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12 साल में कितना सफल हुआ भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा?
भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे को भारतीय जनता के बीच यह कहकर चलाया गया था कि यह जादुई छड़ी है, जिसके हाथ में आने की देर है, भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें पलक झपकते ही पूरी हो जाएंगी और बार-बार होने वाले पॉवर कट की मुसीबत छू मंतर हो जाएगी। लेकिन हुआ उसके उलट…
प्रबीर पुरकायस्थ
16 Aug 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
फाइल फोटो। 2 मार्च, 2006 को दिल्ली में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह।
फाइल फोटो। 2 मार्च, 2006 को दिल्ली में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह।

भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे (nuclear deal) पर दस्तखत हुए, 12 बरस से ज्यादा हो चुके हैं। भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री, प्रणव मुखर्जी और अमरीकी विदेश सचिव, कोंडोलीज्जा राइस ने 2008 के अक्टूबर के महीने में, अमेरिका-भारत असैनिक नाभिकीय सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। इस सौदे को भारतीय जनता के बीच यह कहकर चलाया गया था कि यह जादुई छड़ी है, जिसके हाथ में आने की देर है, भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें पलक झपकते ही पूरी हो जाएंगी और बार-बार होने वाले पॉवर कट की मुसीबत छू मंतर हो जाएगी। लेकिन, जिन लोगों की आंखों पर खास अमेरिका के बने चश्मे चढ़े हुए हैं, वे अब इस सच्चाई को ही पहचानने से इंकार करते नजर आते हैं कि उस भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे की कामयाबी को तो इसी पैमाने पर जांचना होगा कि क्या इस सौदे ने, भारत की ऊर्जा संबंधी किसी भी जरूरत को पूरा किया है। लेकिन, इस पहलू से देखा जाए तो यह सौदा तो पूरी तरह से विफल ही साबित होता है।
 
इस सौदे तथा इसी क्रम में आगे चलकर नाभिकीय पाबंदियों के हटाए जाने के परिणामस्वरूप, तीन नाभिकीय संयंत्र आपूर्तिकर्ताओं- अमेरिका के जनरल इलैक्ट्रिक (जीई) तथा वेस्टिंगहाउस और फ्रांस के अरेवा से भारत को 18 नाभिकीय संयंत्र हांसिल होने थे। जीई को गुजरात में मीठी विर्दी में और वेस्टिंगहाउस को आंध प्रदेश के कोवाड्डा में, छ:-छ: लाइट वॉटर रिएक्टर (एलडब्ल्यूआर) लगाने का जिम्मा सौंपा गया था। इसी प्रकार फ्रांस की अरेवा को महाराष्ट्र के जैतापुर में छ: योरपीय प्रैशराइज्ड वाटर रिएक्टर (एलडब्ल्यूआर) लगाने का जिम्मा मिला था। इनमें से एक भी संयंत्र कांट्रैक्ट की मंजिल तक भी नहीं पहुंच पाया है, फिर बिजली पैदा होने का तो सवाल ही कहां उठता है।
 
बेशक, इस बीच भारत ने बिजली की कमी पर और बार-बार होने वाले पॉवर कटों से निजात पा ली है। लेकिन, इसमें नाभिकीय सौदे के बल पर, ऊर्जा उत्पादन क्षमता में हुई किसी बढ़ोतरी का रत्तीभर योगदान नहीं है।

12 वर्ष की इस अवधि के बीच, वेस्टिंगहाउस तो 2017 में दीवालिया भी हो चुकी है। हाल ही में वह चैप्टर-11 के अंतर्गत दीवालियापन की प्रक्रियाओं से निकली है। उधर जीई ने अपना रिएक्टर डिवीजन हिटाची को बेच दिया है, जिसे भारी घाटा उठाना पड़ा है और बड़े नाभिकीय रिएक्टर बनाने की उसमें कोई हिम्मत नहीं बची है। उधर फ्रांसीसी अरेवा भी इसी बीच दीवालिया हो गयी है और उसकी परियोजनाओं का ईडीएफ ने अधिग्रहण कर लिया है। ईडीएफ फ्रांस की सरकारी उपयोगिता है, जिसकी मिल्कियत में फ्रांस के सारे नाभिकीय संयंत्र हैं। भारत में जो भी नाभिकीय बिजलीघर बन रहे हैं, वे या तो घरेलू क्षमता के बल पर बन रहे हैं या फिर रूस के रोसाटम 1000 मेगावाट लाइट वाटर रिएक्टरों के सहारे बन रहे हैं।
 
