NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मीलॉर्ड! क्या आदिवासियों के बिना ज़िंदा रह सकेंगे जंगल?
वन अधिकार कानून से जुड़ी बहस में सरकार की तरफ से कोई भी सरकारी वकील पेश नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने आदेश सुना दिया।इसलिए इस आशंका को बल मिलता है कि सरकार द्वारा ही वन अधिकार कानून को वन संरक्षण के नाम पर कमजोर कर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
अजय कुमार
23 Feb 2019
adiwasi
image courtesy- sabrang india

बहुत सारी ख़बरों में सबसे ज़रूरी ख़बर वे होती हैं जिनका जुड़ाव सबसे कमज़ोर लोगों से होता है। उन लोगों से जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती है। और अगर सुनी भी जाती है  तो अनसुनी कर दी जाती है। ऐसा ही हुआ है सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले में जिसका जुड़ाव आदिवासियों से है। जिसमें  तकरीबन 10 लाख आदिवासियों को जंगल से बाहर जाने का आदेश दिया गया है। अपनी चलताऊ भाषा में कहें तो यह कह सकते हैं की देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने का फैसला सुनाया है। बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी रिपोर्ट कहती है कि इस फैसले से  36 राज्यों (29 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश) के 18 लाख से भी अधिक आदिवासियों को जंगल से बाहर निकाला जा सकता है। 

 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि तय समय-सीमा के भीतर उन आदिवासी परिवारों को जंगल से बाहर निकाला जाए जिनके भूमि अधिकार प्रमाण पत्र के दावे को वन अधिकार कानून के तहत काम करने वाली प्राधिकरणों ने ख़ारिज कर दिया है। इस आदेश के बाद तकरीबन 16 राज्यों के मुख्य सचिव ने एफिडेविट फाइल करते हुए कहा कि इससे तकरीबन 11 लाख आदिवासी परिवार प्रभावित होंगे। लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी रिपोर्ट कहती है कि इस फैसले को सभी राज्यों को मानना है इसलिए यह संख्या इससे अधिक करीब 18 लाख हो सकती है।

इस पूरे फैसले को सही से समझने के लिए यह जानना  जरूरी है कि वन अधिकार कानून क्या है ? और जब यह जान लेंगे तो सारी  बातें साफ़ होने लगेंगी। 

वन अधिकार कानून

देश की संसद ने 18 दिसम्बर, 2006 को अनुसूचित जाति एवं अन्य पारम्परिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006पारित किया था। इस कानून को सही से समझने के लिए इसका इतिहास समझना जरूरी है। एक सदी से अधिक समय से भारत के वनों की शासन व्यवस्था उन भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों के अनुसार की जाती रही है जो 1876 से 1927 तक पारित किए गए थे। उसके बाद 1927 का कानून भारत का केन्द्रीय वन कानून बना रहा। इन कानूनों का पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। कारण  यह था कि अंग्रेज  जंगलों के संसाधन का हक अपने हाथ में लेना चाहती थे, जिसके लिए जरूरी था कि सरकार वनों पर अपना अधिकार जमाए। और उन पारम्परिक सामुदायिक वन प्रबन्धन की प्रणालियों को दबा दे जो देश के अधिकतर हिस्सों में लागू थीं। इन कानूनों ने सरकार को वनों के किसी भी क्षेत्र को रिजर्व और संरक्षित करने का अधिकार दे दिया। जिसके बाद वन बन्दोबस्त अधिकारी को भूमि, वनोत्पाद, चरागाह आदि सम्बन्धी अधिकार दावों की जाँच करने का अधिकार मिला। चूँकि इन कानूनों का  मकसद वन भूमि पर कब्जा लेना तथा वन  समुदायों को उनके अधिकारों से बेदखल  करना था इसलिए  इन कानूनों का अंग्रेजों ने जमकर फायदा उठाया। आजादी के बाद यह सारी जमीनें वन विभाग को दे दी गयी। इसके बाद यह परेशानी खुलकर सामने आने लगी कि वनों में रहने वाले आदिवासियों और वनों के संरक्षण से जुडी चिंताओं के साथ कैसे तालमेल बिठाया जाए। इनके बीच ताल-मेल बिठाने के लिए बहुत सारे संघर्ष हुए। इन संघर्षों का ही नतीजा रहा कि साल 2006 में वन अधिकार कानून पास हुआ। यह कानून पास होने के बाद यह विरोध भी दर्ज होने लगा कि सरकार अपने  हाथों से वन अधिकार को गंवा रही है। इससे वन संसाधन की निजी हाथों में खरीद बिक्री होगी और वन संरक्षण से जुड़े सारे अभियान बर्बाद  हो जायँगे। लेकिन इस कानून में ही इस विरोध का जवाब भी दर्ज था और अब भी है।

