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मई दिवस विशेष : तकनीकी क्रांति और मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में मज़दूर आंदोलन
टेक्नोलॉजी न सिर्फ जॉब्स को प्रभावित कर रही है बल्कि यह श्रमिक और उसके मालिक के संबंधों को इतना अल्पकालिक और अपरिभाषेय बना रही है कि पारंपरिक ट्रेड यूनियन आन्दोलन के लिए अपनी भूमिका तय करना कठिन हो रहा है।
डॉ. राजू पाण्डेय
30 Apr 2019
मई दिवस विशेष
फोटो साभार : आधी आबादी

मज़दूर दिवस के साथ श्रमिकों के संघर्ष की असंख्य लोमहर्षक गाथाएं जुड़ी हुई हैं। अमेरिका में 8 घण्टे के मानक कार्यदिवस की मांग को लेकर 1 मई 1886 से अनेक ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल प्रारंभ कर दी थी। इसी आन्दोलन के दौरान बाद में 4 मई को शिकागो के हेमार्केट में प्रदर्शनकारियों और पुलिस की उभय पक्षीय हिंसा में बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए। श्रमिकों के अधिकारों के लिए हुए इस संघर्ष की स्मृति को चिरस्थायी बनाने हेतु 1 मई का दिन श्रमिकों और कामगारों के हक़ की लड़ाई को ही समर्पित कर दिया गया है।

वैज्ञानिक और तकनीकी विकास तथा मानव श्रम की आवश्यकता के पारस्परिक संबंधों पर निरंतर चर्चा होती रही है- प्रायः यह कहा जाता है कि वैज्ञानिक विकास और तकनीकी क्रांति ने मानव श्रम की जरूरत को कम किया है। जब भी बेहतर तकनीक आई है तब कम लागत में, कम समय में, बेहतर गुणवत्ता का उत्पाद मशीनों के माध्यम से बनाना संभव हुआ है और मानव श्रम पर उद्योगपतियों की निर्भरता घटी है। इसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी तो बढ़ी ही है साथ ही कारखानों में नियोजित श्रम शक्ति की आवाज़ को अनसुना करने की कारखाना मालिकों को सहूलियत भी मिली है। श्रमिकों के लिए नई तकनीकों में निपुणता एक आवश्यकता बन गई है और यदि वे ऐसा न कर पाए तो उनकी छंटनी एक अपरिहार्य परिणाम होती है।

इंग्लैंड में 1761 से 1850 के मध्य का टेक्सटाइल उद्योग औद्योगिक और तकनीकी क्रांति के परिणामों को प्रदर्शित करता है-  कुटीर उद्योगों का उजड़ना, श्रमिकों का नई, कठिन,शोषणमूलक और अमानवीय परिस्थितियों में कार्य करने हेतु बाध्य हो जाना तथा श्रमिक आंदोलनों का प्रारंभ। फ्रेडरिक एंगेल्स को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता है कि तकनीकी क्रांति ने किस प्रकार श्रमिकों के जीवन में उथल पुथल मचा दी थी।

पिछले तीन चार दशक आर्थिक उदारीकरण के प्रति सम्पूर्ण समर्पण और वैश्वीकृत मुक्त अर्थव्यवस्था की स्थापना के साक्षी रहे हैं। ट्रेड यूनियन आन्दोलन के यथाशक्ति और भरपूर प्रतिरोध के बावजूद उदारीकरण और वैश्वीकरण की न तो दिशा बदली है न गति धीमी हुई है, इन्हें नकारने की बात तो अब शायद इनके विरोधी भी नहीं करते। पुनः यह टेक्नोलॉजी ही है जो मानव श्रम के स्वरूप को इतनी तेजी से बदल रही है कि कोई श्रम आधारित व्यवस्था रूपाकार लेने से पूर्व ही किसी अन्य व्यवस्था में परिणत होने लगती है, यह इतनी दृढ़ और रूढ़ ही नहीं हो पाती कि इसका विरोध किया जा सके।

