NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मज़दूर वर्ग के लिए मंदी का क्या अर्थ है?
वेतन में ठहराव और बढ़ती बेरोज़गारी के बीच एक बेख़बर सरकार ग़लत दरवाज़ों पर दस्तक दे रही है। यह वह दृष्टिकोण है जिसके ज़रिये सरकार एक घातक ग़लती कर रही है, जिसके लिए लोगों को आने वाले महीनों में भारी नुकसान उठाना होगा।
सुबोध वर्मा
19 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
What the slowdown
प्रतियात्मक तस्वीर Image Courtesy : The Hindu

भारतीय अर्थव्यवस्था में चल गतिरोध और लड़खड़ाहट को लेकर भयंकर रूप से घबराए कॉर्पोरेट क्षेत्र में बहुत अधिक अफ़रा-तफ़री चल रही है। स्वतंत्रता दिवस के संबोधन के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री मोदी सीधे वित्त मंत्री और उनके मंत्रालय के सहयोगियों के साथ "विचार-मंथन" करने के लिए बैठक में गए। इससे पहले, सीतारमण – बैंकरों, उद्योग जगत के कप्तानों, पूंजी बाज़ार के खिलाड़ियों और रियल एस्टेट टायकून के साथ अंतहीनबैठकें करने में व्यस्त थीं। यहां तक कि विदेशी पोर्टफ़ोलियो वाले निवेशकों के साथ चर्चा की गई क्योंकि वे अपनी आय के बारे में चिंतित थे। जबकि इन हालात में भी, निश्चित रूप से मुख्यधारा का मीडिया, कर रियायत सहित एक प्रोत्साहन पैकेज (पढ़ें रियायतें) के बारे में अटकलों के साथ बैलिस्टिक हो गया।

आश्चर्य की बात नहीं है कि मोदी सरकार की अगुवाई में मीडिया जो कहानी बना रहा है, उसके मुताबिक़ धन निर्माता ही हैं जो पीड़ित हैं और जिन्हें मदद की आवश्यकता है। वास्तव में, मोदी ने लाल क़िले से अपने संबोधन में उनका बचाव किया।

लेकिन इस बात पर गहरी चुप्पी है कि लोगों का क्या होगा - कृषि और औद्योगिक श्रमिक, छोटे और सीमांत किसान, कर्मचारी, यहां तक कि मध्य वर्ग की तरफ़ भी कोई ध्यान नहीं है। आर्थिक संकट को हल करने की आपाधापी में, मोदी और उनके सहयोगियों ने इन वर्गों से किसी भी वर्ग को कोई भी परामर्श नहीं दिया है और न ही लोगों की मदद करने के उपायों के बारे में बात की है।

यह वह दृष्टिकोण है जिसके ज़रिये सरकार एक घातक ग़लती कर रही है, जिसके लिए लोगों को आने वाले महीनों में भारी नुकसान उठाना होगा। सरकार निजी क्षेत्र में निवेश को और अधिक रियायत देकर बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, जबकि वास्तविक समस्या यह है कि मांग में भयंकर कमी है। लोगों के हाथों में ख़रीदने के लिए पैसा नहीं है। इसका समाधान कृषि और ग़ैर-कृषि मज़दूरी में वृद्धि करके,किसानों की आय में वृद्धि करके सार्वजनिक कीमतों को मज़बूत करना और मांग को बढ़ावा देने से होगा। आर्थिक गतिविधि शुरू करने के लिए ख़र्च बढ़ाना होगा। हालाँकि, ये उपाय मोदी सरकार के लिए जैसा कि वे पिछले कांग्रेस के लिए उठाना कठिन काम की तरह है। (ध्यान दें कि पी. चिदंबरम, कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री ने मोदी द्वारा घोषित कुछ उपायों का स्वागत किया है!)