वामपंथी पार्टियों ने अमेरिका-भारत नाभिकीय सौदे के सवाल पर मनमोहन सिंह सरकार से जब नाता तोड़ा था, उनकी दलील यही थी कि इस सौदे से भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के पहलू से कोई उल्लेखनीय लाभ मिलने वाला नहीं था। इसके बजाए यह सौदा, नाभिकीय ऊर्जा मुहैया कराने की आड़ में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को ही कमजोर करने जा रहा था, जबकि भारत स्वतंत्रता के बाद से इस स्वायत्तता को बड़े जतन से बचाए रहा था। उसके बाद से भारत ने अमेरिका के साथ, एक के बाद एक, कई रक्षा समझौते किए हैं। हाल ही में भारत, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व में क्वॉड के नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ है। गुटनिरपेक्षता के अपने जमाने से भारत, अब तक इतनी दूर निकल आया है।
 
सरकार और नाभिकीय आकाओं द्वारा नाभिकीय ऊर्जा को लेकर अनेक अफलातूनी योजनाएं पेश की गयी थीं। ऐसी ही एक योजना तो यही थी कि 2031 तक, 63,000 मेगावाट की नाभिकीय बिजली क्षमता स्थापित कर दी जाएगी। उस समय नाभिकीय पॉवर कार्पोरेशन के अध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक, एस के जैन ने कहा था, ‘63,000 मेगावाट के कुल लक्ष्य में से, करीब 40,000 मेगावाट का उत्पादन अंतराष्ट्रीय सहयोग से लाइट वाटर रिएक्टरों (एलडब्ल्यूआर) के जरिए ही किया जाएगा।’
 
इस सौदे के संबंध में यूपीए के साथ हुए विचार-विनिमय में, वामपंथ ने इसके अव्यवहार्य होने की बात उठायी थी। वामपंथ ने यह भी ध्यान दिलाया था कि इस तरह की बिजली बेहिसाब महंगी पड़ने जा रही थी। और आज स्थिति यह है कि जीई, वेस्टिंगहाउस या अरेवा--अब ईडीएफ--के प्रस्तावित 18 बिजलीघरों में से, एक भी जमीन पर उतरता नजर नहीं आता है। लेकिन क्यों? इन संयंत्रों की लागत ही इतना ज्यादा बैठेगी कि जो भी बिजली उपयोगिता उनकी मिल्कियत संभालेगी, उसका दीवाला निकल जाएगा। यह दूसरी बात है कि जब-जब कोई अमरीकी या फ्रांसीसी उच्चाधिकारी भारत के दौरे पर आता है, झाड़-पोंछकर इन संयंत्रों के सौदों की चर्चा को बाहर निकाल लिया जाता है।
 
दूसरी ओर, आयातित नाभिकीय रिएक्टरों की उम्मीद में, हमारे देश का अपना घरू नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम भी धीमा पड़ गया है। इन 12 वर्षों में हमने अपनी घरू नाभिकीय क्षमता में, देसी डिजाइन की 220 मेगावाट की दो नयी यूनिटें ही जोड़ी हैं और रूसी डिजाइन के सहारे, 1000 मेगावाट की दो यूनिटें और जोड़ी हैं। अब 2031 तक, 15,700 मेगावाट की क्षमता के 21 और नाभिकीय रिएक्टर स्थापित करने की योजना है। इसका अर्थ यह है कि 2031 तक जो 40,000 मेगावाट के आयातित लाइट वाटर रिएक्टर स्थापित होने वाले थे, उनमें से सिर्फ 4,000 मेगावाट क्षमता के रूसी रिएक्टर ही जमीन पर उतर पाएंगे। दूसरी ओर, अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों का कोई भी नाभिकीय रिएक्टर, भारत में तब तक स्थापित नहीं होने वाला है।
 
नाभिकीय सौदे की घोर विफलता का कारण

भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा इतनी बुरी तरह से विफल क्यों हुआ? इसका असली कारण था भारतीय राजनीतिक प्रतिष्ठान का अमेरिका के नाभिकीय उद्योग की कल्पित सामर्थ्य के संबंध में पूरी तरह से गलत आकलन और उसकी यह धारणा कि भाभा एटमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) और भारतीय नाभिकीय विद्युत कार्पोरेशन, बहुत काम के नहीं हैं।
 