बाजार की शक्तियों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव और दबाव इस बदलती टेक्नोलॉजी की सहायता से स्वयं को शोषण तंत्र का हिस्सा समझने की भूल करते छोटे पूंजीपतियों और उनके प्रबंधकों को भी नेस्तनाबूद कर उन मजदूरों की तरह नारे लगाने को मजबूर कर देता है जिनका शोषण वे स्वयं करते रहे हैं।

विश्व बैंक और अमेरिकी वित्तीय प्रशासन के लगभग हर महत्वपूर्ण पद पर कार्य कर चुके तथा बराक ओबामा के कार्यकाल में महामंदी पर अमेरिकी प्रतिक्रिया का नेतृत्व करने वाले अर्थशास्त्री लॉरेंस समर्स की यह स्वीकारोक्ति उद्धृत करने योग्य लगती है-  जॉब गंवाने वाले सेक्टर्स की संख्या जॉब पैदा करने वाले सेक्टर्स से कहीं अधिक है तथा सॉफ्ट वेयर टेक्नोलॉजी का एक सामान्य पहलू यह भी है कि जो इंडस्ट्रीज और जॉब्स पैदा करती है वे भी हमेशा के लिए नहीं हैं। (भविष्य की आर्थिक चुनौतियों पर चिंतन, 7 जुलाई 2014)। टेक्नोलॉजी न सिर्फ जॉब्स को प्रभावित कर रही है बल्कि यह श्रमिक और उसके मालिक के संबंधों को इतना अल्पकालिक और अपरिभाषेय बना रही है कि पारंपरिक ट्रेड यूनियन आन्दोलन के लिए अपनी भूमिका तय करना कठिन हो रहा है।

मैकिंसी क्वार्टरली में अगस्त 2016 में प्रकाशित माइकल चुई और उनके साथियों का एक शोधपत्र उन क्षेत्रों की पड़ताल करता है जिनमें निकट भविष्य में पूर्ण या आंशिक ऑटोमेशन संभव है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों के 800 जॉब्स की 2000 से अधिक ऐक्टिविटीज का विश्लेषण कर यह शोधकर्त्ता हमें बताते हैं कि इनमें से 45 प्रतिशत गतिविधियां (जिनके लिए लोगों को भुगतान दिया जाता है) वर्तमान में उपलब्ध टेक्नोलॉजी द्वारा ही आसानी से स्वचलित की जा सकती हैं। ऐसी गतिविधियां जिनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है 78 प्रतिशत तक ऑटोमेटेड हो सकती हैं जबकि उन गतिविधियों में से 25 प्रतिशत को स्वचलित किया जा सकता है जिनका पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है। मैकिंसी द्वारा कराया गया अध्ययन यह भी बताता है कि ऑटोमेशन के कारण 2030 तक 400 से 800 मिलियन नौकरियां समाप्त हो जाएंगी और परिणाम स्वरूप लगभग 375 मिलियन लोगों को दूसरा रोजगार ढूंढना पड़ेगा। यह रोजगार भी स्थायी नहीं होंगे। इनकी भी प्रकृति और स्वरूप परिवर्तित होते रहेंगे।

