NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
#महाराष्ट्र_सूखा : किसान अपने मवेशियों को न बेच पा रहे हैं, न बचा पा रहे हैं!
क़र्ज़ और पीने के पानी की कमी को लेकर किसान चिंतित हैं कि वे अपने मवेशियों को आख़िर कैसे बचा पाएंगे।
अमय तिरोदकर
18 Mar 2019
Hingoli Market
हिंगोली बाज़ार। फोटो : अमय तिरोदकर

[वर्ष 1972 के बाद से महाराष्ट्र कई बार सूखे की मार झेला लेकिन इस बार ये राज्य सबसे ज़्यादा प्रभावित है। राज्य सरकार ने 350 में से 180 तहसीलों को सूखा घोषित कर दिया है। पूरा मराठवाड़ा (दक्षिणी और पूर्वी महाराष्ट्र का क्षेत्र) क्षेत्र अब बेहद ख़तरनाक स्थिति में है। न्यूज़क्लिक द्वारा ग्राउंड रिपोर्ट की श्रृंखला का अगला भाग]

मराठवाड़ा के हिंगोली ज़िले के 63 वर्षीय साहेबराव बंगर पशु व्यापारी हैं। हिंगोली में मवेशियों के साप्ताहिक बाज़ार में रिपोर्टर ने बंगर से मुलाक़ात की। बंगर ने कहा, “देखिए, मुझे आपसे बात करने का कितना समय  है। यदि आप इस बाज़ार में लगभग तीन साल पहले आए होते तो मैं आपसे एक शब्द भी बात नहीं कर पाता। पर क्या करें? धंधे की मिट्टी की भी क़ीमत नहीं रही।”

वे पिछले 25 वर्षों से इस व्यवसाय में हैं। बंगर इस बाजार में सात से आठ मवेशी बेचते थे। वे कहते हैं, “यह इस ज़िले का बाज़ार है। यहां इस तरह का कारोबार होता है। अब मैं पांच मवेशियों को भी इस बाज़ार में नहीं लाता। जितना मैं यहां कमाता हूं उससे कहीं ज्यादा टैंपो का किराया [मवेशियों के लिए] है।

हम महाराष्ट्र में कहीं भी जाते हैं हर जगह की कहानी यही है। व्यापक रूप से चर्चा की गई और आलोचना की गई कि यह सब महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम 2015 की वजह से है। ये अधिनियम जिसके चलते राज्य में गोमांस प्रतिबंध को लागू किया गया है वह किसानों के परेशानियों को बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मंदी का एक प्रमुख कारण भी है।

पीने के पानी और क़र्ज़ जैसे मुद्दों के अलावा महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा सूखे की मार झेल रहा है ऐसे में किसान चिंतित हैं कि वे अपने मवेशियों को कैसे बचा पाएंगे। न्यूज़़क्लिक ने अपनी पहली की रिपोर्ट में इसका जि़क्र किया था कि किस तरह किसान चारे की कमी की वजह से पशुओं को कम क़ीमत पर बेच रहे हैं।

उस्मानाबाद के लीत गांव के शंभुराजे निम्बालकर के पास दो गायें थीं और उन्होंने दोनों गायों को बेच दिया। वे कहते हैं, “सामान्य बाजार दरों के हिसाब से हम 1 लाख 40 हजार रुपये कमा लेते थे। लेकिन मवेशी बाजार पहले से ही ख़राब हो गया है और इसके अलावा यहां अब पानी की कमी भी है। मुझे सिर्फ 60,000 रुपये ही हासिल हुए हैं।” उस्मानाबाद के हिवरा गांव के 78 वर्षीय गहिनाथ जगदाले ने न्यूज़क्लिक को बताया कि उन्होंने गुजारा करने के लिए अपनी तीन गायों को बेच दिया। “हमारे पास पीने के लिए पानी नहीं है। फिर मैं उन गायों को कैसे रख पाऊंगा? उन्हें चारे और पानी की आवश्यकता होती है।” ऐसी विकट स्थिति में मवेशियों की बिक्री से किसानों को कई तरह से मदद मिली। हालांकि गोवंश हत्‍या बंदी उनके समक्ष बड़ी रुकावट बन गई है।

