NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मॉब लिंचिंग की संस्कृति
जिन भीडों का उद्देश्य अफवाह,धारणाओं और नफरतों पर आधारित होता है, वह हमेशा असंतुलित तरीके से बरताव करती हैं। ऐसी भीड़ गुस्से के साथ जन्म लेती है और मॉब लिंचिग में बदल जाती है।
अजय कुमार
09 Jul 2018
mob lynching

समाज का माहौल समय के हर दौर को अपने हिसाब से चलने के लिए मजबूर करता है। हमारे भीतर का डर किस दौर में गुस्से में बदलेगा और किस दौर में शिकारी बन जाएगा, यह महज किसी घटना या घटनाओं के समूह का परिणाम नहीं होता बल्कि इसके पीछे राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक  हकीकतों से बना माहौल काम करता है।

 पिछले कुछ सालों से हमारा समाज मॉब लिंचिंग की भयावह  हरकरतों में लिपटता जा रहा है। पिछले साल भर में बच्चा चोरी के अफवाह में  मॉब लिंचिंग की वजह से तकीबन 15 दुर्घटनाएं घट चूकी हैं। इन सारी घटनाओं में व्हाट्सप्प के जरिये बच्चा चोरी की अफवाह फैलाई गयी। स्थानीय लोगों में बाहरी लोगों के प्रति संदेह पनपा और स्थानीय लोगों का बरताव बाहरी लोगों के प्रति भीड़ जैसा हो गया।

मतलब डिजिटल इंडिया का सहारा गवर्नेंस  में मिले न मिले लेकिन अफवाह फैला कर भीड़ बन जाने में जरूर मिल रहा है। साल 2015 में दादरी की घटना से लेकर पहलू खान, जाहिल रसूल भट्ट, जफर हुसैन, अयूब पंडित और जुनैद खान जैसी लम्बी श्रृंखला है जो मॉब लिंचिंग का शिकार बनते हैं। इन सारी दुर्घटनाओं में भीड़ संदेह, नफरत और अपने भीतर की धारणाओं की वजह से इकट्ठा होती है, गुस्से की मदहोशी में डूबकर शिकारी बनती है और किसी को इतना घायल कर देती है कि उसे अपनी जान गंवानी पड़ती है। इन दुर्घटनाओं के परत उधेड़नें पर इंसानी वजूद को शर्मसार करने  वाली बातें सामने आती है।

 पिछले 4 साल में गौ रक्षा के नाम पर 78 दुर्घटनाएं घटी है। जिसमें मुस्लिम और दलित समाज के लोगों को निशाना बनाया गया है। इन सारे हमलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इससे जुड़े संगठनों  का कहीं न कहीं जुड़ाव रहता है।  इसका मतलब यह है कि हिंदुत्व की विरासत पर शासन चला रही मौजूदा भाजपा सरकार इनको दबी जुबान में सहारा देती है। और ये लोग इन्हीं के दम पर भीड़ बनकर लोगों को मारते रहते हैं। इस दौर की सबसे भयावह बात तो यह है कि हम गाय रक्षा के नाम पर भीड़ बनकर इंसानों को मारने निकले पड़ते हैं। आने वाली सदियां इस दौर पर हँसते हुए कहेंगी कि 21 वीं सदी में  मोदी दौर के लोग सबसे बर्बर हुआ करते थे ,ये लोग  जानवर बचाने के लिए भीड़ बनकर  मुश्लिम और दलितों का शिकार किया करते थे। 

ऐसा नहीं है कि भीड़ का हिंसक बन जाने का रवैया इसी दौर का है। ऐसी दुर्घटनाएं पहले भी होती रही है। इससे कभी नकारात्मक एहसास मिलता है तो कभी सकारात्मक। लेकिन इसका परिणाम हमेशा भयावह और गलत होता है।  महिलाओं  की भीड़ द्वारा कानून व्यवस्था से परेशान होकर किसी बलात्कारी की लिंचिंग सकारत्मक एहसास दे सकता है तो उसी भीड़ द्वारा बच्चा चोरी के संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को मार  देना नकारत्मक  एहसास। व्हाट्सप्प के जरिये सूचनाओं का अफवाह फैलाकर कोई गलत व्यक्ति चुनाव जीत सकता है तो व्हाट्सप्प के जरिये अफवाह फैलाकर सांप्रदायिक दंगे भी फैलाये जा सकते है। इसलिए समय का यह दौर जब इंसानों को शिकारी बनाने में लगा हुआ है तो यह समझने की जरुरत है कि आखिरकार हम भीड़ क्यों बन जाते हैं और भीड़ बनकर हिंसक क्यों हो जाते हैं?

