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मोदी सरकार ईरान तेल के मुद्दे पर अमेरिकी धमकी के आगे झुकी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुलवामा, बालाकोट, एएसएटी के ज़रिये अपने आपको राष्ट्रीय हितों का रक्षक होने का दावा करते हुए पूरे देश भर में घुम रहे हैं। लेकिन विदेश नीति से जुड़ा एक मुद्दा जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव डालने वाला है और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला है, वह है - अमेरिका द्वारा भारत को ईरान से तेल आयात करने से रोकना।
एम. के. भद्रकुमार
25 Apr 2019
Translated by महेश कुमार
मोदी सरकार ईरान तेल के मुद्दे पर अमेरिकी धमकी के आगे झुकी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुलवामा, बालाकोट, एएसएटी के ज़रिये अपने आपको राष्ट्रीय हितों का रक्षक होने का दावा करते हुए पूरे देश भर में घुम रहे हैं। लेकिन विदेश नीति से जुड़ा एक मुद्दा जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव डालने वाला है और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला है, वह है - अमेरिका द्वारा भारत को ईरान से तेल आयात करने से रोकना।

व्हाइट हाउस की इस धमकी से भारत के तेल के बिल में वृद्धि होना (महंगा) निश्चित है। और, अभी तक, केवल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने इस पर चिंता व्यक्त की है। यदि विदेश नीति देश के विकास को निश्चित करने का एक ज़रिया है, तो मोदी सरकार को अपने राजनीतिक साहस को जुटाते हुए ट्रम्प प्रशासन को स्पष्ट तौर बता देना चाहिए और दिखाना चाहिए कि भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने के उनके प्रयास का विरोध किया जाएगा।

इसके बजाय, सोमवार को मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि सरकार अन्य देशों को ईरानी तेल में व्यापार करने से रोकने के लिए व्हाइट हाउस के फ़ैसले की बड़ी ही नम्रतापूर्वक चेतावनी दे रही है। सबसे अफ़सोस की बात है कि हम जो कुछ भी देख रहे हैं, वह हमारी सरकार द्वारा राष्ट्रीय हितों का आत्मसमर्पण है, जो मोदी के भारत के विकास और समृद्धि के संरक्षक होने के दावों के पूरी तरह से नकारता है और उसके विपरीत है।

इस संबंध में सरकार ने एक घुमाव दिया है कि उसने तेल की आपूर्ति के लिए "वैकल्पिक स्रोतों" की व्यवस्था की है। यह सादा कुतर्क है। असली मुद्दा यह है कि ईरान अत्यधिक रियायती शर्तों पर भारत को तेल की आपूर्ति कर रहा है – जिन शर्तों पर तेल बाज़ार में उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध बाज़ार से तेल ख़रीदना हमेशा से एक विकल्प रहा है, लेकिन सरकार ईरान से अनुकूल शर्तों का लाभ उठाकर अपने आयात बिल को काफ़ी कम कर सकती है। इतना ही नहीं, तेल व्यापार एक अस्थिर मामला है और इससे केवल बिचौलियों को लाभ पहुँचता है। यदि भारत उपलब्ध बाज़ार से तेल ख़रीदता है, आम आदमी को इस छिपी हुई रिश्वत का भी बोझ उठाना पड़ेगा। ईरान भारत के साथ दीर्घकालिक (लम्बे समय के लिए ) व्यवस्था बनाने के लिए उत्सुक है।

सोमवार को व्हाइट हाउस की घोषणा में दावा किया गया कि सऊदी अरब और यूएई ईरान से खोए तेल की भरपाई करने के लिए सहमत हो गए हैं। हालांकि, सऊदी अरब ने इस पर काफ़ी संभली हुई प्रतिक्रिया दी है, जिसमें कहा गया है कि यदि आवश्यकता हो तो वह आपूर्ति करेगा। मुद्दा यह है कि, सऊदी अरब को भी ओपेक + डील (रूस के साथ) के तहत उसे अपनी सीमा के नीचे उत्पादन रखना पड़ता है, जिसका मतलब है कि इस सिद्धांत के तहत वह वर्तमान स्तरों (लगभग, 500,000 बीपीएस) के ऊपर प्रति दिन कुछ सौ हज़ार बैरल ही जोड़ सकता है, जो ईरान से होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। (और यह वेनेज़ुएला के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिबंधों और लीबिया में गृह युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में अन्य व्यवधानों को भी क़तई ध्यान में नहीं रखता है।)

