NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
कानून
भारत
राजनीति
‘लंबी सुनवाई प्रक्रिया एक सज़ा’: पूर्व न्यायाधीशों ने यूएपीए के अंतर्गत ज़मानत और जेल के विधान की आलोचना की
न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश ने रेखांकित किया कि इन निरोध कानूनों के प्रावधान के व्यापक दुरुपयोग होने के चलते ही बाद में अधिकांश निरोध अधिनियमों को निरस्त कर दिया गया था जबकि यूएपीए “चोरदरवाजे” से आया एक कानून है।
अभिलाषा चट्टोपाध्याय
07 Jul 2021
uapa

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर कहते हैं कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के मामले में आरोपित किसी व्यक्ति के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाली सुनवाई स्वयं में एक सजा हो जाती है, जबकि इस कानून के तहत अंतिम रूप से सजा मिलने की दर आश्चर्यजनक रूप से बहुत ही कम रहती है। वे पीयूसीएल के तत्वावधान में 3 जुलाई 2021 को आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में बोल रहे थे। 

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) की तरफ से डॉ वी.सुरेश की अध्यक्षता में यूएपीए कानून के अंतर्गत गिरफ्तारी के प्रावधानों के चलते जारी संकट पर एक संवाद का आयोजन किया गया था, जिसमें वक्ता के रूप में न्यायमूर्ति लोकुर  और पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश अंजना प्रकाश को आमंत्रित किया गया था। इस कानून के अंतर्गत पिछले कुछ सालों में देश में अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके तहत गिरफ्तार किए गए अनेक लोगों को पिछले महीने देश के लगभग सभी हिस्सों, गुजरात से लेकर दिल्ली और असम, तथा जहां-तहां से रिहा भी किया गया है। 

न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि 2015 से 2019 के बीच, यूएपीए तहत की गई गिरफ्तारियों के अनेक मामले में “सजा की दर बहुत अल्प मात्र 1.97 फीसद रही है।” उन्होंने आगे कहा कि “अस्पष्ट आरोप पत्र इस कानून के दुरुपयोग को बढ़ाते हैं,  जिसका विशाल दुष्परिणाम लोगों के जीवन और उनकी आजीविका पर पड़ता है।”

जैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली में दंगा फैलाने की साजिश रचने के मामले में गिरफ्तार छात्र कार्यकर्ता आसिफ इकबाल तन्हा को दी गई जमानत के आदेश में टिप्पणी की: “जहां अदालत को पता चला कि किसी कार्य या चूक को पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया है और उसे देश की सामान्य दंड संहिता द्वारा निपटाया गया है। अदालत को एक राज्य एजेंसी के ‘असत्य’ का अनुमोदन अवश्य ही नहीं करना चाहिए।“ (दिल्ली उच्च न्यायालय आसिफ इकबाल तन्हा बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली जून 15 2021) 

न्यायाधीश प्रकाश ने यूएपीए संशोधित अधिनियम 2008 की धारा 12 और धारा 43 डी(5) से लेकर (7) तक को उद्धृत किया, जिन्हें आतंकवादी गतिविधियों (गैर कानूनी गतिविधियों में नहीं) में गिरफ्तार व्यक्तियों की जमानत को लेकर अधिनियम में जोड़े गए थे। दूसरे शब्दों में, अन्य कानून जहां मान कर चलते हैं कि दोष साबित होने तक हर आरोपित व्यक्ति निर्दोष है, वहीं यूएपीए यह मान कर चलता है कि आरोपित व्यक्ति पर लगाए गए तमाम आरोप “प्रथमदृष्टया” सही हैं।

इस कारण से, न्यायमूर्ति लोकुर ने रेखांकित किया, “लंबित सुनवाई का मामला, खास कर यूएपीए जैसे कानून के अंतर्गत, “प्रक्रिया ही सजा हो जाती है।”  इस संदर्भ में, आसिफ तन्हा और नजीब (यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए.नजीब) मामलों के हवाले से, न्यायमूर्ति लोकुर ने रेखांकित किया कि “पांच साल की अवधि तो मानक नहीं हो सकती, लेकिन जुर्म हुआ है या नहीं, इसे साबित करने के लिए एक ‘तर्कसंगत अवधि’ दी जानी चाहिए।”

न्यायमूर्ति लोकुर ने अपने संबोधऩ में कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने तन्हा मामले में यह भी गौर किया कि “अभियोजन पक्ष के 740 गवाह थे, और कोविड-19 महामारी की वजह से न्यायालय की सामान्य कार्यवाहियों में आने वाली बाधाओं को देखते हुए इस मामले में त्वरित सुनवाई संभव नहीं थी।” लिहाजा, अदालत ने तीनों छात्र कार्यकर्ताओं-नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत दे दी। 