फार्च्यून में 26 फरवरी 2019 को प्रकाशित जोनाथन वानियान का एक लेख वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की उस रिपोर्ट का उल्लेख करता है जिसके अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा मशीन लर्निंग के आने के बाद श्रम की आवश्यकता और उसके स्वरूप में बहुत बदलाव आएगा। अमेज़न जैसे रिटेल सेक्टर के महारथी खर्च कम करने के लिए यह तकनीकी ला रहे हैं जिसका परिणाम यह होगा कि रिटेल सेक्टर के कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले अनेक कार्य मशीनें कर देंगी और इन्हें कम वेतन से संतोष करना होगा और आय बढ़ाने के लिए दूसरे सेक्टर्स में कार्य करना होगा। इनकी छंटनी भी संभावित है। यहां तक कि सेल्फ चेक आउट मशीन्स के आने के बाद कैशियर की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। 2013 तक विश्व में ऐसी 191000 मशीनें कार्य कर रही थीं जिनकी संख्या अब दुगनी हो जाने की संभावना है। यही स्थिति फ़ूड, एकोमोडेशन तथा हेल्थ जैसे सेवा प्रधान क्षेत्रों में भी है जिनमें ऑटोमेशन की इतनी ज्यादा गुंजाइश है कि मैकिंसी के अनुसार हॉस्पिटल में भर्ती मरीज अथवा भोजन के लिए रेस्टोरेंट में आया ग्राहक यदि मनुष्य के संपर्क की कमी महसूस करें तब ही उन्हें विशेष सुविधा के तौर पर मानव सहायक उपलब्ध कराया जाएगा।

पारंपरिक ट्रेड यूनियन आंदोलन के आधारों को टेक्नोलॉजी और उदारीकरण ने चरमरा दिया है। अब न तो फिक्स्ड वर्क प्लेस रह गया है, न फिक्स्ड वर्किंग आवर्स। वर्किंग कंडीशन्स और भुगतान भी परिवर्तनशील हैं। कार्य की प्रकृति भी बदल रही है और मालिक भी बदल रहा है। सबसे बढ़कर श्रमिक की मानसिकता भी बदल रही है – अब वह स्थायित्व और स्थिरता के बजाय तात्कालिक लाभ और सर्वोत्तम सौदेबाजी को अच्छा समझता है और हमेशा नौकरी गंवाने के खतरे के लिए तैयार रहता है बल्कि खुद भी मोलभाव कर बेहतर विकल्प ढूंढता है भले ही वह विकल्प भी अस्थायी हो। लेकिन टेक्नोलॉजी के खतरे तो हैं।  फाइनेंशियल टाइम्स में 21 नवंबर 2018 को प्रकाशित सराह ओ कॉनॉर का लेख बस ड्राइवर एंड्रू वर्थ के उस भाषण से शुरू होता है जो उन्होंने  ब्रिटेन की टीयूसी कांग्रेस के 150वें अधिवेशन में दिया था। एंड्रू कहते हैं – मेरी कंपनी स्टेजकोच अब ड्राइवर रहित बस चलाने जा रही है। उन्होंने मुझे नौकरी से हटाया नहीं है। अब बस मेरे नियंत्रण में नहीं रहेगी। मैं केवल आपात दशा में स्टॉप बटन दबाने के लिए बस में मौजूद रहूंगा। मुझे इसके लिए वे कितना वेतन देंगे आप खुद विचार कर सकते हैं। लेकिन अर्थशास्त्रियों का एक ऐसा वर्ग भी है जो ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को श्रमिकों के लिए सकारात्मक मानता है। इसके अनुसार अब मजदूरों को जान जोखिम  में डाल कर काम करने की मजबूरी से छुटकारा मिलेगा। कार्य की परिस्थितियां सुविधाजनक बनेंगी। कार्य के घण्टे कम होंगे। मुनाफा बढ़ेगा। ट्रेड यूनियनों को इस बात के लिए संघर्ष करना होगा कि यह मुनाफा मालिक और मजदूर में बराबर बंटे। ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस की प्रथम महिला महासचिव फ्रांसिस ग्रैंडी कहती हैं कि 19वीं सदी में हमने 8 घण्टे के कार्य दिवस के लिए संघर्ष किया। 20वीं सदी में हमने दो दिन के वीकेंड और सवैतनिक अवकाश के अधिकार अर्जित किए। अब हम चार दिन के वीकेंड और आकर्षक वेतन के लिए लड़ रहे हैं। जर्मनी की इंडस्ट्रियल यूनियन आई जी मेटल ने वहां की एम्प्लॉयरस यूनियन के साथ एक अनुबंध कर कार्य घण्टों को 35 घण्टे प्रति सप्ताह से घटाकर 28 घण्टे प्रति सप्ताह कराने में कामयाबी हासिल की है। स्वीडन में नियोक्ताओं और ट्रेड यूनियनों द्वारा जॉब सिक्योरिटी कॉउंसिल्स चलाई जा रही हैं जिनकी सफलता का आलम यह है कि वहां छंटनी हुए कर्मचारियों में से 90 प्रतिशत को 1 वर्ष के अंदर दुबारा काम मिल जाता है जबकि फ्रांस और पुर्तगाल में यह दर 30 प्रतिशत है। स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड जैसे उत्तरी यूरोप तथा उत्तर अटलांटिक के नार्डिक देशों की ट्रेड यूनियंस तो ऑटोमेशन की मांग कर रही हैं। विकसित देशों की ट्रेड यूनियनों द्वारा सूचना तकनीकी और सोशल मीडिया का भी खूब प्रयोग किया जाता है। अपनी यूनिक आइडेंटिटी द्वारा श्रमिक और कर्मचारी चाहे जिस भी स्थान पर जिस भी नियोक्ता के साथ जुड़ें अपनी यूनियन के सतत संपर्क में रहते हैं। फेसबुक और ट्विटर के जरिये उन्हें अद्यतन जानकारियां मिलती रहती हैं। वे इस प्लेटफार्म पर अपनी समस्याएं यूनियन लीडर्स के साथ शेयर करते हैं और उनका समाधान प्राप्त करते हैं। यूनियन लीडर्स की भूमिका भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय होती है।

