NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
शादी का झांसा देकर बलात्कार वाले मामलों में महिलाओं की आवाज़ को अहमियत देने की ज़रूरत
शादी का झांसा देकर किये जाने वाले बलात्कार के मामलों में अदालतों को पीड़िता और अपराधी की निजी धारणाओं में और ज़्यादा गहराई से खोजबीन की कोशिश करनी चाहिए।
अवंतिका तिवारी
23 Aug 2021
शादी का झांसा देकर बलात्कार वाले मामलों में महिलाओं की आवाज़ को अहमियत देने की ज़रूरत

अवंतिका तिवारी लिखती हैं  कि शादी का झांसा देकर किये जाने वाले बलात्कार के मामलों में अदालतों को पीड़िता और अपराधी की निजी धारणाओं में और ज़्यादा गहराई से खोजबीन की कोशिश करनी चाहिए। इससे सहमति के विचार को ऐसे समय में ज़ोर मिलेगा जब सुरक्षा और शादी की लफ़्फ़ाज़ी महिलाओं के अनुभवों को दरकिनार कर देती है। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकल न्यायाधीश पीठ ने हाल ही में शादी के झांसे से किये जाने वाले बलात्कार के मामलों में निहित दोषपूर्ण रुख़ को उजागर कर दिया है। अभिषेक चौहान बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में एक ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि आरोपी को अभियुक्ता के साथ अपनी शादी में बाधा पैदा होने की बात इसलिए पता थी क्योंकि वे अलग-अलग धर्मों के थे। अदालत ने कहा कि इसके बावजूद, उसने उसे "शारीरिक रिश्ते बनाने" का लालच दिया था।”

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी "सहमति की याचना नहीं कर सकता और आरोपी ने जिस तरीक़े का सहारा लिया उसे मज़ाक नहीं माना जा सकता है।" हालांकि, क़ानून में इस तरह सहमति बनाने को लेकर झांसे के लिए शायद कोई जगह नहीं है। इसके साथ ही यह बलात्कार के मामलों की उन जटिलताओं को भी उजागर करता है जिसमें शादी करने का झूठा वादा शामिल होता है।

न्यायपालिका ने भारतीय दंड संहिता की धारा 90 के तहत सहमति के भीतर जाते हुए इस अपराध को नये तरीक़े से सामने रखा है। ऐसे मामलों में यौन क्रिया से जुड़ा धोखा शामिल नहीं है। न ही ऐसे मामले निष्क्रिय पेशी का उदाहरण हैं। इसके बजाय, यौन कृत्य सहमति से किया जाता है, लेकिन शादी का वादा टूट जाने के बाद इसे असहमति माना जाता है।

यहां तक कि इस श्रेणी के मामलों में नारीवादी जुड़ाव शादी और यौन सहमति के अपरिहार्य उलझाव से जूझ रहा है। श्रीमती बसु और निवेदिता मेनन जैसी नारीवादी इन मामलों को बलात्कार क़ानून के दायरे से हटाने की सलाह देती हैं।

वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जब एक पुरुष को शादी के मामले में दोषी ठहराया जाता है, तो यह छिपे तौर पर शादी और महिला लैंगिकता के पितृसत्तात्मक मानदंडों की ही पुष्टि करता है। इस तरह के मामले महिलाओं की इच्छा के बजाय विवाह की संस्था को यौन साधन का आधार बनाते हैं।

फ्लाविया एग्नेस जैसी अन्य नारीवादियों का कहना है कि ज्यादातर मामलों में सामाजिक रूप से वंचित महिलाओं को शादी के बहाने यौन सम्बन्ध बनाने का लालच दिया जाता है और ऐसी स्थिति में उन्हें निरुपाय नहीं छोड़ा जा सकता। उनका तर्क है कि सामाजिक-आर्थिक सिलसिले में महिलाएं शादी के वादों की आसानी से शिकार हो जाती हैं।

