NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
महिलाओं की निर्णायक स्थिति ही रोकेगी बढ़ती आबादी
लैंगिक भेदभाव जनसंख्या वृद्धि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है। परिवार और समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व तथा नारियों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के तौर पर देखने की प्रवृत्ति का जनसंख्या वृद्धि से सीधा संबंध है।
डॉ. राजू पाण्डेय
11 Jul 2019
11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष
Image Courtesy : Economic Times

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष

दुनिया की आबादी 5 अरब तक पहुंचने के बाद जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर विश्व का ध्यान खींचने के ध्येय से यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेंट प्रोग्राम की प्रशासनिक समिति ने 11 जुलाई 1989 को पहली बार विश्व जनसंख्या दिवस का आयोजन किया।  तब से अब तक प्रति वर्ष यह एक निश्चित थीम पर केंद्रित होता है किंतु 2019 पहला वर्ष होगा जब विश्व जनसंख्या दिवस की कोई थीम नहीं है। इस बार का विश्व जनसंख्या दिवस ठीक 25 वर्ष पूर्व कैरो में जनसंख्या और विकास पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के अधूरे लक्ष्यों की प्राप्ति पर केंद्रित है।

1994 में आयोजित कैरो सम्मेलन में 179 देशों ने प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य और लैंगिक समानता को संधारणीय विकास हेतु आवश्यक बताया था।

आज विश्व की आबादी 7 अरब 71 करोड़ को स्पर्श कर रही है। प्रति वर्ष विश्व की जनसंख्या में 8.30 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं। यह तथ्य चौंकाने वाला है कि संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विकसित देश  की युवा आबादी का 30 प्रतिशत अनैच्छिक और दुर्घटनावश गर्भधारण का नतीजा है। तमाम प्रयासों के बावजूद पिछड़े और विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर चुनौती बनी हुई है और हमारा देश कोई अपवाद नहीं है।

हम चीन को पीछे छोड़ते हुए 2024 तक विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला देश बनने की ओर अग्रसर हैं। 2050 तक हमारी जनसंख्या 1 अरब 70 करोड़ हो जाएगी। हमारे पास दुनिया की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि है और हम दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी को आश्रय देते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की अप्रैल 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 से 2019 की अवधि में भारत की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत रही जो इसी अवधि में चीन की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर के दुगने से भी अधिक है।

लैंगिक भेदभाव जनसंख्या वृद्धि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है। कैरो सम्मेलन इस कारण  ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि  पहली बार इसमें लैंगिक समानता को जनसंख्या नियंत्रण हेतु आवश्यक बताया गया था। 2019 के ग्लोबल जेंडर इक्वलिटी इंडेक्स में भारत 129 देशों में 95 वें स्थान पर रहा। हमारे देश में  लैंगिक असमानता ने जनसंख्या वृद्धि की समस्या को जटिल बनाया है।

भारतीय समाज में पुत्र जन्म को सौभाग्य का अवसर माना जाता है। हम इस मिथ्या धारणा से ग्रस्त हैं कि पुत्र ही परिवार को आर्थिक मजबूती प्रदान करते हैं और माता पिता के बुढ़ापे की लाठी बनते हैं। हमारी धर्म परंपरा के अनुसार मृत्यु के उपरांत अनेक कर्मकांडों का संपादन केवल पुत्र ही कर सकते हैं जो मृतात्मा की शांति के लिए आवश्यक हैं। बेटियां परिवार पर अनावश्यक भार समझी जाती हैं क्योंकि समाज में यह भ्रामक और असत्य धारणा फैली हुई है कि इन्हें तो ब्याह कर पराये घर जाना है इसलिए ये परिवार पर आर्थिक रूप से बोझ ही हैं। दहेज आदि कुप्रथाएं भी बेटियों को एक समस्या के रूप में देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं। पुत्रजन्म की चाह में अनेक संतानों को जन्म देना जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख कारण रहा है।