भारत जैसे देशों में ट्रेड यूनियनों के लिए चुनौतियां बहुत कठिन हैं। विकसित देशों में औद्योगिक क्रांति के बाद से ही एक संगठित श्रमिक वर्ग मौजूद है। इस वर्ग की जागरूकता और संघर्षों के कारण श्रम कानूनों का एक सुविकसित ढांचा उपस्थित है और इस वर्ग द्वारा इन कानूनों का पालन करने के लिए सरकार और उद्योगपतियों पर दबाव भी बनाया जाता है। जबकि इंटरनेशनल लेबर यूनियन की इंडियन लेबर मार्केट अपडेट 2016 के अनुसार भारत का 82 प्रतिशत वर्कफोर्स अभी भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। इन श्रमिकों की कार्य दशाओं पर सामंती शोषण की छाया है। बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम, पलायन, असुरक्षित परिस्थितियां,लैंगिक भेदभाव, कम मजदूरी, अनिश्चित भविष्य जैसी ढेरों समस्याएं इन्हें सदैव घेरे रहती हैं। श्रम कानून इनके लिए अर्थहीन हैं। कहा जाता है कि ये अनेक व्यवस्थागत विसंगतियों और अड़चनों के कारण श्रम कानूनों के दायरे से अब तक बाहर हैं। शायद यही कारण है कि ट्रेड यूनियनें भी इनके लिए कुछ खास नहीं कर पातीं। ट्रेड यूनियनों और श्रम कानूनों की भूमिका संगठित क्षेत्र में काम करने वाले सरकारी तथा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स एवं बड़े प्राइवेट सेक्टर इंटरप्राइजेज के कर्मचारियों तक सीमित है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग हमारे देश के कठोर श्रम कानूनों को न केवल असंगठित क्षेत्र के बड़े आकार के लिए उत्तरदायी बताता है बल्कि इसे संगठित क्षेत्र की धीमी एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ के लिए भी दोषी ठहराता है। इन अर्थशास्त्रियों के अपने तर्क हैं। श्रम कानून समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं। कुछ अध्ययन यह बताते हैं कि वे राज्य जिन्होंने अपने श्रम कानूनों को लचीला बनाया है विकास के प्रचलित मानकों पर उन राज्यों से अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं जहां श्रम कानून कठोर हैं। हाल ही में मोदी सरकार ने 44 श्रम कानूनों को 4 श्रम संहिताओं के रूप में सरलीकृत करने का प्रयास किया। पहले 4 भाजपा शासित राज्यों- राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में श्रम कानूनों में बदलाव किया गया फिर केंद्र सरकार भी इस दिशा में अग्रसर हुई। ट्रेड यूनियनों के विरोध और चुनावी तकाजों के कारण सरकार धीमी गति से इस दिशा में आगे बढ़ी है। