NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मैनुअल स्केवेंजिंग से हुई मौत – कहाँ है इंसाफ?
"आज सरकार के एजेंडे में अभी तक न तो मैला ढोने वालों की मुक्ति हैं और न ही सीवर-सेप्टिक टैंक में हो रही मौतों को रोकना है। मोदी सरकार तो सिर्फ... स्वच्छ भारत का ढिंढोरा पीटने में लगी है।"
भाषा सिंह
08 Aug 2017
मैनुअल स्केवेंजिंग से हुई मौत – कहाँ है इंसाफ?

ऐ, रहबरो मुल्कों कौम बता, ये किसका लहू है कौन मरा–

इंकलाबी तेवर वाले मकबूल शायर साहिर लुधियांवी की ये नज्म अनगिनत वाकयों पर जनता के ऊपर होने वाले जुल्म, कत्लेआम की बानगी के तौर पर पेश की जाती रही। यहां पर जिन लोगों की हत्याओं की बात कर रहे हैं, उनका भी सीधा संबंध व्यवस्था की क्रूरता से है, वे भी सोची समझी हत्याएं हैं लेकिन, इन मौतों पर ऐसा गुस्सा हमारे-आपके दिलों से इस तेवर के साथ नहीं फूटता है। क्यों ?

जिन मौतों की, या यूं कहें तो बेहतर होगा कि जिन हत्याओं की हम बात करेंगे, वे अक्सर ज्यादा ध्यान नहीं खींचतीं। हमारे समाज में इन लोगों का मरना आज से नहीं सदियों से एक नॉर्मल परिघटना रही है। पिछले एक-दो साल से अगर ये मौतें बड़े शहरों के इर्द-गिर्द होती हैं तो चर्चा में आती हैं। अगर दूरदराज में होती हैं तो न तो खबर ही बन पाती हैं और न ही किसी की चिंता इस पर जाहिर होती है। ऐसे में खामोशी से इनका अंतिम संस्कार हो जाता है और अरबों की भीड़ में इनके परिजन अपनी दुखी की पोटली के साथ गुम हो जाते हैं। 

जी हां, सही समझा आपने। मैं देश के कोने-कोने में होने वाली सीवर और सेप्टिक टैंक को साफ करने के दौरान होने वाली मौतों-हत्याओं का जिक्र कर रही हूं। पिछले तीन सालों में करीब 1500 ऐसी मौतों का ब्योरा जुटाया गया है। इन आंकड़ों को जुटाने, गटर में परिजनों को खोने वाले लोगों की स्थिति का मुआयना करने का काम सफाई कर्मचारी समुदाय के बीच से जन्मी एक संस्था सफाई कर्मचारी आंदोलन ने किया है। निसंदेह, इन आंकड़ों और तथ्यों को जुटाने की जेहमत सरकार ने नहीं की। किसी सरकारी संस्था ने भी नहीं की। आज सरकार के एजेंडे में अभी तक न तो मैला ढोने वालों की मुक्ति हैं और न ही सीवर-सेप्टिक टैंक में हो रही मौतों को रोकना है। मोदी सरकार तो सिर्फ अपने मन की बात और स्टैंड अप इंडिया, मेक इन इंडिया से लेकर स्वच्छ भारत का ढिंढोरा पीटने में लगी है। उसने अभी तक 2013 के नए कानून, जिसके तहत किसी भी रूप मे इंसानी मल को हाथ से साफ करने वाले काम को गैर-कानूनी ठहराया है, प्रतिबंधित किया है, उसे क्रियान्वित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। और तो और, 2014 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं कर रही है। देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ तौर पर कहा कि 1993 से लेकर अभी तक जितने लोग सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई में मारे गए हैं, सबके परिजनों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देना। तमाम सालों में मारे गए लोगों की शिनाख्त के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को एक सर्वे कराने को कहा था। इस दिशा में अभी तक, यानी 2017 तक, कोई प्रगति नहीं हुई है। न ही, सीवर-सेप्टिक टैंक में मारे जा रहे लोगों के परिजनों को अपने आप मुआवजा देने की कोई व्यवस्था की गई है। जहां तक मारे गए लोगों के परिजन, समाज मजबूत हैं, संगठन सक्रिय है, वहां तो थोड़ा-बहुत न्याय मिल पा रहा है, वरना कोई सुनवाई नहीं है।

