NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अब ज़रूरी है कि LGBTQIA+ समुदाय के हाथों में कुछ ताक़त दी जाए
सकारात्मक कार्रवाई के ज़रिये इंसाफ़ की एक खिड़की खुल सकती है। लेकिन यह खिड़की काफ़ी लंबे वक़्त से बंद है।
इंद्र शेखर सिंह
01 Jul 2021
अब ज़रूरी है कि LGBTQIA+ समुदाय के हाथों में कुछ ताक़त दी जाए
Image Courtesy: Down To Earth

अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस इस महीने वाशिंगटन में प्राइड मार्च में शामिल हुईं। इसकी तरफ़ कई लोगों का ध्यान गया। लेकिन क्या हैरिस के इस कदम का मतलब होगा कि LGBTQIA+ समुदाय को आगे राहत मिलेगी? शायद नहीं। फ्लोरिडा के गवर्नर ने ट्रांसएथलीट्स को महिलाओं की खेल प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने से रोक दिया है। इस तरह फ्लोरिडा अब सातवां राज्य बन गया है, जो ट्रांसएथलीट्स को महिलाओं के खेलों में प्रतिबंधित कर चुका है। ऐसा सिर्फ़ अमेरिका में ही नहीं हो रहा है। बुल्गारिया में पैदा हुए तनाव के चलते हमले हुए और समुदाय के विरोध में जुलूस निकाले गए। हंगरी ने भी 2022 चुनावों के पहले ध्रुवीकरण के लिए LGBTQIA+ विरोधी कानून पास किए हैं।

मतलब साफ़ है कि भारत समेत दुनियाभर में LGBTQ के लिए चीजें अच्छी नहीं है। भारतीय परिवार किसी समलैंगिक बेटे या बेटी को अपनाने से इंकार कर देते हैं, अगर वे अपना भी लेते हैं, तो भी इन लोगों को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। कई बार इन्हें रेप, हत्या, जबरदस्ती वसूली जैसे अपराधों समेत प्रेमविहीन जीवन से संघर्ष करना पड़ता है। हाल में उत्तरप्रदेश पुलिस ने चार लोगों को एक शख़्स से गैंगरेप के आरोप में गिरफ़्तार किया था। यह लोग पीड़ित शख़्स से एक डेटिंग ऐप के ज़रिए मिले थे। LGBTQIA+ समुदाय द्वारा एकांत में भोगी जाने वाली दर्द की कई कहानियां है। कई बार यह सामने आती हैं, तो कई बार नहीं।

भारतीय समाज में पुरुषवादी मानसिकता मजबूत होने के चलते पुरुष यौन हिंसा पर चर्चा को निषेध माना जाता है। इसलिए हमारे यहां पुरुष यौन हिंसा को सामने लानी की संस्कृति नहीं है। ट्रांसजेंडर लोग सामाजिक तौर पर वंचित हैं और उनसे जीवन व सम्मान का अधिकार भी छीन लिया जाता है। कुल-मिलाकर भारत समलैंगिक लोगों के लिए सही देश नहीं है।

इसकी एक सीधी वज़ह यह है कि LGBTQIA+ समुदाय का कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है। राजनीति या सेना में समलैंगिकों की भागीदारी से बहुत दूर, भारतीय समाज यह तथ्य तक नहीं पचा पाया है कि कोई समलैंगिक प्रोफ़ेसर, स्वास्थ्यकर्मी या कॉरपोरेट पेशेवर हो सकता है। सत्ता के गलियारे उनके लिए हर तरफ से बंद हैं।

तमिलनाडु सरकार ने 2008 में ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड बनाया था और तीसरे लिंग को पहचान दी थी। इसके ज़रिए ट्रांसजेंडर समुदाय को सरकारी कल्याण योजनाओं का फायदा मिलने का रास्ता साफ़ हुआ था। लेकिन समलैंगिक समुदाय के एक बड़े हिस्से को इससे बाहर छोड़ दिया गया। एक ऐसे माहौल में जब समलैंगिक के तौर पर समाज में रहना चुनौतीपूर्ण है, तब सरकारी सहानुभूति ना होने के चीजें बदतर हो जाती हैं। 'ट्रांसजेंडर प्रोटेक्शन एक्ट (TPA)' को मोदी सरकार ने दबा दिया। इससे ट्रांसजेंडर अधिकारों का दमन हुआ है, क्योंकि सरकार के कदम से सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2014 में NALSA केस में दिए फ़ैसले को पलट दिया गया। इस फ़ैसले में ट्रांसजेंडर समुदाय के सम्मान के अधिकार को मान्यता देते हुए, उन्हें पिछड़े और वंचित तीसरे लिंग का दर्जा दिया गया था। कहा गया था कि इस समुदाय का संरक्षण किया जाना जरूरी है।