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि सरकार ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के नाम पर श्रमिकों के लंबे संघर्षों के बाद अपना मौजूदा स्वरूप प्राप्त कर सके श्रम कानूनों को कमजोर कर रही है। यह कॉरपोरेट परस्त संशोधन हायर एंड फायर की नीति को बढ़ावा देंगे। भारत 1922 से ही इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन का संस्थापक सदस्य है। आईएलओ के संविधान का पालन करना उसका दायित्व है किंतु सरकार आईएलओ के नियमों को दरकिनार कर ट्रेड यूनियनों को बिना निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाए एकतरफा संशोधन कर रही है। इधर वर्ल्ड बैंक का कहना है कि यह श्रम सुधार ज़्यादा रोजगारों का सृजन करेंगे और बेहतर मजदूरी की प्राप्ति में सहायक होंगे। यद्यपि वर्ल्ड बैंक यह भी कहता है कि मजदूरी में वृद्धि का लाभ मुख्यतया उच्च तकनीकी कुशलता वाले, बहुत अनुभवी, शहरी पुरुष कामगारों को मिलेगा। अन्य लोगों का क्या होगा इस पर चर्चा करने के लिए सरकार या मीडिया कोई भी तैयार नहीं है। श्रम कानूनों में संशोधनों को न्यायोचित ठहराने का सबसे रोचक तर्क यह है कि मौजूदा कानूनों की कठोरता के कारण इनका उल्लंघन कर उद्योगपतियों को अपना काम चलाना पड़ता है इसलिए इन्हें क्यों न खत्म ही कर दिया जाए। और जैसा चल रहा है उसे ही नियम कानून मानकर आगे बढ़ा जाए। इस तर्क में मजदूरों के लिए कोई खास स्थान नहीं है। अब उनका शोषण कानूनी रूप ले लेगा। सरकार का दावा है कि सोशल सिक्योरिटी कोड जैसे सुधार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन में बदलाव लाएंगे। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का इन नए कानूनों के दायरे में आना उनके जीवन को पता नहीं किस रूप में प्रभावित करेगा। कहीं यह नरक के आधुनिकीकरण जैसा तो नहीं होगा- सामंती नरक को कॉरपोरेट नरक में तब्दील कर दिया जाएगा। जिन कानूनों के सहारे ट्रेड यूनियनें अपनी लड़ाई लड़ती थीं उन्हें अब तकनीकी क्रांति के रथ पर सवार मुक्त अर्थव्यवस्था के अनुकूल बनाया जा रहा है जहां बदलावों की गति इतनी अधिक है कि इन बदलावों के कारणों और परिणामों का विश्लेषण करने हेतु आवश्यक समय और तकनीकी दक्षता ट्रेड यूनियनों के पास शायद मौजूद नहीं होगी। श्रम कानूनों का लचीला होना तकनीकी परिवर्तनों और मुक्त अर्थव्यवस्था की अवसरवादिता के साथ संगति बैठाने को आवश्यक है। संशोधित श्रम कानून श्रमिक के जीवन में उत्पन्न अस्थिरता को नियमों के दायरे में लाने के प्रयत्न से उपजे हैं। दरअसल ये कानूनी सुधार तकनीकी परिवर्तनों और मुक्त अर्थव्यवस्था की घातक आकस्मिकता के शॉक को कम करने की कोशिश मात्र हैं। इन कठिन परिस्थितियों का सामना ट्रेड यूनियन आंदोलन किस तरह करेगा यह देखा जाना शेष है। 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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