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मध्य प्रदेशः भावांतर भुगतान योजना के बावजूद किसानों को भारी नुकसान
विभिन्न मंडियों में पिछले वर्षों की क़ीमतों की तुलना में फसल की दरों में 60 से 70 प्रतिशत की कमी आई है।
काशिफ काकवी
25 Oct 2018
MP farmers

मध्यप्रदेश सरकार ने लगातार पांचवीं बार केंद्र सरकार से कृषि कर्मण पुरस्कार जीता है लेकिन प्रदेश के मालवा क्षेत्र के किसान कथित किसान विरोधी नीतियों के कारण सरकार से बेहद नाराज़ हैं।

प्रदेश के मालवा क्षेत्र जिनमें मंदसौर, नीमच, रतलाम, झाबुआ, आगर, उज्जैन और आसपास के जिले शामिल हैंI यहां के किसान लहसुन, सोयाबीन, दूध, प्याज, राजमा, उरद, मक्का और अफीम की गिरती क़ीमत से परेशान हैं।

इस क्षेत्र के विभिन्न मंडियों (बाजारों) में पिछले वर्षों की क़ीमतों की तुलना में अनाज की दरों में 60 से 70 प्रतिशत की कमी आई है। इस साल प्याज और लहसुन की क़ीमतों में सबसे ज्यादा गिरावट आई है।

लहसुन 200 से 3,225 रुपए, प्याज 265 से 9 41 रुपए और राजमा 2,000 रुपए से 3,500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बेचा जा रहा है, जबकि अफीम 1,500 से 3,000 रुपए प्रति किलो बिक रहा है।

MP onion farmers' loss 1.jpg

मध्य प्रदेश के मंडी बोर्ड के अनुसार राज्य में 520 मंडियां हैं जिनमें से 246 मुख्य थोक मंडी हैं और 274 उप-मंडी हैं। इनमें से 35 प्रतिशत मंडियां मालवा क्षेत्र में हैं क्योंकि मालवा क्षेत्र की 80 से 85 प्रतिशत आबादी पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है।

प्रमुख फसलों की गिरती क़ीमतों ने चुनावी राज्य मध्य प्रदेश के किसानों को परेशान कर दिया है। वे इस गंभीर परिस्थिति के लिए राज्य और केंद्र सरकारों के किसान विरोधी नीतियों को ज़िम्मेदार बता रहे हैं।

उन्होंने पहले दावा किया था कि वे पिछले दो-तीन वर्षों की तुलना में बेहतर क़ीमत प्राप्त कर रहे थे। मालवा क्षेत्र के किसानों में निराशा लगातार बढ़ रही है और वे आगामी विधानसभा चुनावों में मौजूदा बीजेपी सरकार को हटाने की योजना बना रहे हैं जो 28 नवंबर को होने वाला है।

लहसुन की खेती करने वाले किसान शिवनारायण वेद कहते हैं, "सौ किलो लाहसुन बेचो और 1 लीटर पेट्रोल खरीदो, बात बराबर है।"

शिवनारायण वेद 58 वर्षीय किसान हैं जो मंदसौर ज़िले के सीतामो तहसील में रहते हैं।

ज़़ीरापुर के एक अन्य किसान राम गोपाल (68) जो लहसुन बेचने के लिए मंदसौर कृषि उपज मंडी में मौजूद थें उन्होंने कहा, "मैंने इसे इसी मंडी में 6,000 से 7,000 रुपए प्रति क्विंटल बेचा था, लेकिन अब इसकी क़ीमत गिरकर 200 से 3,000 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है।"

गोपाल कहते हैं किसान एक एकड़ लहसुन की फसल उगाने के लिए 25,000 से 30,000 रुपए खर्च करते हैं और प्रत्येक एकड़ भूमि में औसतन 8 से 10 क्विंटल फसल होती है। उन्होंने कहा, "प्रत्येक एकड़ पर हम 8,000 से 10,000 रुपए का नुकसान सह रहे हैं। हम कैसे ज़िंदा रहेंगे?"