देश की राजधानी दिल्ली के घिटोरनी में 16 जुलाई 2017 को चार लोगों की जान एक सेप्टिक टैंक में चली गईं। इन चार में तीन दिहाड़ी के मजदूर थे और एक छोटा ठेकेदार-contractor था। चूंकि मामला दिल्ली का था, इसलिए मीडिया में खबरें आईं और थोड़ी राजनीतिक हलचल हुई। लेकिन इंसाफ की दृष्टि से एक कदम भी मामला आगे नहीं बढ़ा। शुरू से मामले में हेराफेरी करने की कोशिश चलती रही, इसे वाटर हार्वेस्टिंग टैंक बताया जा रहा था। जब ये सवाल उठा कि हार्वेस्टिंग टैंक में कैसे जहरीली गैसें हो सकती है, तब दबी आवाज में यह कहा जाने लगा कि यह सीवर से जुड़ा था। पड़ताल पर पता चला कि टैंक की सफाई करने गए तीन मजदूरों में से सबसे पहले जिसे नीचे उतारा गया था वह अनिल थे, जो वाल्मिकी समुदाय से आते थे। दिल्ली में 100 फुटा रोड पर बने रैनबसेरा में रहते थे और उसके बगल में ही बनी झुग्गी बस्ती में उनकी बहन का परिवार रहता था। जब अनिल बाहर नहीं आए तो दूसरे मजदूर को नीचे उतारा गया, उनका नाम था दीपू दुबे – वह भी उसी रैनबसेरा में रहते थे और परिजन के नाम पर उनका सिर्फ एक भाई है, जो उसी रैन बसेरा में रहते हैं। इन दोनों को नीचे लुढ़कता देख टैंक में उतरे इंद्रजीत उर्फ बिल्लू जो पंजाबी समुदाय के थे और वह भी जहरीली गैस का शिकार हो गए। इन तीनों को बिना कोई सेल्टी गियर के उतारा गया था। यानी किसी के भी कमर में कोई रस्सी या मुंह में मास्क नहीं लगा था। जिस समय ये तीन गटर में जान दे रहे थे, उस समय लोगों का हुजूम लग गया था, लेकिन कोई उन्हें बचाने के लिए तैयार न था। ये दुर्घटना जब घटी तब सरवन sub-contractor वहां नहीं था, उनका बेटा जसवंत था। बेटे ने पिता को फोन किया और सरवन पहुंचे, और हुजूम के दबाव में वह रस्सी बांध कर नीचे उतरे और जैसे ही रस्सी खोलकर बाकी मजदूरों को बांधने लगे, वह भी चपेट में आ गए और फिर उनके पीछे बेटा जसवंत भी कूदा। इतनी देर तक बचाव के लिए न तो पुलिस पहुंची और न ही फायर ब्रिगेड। जब फायर पहुंची तब जसवंत को जिंदा निकाला गया। घटना के एक दिन बाद, दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी पंजाबी बस्ती में तो संवेदना दिखाने पहुंच गए, ठेकेदार के परिवार से मिले, लेकिन टैंक में मरने वाले मजदूरों की न तो उनको याद आई और न ही उनका लावलश्कर उधर गया। विडंबना यह कि वे पूरे समय यही समझाते रहे कि लोगों को ऐसे काम नहीं करने चाहिए, और सावधानी से उतरना चाहिए। दरअसल, यही है वह जातिगत सोच जो सीवर-सेप्टिक टैंक में हो रही मौतों का जिम्मेदार उसमें सफाई करने वालों को ही मानती है। ये तर्क पूरे देश में पूरी बेशर्मी से दिया जा रहा है कि आखिर क्यों मैला ढओने वाले लोग मल उठा रहे हैं, आखिर क्यों सफाई कर्मचारी समाज गटर में जान दे रहा है। ये लोग कभी ये सवाल नहीं उठाते कि जब मैला प्रथा गैर-कानूनी है, जब सीवर-सेप्टिक टैंक में इंसानों को उतारना गैर-कानूनी है, तब आखिर क्यों सरकारें, स्थानीय प्रशासन और ठेकेदार इसे जारी रखे हुए हैं। क्यों सीवर-सेप्टिक टैंक में इतनी मौतों के बावजूद किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्य़वाई क्यों नहीं हुई। कौन है इन हत्याओं का जिम्मेदार? ये सवाल नहीं उठाया जाता, क्योंकि इससे व्यवस्था की जातिगत साजिश उजागर होती है। आखिरकार सीवर और सेप्टिक टैंक को साफ करने वाले और इसमें मरने वाले 99 फीसदी से अधिक दलित समुदाय से हैं।  