इस बीच, देश के लोग – जो वास्तविक धन अर्जित करने वाले हैं, न कि परजीवी कॉर्पोरेट दिग्गजों – बल्कि उस जनता के साथ क्या हो रहा है, इस पर एक नज़र डालते हैं।

बेरोज़गारी की लहर

मांग कम होने के कारण, कई औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को बड़े संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी वजह से वे श्रमिकों की काम से छुट्टी कर रहे है। इसके ठोस आंकड़े अब तक केवल ऑटोमोबाइल क्षेत्र और उसकी सहायक कंपनियों से ही उपलब्ध हैं, जो बताते हैं कि ऑटोमोबाइल की बिक्री में गिरावट की वजह से 10 लाख तक नौकरियाँ खो सकती हैं, जिस की वजह ऑटो पार्ट्स निर्माताओं और विभिन्न सहायक इकाइयों में मंदी की स्थिति पैदा हो सकती है। 300 से अधिक डीलरशिप कथित तौर पर बंद हो गयी है।

इसके अलावा, तेज़ी से बढ़ने वाला उपभोक्ता बाज़ार (FMCG) क्षेत्र संकट का सामना कर रहा है। एक प्रमुख कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने पिछले साल12 प्रतिशत की तुलना में इस साल पहली तिमाही में कुल 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जिनके परिणाम उपलब्ध हैं, जैसे ब्रिटानिया, डाबर, एशियन पेंट्स आदि कथित तौर पर समान स्थिति में है। वहाँ भी एक ही बात समान है - अधिक छंटनी और श्रमिकों की छंटनी जबकि थेकेदारी के तहत काम कर रहे श्रमिकों को तो बिना भाव के बाहर कर दिया जाएगा।

रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में लगभग 12 प्रतिशत कर्मचारी कार्यरत हैं और उन्होंने दरिद्र किसानों और कृषि श्रमिकों के लिए काम देने का काम किया है। लेकिन 42 महीनो (सामान्य 8-12 महीने) से बिक्री नहीं हुई है जो अपने आप में चौंका देने वाली बात है। यह क्षेत्र 250 प्रकार के सहायक उद्योगों से जुड़ा हुआ है। ज़ाहिर है यह क्षेत्र भी बड़े पैमाने पर मंदी के दौर से गुज़र रहा है जिसका मतलब होगा लाखों नौकरियों का नुकसान -जब तक कि सरकार सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा नहीं देती इसमें सुधार की गुंजाईश नहीं दिखाई देती है।

टाटा स्टील जैसी बड़ी स्टील कंपनियों ने मांग में कमी के कारण पूंजी निवेश में कटौती की घोषणा की है। रिपोर्टों के अनुसार, कई औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों की छुट्टी करने की उम्मीद है।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र, एक बड़ा रोज़गार का स्रोत माना जाता है, जो आज़ तक भी  नोटबंदी/विमुद्रीकरण और जी.एस.टी. के दोहरे झटकों से उबर नहीं पाया है। हाल के महीनों में इसकी हालत और ख़राब हो गयी है। आर.बी.आई. के बैंक क्रेडिट डेटा से पता चलता है कि इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में एमएसएमई को उधार वास्तव में 2018 के 0.7 प्रतिशत से गिरकर 0.6 प्रतिशत हो गया है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में और नौकरियां ख़त्म होने वाली हैं।

यहां तक कि सेवा क्षेत्र पहले की तुलना में धीमा है। पर्यटन, होटल और रेस्तरां, आईटी, परिवहन, रियल एस्टेट और शिपिंग में बैंक क्रेडिट में गिरावटआई है। यह इस बात का संकेत है कि इन क्षेत्रों में रोज़गार घटने की संभावना है।

बढ़ती बेरोज़गारी

नौकरियों की हानि चल रहे बेरोजगारी संकट की पृष्ठभूमि में हो रही है जिसे मोदी सरकार पिछले पांच साल के कार्यकाल से ही अनसुना कर रही है -और ध्यान नहीं दे रही है। वर्तमान में, सी.एम.आई.ई. का अनुमान है कि बेरोज़गारी दर जुलाई 2019 में 7.5 प्रतिशत थी। दो साल पहले यह 4.1प्रतिशत थी। इस अवधि में बेरोज़गारी लगातार बढ़ी है। [नीचे चार्ट देखें]
chart 1.JPG

मौजूदा मंदी के चलते, पहले से ही ख़राब स्थिति अब विस्फ़ोटक हो जाएगी। आने वाले महीनों में बढ़ी बेरोज़गारी की संख्या स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन मोदी सरकार अभी भी हालात में परिवर्तन के लिए अपने क्रोनियों, यानि निजी क्षेत्र पर निर्भर है। जब उद्योग पर संकट नहीं था, तब भी वे रोजगार पैदा नहीं कर रहे थे। फिर वे वर्तमान मंदी में नौकरियों को कैसे बचा सकते हैं?