वन अधिकार कानून के वन भूमि अधिकार प्रमाण पत्र पाने के दो चरण हैं। पहला किसी भी दावेदार को यह साबित करना है कि वह मुख्यतः वनों के बाशिंदें है और अपनी जिंदगी चलाने के लिए वनों तथा वन-भूमि पर निर्भर हैं। दूसरा  दावेदारों को यह साबित भी करना है कि इस तरह से वे तकरीबन पिछले 75 साल से अपनी जिंदगी चलाते आए रहे हैं।

यहीं पर यह भी सवाल उठता है  जो लोग 75 साल पहले यानी आज़ादी के पहले वनों से बेदखल कर दिए गए और जो वनों के आसपास रहते हैं, उनका क्या?

आदिवासियों के बीच ऐसी स्थिति मुश्किल से होती है। उनमें से अधिकतर लोगों के स्थायी घर वन के आसपास भू-राजस्व वाली जमीन में होते हैं, वन में नहीं।  जो वास्तव में वन-भूमि में रहते भी थे, उनमें से अधिकतर को पहले ही वहाँ से जबरन हटा दिया गया है अथवा वन विभाग ने उनके घर को छोड़कर अपनी चारदीवारी बना ली है  ताकि उनसे सीधा  संघर्ष  टाला जा सके। 

वन अधिकार कानून के तहत वन में रहने वाले  किसी आदिवासी को तीन तरह  के अधिकार मिलते हैं 

- 13 दिसम्बर, 2005 से पहले किसी आदिवासी का वन भूमि पर कब्जा है और वह उसे जोत रहा है और अगर कोई आदिवासी इस स्थिति को दस्तावेज से साबित नहीं कर पा रहा हो तो प्रति परिवार 4 हेक्टेयर की भू-हदबन्दी लागू होगी।

 2. पारम्परिक रूप से लघु वन उत्पाद जैसे कि जंगल की लकड़ी, पत्ते, वार्निश, प्राकृतिक वार्निश, महुआ, छाल के साथ जल निकायों,चरागाहों आदि का उपयोग करना 

 3. वनों एवं वन्य-जीवों की रक्षा एवं संरक्षण- यह वह अधिकार है जो इस कानून का सबसे  जरूरी  पक्ष है। यह उन हजारों आदिवासी समुदायों के लिए अहमियत रखता है जो वन माफियाओं, उद्योगों तथा जमीन पर कब्जा करने वालों के खतरों से अपने वनों तथा वन्य जीवों की रक्षा में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकतर वन विभाग की साँठगाँठ से इस काम को अंजाम देते हैं। पहली बार यह जमीनी तौर पर लोकतान्त्रिक वन प्रबन्धन का द्वार खोलता है और इसकी सम्भावना पैदा करता है।

इसके अलावा वन अधिकार कानून 2006 की धारा 6 में तीन चरण वाली एक प्रक्रिया है जिसके आधार पर यह तय किया जाता है कि किस आदिवासी या वनवासी को भूमि अधिकार मिलेगा और किसे नहीं मिलेगा। 

पहला, ग्राम सभा यानी कि  पूरी ग्राम सभा न कि ग्राम पंचायत  तय  करेगी कि कितने अरसे से कौन ज़मीन जोत रहा है और किस तरह के वनोउत्पाद का लाभ वह लेता रहा है। यह जांच ग्राम सभा की वनाधिकार समिति करेगी, जिसके निष्कर्ष को पूरी ग्रामसभा स्वीकार करेगी।