मीता मजूमदार ने 2017 के अपने शोधपत्र में बेंगलुरु और अहमदाबाद में किए गए अध्ययन के हवाले से यह बताया है कि अशिक्षित और निर्धन महिलाओं तथा ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं में पुत्र जन्म की चाह में अधिक संतान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा है। समाज ने जब - हम दो हमारे दो- की नीति का अनुसरण भी किया तब भी पुत्र जन्म की चाह में वह गर्भस्थ शिशु के लिंग की जांच के गैरकानूनी तरीकों की ओर आकर्षित हुआ तथा कन्या भ्रूण की हत्या जैसी नई प्रवृत्ति अस्तित्व में आई जिसके कारण लिंगानुपात में चिंताजनक परिवर्तन आया।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 943 है। विवाह की कानूनी आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष होने के बावजूद देश के अनेक भागों में बाल विवाह की कुप्रथा जारी रही है। जल्दी विवाह का दुष्परिणाम यह होता है कि स्त्रियों में गर्भधारण और संतानोत्पत्ति का काल लंबा हो जाता है जिस कारण जनसंख्या बढ़ती है। कम आयु में गर्भधारण जच्चा बच्चा दोनों के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालता है। 

विश्व के अनेक धर्म गर्भ निरोधकों के प्रयोग और गर्भपात को धर्म विरुद्ध मानते हैं और पितृसत्तात्मक समाज में जहां नारी को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है वह चाह कर भी संतानोत्पत्ति का अधिकार अपने पास नहीं रख पाती।

यद्यपि भारत के संदर्भ में इंडिया स्पेंड का 2016 का एक अध्ययन बताता है कि हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि शैक्षिक स्तर और सामाजिक आर्थिक विकास पर निर्भर करती है, यह धार्मिक विश्वासों द्वारा नियंत्रित नहीं होती। किंतु यह भी सत्य है कि इन धार्मिक मान्यताओं ने जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को प्रभावकारी ढंग से चलाने में बाधा उत्पन्न की है। सरकारें अलोकप्रिय होने के भय से धार्मिक विश्वासों के साथ छेड़छाड़  करना नहीं चाहतीं।  

परिवार और समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व तथा नारियों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के तौर पर देखने की प्रवृत्ति का जनसंख्या वृद्धि से सीधा संबंध है।

वैश्विक स्तर पर किए गए अध्ययन यह बताते हैं कि जो देश स्त्री शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए हैं वहां जनसंख्या वृद्धि की दर बहुत अधिक है। जिन देशों में स्त्री के कानूनी अधिकारों की रक्षा नहीं की जाती वहां 18 वर्ष से कम आयु में लड़कियों के विवाह की घटनाएं बहुतायत में होती हैं और जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है। जिन देशों में स्वास्थ्य शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से स्त्रियों को वंचित किया जाता है वहां भी जनसंख्या तेजी बढ़ती है। इन देशों में स्त्रियां बार बार संतानोत्पत्ति के खतरों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके कुप्रभावों से अनभिज्ञ होती हैं और गर्भ निरोधकों तक इनकी पहुंच भी आसान नहीं होती। गर्भ निरोधकों का प्रयोग भी वे पुरुष की मर्जी से कर पाती हैं। अपनी मर्जी से गर्भ निरोधकों का प्रयोग करने वाली स्त्रियों को विलासिनी, उच्छृंखल और दुष्चरित्र माना जाता है।

हमारे देश में स्त्री शिक्षा की स्थिति यह है कि 50 प्रतिशत से ज़्यादा लड़कियां अपना हाईस्कूल भी पूरा नहीं कर पातीं। घर की देखरेख और बच्चों का लालन पालन इनके अनिवार्य कर्तव्य समझे जाते हैं और यह माना जाता है कि ज्यादा पढ़ लिख लेने पर वे घमंडी और बहिर्मुख हो जाएंगी तथा पितृसत्ता द्वारा निर्धारित अपने मूल कर्तव्य से विमुख हो जाएंगी।

यूनिसेफ के 2017 के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में 27 प्रतिशत लड़कियां 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने से पहले ब्याह दी जाती हैं जबकि 7 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही कर दी जाती है।

यूनिसेफ के अनुसार भारत बालिका वधुओं की 15509000 संख्या के साथ पूरे विश्व में असम्मानजनक रूप से पहले क्रम पर है। वैश्विक स्तर पर प्रतिदिन 800 महिलाएं गर्भावस्था और शिशु जन्म के दौरान ऐसे कारणों से मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है- इनमें से 20 प्रतिशत महिलाएं भारतीय होती हैं।