सऊदी के तेल मंत्री ख़ालिद अल-फ़लीह पहले ही ओपेक + समूह की चिंताओं को साझा करने की कोशिश करने के लिए काफ़ी आगे निकल गए हैं, यह कहते हुए कि रियाद “वैश्विक तेल बाज़ार को सुनिश्चित करते हुए उपभोक्ताओं को पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए साथी तेल उत्पादकों के साथ समन्वय करेगा ताकि बाज़ार संतुलन से बाहर न जा पाए। ”संक्षेप में, सऊदी अरब एकतरफ़ा कार्यवाही नहीं करेगा और पूर्वनिर्धारित रूप से कार्य भी नहीं करेगा।

इसके अलावा, ओपेक + समूह को एक साथ रखने के रणनीतिक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, रियाद की भी बजटीय चिंता है कि वह तेल की क़ीमत को अधिक से अधिक बनाए रखे। आईएमएफ़ का अनुमान है कि सऊदी अरब को अपने 2019 के बजट को संतुलित करने के लिए तेल की क़ीमतों में 80-85 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की आवश्यकता होगी। ओपेक के आंकड़ों के अनुसार, तेल और गैस क्षेत्र सऊदी अरब के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 50 प्रतिशत उत्पन्न करता है, और इसकी निर्यात से आय लगभग 70 प्रतिशत है। इसके अलावा, सऊदी अरब तेल से होने वाली आय पर निर्भर है, जिसे विज़न 2030 के रूप में जाना जाता है, इसके बेहद महत्वाकांक्षी परिवर्तन कार्यक्रम को फ़ंड करने के लिए, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने के लिए अरबों डॉलर के निवेश के लिए अरबों डॉलर लाने का रास्ता बनाया है।

इसलिए, सभी कारकों पर ध्यान दें तो लगता है, कि तेल की क़ीमत बढ़ेगी और आने वाले महीनों में भारत के आयात बिल को भी बढ़ाने के लिए बाध्य होगी। सरकार की गणना यह होगी कि यदि भाजपा सत्ता में वापस आ जाती है, तो तेल की क़ीमत में वृद्धि का बोझ उपभोक्ता पर डाला जा सकता है, जैसा कि मोदी सरकार ने पिछले 5 साल की अवधि में किया है। बेशक, उच्च तेल की क़ीमतों के कारण दुनिया भर में आर्थिक मंदी का ख़तरा पहले से मंडरा रहा है।

मोदी सरकार बिना किसी संकेतक प्रतिरोध के अमेरिकी दबाव के आगे झुक गयी। दो देश जो ईरानी तेल पर निर्भर हैं- चीन और तुर्की – इन दोनों देशों ने वॉशिंगटन के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत दिखाई है। मंगलवार को बीजिंग में एक समाचार ब्रीफ़िंग में, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, गेंग शुआंग ने अमेरिका के फ़ैसले की आलोचना करने के लिए कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया और कहा कि अमरीका के इस क़दम के ख़िलाफ़ चीन ने पहले से ही पुर्व निर्धारित कार्यवाही कर ली है। उन्होंने कहा, "चीन ने अमेरिका से  कहा कि वह चीन के हितों और चिंताओं का गंभीरता से सम्मान करे और चीन के हितों को नुक़सान पहुँचाने वाली ग़लत कार्यवाहियों से बचे।" चीन पहले ही अमरीका को अपना पक्ष रख चुका है। गेंग ने कहा कि चीन ने ईरान और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच ईरान के तेल को लेकर परस्पर सहयोग के ख़िलाफ़ अमरीकी दख़ल का ''कड़ा विरोध '' किया है, जिसमें चीन का हित भी शामिल है, उसका सम्मान और सुरक्षा होनी चाहिए।''

तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत अयुसुओलू ने आक्रोश में पूछा: “आप (अमेरिका) दूसरे देशों पर दबाव क्यों बना रहे हैं? आप अपना इंतज़ाम ख़ुद करें। अन्य देशों को आपके एकतरफ़ा फ़ैसलों का पालन क्यों करना चाहिए?” उन्होंने कहा, “हम एक अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली और क़ानूनी नियमों के साथ स्थापित बहुपक्षवाद का समर्थन करते हैं। तथ्य है कि इस फ़ैसले को एक देश द्वारा बाधित किया जा रहा है और जो सभी पर अपने निर्णयों को थोपने के लिए दबाव डाल रहा है, यह अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली को नुक़सान पहुँचा रहा है और इसे ख़तरे में डाल रहा है।"

इन देशों के मुक़ाबले, मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अमेरिका की धमकी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेंगे। वास्तव में विचित्र बात यह है कि वॉशिंगटन, ईरान पर भारत के साथ मसूद अज़हर के मामले को प्रतीकात्मक समर्थन देने के भारत के अनुपालन के साथ इसे जोड़ रहा है! यह ब्लैकमेल है। जबकि उपयुक्त यह होता कि अमेरिका ने आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देश के रूप में पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट कर दिया है? क्या ट्रम्प ऐसा करने की हिम्मत करेंगे? नहीं, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि अफ़गानिस्तान में अमेरिकी ठिकाने पाकिस्तान के माध्यम से आपूर्ति लाइन गंभीर रूप से निर्भर हैं।

ट्रम्प स्पष्ट रूप से सोचते हैं कि मोदी एक पुआल (हल्का) के व्यक्ति हैं, जो उनके ख़ुद के द्वारा बनाई जा रही छवि के विपरीत हैं। दरअसल, वह हर बार मोदी के बारे में अपमानजनक बातें कहते हैं, लेकिन बाद में सिर्फ़ उसे टाल देते हैं और ऐसा कर वे ख़ुद को और भी ज़्यादा प्रभावित कर रहे होते हैं। ट्रम्प ने अमेरिका द्वारा भारत में किए जा रहे निर्यात का शुल्क बढ़ाया, लेकिन मोदी ने इसके ख़िलाफ़ कोई पारस्परिक उपाय नहीं किए। ट्रम्प ने हार्ले डेविडसन मोटरबाइकों के लिए शुल्क में कटौती की मांग की, और मोदी ने न केवल इसका अनुपालन किया बल्कि व्यक्तिगत पोटस को फ़ोन करके यह ‘अच्छी’ ख़बर दी। मोदी ने ट्रम्प को गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित भी किया लेकिन ट्रम्प ने तिरस्कारपूर्वक अस्वीकार कर दिया।

क्या यह आश्चर्य की बात है कि अमेरिका ने, मोदी की बड़ी दॄष्टि जिसमें भारत द्वारा ईरान के साथ आर्थिक सहयोग का विस्तार करने और उसे मज़बूत करने के लिए एक भुगतान तंत्र क़ायम किया जिससे डॉलर को दरकिनार किया जा सके लेकिन अमरीका ने अब इस व्यवस्था को ख़त्म करने का क़दम उठा लिया है? वॉशिंगटन का एकदम सही अनुमान था कि दिल्ली बिना किसी विरोध के आत्मसमर्पण कर देगी। क्या इस तरह का शर्मनाक आत्मसमर्पण हमारे हिन्दू डीएनए में होना चाहिए – जो सर्वोच्च ताक़त के सामने शर्मनाक ढंग से ज़मीन पर बिछ जाए और ग़रीबों एवं बेसहारा पर हमला करे?

Courtesy: Indian Punchline
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