इसके बाद ग्रामसभा की सिफारिश को दो चरणों से गुजरना होगा। ब्लॉक स्तर की छानबीन और जिलास्तर की छानबीन। जिला स्तर की छानबीन जिलास्तरीय समिति करती है। अंत में, जिलास्तरीय समिति का फैसला अंतिम माना जाएगा कि किसे भूमि अधिकार मिलेगा और किसे नहीं। इस समिति में 6 सदस्य होते हैं। 3 सरकारी और 3 चुने हुए। इनकी नज़र में अगर किसी का भूमि अधिकार संबंधी दावा गलत है तो उसे यह समिति खारिज कर सकती है। अन्तिम बात, इस कानून के तहत दी गयी जमीन न बेची जा सकेगी और न उसका अधिकार दूसरे को हस्तान्तरित किया जा सकेगा। यही प्रावधान उस विरोध का जवाब देती है, जिसके तहत यह कहा जाता था और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले संगठनों का दावा है कि जंगलों में मानवीय बसावट के चलते वनों का संरक्षण नहीं हो पाएगा।  वन भी गाँव से होते हुए शहर और शहर से होते हुए उद्योग धंधों के केंद्र में बदल जायेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले संगठन का कहना है कि जंगलों में मानवीय बसावट से जंगल  तो धीरे-धीरे बर्बाद होता है ही साथ में बहुत बड़े पैमाने में जंगलों में आदिवासियों की रहने से जंगल में जंगली जीवों के आवास भी बर्बाद होता रहता है। जिसका अंतिम नतीजा जंगल के पूरी जैव-विवधता की बर्बादी में देखा जा सकता है।  इसलिए वन अधिकार कानून का अंत करना जरूरी है और उन आदिवासियों को जंगल से बाहर निकालना जरूरी है जिनके दावे वन अधिकार कानून के तहत खारिज किये जा चुके हैं। 

आदिवासी समूह के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा आदिवासियों के दावे को खारिज करने वाले जो आंकड़ें दिए जा रहे हैं, वे सभी बोगस हैं। सभी गैरकानूनी है। आदिवासिओं को आपने दावे जाहिर करने के लिए जिन दस्तावेजों को देना पड़ता है और जिस तरह के नौकरशाही से गुजरना पड़ता है वह इतनी जटिल और लूट से भरी हुई है कि आदिवासी अपना दावा हासिल करने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। 

साल 2018 में छपी डाउन टू अर्थ पत्रिका की एक रिपोर्ट कहती है कि एक दशक के दौरान वन अधिकार के तहत तकरीबन  42 लाख दावे किये गए लेकिन 40 फीसदी दावे को ही मंजूरी मिली।  

सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई सवाल खड़े कर रहा है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही न्याय तक पहुँचने के लिए जरूरी मानक नहीं अपनाए। वन अधिकार कानून से जुड़ी बहस में सरकार की तरफ से कोई भी सरकारी वकील पेश नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने आदेश सुना दिया। सरकार ने लापरवाही दिखाई मगर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से यह न्यायिक कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा होता है कि वह दूसरा पक्ष सुनकर ही अपना फैसला दे।  इस फैसले पर आदिवासियों के बीच काम करने वाले वकील मधुरेश कहते हैं कि यह पूरी तरह से पश्चिमी सोच है कि जंगलों से मानवीय बसावट हटाकर ही जंगल बचाये जा सकते हैं। हमारे यहाँ आदिवासी जंगल का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और ऐसा भी है कि इनके रहने की वजह से जंगलों और जंगली जीवों का संरक्षण अच्छी तरह से हो पाता है। इसके साथ यह भी है कि भूमि अधिकार प्रमाण पत्र ख़ारिज करने का अधिकार ग्राम सभा का है। यानी कानून के तहत ग्राम सभा फैसला करेगी कि जंगल में कौन रहेगा और  कौन नहीं। इसपर सुप्रीम कोर्ट कैसे फैसला ले सकता है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून का उल्लंघन भी है। हालाँकि इस पर अगली सुनवाई 27  जुलाई को होनी है। 

इस तरह से सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस तरफ इशारा करता है कि दबे-कुचले लोगों का कोई माई-बाप नहीं है, भले ही उनकी संख्या कितनी भी क्यों नहीं हो। न तो वे अपने अधिकार के लिए खड़े होने में काबिल होते हैं और न ही उनके लिए सरकारें खड़ी होती हैं।  याचिकर्ताओं की याचिका पर भी शक उठता है। अगर वे सचमुच में जंगल संरक्षण के हितैषी होते तो वन अधिकार कानून के मंशा को समझते।  यह भी समझते कि जंगल के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीने वाली जिंदगी  जंगल को नुकसान नहीं पहुंचा सकती है।  इसलिए यहां पर थोड़ा षड्यंत्रकारी थ्योरी की तरफ भी देखने की कोशिश होनी चाहिए। सरकार ने वकील नहीं दिए। सरकार आदिवासियों को मुख्यधारा की तरफ लाने की बात करती है। मुख्यधारा की तरफ लाने के लिए  विकास की बात की जाती है।  और विकास के नाम पर जंगल के संसाधन के दोहन को सरकारों  खुली छूट दी जाती है।  इस छूट में अड़ंगा डालने का काम वन अधिकार कानून करता है।  जिसके तहत बिना ग्राम सभा की अनुमति के कोई भी जंगल की जमीन का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसलिए इस आशंका को बल मिलता है कि सरकार द्वारा ही वन अधिकार कानून को वन संरक्षण के नाम पर कमजोर कर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