एक भ्रामक धारणा यह बनी रही है कि थ्री माइल आइलैंड मामले में नाभिकीय रिएक्टर के करीब-करीब बैठ जाने की जो नौबत आ गयी थी, उसके चलते ही अमेरिका का नाभिकीय ऊर्जा से मोह टूट गया था। वास्तव में अमरीकी नाभिकीय उद्योग, उसकी बिजली उपयोगिताओं की नजरों से इसलिए गिरा था कि वह नाभिकीय बिजलीघरों के निर्माण की अपनी प्रस्तावित समय सूची का पालन नहीं कर पा रहा था और उसकी लागतें प्रस्तावित लागतों से बेतरह बढ़ रही थीं। इन्हीं हालात में 1980 के दशक में सस्ती प्राकृतिक गैस का विकल्प जब सामने आया, ज्यादातर बिजली उपयोगिताओं ने अपने नये बिजलीघरों को चलाने के लिए प्राकृतिक गैस के विकल्प को अपना लिया।
 
इस तरह, कार्बन उत्सर्जनों से बचाने के लिए जिस नाभिकीय पुनर्जागरण का वादा किया गया था, वह तो कभी आया ही नहीं क्योंकि इस दौरान अक्षय (रिन्यूएबल) ऊर्जा की लागतें लगातार घटती गयी हैं और दूसरी ओर नाभिकीय ऊर्जा क्षमताओं के निर्माण में लागत तथा समय के, प्रस्तावित से बेहिसाब बढ़ जाने की बीमारी बनी ही रही है।
 
एमआइटी के एक ग्रुप ने हाल ही में नाभिकीय ऊर्जा के भविष्य के संबंध में अपना, दो साल लंबा एक अध्ययन पूरा किया है--‘द फ्यूचर ऑफ आफ न्यूक्लिअर इनर्जी इन एक कॉर्बन कन्स्ट्रेन्ड वल्र्ड’। उनके निष्कर्ष झटका देने वाले हैं कि अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय कंपनियों ने, बड़े नाभिकीय संयंत्र निर्मित करने की क्षमता ही खो दी है। नाभिकीय ऊर्जा के सुहाने दिनों में इस तरह के संयंत्रों के निर्माण के साथ जुड़े रहे इंजीनियरों तथा नाभिकीय-भौतिकीविदों की पीढ़ी, इस बीच या तो सेवानिवृत्त हो गयी है या अब इस काम से जुड़ी नहीं रह गयी है। जिन कंपनियों ने अब भी अपने अतीत के नामों को छोड़ा नहीं है, उनमें भी अब इसकी कोई संस्थागत स्मृति नहीं बची है कि ऐसे विशाल संयंत्रों का निर्माण कैसे किया जाता है।

इसके नतीजे, अमेरिका में वेस्टिंगहाउस द्वारा दो जगहों पर बनाए जा रहे चार नाभिकीय बिजली संयंत्रों में बहुत साफ-साफ देखे जा सकते हैं। केरोलिना में वेस्टिंगहाउस द्वारा जिन दो रिएक्टरों का निर्माण किया जा रहा था, उन्हें पूरे 9 अरब डालर खर्च करने के बाद भी छोड़ दिया गया है क्योंकि पूरे होने पर इन संयंत्रों की लागत 25 अरब डॉलर बैठने जा रही थी यानी सौदे में तय हुई लागत से दोगुनी से भी ज्यादा। इसके अलावा समय भी तय समय सीमा से कई साल ज्यादा लगने जा रहा था। इसी प्रकार, जॉर्जिया में वेस्टिंगहाउस द्वारा निर्मित वोग्टल संयंत्र की लागत 11.5 अरब डालर के शुरूआती अनुमान के मुकाबले, दोगुनी से ज्यादा रहने जा रही है। और कहां तो इस संयंत्र का काम 2016 तथा 2017 में पूरा होना था और कहां अब तक इसकी दोनों इकाइयों का काम पूरा होने के आस-पास भी नहीं है।
 
फ्रांस में फ्लेमनविले के संयंत्र के निर्माण का अरेवा का रिकॉर्ड और भी बदतर रहा है। फ्लेमनविले का संयंत्र 2013 तक चालू हो जाना था और इसकी लागत 3.3 अरब यूरो बैठनी थी। लेकिन यह संयंत्र दस साल पीछे चल रहा है और जहां तक लागत का सवाल है, फ्रांस की कोर्ट ऑफ ऑडिट के अनुसार, बढक़र करीब छ: गुनी हो गयी है और पूरे 19.2 अरब यूरो पर पहुंच गयी है.
 