यह कानून कई प्रतिगामी प्रावधानों से भरा हुआ था, जैसे- ऐसे लोग जिन्होंने सर्जरी के ज़रिए अपना लिंग बदलवाया, उन्हें ही ट्रांसजेंडर का दर्जा दिया जाएगा। यह कानून जिलाधीशों और समितियों को लोगों का वर्गीकरण और उनका परीक्षण करने का अधिकार देता है। ऐसे में आत्म-पहचान के अधिकार का हनन होता है। 

ट्रांसजेंडर समुदाय की पारंपरिक भूमिका, जैसे- शादी, बच्चों के जन्म आदि पर बधाई को भी छीन लिया गया। ऐसे में इस समुदाय के लिए आजीविका के संसाधन ख़त्म हो गए। इस कानून ने ट्रांसजेंडर समुदाय को अफ़सरशाही के चंगुल में फंसा दिया है। ऐसा लगता है कि राजनीतिज्ञ और अफ़सर अपने पूर्वाग्रहों से आज़ाद नहीं होकर, अपने हितों को नहीं छोड़ सकते। 

LGBTQIA+आरक्षण

जब तक इस समुदाय को सत्ता में हिस्सा नहीं मिल जाता, LGBTQIA+ आंदोलन उन लोगों द्वारा दमित होता रहेगा, जो नागरिक अधिकार नहीं समझते, समतावादी मूल्यों को नकारते हैं और पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं। TPA, पूर्वाग्रहों और पक्षपात द्वारा पैदा की गई एक बड़ी असफलता का खूब उदाहरण है।

समानता के आधार पर मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को सत्ता के गलियारों में जाने का रास्ता बनाया था। आजादी के बाद से अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल समूह खुद को किसी अगड़ी जाति की पार्टी के आसपास इकट्ठा करते नज़र आते थे, ताकि उन्हें राजनीतिक फायदा मिल सके। जब तक इन लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल गया, उनका सामाजिक और आर्थिक स्तर सुधार की दिशा में आगे नहीं बढ़ा। एक तरीके से OBC के लोगों ने अपने-आपको और भारत को सकारात्मक कार्रवाई के इन तीन दशकों में बदल लिया है। आरक्षण के ज़रिए पारंपरिक जातीय कुलीनताओं को चुनौती जारी है। आरक्षण लाखों लोगों की सामाजिक गतिशीलता का ज़रिया बना है। 

LGBTQIA समुदाय को भी एक सकारात्मक कार्रवाई वाले अभियान की जरूरत है। भारत को सकारात्मक आरक्षण की जरूरत है, जिसका मतलब है कि शिक्षा से लेकर नागरिक सेवाओं तक सभी सरकारी विभागों में LGBTQIA+ समुदाय के लिए सीट आंवटन को बढ़ाने की जरूरत है। 2014 में सरकार ने सवाल उठाते हुए कहा कि समलैंगिक लोग अलग-अलग जातियों और धर्मों से ताल्लुक रख सकते हैं। तब सरकार कैसे कार्रवाई कर सकती है? उदाहरण के लिए मंडल आयोग एक अंक प्रणाली पर आधारित था, जिसके ज़रिए सामाजिक-आर्थिक तत्वों को आंकलन में शामिल किया गया था। मंडल आयोग ने किसी जाति समूह को किसी क्षेत्र के लिए ही आरक्षण दिया था। जैसे- अगर किसी जाति के सदस्य को एक राज्य में आरक्षण मिल सकता है, लेकिन ऐसा हो सकता है कि किसी दूसरे राज्य में उसे आरक्षण ना दिया जाए। ऐसा इसलिए, क्योंकि एक जातिगत समूह या अल्पसंख्यक समूह के साथ एक क्षेत्र में बहुत भेदभाव हो सकता है, लेकिन दूसरे क्षेत्र में उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। 

सामूहिक आवेश और भेदभाव, सकारात्मक कार्रवाई के लिए पूर्ववृत्ति हो सकते हैं। लैंगिक अल्पसंख्यकों के साथ परिवारों और उनके सामाजिक समूहों में बहुत अत्याचार हुआ है। इसलिए दूसरे वंचित तबकों के साथ, उन्हें भी सकारात्मक कार्रवाई का लाभ मिलना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक आधार पर इस तरह के अभियान का आधार तय किया जा सकता है। इसके प्रभावी तरीके से काम करने के लिए सरकार को लोगों को आत्म-पहचान का अधिकार देना चाहिए और खुद को चयन प्रक्रिया में उलझने से दूर रखना चाहिए। अमेरिका और यूरोप पहले ही इस तंत्र को अपना चुके हैं। इसी तरीके से भारत अपनी फ़ैसला लेने वाली प्रक्रिया में विविधता ला सकता है। 