हिंगोली ज़िले की वसमत तहसील के एक किसान पंडितराव होदे कहते हैं, “देखिए अब किसानों को दोनों तरफ से मारा जा रहा है। पहला, हमें सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिल रही है। इसलिए, मवेशियों की बिक्री से हमें कुछ वित्तीय राहत मिली। लेकिन सरकार ने इसे अधिनियम में शामिल कर लिया है और किसान अपने मवेशियों की अच्छी क़ीमत पाने में असफल हो रहे हैं।”

किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को जो सबसे ज्यादा तबाह करने वाले है वह है कालीन पर प्रतिबंध। लातुर ज़िले के निलंगा मवेशी बाज़ार में बरशी सोलापुर से आए एक व्यापारी अशोक गवहाने कहते हैं, “देखिए, हम व्यापारी हैं। लेकिन मैं आपको बता दूं कि कोई भी गोमांस के लिए अपनी गायों को नहीं बेचता था। गोमांस के लिए जो बेचा जा रहा था वह बैल, सांड और भैंस था। गायों को हमेशा दूध के लिए बेचा जाता था। सरकार को इस कानून को लागू करने से पहले कालीन प्रतिबंध के बारे में सोचना चाहिए था।”

जैसा कि सभी लोग जानते हैं इस अधिनियम को लागू करने के पीछे का मक़सद पूरी तरह से सैद्धांतिक था। यह छिपा नहीं है कि इसके पीछे एजेंडा आश्चर्यजनक रूप से पूरी तरह से मुस्लिम-विरोधी है। हालांकि इस दावे के समर्थन के लिए कोई डेटा नहीं है, लेकिन यह व्यापक रूप से माना जाता है कि मुस्लिम समुदाय की एक बड़ी संख्या बीफ उद्योग में काम करती है। हालांकि महाराष्ट्र में भी हिंदू व्यापारी भी हैं, और सरकार को यह समझना चाहिए कि व्यापार और अर्थव्यवस्था हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अंतर नहीं करते हैं।

निलंगा बाजार में आए तौफीक बेपारी और बालाजी तरंगे दोनों 15-20 साल से इस व्यवसाय में हैं। तौफीक का कहना है, “अगर हम 60,000 रुपये में एक सांड खरीदते हैं तो हमें इसे कई बाज़ारों में ले जाना पड़ता है। यदि यह सांड नहीं बिकता है तो हम इसे अपने पास रखते हैं। एक पशु पर हर महीने पानी और चारे का खर्च लगभग 3,000-4,000 रुपये होता है। इसलिए सांड की लागत इस तरह बढ़ जाती है। इन्हें बाजार तक ले जाने और उन्हें वापस लाने की अतिरिक्त लागत भी है। तो कुल मिलाकर लागत केवल डेढ़ महीने में 70,000 रुपये हो जाती है। अगर हमें 70,000 रुपये नहीं मिलते हैं तो हमें क्या करना चाहिए?”

Balaji Tarange.jpg

(बालाजी तरंगे। फोटोः अमय तिरोदकर)

तरंगे ने कहा, “पहले, हैदराबाद और मुंबई की कंपनियां बैल और भैंस के लिए ग्रामीण बाजारों तक आती थीं। यह स्पष्ट रूप से बीफ के लिए ही आती थी। अब चूंकि बाजार बंद है तो हम यहां व्यापार करने में असफल हो रहे हैं।”

ऐसी हालत में किसान सरकार की तरफ देख रहे थे जिसे उन्होंने चुना है। लेकिन सरकार किसानों के बचाने में स्पष्ट रूप से विफल रही है। एक किसान ने सवाल किया, “अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी तो हम क्या करेंगे?"