इसलिए, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का मामला सहमति और लैंगिकता, अंतर-धार्मिक विवाह और हिंसा के साथ उसकी संलग्नता से जुड़ा हुआ है। हालांकि, ज़मानत की सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी अदालतों के भीतर होने वाली आम क़वायद से जुदा होती है।

दिलीप सिंह बनाम बिहार राज्य के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक विरोध जैसी सामाजिक परिस्थितियों को व्यक्ति को बरी किये जाने को लेकर एक वैध तर्क माना। इसने इस दोषपूर्ण पद्धति की व्याख्या दो तरह से की: क्या "सम्बन्ध बनाने की शुरुआत से" महिला से शादी करने का कोई इरादा था या नहीं और क्या वह जानता था कि शादी करने के "वादे की वजह से सहमति दी गई है।"

हालांकि, दिलीप सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने घर में शादी का हो रहे विरोध से लड़ने में अभियुक्त की अक्षमता को शादी के वादे को पूरा कर पाने में विफल रहने की भूमिका को अहम माना, लेकिन ऐसा कोई इरादा नहीं था। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट अभिषेक चौहान में बैठे एक अभियुक्त के संदर्भ में न तो उसके दोषी मन की क़ानूनी समझ या उसकी कमी की ही कोई झलक देता है।

इसके बजाय, अदालत का तर्क यह है कि "लड़के" को "किसी लड़की" के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने में उसे अपनी करनी के "नतीजों" का सामना करना ही पड़ता है। यह ऐसा है, जैसे कि आरोपी को शादी की सज़ा दी जा रही हो क्योंकि उसने यौन सम्बन्ध बनाए हैं। इस तरह के बलात्कार के मामलों को लेकर अदालत का सिद्धांत अवैवाहिक सम्बन्धों के साथ हिंसा को भी जोड़ देता है।

दिलीप सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को इस बात की जांच करनी चाहिए कि क्या सहमति प्यार पर आधारित थी या शादी के वादे से पैदा हुई थी। इसका पता लगाने का एकमात्र तरीका तो यही देखना है कि क्या महिला "की जा रही गतिविधि की नैतिक गुणवत्ता और उसमें निहित जोखिम" को समझ पाने के बाद सहमत है।

संक्षेप में कहा जाए, तो मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों पर बिल्कुल उलट विचार रखते हैं। हाई कोर्ट ने भारत को एक ऐसा "रूढ़िवादी समाज वाला देश बताया, [जिसमें] कोई भी अविवाहित लड़की शादी के आश्वासन के बिना संभोग नहीं करेगी।" इसलिए, यह भारतीय सभ्यता को दूसरों से अलग करता है। इस प्रकार, यह प्रेम के कारण सेक्स और शादी के वादे के कारण सेक्स के बीच के फर्क को मिटा देता है।

हाई कोर्ट भारतीय महिलाओं की लैंगिकता को निष्क्रिय बनाता है। यह 'भारतीय महिला' की एक समान श्रेणी बनाकर सहमति को नकारता है, जो शादी के बाहर सेक्स के लिए कभी हां नहीं कहेगी। यह धारणा इस विचार को बल देती है कि सेक्स को हमेशा शादी के बाद ही करना चाहिए। यदि ऐसा है, तो यह एक तरह से सामान्य होने की स्थिति से एक ऐसा बिलगाव है, जिसे शादी के बाद ही नाकारा जा सकता है।

इसके अलावा, हाई कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ "महिला ही गर्भवती होने का जोखिम उठाती है", जिसका अर्थ यह है कि आरोपी को यौन सम्बन्ध रखने की क़ीमत चुकानी होगी। इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह महिलाओं की चेनशक्ति भी छीन लेता है और उसकी व्यक्तिपरक वास्तविकता के साथ जुड़ाव की संभावना को भी नष्ट कर देता है। अदालत निष्क्रिय और पीड़ित "भारतीय महिलाओं" के बारे में एक धारणा बना लेती है और इस बात का पता लगाने में विफल रहती है कि क्या अभियुक्ता को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। हम महिला पर पड़ते दबाव को लेकर कुछ भी नहीं जानते।