परिचर्चा में न्यायाधीश लोकुर ने दावा किया कि अदालतों को प्रकाश चंद्र मेहता मामले में रखे गए दृष्टांत के मुताबिक अवश्य ही प्रगतिशील बनी रहनी चाहिए, जिनमें अदालत ने साफ किया था, “ताकत के दुरुपयोग के विरुद्ध रक्षक संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने के विचार में कोई कानून ऐसा नहीं है, जिसके तहत (न्यायाधीशों को) अपने कॉमन सेंस को कोल्ड स्टोर में रख देना चाहिए।” (एआइआर687, 1985 एसीआर (3) 697)।

सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति एन.वी.रमन, सूर्य कांत एवं अनिरुद्ध बोस की एक तीन सदस्यीय खंडपीठ ने पहली फरवरी 2021 को दिए फैसले में कहा था कि यूएपीए के तहत भी आरोपित व्यक्ति को त्वरित सुनवाई का मौलिक अधिकार है और उसके इस अधिकार का उल्लंघन होने की स्थिति में उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है। परिचर्चा में इसी तथ्य को आगे बढ़ाते हुए न्यायमूर्ति लोकुर ने रेखांकित किया कि “आरोपित व्यक्ति के कैद में रहने के दौरान उस पर होने वाले अधिक मानवीय परिणामों को देखते हुए उसके पुनर्वास एवं रोजगार सुनिश्चित करने के अलावा उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए।”

अंत में, उन्होंने एक विज्ञापन साझा कर दिल्ली पुलिस के नए प्रयोग की ओर ध्यान आकृष्ट कराया जिसमें “लीगल कंसल्टेंट के रूप में वकीलों की भर्ती की बात कही गई है, जो दोधारी तलवार हो सकती है।”  उन्हें जांच अधिकारियों को सलाह देने और अंतरालों को पाटने में उनकी मदद करने के लिए कहा जाएगा। न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि “साक्ष्य न होने की सूरत में, वे अपने मुकदमे को मजबूत बनाने के लिए अपनी तरफ से कुछ न कुछ गढ़ सकते हैं। इस ‘कानूनी सलाह’ के आधार पर सजा की दर में 2 फीसद तक की बढ़ोतरी हो जाएगी।”

निश्चयात्मक रूप से न्यायाधीश प्रकाश न्यायालयों की संरचना को विश्लेषित करती हुईं तर्क देती हैं कि इन निरोध कानूनों के प्रावधान के व्यापक दुरुपयोग होने के चलते ही बाद में अधिकांश निरोध अधिनियमों को निरस्त कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि एक निरोध कानून के रूप में यूएपीए ने ‘पिछले दरवाजे’ से ज्यादा घुसपैठ की है। निवारक निरोध अधिनियम (प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट) से भिन्न, यूएपीए ने समयबद्ध समीक्षा के उपबंध को समाप्त कर दिया है, जो इसे संसद में निरस्त किए जाने तक अनिश्चित काल के लिए वैध बना देता है।” 

 अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

https://www.newsclick.in/long-trial-process-tends-become-punishment-justices-critique-bail-jail-UAPA

UAPA
Misuse of UAPA
Justice Madan Lokur
PUCL
Stan Swamy

Related Stories


बाकी खबरें

  • Himachal Pradesh
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल प्रदेश: फैक्ट्री में ब्लास्ट से 6 महिला मज़दूरों की मौत, दोषियों पर हत्या का मुक़दमा दर्ज करने की मांग
    24 Feb 2022
    हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में एक फैक्ट्री में विस्फोट होने से छह लोगों की मौत हो गयी और 12 अन्य झुलस गए हैं। फैक्ट्री में अवैध रूप से पटाखे बनाए जा रहे थे। जानकारी के मुताबिक मारे गए ज्यादातर लोग और…
  • putin
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस द्वारा डोनबास के दो गणराज्यों को मान्यता देने के मसले पर भारत की दुविधा
    24 Feb 2022
    डोनबास के संदर्भ में, भारत की वास्तविक दुविधा स्वयं के दूर-दराज के प्रदेशों की जमीनी हकीकत को देखते हुए उनके आत्मनिर्णय को लेकर है। 
  • putin
    एपी
    पुतिन की पूर्वी यूक्रेन में सैन्य अभियान की घोषणा
    24 Feb 2022
    पुतिन ने दावा किया है कि हमले पूर्वी यूक्रेन में लोगों की रक्षा करने के मकसद से किए जा रहे हैं। पुतिन ने अन्य देशों को आगाह भी किया है कि रूसी कार्रवाई में किसी प्रकार के हस्तक्षेप के प्रयास ‘‘के ऐसे…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 14,148 नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    24 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.35 फ़ीसदी यानी 1 लाख 48 हज़ार 359 हो गयी है।
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में हिन्दुत्व बेअसर, हिजाब-विवाद, 'सायकिल' पर निशाना और मलिक अरेस्ट
    24 Feb 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में चौथे चरण के मतदान के बाद सत्ता की लड़ाई और दिलचस्प हो गयी है. सत्ताधारी भाजपा के पांव डगमगाते नज़र आ रहे हैं. पार्टी का हिन्दुत्व एजेंडा भी काम नहीं आ रहा है.
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License