मोदी सरकार सोचती है कि श्रम क़ानूनों को आसान बनाने से, नौकरियों पर जब चाहे रखने और जब चाहे निकालने से और कम मज़दूरी देने की अनुमति से मालिक लोग अधिक लोगों को रोज़गार दे देंगे। लेकिन ऐसा पहले नहीं हुआ, और न ही अब असंभव है। होगा यह कि हज़ारों श्रमिकों को काम से बाहर निकाल दिया जाएगा।

ग्रामीण संकट जारी है

विशाल ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि की क्या स्थिति है? इस पहले से ही संकटग्रस्त क्षेत्र में हालात और भी भयावह हैं जो भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को रोज़गार देता है - और ख़रीदने की ताक़त प्रदान करता है।

कृषि मंत्रालय के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, खरीफ़ की बुवाई पिछले साल की तुलना में लगभग 5.3 प्रतिशत कम हुई है और प्रमुख फसल धान में क़रीब 13 प्रतिशत तक लुढ़कन दर्ज़ की गई है। जारी बाढ़ ने हजारों हेक्टेयर की खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है, साथ ही आगे भी भारी नुकसान की संभावना है क्योंकि आने वाले दिनों में पंजाब जैसे उत्तरी राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ का पूर्वानुमान है। इसलिए, उत्पादन/आउटपुट पर नकारात्मक रूप से प्रभाव पड़ने की संभावना है।

मोदी की कंजूस सरकार ने खरीफ़ उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली सी वृद्धि की घोषणा की है। उदाहरण के लिए, धान एमएसपी में पिछले साल की तुलना में केवल 4 प्रतिशत की वृद्धि की है। कई राज्यों में उत्पादन की लागत वास्तव में इससे अधिक है। कुल मिलाकर, एमएसपी लागत+ 50 प्रतिशत लाभ के ज़रूरी बेंचमार्क को पूरा नहीं करता है, जहां लागत में न केवल इनपुट और पारिवारिक श्रम शामिल हैं, बल्कि लागत भी शामिल है।

इसलिए, सरकार किसानों को संसाधन हस्तांतरित करने के लिए तैयार नहीं है - एक ऐसी नीति जो निश्चित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ाएगी और अर्थव्यवस्था को मदद करेगी।

जहां तक कृषि अर्थव्यवस्था के सबसे गरीब और सबसे ज्यादा शोषित तबक़े, खेतिहर मज़दूरों की बात है, वे सरकार की नज़र से बिल्कुल बाहर हैं। इस तथ्य के बावजूद कि देश में लगभग 15 करोड़ ऐसे श्रमिक हैं जो खेतिहर मज़दूर हैं। पिछले दो वर्षों में इन असहाय श्रमिकों के वेतन में मात्र 3.8प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में उसी अवधि में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जैसा कि आरबीआई के आंकड़ों से पता चला है। इसका मतलब यह है कि महंगाई मामुली से बढ़ी मज़दूरी को खा रही है - और वास्तविक रूप में मज़दूरी घट रही है। [नीचे चार्ट देखें]
chart 2.JPG

ग्रामीण क्षेत्रों में मज़दूरी बढ़ाने और उन्हें लागू करने के लिए ज़रूरी रूप में जिस धन को निवेश करने की ज़रूरत है नहीं कर रही है, ऐसा कर सरकार ने कृषि-श्रमिकों की दुर्दशा पर ध्यान देने से इनकार कर दिया है। कोई आश्चर्य की बात नहीं, कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग इतनी कम है।

औद्योगिक श्रमिकों की मज़दूरी

मोदी सरकार का रवैया श्रमिकों और कर्मचारियों के प्रति इतना शत्रुतापूर्ण है कि मज़दूरी और काम के घंटे तय करने के लिए हर तरह के उचित मानकों को हटाने के लिए श्रम क़ानूनों में संशोधन किया गया है। यह हाल ही में पारित हुए वेतन पर संहिता और सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों पर संहिता में स्पष्ट है।