fra
adiwasi
forest right act
supreme court order on forest right act
wild life first

Related Stories

तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 

अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष करते ईरुला वनवासी, कहा- मरते दम तक लड़ेंगे

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा

कैसे ख़त्म हो दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षण संस्थानों में होने वाला भेदभाव

झारखंड: हेमंत सरकार ने आदिवासी समूहों की मानी मांग, केंद्र के ‘ड्रोन सर्वे’ कार्यक्रम पर लगाईं रोक

घटते जंगलों से बेपरवाह समाज, चेतावनी देती रिपोर्टें

झारखंड: खूंटी के आदिवासी गांवों में ‘ड्रोन सर्वे’ को लेकर विरोध, प्रशासन के रवैये से तनाव

सामूहिक वन अधिकार देने पर MP सरकार ने की वादाख़िलाफ़ी, तो आदिवासियों ने ख़ुद तय की गांव की सीमा

झारखंड:  टाना भगत आदिवासियों ने राजभवन पर किया प्रदर्शन, सरकार पर लगाया उपेक्षा का आरोप

मुसलमानों, आदिवासियों पर हो रहे हमलों पर चुप क्यों है भारत सरकार?


बाकी खबरें

  • tikoniya
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी भारी राजनीतिक कीमत चुका कर ही अब अजय मिश्रा टेनी को मंत्री बनाये रख सकते हैं
    12 Oct 2021
    आज अंतिम अरदास के मौके पर पूरा देश लखीमपुर खीरी के शहीद किसानों को श्रद्धांजलि दे रहा है तथा घटनास्थल तिकोनिया में पूरे देश से आये किसानों का विराट संगम हो रहा है।
  • New Service Rules in Jammu and Kashmir
    डॉ राधा कुमार
    ज़ुल्म के दरवाज़े खोलते जम्मू-कश्मीर के नये सेवा नियम
    12 Oct 2021
    बर्ख़ास्त किये गये ज़्यादातर लोगों के ख़िलाफ़ जो आरोप क़ायम किये गये हैं, वे गंभीर हैं, लेकिन चूंकि आम लोगों के सामने इसे लेकर कोई सबूत नहीं रखा गया है, इसलिए यह साफ़ नहीं है कि इन आरोपों में दम है…
  • facebook
    प्रबीर पुरकायस्थ
    एक व्हिसलब्लोअर की जुबानी: फेसबुक का एल्गोरिद्म कैसे नफ़रती और ज़हरीली सामग्री को बढ़ावा देता है
    12 Oct 2021
    बेशक, यह सवाल पूछा जा सकता है कि जब फेसबुक के सिलसिले में ये सभी सवाल पहले भी उठाए जाते रहे हैं, तो इसमें नया क्या है। इस सब में बड़ी खबर यह है कि अब हमारे पास इसके सबूत हैं कि फेसबुक को इसकी पूरी…
  • Fb
    सोनाली कोल्हटकर
    समझिए कैसे फ़ेसबुक का मुनाफ़ा झूठ और नफ़रत पर आधारित है
    12 Oct 2021
    फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन द्वारा किए गए खुलासों से पता चलता है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अच्छी तरह जानता है कि उसके प्लेटफॉर्म का समाज पर किस तरह नकारात्मक प्रभाव…
  • attack on dalit
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान में दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या, तमिलनाडु में चाकू से हमला कर ली जान
    12 Oct 2021
    दलित समाज के लोगों पर हमलों की घटना लगातार सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां राजस्थान के हुनुमानगढ़ जिले में दलित युवक जगदीश की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, वहीं तमिलनाडु के तंजावुर में दलित युवक प्रभाकरण की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License