नौकरियां हैं, जिसमें बाकी के मुकाबले बेहतर भुगतान किया जाता है। एक अन्य कम भुगतान वाला क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र है, जिसमें कभी 54 लाख कार्यरत लोगों की बढ़ोत्तरी देखी गई थी। लेकिन, विनिर्माण क्षेत्र में लगे श्रमिकों की संख्या में लगभग आठ लाख श्रमिकों की लगातार गिरावट देखी गई है।

इससे तो यही पता चलता है कि बेहतर भुगतान और ज्यादा सुरक्षित नौकरियां गायब हो रही हैं। आकस्मिक श्रमिक, खेतों या अन्य जगहों पर काम करने वालों, या छोटे दुकानदार, विक्रेता, फेरीवालों आदि जैसे लोगों को अस्थायी कमाई के अवसरों को भी हाथ से नहीं जाने देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

यहां याद रखने वाली बात यह है कि महामारी से पहले वेतनभोगी नौकरियां (सीएमआईई के आकलन के मुताबिक) 8.7 करोड़ आंकी गई थीं। इसके मुकाबले 7.65 करोड़ का मौजूदा स्तर ऐसी नौकरियों में आने वाली एक करोड़ से ज्यादा की भारी गिरावट को दर्शाता है।

यह प्रच्छन्न या छुपी हुई बेरोजगारी की प्रकृति वाली बेरोजगारी है, जो कि खुली और दर्ज बेरोजगारी से अलग है। लोगों में मायूसी है और बस जिंदा रहने के लिए लोग कहीं भी और उस किसी भी पारिश्रमिक पर काम कर रहे हैं, जिससे कि उनकी कमाई हो सकती है। उनकी यह कमाई अल्पकालिक है और हकीकत में यह स्थिति लोगों को गरीबी के जबड़े में जकड़ने के लिए मजबूर करती है।

अंग्रेजी में मूल रूप में प्रकाशित इस लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Less Jobs, Even Lesser Income Crushing People’s Lives

unemployment
CMIE data
Pandemic job Losses
Falling incomes
Hidden unemployment
Labour Force Participation
income crisis

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

ज्ञानव्यापी- क़ुतुब में उलझा भारत कब राह पर आएगा ?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा


बाकी खबरें

  • National Girl Child Day
    सोनिया यादव
    राष्ट्रीय बालिका दिवस : लड़कियों को अब मिल रहे हैं अधिकार, पर क्या सशक्त हुईं बेटियां?
    24 Jan 2022
    हमारे समाज में आज भी लड़की को अपने ही घर में पराये घर की अमानत की तरह पाला जाता है, अब जब सुप्रीम कोर्ट ने पिता की प्रॉपर्टी में बेटियों का हक़ सुनिश्चित कर दिया है, तो क्या लड़कियां पराया धन की बजाय…
  • social science
    प्रभात पटनायक
    हिंदुत्व नहीं, बल्कि नए दृष्टिकोण वाला सामाजिक विज्ञान ही दिमाग को उपनिवेश से मुक्त कर सकता है
    24 Jan 2022
    समाज विज्ञान, बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि तीसरी दुनिया की समस्याएं, सबसे बढक़र सामाजिक समस्याएं हैं। और तीसरी दुनिया के दिमागों के उपनिवेशीकरण का नतीजा यह होता है कि औपनिवेशिक दौर के…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    सिर्फ साम्प्रदायिक उन्माद से प्रचार होगा बीजेपी?
    24 Jan 2022
    अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा है कि चुनाव से पहले टीवी चैनलों द्वारा दिखाए जा रहे सर्वे पर लगाम लगाई जाए। अभिसार शर्मा आज के एपिसोड में इस मुद्दे के साथ साथ भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार…
  • Dera Ballan
    तृप्ता नारंग
    32% दलित आबादी होने के बावजूद पंजाब में अभी तक कोई कद्दावर एससी नेता नहीं उभर सका है: प्रोफेसर रोंकी राम 
    24 Jan 2022
    पंजाब की 32% अनुसूचित आबादी के भीतर जाति एवं धार्मिक आधार पर विभाजन मौजूद है- 5 धर्मों के 39 जातियों में बंटे होने ने उन्हें अनेकों वर्षों से अपने विशिष्ट एवं व्यवहार्य राज्य-स्तरीय नेतृत्व को विकसित…
  •  Bihar Legislative Council
    फ़र्रह शकेब
    बिहार विधान परिषद में सीट बंटवारे को लेकर दोनों गठबंधनों में मचा घमासान
    24 Jan 2022
    बिहार में इस वर्ष स्थानीय निकाय प्राधिकार क्षेत्र से आने वाले बिहार विधान परिषद के 24 सदस्यों यानी सीटों के लिए चुनाव होना है, जिसकी अधिसूचना अभी फ़िलहाल जारी नहीं हुई है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License