दूसरी ओर एमआइटी की उक्त रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि नाभिकीय संयंत्रों के निर्माण की नाकामी की इस बीमारी का असर रूस, दक्षिण कोरिया, चीन तथा भारत पर नजर नहीं आता है। इन सभी देशों में प्रस्तावित बजट में और निर्माण की समय सूची के हिसाब से, नाभिकीय संयंत्रों का निर्माण हो रहा है।
 
हम फिलहाल इस वृहत्तर प्रश्न पर चर्चा नहीं कर रहे हैं कि अक्षय ऊर्जा की लागतों की स्थिति और नाभिकीय रिएक्टरों से जुड़े जोखिमों को देखते हुए (फुकुशीमा को याद रखें), हमारे भविष्य के ऊर्जा मिश्रण में नाभिकीय ऊर्जा की कितनी जगह हो सकती है। हम फिलहाल इस चर्चा को भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे तक ही सीमित रखेंगे, जिसमें यह मानकर चला गया था कि हमारी ऊर्जा आवश्यकता के एक हिस्से की भरपाई, नाभिकीय संयंत्रों से ही होनी है। इस पूर्व-धारणा के रहते हुए भी, वामपंथ ने उस समय यूपीए के साथ अपनी चर्चाओं में यह रेखांकित किया था कि हमारे देश में नाभिकीय ऊर्जा की उत्पादन क्षमताओं के निर्माण की घरेलू क्षमताएं मौजूद थीं और यह भी कि अमरीकी तथा फ्रांस के अरेवा जैसे अन्य पश्चिमी स्रोतों से आयातित नाभिकीय बिजली क्षमता हासिल करना, इतना महंगा विकल्प है कि उसका बोझ उठाया ही नहीं जा सकता है।
 
तब भारत, इस अमेरिका-भारत नाभिकीय सौदे के जाल में क्यों फंस गया? अमेरिका के लिए, इस नाभिकीय सौदे के दो प्रमुख लक्ष्य थे। एक तो इसके जरिए वह अपने मरणशील नाभिकीय उद्योग को बचाने की उम्मीद कर रहा था, जिसका भविष्य इसके बिना अंधकारमय होने जा रहा था। उसे भारत का नाभिकीय बाजार आकर्षक लग रहा था और यह आकर्षण इससे और बढ़ जाता था कि वह भारत को वेस्टिंगहाउस और जीई से, उनके महंगे नाभिकीय बिजलीघर खरीदने के लिए राजी कर लेने की उम्मीद कर सकता था। उसका दूसरा लक्ष्य था, भारत को नाभिकीय ताकतों के क्लब में प्रवेश दिलाने की आड़ में, भारत को अमरीकी नाभिकीय आपूर्तियों के साथ बांधना और उसकी भविष्य की नीतियों की बाड़ेबंदी कर देना। यह भारत को गुटनिरपेक्षता को त्याग कर, अमेरिका के रणनीतिक आलिंगन में खींचने में अमेरिका की मदद करने जा रहा था।
 
1974 के पोखरण विस्फोट और भारत पर पाबंदियां लगाए जाने के बाद के बहुत ही मुश्किल दौर में, भारत ने अपने एक स्वतंत्र नाभिकीय उद्योग को खड़ा किया था। एक बार पश्चिमी नाभिकीय आपूर्तियों के साथ बंध जाने के बाद, वह फिर से उसी तरह से पश्चिमी पाबंदियों के सामने अरक्षित हो जाता, जैसे तारापुर में अपने जीई के रिएक्टरों और कनाडा के सीएएनडीयू रिएक्टरों के लिए हो गया था। बीएआरसी और एनपीसी को अपने बल पर सीएएनडीयू रिएक्टरों के मामले में सिद्धहस्त होने में वर्षों लग गए थे। इस प्रक्रिया से भारत को अपने घरेलू इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग, जटिल धातुकार्मिक प्रक्रियाओं और इंजीनियरिंग के मामले में गुणवत्ता नियंत्रण का विकास करने में मदद मिली है। इस सबसे नयी प्रौद्योगिकियों पर महारत हासिल करने की भारत की तलाश में भारी मदद मिली है।

इस तरह भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा वास्तव में, भारत की विदेश नीति को अमेरिका के मनोनुकूल दिशा में मोड़ने की कोशिश का हिस्सा था। इसके जरिए भारत में आत्मनिर्भर तरीके से प्रौद्योगिकी के विकास के सिलसिले को भी कमजोर किया जाना था। और इस समझौते के बारह साल बाद हम क्या देखते हैं? यह सौदा, भारतीय नाभिकीय ऊर्जा बाजार पर कब्जा करने के अपने लक्ष्य में तो विफल हो गया है। लेकिन, भारत को अमेरिका के एक अधीनस्थ सहयोगी में तब्दील करने के अपने लक्ष्य में जरूर यह सौदा कामयाब हो गया लगता है।    

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल ख़बर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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