2019 में तमिलनाडु सरकार ने सुझाव दिया कि ट्रांसजेंडर लोगों को MBC (अति पिछड़े वर्ग) के तहत आरक्षण दिया जाना चाहिए। 2014 को NALSA फ़ैसला भी इस तरह की विशेष सुरक्षाओं का उपबंध करता है, लेकिन TPA ने इस मांग को अलग कर दिया। 

ओडिशा जैसे राज्य पहले ही आगे चल रहे हैं। ओडिशा पुलिस में जल्द ही ट्रांसजेंडर अधिकारी शामिल हो सकते हैं। इस बीच दूसरे संस्थान जैसे- नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन भी इस दिशा में कार्रवाई शुरू कर चुके हैं। नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन पहला प्राइड स्टेशन बना चुका है। लेकिन LGBTQIA+ समुदाय को सुरक्षित महसूस कराने और आत्मसम्मान भरा जीवन उपलब्ध कराने की दिशा में अभी बहुत कदम उठाए जाने बाकी हैं। 

लेकिन ध्यान रहे कि सकारात्मक कार्रवाई न्याया का सिर्फ़ एक दरवाजा खोलती हैं। भारत को LGBTQIA+ समुदाय के लोगों पर हमलों को रोकने के लिए, हमला करने वालों को दंडित करना चाहिए। जो लोग डर के साये में रहते हैं या अधिकारों से वंचित रहते हैं, वे भी मुख्यधारा का हिस्सा बनना चाहते हैं। हर सभ्य देश नागरिकों को उनकी पहचान से परे सम्मान, अधिकार और रक्षा का अधिकार देता है। अब वक़्त आ चुका है कि भारत भी ऐसा ही करे और अपने संविधान के आदेश को पूरा करे। 

LGBTQIA+ आंदोलन के नेता, हर राजनीतिक पार्टी में एक जेंडर फोरम और राज्य व जिला स्तरीय समितियों में खुद को समन्वित करने की मांग कर रहे हैं। ऐसा मजबूत रैलियों और दलितों, महिलाओं, कामग़ारों व अल्पसंख्यक समूहों के साथ भाईचारा बनाए बिना नहीं किया जा सकता। किसानों का आंदोलन भी एक ऐसा मंच है, जिसे LGBTQIA के नेताओं को अपनाना चाहिए। उन्हें राजनीतिक होने और चुनावी राजनीति में आने की जरूरत है। क्योंकि बिना राजनीतिक ताकत के उनके आत्मसम्मान को हमेशा चुनौती मिलती रहेगी। 

(लेखक नेशनल 'सीड एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया' के पूर्व निदेशक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Let’s Have Some Power With Our Pride

LGBTQIA+ community
sexual violence
Transgender Protection Act
Modi government
Reservation
Most Backward Category

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • punjab
    रवि कौशल
    पंजाब चुनाव: पार्टियां दलित वोट तो चाहती हैं, लेकिन उनके मुद्दों पर चर्चा करने से बचती हैं
    12 Feb 2022
    दलित, राज्य की आबादी का 32 प्रतिशत है, जो जट्ट (25 प्रतिशत) आबादी से अधिक है। फिर भी, राजनीतिक दल उनके मुद्दों पर ठीक से चर्चा नहीं करते हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से कमज़ोर, सामाजिक रूप से उत्पीड़ित…
  • union budget
    बी. सिवरामन
    केंद्रीय बजट 2022-23 में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के पीछे का सच
    12 Feb 2022
    क्या पूंजीगत खर्च बढ़ने से मांग और रोजगार में वृद्धि होती है?
  • Rana Ayyub
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    जनता के पैसे का इस्तेमाल ख़ुद के लिए नहीं किया : राना अय्यूब
    12 Feb 2022
    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक बयान जारी करते हुए अय्यूब ने कहा कि उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग के अधिकारियों को ‘‘स्पष्ट रूप से दिखाया’’ है कि ‘‘राहत अभियान के धन का कोई भी हिस्सा…
  • sc and yogi
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सुप्रीम कोर्ट की यूपी सरकार को चेतावनी; सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ वसूली नोटिस वापस लें या हम इसे रद्द कर देंगे
    12 Feb 2022
    शीर्ष अदालत ने कहा कि दिसंबर 2019 में शुरू की गई यह कार्यवाही उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कानून के खिलाफ है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 50 हज़ार नए मामले सामने आए 
    12 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 50,407 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 25 लाख 86 हज़ार 544 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License