भीड़ कई तरह के लोगों का जमावड़ा होती है। इसमें शामिल लोग एक-दूसरे को नहीं जानते है। लेकिन सभी किसी खास उद्देश्य की  वजह से इकठ्ठा होते हैं । भीड़ के उद्देश्य की प्रकृति जैसी होती है, भीड़ वैसे ही  व्यवहार करने लगती है । भीड़ में सभी उद्देश्य को जानते तो हैं लेकिन उसके प्रति क्रिटिकल थिंकिंग नहीं रखते। सभी भीड़ के उद्देश्य के प्रति सम्मोहित होते हैं। इसलिए भीड़ अगर उद्देश्य के साथ संतुलित रही तो गुस्से में व्यक्त हो जाती है और अगर असंतुलित हुई तो हिंसक हो जाती है। जिन भीडों का उद्देश्य अफवाह,धारणाओं और नफरतों पर आधारित होता है, वह हमेशा असंतुलित तरीके से बरताव करती हैं। ऐसी भीड़ गुस्से  के साथ जन्म लेती है और मॉब लिंचिग में बदल जाती है। हमारा समाज भीतर ही भीतर दलित, मुसलमान ,औरतों और   हर तरह के वंचितों के प्रति घोर धारणाओं और नफरतों से भरा है।

इसलिए इस समूह के लोग जब दबे पांव चले आ रहे  अन्यायी किस्म के समाजिक नियमों का उल्लंघन करते हैं तो राजनीति अपने  गंदे हथकंडों का इस्तेमाल कर उनके खिलाफ भीड़ भी तैयार करती रहती है. दूरदराज इलाके में वंचितों के खिलाफ ऐसी भीड़ का तैयार होना आम बात है। वंचितों के खिलाफ मॉब  लिंचिंग की दुर्घटनाएं हमारे समाज के किसी न किसी हिस्से में रोज घटित होती हैं।  इनकी वंचना इतनी गहरी होती है कि इनमें से बहुत लोग अपने  खिलाफ हो रहे अन्याय को दर्ज करवाने से डरते हैं। महिलाओं को अन्यायी किस्म के  सामाजिक नियमों के उललंघन पर  प्रताड़ित करना (खाप पंचायत) और दलितों को अछूत बताकर पीटना हमारे समाज में मौजूद मॉब लिंचिंग के बीज को दर्शाता है।  गाय रक्षा के नाम पर बनने वाली भीड़ राजनितिक मंशा बनती है। यह समाज में पहले से चली आ रही  मुस्लिमों और दलितों  के प्रति धारणाओं और अलगाव को नफरतों में बदलती है।  इस नफरतों का इस्तेमाल कर भीड़ बनाती है और लोगों के जान लेती है। 

इस सामाजिक स्थिति को जब  इस दौर की नफरत की राजनीति और आर्थिक असमानता की खाई से उपजे  परेशानियों का साथ मिलता है तो भीड़ का असंतुलित और हिंसक तरीके से व्यवहार करना आम हो जाता है। इसलिए अक्सरहा भीड़ की अगुवाई  करने वाला इंसान अगर भीड़ के भीतर मौजूद असंतोष को उग्र  तरीके से हवा देता है तो भीड़ असंतुलित हो जाती है। भीड़ के भीतर मौजूद असंतोष को हवा देने के लिए अफवाह फैलायें जाते हैं, तथ्यों तोड़े मरोड़े जाते हैं, भीड़ की भावुकता पर हमला किया जाता है और अपने साथ गोलबंदी बनाने की कोशिश की जाती है। पहचान के आधार पर राजनीति करने वाले लोग इस फलसफे का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इस मामलें में हमारे प्रधानमंत्री का कोई सानी नहीं है। पाकिस्तान से लेकर नेहरु की जिंदगी पर की गयी बातें भीड़ बनाने  के इरादे से ही की जाती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सूचानाओं का संसार मौजूद है। इन सूचनाओं में से सही सूचना छांटने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास कुछ बेसिक समझ का  होना जरूरी  है।  इस समझ के साथ कुछ ऐसे लॉजिकल मेथड की भी जरूरत होती है, जिसके आधार पर सूचनओं के संसार से फ़र्ज़ी सूचनाओं को ख़ारिज कर दिया जाए। ऐसी इंसानी टेन्डेन्सी क्रिटिकल और  लॉजिकल शिक्षा और सामजिक व्यवहार के बिना नहीं हासिल की जा सकती है। हुआ यह है की हम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ते जा रहे हैं लेकिन टेक्नोलॉजी बरतने के लिए जरूरी समझ अपने नागरिकों को मुहैया नहीं करा रहे हैं। बच्चा चोरी की घटना सही हो सकती है लेकिन बच्चा चोरी के आधार पर किसी भी बाहरी नागरिक के खिलाफ फैलायी गयी किसी भी तरह सूचना गलत और अफवाह के सिवाय और कुछ नहीं हो सकती। लेकिन सरकार डिजिटल मीडिया पर कानून बनाकर अफवाहों को कंट्रोल करना चाह रही है। ऐसी किसी भी तरह के कानून से अभिवयक्ति की आज़ादी कमजोर होगी न कि अफवाहों का खात्मा होगा .