मैंने यहां इस पूरी घटना का ब्यौरा इसलिए दिया है ताकि जब आप अगली बार सेप्टिक टैंक या सीवर में मरने वालों की खबर पढ़े तो आपके जेहन में यह सवाल कौंधे कि पहले आदमी को बचाने के लिए जो दूसरा आदमी गया होगा, वह जानता होगा कि उसकी भी जान जा सकती है, लेकिन वह अपनी आंख के आगे एक इंसान, अपने साथी को मरता नहीं देख सकता था। लेकिन बाकी सारे समाज के लिए इनका मरना कोई बड़ी परिघटना नहीं है। तथाकथित सभ्य समाज के लिए ये गंदगी का काम करने वाले लोग हैं, जो गंदगी में हीमरने के लिए अभिशप्त हैं। लिहाजा बहुसंख्य आबादी को अपने fellow citizen के बिना वजह इस तरह से मरने से बहुत फर्क नहीं पड़ता।   दिल्ली के इस मामले में भी अभी तक न तो 10 लाख का मुआवजा मिला है और  न ही सरकारी आवास या सरकारी नौकरी की बात करनी सरकार ने शुरू की है। जबकि सर्वोच्च न्यायलय के फैसले के मुताबिक यह सब उन्हें मिलना चाहिए।

घिटोरनी समेत तमाम घटनाएं भारत के चमचमाते विकास के दावे, स्वच्छ भारत के ढिंढोरे के मुंह पर तमाचा हैं। ये हत्याएं इस बात की गवाही देती हैं कि हमारा sanitation caste ridden है। साथ ही साथ ये दुर्घटनाएं हमें यह भी याद दिलाती हैं कि बाबा साहेब भीमराव अंबेडर का जाति उन्मूलन के सपने के लिए आज भी लामबंदी कितनी जरूरी है। 

 


 
 

भाषा सिंह एक पत्रकार, कार्यकर्ता और लेखक है। मैनुअल सफाई के मुद्दे पर काम करने के लिए 2005 में भाषा ने प्रभा दत्त फेलोशिप प्राप्त किया।

Courtesy: इंडियन कल्चरल फोरम
दलित हत्या
दलित विरोधी सरकार
भाजपा
आम आदमी पार्टी

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?

बिहार: सामूहिक बलत्कार के मामले में पुलिस के रैवये पर गंभीर सवाल उठे!


बाकी खबरें

  • Modi
    राज कुमार
    ‘दमदार’ नेता लोकतंत्र कमजोर करते हैं!
    07 Mar 2022
    हम यहां लोकतंत्र की स्थिति को दमदार नेता के संदर्भ में समझ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि क्या दमदार नेता के शासनकाल में देश और लोकतंत्र भी दमदार हुआ है? इसे समझने के लिए हमें वी-डेम संस्थान की लोकतंत्र…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 22 महीने बाद 5 हज़ार से कम नए मामले सामने आए 
    07 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 4,362 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 54 हज़ार 118 हो गयी है।
  • Modi
    सुबोध वर्मा
    ज़्यादातर राज्यों में एक कार्यकाल के बाद गिरता है बीजेपी का वोट शेयर
    07 Mar 2022
    हालांकि 'डबल इंजन' वाली सरकारों को फ़ायदेमंद बताकर प्रचारित किया जाता है, मगर आंकड़े कुछ और ही बताते हैं।
  • New pension scheme
    न्यूज़क्लिक टीम
    New Pension Scheme पर गुस्सा फूटा, महंगाई मारक, मोदी मैजिक नहीं चला
    06 Mar 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने घोसी विधानसभा में अलग-अलग राजनीतिक दलों के समर्थकों से बात की। New Pension Scheme पर नाराजगी फूटी, बासफोर समाज में वंचना की मार, भाजपा को मोदी का भरोसा।
  • communalism
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोधरा, भाजपा और देश में बढ़ती सांप्रदायिकता
    06 Mar 2022
    कुछ ऐसी घटनाएं होती है जो न केवल समाज बल्कि पूरे देश की दिशा बदल देते हैं। उनमें से एक है गोधरा त्रासदी। इतिहास के पन्ने के इस अंक में नीलांजन बात कर रहे हैं उसी घटना की और कैसे गोधरा त्रासदी ने देश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License