विश्व के अधिकांश देशों की भांति भारत के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम पर भी पितृसत्तात्मक सोच की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। हमारा परिवार नियोजन कार्यक्रम परिवार में सदस्य संख्या सीमित रखने का उत्तरदायित्व नारी पर डालता है और गर्भधारण को रोकने के लिए  इंट्रा यूटेराइन डिवाइस, फीमेल स्टरलाइजेशन सर्जरी और ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव का प्रयोग नारी शरीर पर ही  किया जाता है। मेल स्टरलाइजेशन सर्जरी का प्रतिशत नगण्य है। परिवार नियोजन के लिए चलाए जाने वाले अधिकांश जागरूकता अभियानों को भी महिलाओं को लक्ष्य कर गढ़ा जाता है और अधिकांश विज्ञापन महिलाओं को केंद्र में रखकर तैयार किए जाते हैं। यूनाइटेड नेशन्स पापुलेशन फण्ड के अनुसार  भारत में पुरुषों को इस बात के लिए शिक्षित करने की महती आवश्यकता है कि परिवार को सीमित रखने का उत्तरदायित्व उन पर भी है केवल महिलाओं पर ही नहीं।

जब तक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण की अवधारणा का समावेश नहीं होगा और इसे नारी के सामाजिक-पारिवारिक-आर्थिक-धार्मिक जीवन की उन्नति से जोड़ा नहीं जाएगा तब तक इसकी सफलता संदिग्ध बनी रहेगी। परिवार में संतानों की संख्या और उनके बीच समयांतराल के विषय में निर्णय लेने की प्रक्रिया में जब तक नारी की केंद्रीय भूमिका नहीं होगी तब तक - छोटा परिवार सुखी परिवार- का स्लोगन  भी सही अर्थों में साकार नहीं हो पाएगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

world population day
population census
global population issues
United nations
india population
gender discrimination
Gender Equality
Women Rights

Related Stories

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!

मुद्दा: महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल और वबाल

क्या समाज और मीडिया में स्त्री-पुरुष की उम्र को लेकर दोहरी मानसिकता न्याय संगत है?

जिउतिया व्रत: बेटियों के मनुष्य होने के पक्ष में परंपरा की इस कड़ी का टूटना बहुत ज़रूरी है

इंडियन मैचमेकिंग पर सवाल कीजिए लेकिन अपने गिरेबान में भी झांक लीजिए!

‘फ़ेमिनिस्ट तालीम’ : नारीवाद को क्लासरूम से बाहर लाकर समझने की एक अनोखी पहल

अटेंशन प्लीज़!, वह सिर्फ़ देखा जाना नहीं, सुना जाना चाहती है

क्यों लगा भारतीय सुप्रीम कोर्ट पर संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा आरोप?

जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न


बाकी खबरें

  • Kapur Commission Report and Savarkar's Role in Gandhi’s Assassination
    न्यूज़क्लिक टीम
    कपूर कमीशन रिपोर्ट और गाँधी की हत्या में सावरकर की भूमिका
    14 Nov 2021
    हाल ही में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि सावरकर दरअसल गाँधी की हत्या का ज़िम्मेदार थाI इससे गाँधी की हत्या से जुड़े सवाल एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गएI 'इतिहास के पन्ने' के इस अंक में…
  • elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर न्यूज़क्लिक का नया कार्यक्रम- चुनाव चक्र
    14 Nov 2021
    आज देश अहम मोड़ पर खड़ा है। इस मोड़ से आगे का रास्ता देश में अगले साल 2022 की शुरुआत में पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से तय होगा। तय होगा कि 2024 के आम चुनाव में देश क्या फ़ैसला लेगा…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : जवाहरलाल नेहरू जन्मदिन विशेष
    14 Nov 2021
    भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन और बाल दिवस के मौक़े पर पढ़िये उन पर लिखी 2 नज़्में... 1. जवाहरलाल नेहरू: अबरार किरतपुरी
  • malnutrition
    राज वाल्मीकि
    कुपोषित बच्चों के समक्ष स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां
    14 Nov 2021
    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवम्बर 2020 तक देश में 9.28 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित थे। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में और फिर बिहार में हैं।
  • साभार : सुमन सिंह के फेसबुक वाल से
    डॉ. मंजु प्रसाद
    पर्यावरण, समाज और परिवार: रंग और आकार से रचती महिला कलाकार
    14 Nov 2021
    ऐसा कलाकार जब प्रकृति को ठोस मेटलिक माध्यम द्वारा कठोर नुकीले घास के रूप में निर्मित करती हैं, यह अत्यंत गंभीर विषय है जो केवल पर्यावरण को ही नहीं वर्तमान मनुष्य जीवन को और उसके संकट को भी दर्शाता…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License