इन्हीं सारे बातों के इर्द-गिर्द  भीड़ और मॉब लिंचिंग की संस्कृति हर दौर में जिन्दा रहती है ।जो  इस समय नफरत की राजनीति,डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद अफवाही सूचनओं और आर्थिक असमानता की घनघोर दौर में हर जगह उभरकर सामने आने लगी है।  बाकी अंतिम सच तो यही है कि भीड़ के भीतर मौजूद लोगों की पहचान भीड़ की वजह से मर जाती है। इसलिए हर व्यक्ति उस समय किसी भीड़ का हिस्सा का बन सकता है जब उसके भीतर मौजूद धारणाएं किसी भीड़ का उद्देश्य हो। और अगर भीड़ किसी के प्रति असंतुलित हुई तो मॉब लिंचिंग तय है। इसलिए मॉब लिंचिंग से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता है कि धारणाओं से मुक्ति पाए जाए। गाय से लेकर इंसानी वजूद पर ,जाति  से लेकर धर्म पर ,औरत से लेकर मर्द पर हर विषय पर सोचने की कोशिश की जाए।  अगर हम अपने जीवन जीनें के तरीकें में क्रिटिकल नहीं होंगें  तो पूंजीपतियों की  गन्दी राजनीति और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद अफवाहें हमें भीड़ में तब्दील करती रहेंगी और हम खून की प्यासी जमात में बदलते चले जाएंगे। 

mob lynching
digital india
whatsapp messages
BJP
BJP-RSS

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • sever
    रवि शंकर दुबे
    यूपी: सफ़ाईकर्मियों की मौत का ज़िम्मेदार कौन? पिछले तीन साल में 54 मौतें
    06 Apr 2022
    आधुनिकता के इस दौर में, सख़्त क़ानून के बावजूद आज भी सीवर सफ़ाई के लिए एक मज़दूर ही सीवर में उतरता है। कई बार इसका ख़ामियाज़ा उसे अपनी मौत से चुकाना पड़ता है।
  • सोनिया यादव
    इतनी औरतों की जान लेने वाला दहेज, नर्सिंग की किताब में फायदेमंद कैसे हो सकता है?
    06 Apr 2022
    हमारे देश में दहेज लेना या देना कानूनन अपराध है, बावजूद इसके दहेज के लिए हिंसा के मामले हमारे देश में कम नहीं हैं। लालच में अंधे लोग कई बार शोषण-उत्पीड़न से आगे बढ़कर लड़की की जान तक ले लेते हैं।
  • पटनाः डीजल-पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ ऑटो चालकों की हड़ताल
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः डीजल-पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ ऑटो चालकों की हड़ताल
    06 Apr 2022
    डीजल और पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के बाद ऑटो चालकों ने दो दिनों की हड़ताल शुरु कर दी है। वे बिहार सरकार से फिलहाल प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहे हैं।
  • medicine
    ऋचा चिंतन
    दवा के दामों में वृद्धि लोगों को बुरी तरह आहत करेगी – दवा मूल्य निर्धारण एवं उत्पादन नीति को पुनर्निर्देशित करने की आवश्यता है
    06 Apr 2022
    आवश्यक दवाओं के अधिकतम मूल्य में 10.8% की वृद्धि आम लोगों पर प्रतिकूल असर डालेगी। कार्यकर्ताओं ने इन बढ़ी हुई कीमतों को वापस लेने और सार्वजनिक क्षेत्र के दवा उद्योग को सुदृढ़ बनाने और एक तर्कसंगत मूल्य…
  • wildfire
    स्टुअर्ट ब्राउन
    आईपीसीसी: 2030 तक दुनिया को उत्सर्जन को कम करना होगा
    06 Apr 2022
    संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम जलवायु रिपोर्ट कहती है कि यदि​ ​हम​​ विनाशकारी ग्लोबल वार्मिंग को टालना चाहते हैं, तो हमें स्थायी रूप से कम कार्बन का उत्सर्जन करने वाले ऊर्जा-विकल्पों की तरफ तेजी से बढ़ना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License