महाराष्ट्र के सूखे को जानने-समझने के लिए हमारी अन्य रिपोर्ट भी पढ़ें :

#महाराष्ट्र_सूखाः सरकार की प्रमुख लघु सिंचाई योजना लोगों को सुविधा देने में विफल

#महाराष्ट्र_सूखाः हज़ारों किसान ऋण माफ़ी योजना से मदद का कर रहे हैं इंतज़ार

सूखाग्रस्त महाराष्ट्रः मराठवाड़ा से स्थायी पलायन की वजह बनी कृषि की विफ़लता

 #महाराष्ट्र_सूखा : उस्मानाबाद में खाली पड़े बाज़ार

#महाराष्ट्र_सूखा: बोरवेल गहरे होने के बावजूद सूख रहे हैं।

मराठवाड़ा में 1972 के बाद सबसे बड़ा सूखा, किसान और मवेशी दोनों संकट में

#महाराष्ट्र_सूखा : सूखे से निजात के लिए किसानों को मामूली सरकारी मदद

Maharashtra
Maharashtra drought
Maharashtra Farmers
farmer crises
cow slaughter ban
Cattle Menace
Cattle ban
BJP government
Devendra Fednavis

Related Stories

महाराष्ट्र में गन्ने की बम्पर फसल, बावजूद किसान ने कुप्रबंधन के चलते खुदकुशी की

किसानों और सरकारी बैंकों की लूट के लिए नया सौदा तैयार

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

27 सितंबर को भारत बंद का समर्थन करने के लिए महाराष्ट्र में 200 संगठन एक साथ आए

इस बार हापुस आम पर भी कोरोना की मार! उत्पादक किसानों को भारी नुक़सान

आज़ाद मैदान की चेतावनी : मांगें पूरी न हुईं तो और तीखा किया जाएगा आंदोलन

महाराष्ट्र: किसान पहुंचे मुंबई, जारी रहेगा आंदोलन

फिर चल पड़ा है महाराष्ट्र के किसानों का जत्था

लड़ेंगे और जीतेंगे: महाराष्ट्र के किसान

किसान आंदोलन: अब जुड़ेंगे महाराष्ट्र के किसान भी


बाकी खबरें

  • Mehsi oyster button industry
    शशि शेखर
    बिहार: मेहसी सीप बटन उद्योग बेहाल, जर्मन मशीनों पर मकड़ी के जाल 
    26 Oct 2021
    बिहार के पूर्वी चंपारण के मेहसी स्थित विश्व प्रसिद्ध सीप-बटन उद्योग की मशीनों पर मकड़ी के जाले लग चुके हैं। बिजली की सप्लाई नहीं है। उद्योग यूनिट दर यूनिट बंद हो रहे हैं। इस उद्योग के कारीगर पंजाब-…
  • coal crisis
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोयला संकट से होगा कुछ निजी कंपनियों को फायदा, जनता का नुकसान
    26 Oct 2021
    कोयले के संकट से देश में बिजली की किल्लत हो रही है। इस किल्लत की वजह क्या है? इस संकट से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की पूर्व कोयला सचिव अनिल स्वरुप से
  • Biden’s Taiwan Gaffe Meant no Harm
    एम. के. भद्रकुमार
    ताइवान पर दिया बाइडेन का बयान, एक चूक या कूटनीतिक चाल? 
    26 Oct 2021
    अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले गुरुवार को सीएनएन टाउन हॉल में यह कहा है कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो वाशिंगटन उसकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • workers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: डीबीसी कर्मचारियों का स्थायी नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन, हड़ताल की चेतावनी दी
    26 Oct 2021
    लगभग 3500 से अधिक कर्मचारी दिल्ली के तीनों नगर निगम में अनुबंध के आधार पर काम कर रहे हैं। राजधानी में डेंगू और अन्य ऐसी महामारी की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद ये ठेके प्रथा के तहत कार्यरत…
  • instant loan
    शाश्वत सहाय
    तत्काल क़र्ज़ मुहैया कराने वाले ऐप्स के जाल में फ़ंसते नौजवान, छोटे शहर और गाँव बने टार्गेट
    26 Oct 2021
    इन ऐप्स के क़र्ज़ वसूली एजेंटों की ओर से किये जा रहे उत्पीड़न के चलते 2020 और 2021 के बीच पूरे भारत में कम से कम 21आत्महत्याएं हुई हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License