वास्तव में, श्रम मंत्री ने घोषणा की कि नया संशोधित राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन 178 रूपए प्रति दिन होगा, जो पहले के प्रति दिन 176 से ऊपर है। यह स्तर सरकार के न्यूनतम वेतन से एक तिहाई से भी कम है जिसे भारतीय श्रम सम्मेलन सत्रों और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित, सभी तय मानदंडों के आधार पर, अपने कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन के रूप में स्वीकार किया गया है।

दो राज्यों को छोड़कर, देश के अन्य सभी राज्यों में, संबंधित राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी 18,000 के 50 प्रतिशत से भी कम है जिन्हे कि इन मानदंडों की आवश्यकता है। अब सरकार से ग्रीन सिग्नल के साथ, श्रमिकों के लिए वेतन बढ़ोतरी को भुलाया जा सकता है।

कामकाजी लोगों को भुखमरी के वेतन के साथ जीने के लिए मजबूर करने के दृष्टिकोण से, कॉर्पोरेट्स और बड़े व्यापारियों, और बड़े ज़मींदारों को सभी रियायतें दी जा रही हैं, जोकि अंतत किसी भी आर्थिक पुनरुत्थान में मदद नहीं करेंगा। वास्तव में, यह अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा डुबो देगा।

मोदी और उनके भरोसेमंद अमित शाह शायद यह उम्मीद कर रहे हैं कि धार्मिक उत्साह, छद्म राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रीयता लोगों को मौन रखेगा और कश्मीर, पाकिस्तान और राम मंदिर इत्यादि जैसे मसले में उलझे रहेंगे, लेकिन जिस तरह का आर्थिक संकट है, ये उनके लिए बड़ा झटका भी हो सकता है। लोग अब उस पुरानी हिन्दी कहावत के तहत काम नहीं करेंगे और भूखे पेट भजन नहीं गा सकेंगे। 

Ministry of Finance
Nirmala Sitharaman
Narendra modi
BJP
modi 2.0
Joblessness
Crisis in Automobile Industry
indian economy

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • Ashok Gehlot and Sachin Pilot
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान: क्या एक हो गए हैं अशोक गहलोत और सचिन पायलट?
    22 Nov 2021
    नए मंत्रिमंडल फेरबदल को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों ही संतुष्ट नज़र आ रहे हैं और इसी से उम्मीद की जा रही है कि दोनों के बीच जारी अंदरूनी कलह फिलहाल शांत हो गई है।
  • Rajasthan: Rape accused along with friends attacked Dalit girl with knife
    एम.ओबैद
    राजस्थान: रेप के आरोपी ने दोस्तों के साथ मिलकर दलित लड़की पर चाकू से किया हमला
    22 Nov 2021
    अलवर में शुक्रवार की रात रेप करने वाले शख्स और उसके साथियों द्वारा कथित रूप से 20 वर्षीय दलित लड़की पर हमला किया गया। जिसमें उसकी आंख में गंभीर चोटें आईं। पीड़िता को जयपुर रेफर कर दिया गया है जहां…
  • Tribal Pride Week
    रूबी सरकार
    जनजातीय गौरव सप्ताह में करोड़ों खर्च, लेकिन आदिवासियों को क्या मिला!
    22 Nov 2021
    प्रदेश के आदिवासियों के लिए सवाल बरकरार है कि 52 करोड़, कुछ जानकारों के अनुसार 100 करोड़ सरकारी खर्च से इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर जो सम्मेलन किया गया, क्या वह भाजपा के एजेंडे का हिस्सा भर था? क्योंकि…
  • farmers
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    क़ानूनों की वापसी से मृत लोग वापस नहीं आएंगे- लखीमपुर हिंसा के पीड़ित परिवार
    22 Nov 2021
    बीजेपी को क़ानूनों की वापसी से राजनीतिक फ़ायदे का अनुमान है, जबकि मूल बात यह है कि राज्य मंत्री अजय मिश्रा अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, जो आने वाले दिनों में सरकार और किसानों के बीच टकराव की वजह बन सकता…
  • South region leader
    पार्थ एस घोष
    अपने क्षेत्र में असफल हुए हैं दक्षिण एशियाई नेता
    22 Nov 2021
    क्षेत्रीय नेताओं के लिए शुरूआती बिंदु होना चाहिए कि, वे इस मूल वास्तविकता को आंतरिक करें कि दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे असमान और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में से एक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License