अगर हाई कोर्ट ने महिला को अपनी कहानी कहने के लिए एक मंच दिया होता तो हम कथित सहमति वाले रिश्तों की हिंसा और पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था को नजर नहीं आने वाली हिंसा को जान पाते।

इस बात का उल्लेख करना कि उसे बदनाम किया जाएगा, दिखाता है कि शादी के बाहर और पारिवारिक दबाव के बावजूद अपनी लैंगिकता को व्यक्त करने को लेकर महिलाओं के जीवन के अनुभवों को समझना कितना मुश्किल है। यह इस बात का एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे समाज महिलाओं को चुप कराने और बलात्कार के मामलों की इस श्रेणी की जटिलता को मिटाने के लिए महिलाओं के पीड़ित होने का उपयोग कर सकता है।

हाई कोर्ट न तो अपराधी और न ही पीड़ित के संदर्भ को सामने रखता है। हमें शायद ही उनके परिवारों की तरफ से उन पर पड़ने वाले दबाव का अंदाजा है। शोध से पता चलता है कि कई मामलों में माता-पिता, रिश्तेदारों और जांच अधिकारी की सलाह पर प्राथमिकी दर्ज की जाती है।

बस इतनी सी उम्मीद ही की जा सकती है कि न्यायपालिका शायद महिला की बात सुने। भविष्य की कानूनी कार्यवाही से उसकी पृष्ठभूमि, संदर्भ और सम्बन्ध की सीमा और लड़का-लड़की के बीच के प्रेम और पारिवारिक दबाव की हिंसा पर प्रकाश पड़ने की उम्मीद की जा सकती है।

(अवंतिका तिवारी वकील व जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में अकादमिक हैं। वह आपराधिक कानून और इसके साथ नारीवादी कानूनी सिद्धांत को विचार-विमर्श में रुचि रखती हैं। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।)

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Make Women’s Voices Central to False Promise to Marry Cases

rape cases
Madhya Pradesh High Court
physical relationship
Indian Penal Code
marry cases

Related Stories

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

राजद्रोह कानून से मुक्ति मिलने की कितनी संभावना ?

पिता के यौन शोषण का शिकार हुई बिटिया, शुरुआत में पुलिस ने नहीं की कोई मदद, ख़ुद बनाना पड़ा वीडियो

क्या लिव-इन संबंधों पर न्यायिक स्पष्टता की कमी है?

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022 के रहस्य को समझिये

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने चूड़ी विक्रेता तस्लीम अली को जमानत दी

निजी रक्षा का अधिकार : एक क़ानूनी दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट को राजद्रोह क़ानून ही नहीं,यूएपीए और एनएसए के दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए

राजद्रोह का क़ानूनः सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना है


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
    29 Dec 2021
    मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
  • 2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    29 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने साल 2021 के उन उजले-स्याह पलों का सफ़र तय किया, जिनसे बनती-खुलती है भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की राह।
  • जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    रवि शंकर दुबे
    जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    29 Dec 2021
    यह हड़ताली रेजिडेंट डॉक्टर्स क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना इनके लिए क्यों ज़रूरी है। आइए, क्रमवार जानते हैं-
  • सोनिया यादव
    जेएनयू: ICC का नया फ़रमान पीड़ितों पर ही दोष मढ़ने जैसा क्यों लगता है?
    29 Dec 2021
    नए सर्कुलर में कहा गया कि यौन उत्पीड़न के मामले में महिलाओं को खुद ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को यह पता होना चाहिए किए इस तरह के उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अपने पुरुष दोस्तों के…
  • कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    एजाज़ अशरफ़
    कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    29 Dec 2021
    सेंसरशिप अतीत की हमारी स्मृतियों को नष्ट कर देता है और जिस भविष्य की हम कामना करते हैं उसके साथ समझौता करने के लिए विवश कर देता है। प्रलयकारी घटनाओं से घिरे हुए कश्मीर में, लुप्त होती जा रही खबरें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License