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राज्य सरकार की भावांतर भुगतान योजना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "कई किसानों को इस योजना के बारे में जानकारी नहीं हैं। हालांकि, सरकार मासिक आधार पर फसल की औसत क़ीमत तय करती है, मंडी में क़ीमत का हर दिन उतार-चढ़ाव होता रहता है। इस तरह भावांतर योजना ऊंट के मुंह में ज़ीरा की तरह है।"

मवेशी पालन करने वाले दूध किसान भी इसी तरह के संकट से गुज़र रहे हैं। वे उज्जैन मिल्क कॉपरेटिव कमेटी को 21 और 23 रुपए की दर सेशुद्ध दूध बेचते हैं जो इसे मुख्य बाज़ार में दोगुनी कीमत पर बेचता है।

कृषि से अपने परिवार की परवरिश करने में नाकाम रहे एक अन्य दूध किसान राम निवास ने कुछ ज़्यादा पैसे कमाने के लिए हरियाणा से कुछ भैंस और गायों को ऊंची क़ीमत पर ख़रीदा था। लेकिन दूध कारोबार में निरंतर नुकसान के कारण उन्होंने दो भैंस बेच दिया है और बाकी को बेचने की योजना बना रहे हैं।

बालागुडा गांव के रहने वाले राम निवास कहते हैं, "खेती के लिए अपर्याप्त भूमि के कारण आमदनी के लिए मैंने कुछ भैंस और गाय ख़रीदा था,लेकिन मुझे खाली हाथ रहना पड़ा है, क्योंकि हमें 21 से 22 रुपए प्रति लीटर की क़ीमत मिल रहे हैं। उसी दूध को बाज़ार में 36 से 52 रुपए पर बेचा जा रहा है।"

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उन्होंने कहा, "कम से कम दूध किसानों को 30 रुपए प्रति लीटर क़ीमत मिलना चाहिए, तब हम ज़िंदा रह सकते हैं।"

यहां तक कि अफीम किसान भी घाटे का सामना कर रहे हैं। अफीम किसान गोपाल पाटीदार कहते हैं, "बड़ा जोखिम उठाने के बावजूद यह अधिक लाभदायक नहीं है। हमने अफीम की खेती में काफी परेशानी उठाई है लेकिन बदले में हमें 15,000 रुपए से 20,000 रुपए प्रति किलो की क़ीमत मिलते हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "काले बाजार में अफीम की क़ीमत 8 से 10 रुपए प्रति किलो है। यह हमारे लिए हास्यास्पद है।"

नीमच कृषि उपज मंडी समिति के सचिव संजय श्रीवास्तव ने कहा, "मंडी खुले बाज़ार हैं, और हमारा इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। फसलों की गुणवत्ता देखने के बाद व्यवसायी क़ीमत लगाते हैं। फसलों की दर फसलों की गुणवत्ता, मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है।"

बीजेपी की अगुवाई वाली राज्य सरकार पर तीखा हमला करते हुए किसान नेता केदार सिरोही कहते हैं, "राज्य सरकार ने मंदसौर किसानों के विरोध-प्रदर्शन से कोई सबक नहीं लिया है। उनकी फसलों के लिए वास्तविक मूल्य देने के बजाय किसानों को उनकी फसलों को कम क़ीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। भावांतर योजना भी किसानों के लिए उपयोगी नहीं है।"

उन्होंने आरोप लगाया, "कृषि केवल मुख्यमंत्री चौहान के बेटे और कृषि मंत्री के लिए लाभदायक है। सीएम चौहान के बेटे कार्तिकेय ने कृषि से पिछले दो वर्षों में 90 लाख रुपए का लाभ अर्जित किया और कृषि मंत्री गौरी शंकर बिसेन ने भी आम को बेचकर क़रीब क़रीब इतना ही राशि अर्जित की है।

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