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मप्र : लगातार मर रहे हैं पत्थर खदान के मज़दूर
पन्ना ज़िले के माँझा, बडोर और रानीगंज जैसे गाँवों में सिलिकोसिस एक महामारी की तरह फैल रही है, जो इन गाँवों के कई लोगों की मौत का कारण बन गई है।
काशिफ़ काकवी
04 Sep 2019
Translated by महेश कुमार
पत्थर खदान के मज़दूर
Image Courtesy: Hindustan Times

भीषण गर्मी में, माँझा गाँव की 35 वर्षीय मिताली आदिवासी अपने मिट्टी के घर के बाहर बैठी हैं, अपनी चार साल की बेटी के बालों से जूँ साफ़ कर रही हैं। इनकी दो लडकियां हैं, मिताली चिंतित हैं कि इन हालात में बच्चों को खाना कैसे खिलाया जाएगा।

सुबह जल्दी उठ कर, काम की तलाश में वह पन्ना चली जाती हैं - जो उनके गाँव से 5 किलोमीटर की दूरी पर है - लेकिन उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ता है क्योंकि किसी ने उन्हें काम  नहीं दिया।

मिताली एक पत्थर खनन की खदान में काम करती थीं और उन्हें दैनिक वेतन के रूप में कुल 180 रुपये मिलता था, लेकिन बारिश के कारण एक पखवाड़े से खनन की गतिविधियां बंद पड़ गई हैं। तब से वह कैसे गुज़र-बसर कर रही है इसका कोई ठिकाना नहीं है। क्योंकि मिताली के पास कोई अन्य कुशलता तो है नहीं, इसलिए अपने बच्चों का पेट भरने के लिए उनके पास एक मज़दूर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि, यह काम भी हासिल करना कठिन हो गया है, विशेषकर जब पूरे देश में आर्थिक मंदी छाई हुई है।

Manjha stone mine 2.png

मिताली के पति ग्यासी आदिवासी की कथित तौर पर पिछले साल सिलिकोसिस से मृत्यु हो गई थी। वे भी साथ काम करते थे। मिताली ने कहा, “कुछ ग्रामीणों का कहना है कि वह सिलिकोसिस से मर गए, जबकि कुछ कहते हैं टीबी से मौत हुई हैं। लेकिन, मेरा जीवन नरक में बदल गया, जब वह इतनी छोटी उम्र में दो बेटियों को छोड़ कर चला गया। वह अपने आख़िरी दिनों में खून की उल्टी कर रहा था।

उसकी 65 वर्षीय पड़ोसी राजकुमारी ने बताया, “बचपन से ही ग्यासी पन्ना की पत्थर की खदान में काम कर रहे थे और इस तरह बहुत कम उम्र में सिलिकोसिस से पीड़ित हो गए थे। एक प्रारंभिक जांच के बाद, डॉक्टरों ने तपेदिक (टीबी) की पुष्टि की और उसे बीमारी से छुटकारा पाने के लिए डॉट्स (एक टी.बी. की दवा) दवा का उपयोग करने के लिए कहा।"

शहर में 2017 के साल में एक एनजीओ ने शहर में एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया था जिसमें  ग्यासी को सिलिकोसिस के लिए पॉज़िटिव पाया गया था। लेकिन उसके इलाज में बहुत देर हो चुकी थी, अगले वर्ष ही उसकी मृत्यु हो गई। डॉट्स (DOTS) दवा पाँच साल के निरंतर उपचार के बाद भी काम नहीं करती है। हालांकि वह सिलिकोसिस से पीड़ित थे और सरकारी डॉक्टर उसे टीबी क़रार दे रहे थे। नतीजतन 39 वर्ष की कम उम्र में ग्यासी की मृत्यु हो गई।

मिताली माँझा गांव की अकेली महिला नहीं हैं, जिसने अपने पति को सिलिकोसिस बीमारी के हाथों खोया है। सिलिका नामक धूल के लगातार संपर्क में आने से कई लोगों की मौत हो गई है, ऐसी मौतें जिन्हें दर्ज भी नहीं किया गया  है।

Silicosis patients at Panna District Hospital.jpg

पन्ना ज़िला अस्पताल में सिलिकोसिस के मरीज़

सिलिकोसिस एक फेफड़े की बीमारी है, और सिलिका के छोटे-छोटे कणों की वजह से सांस लेने में दिक़्क़त होती है, यह एक ऐसा खनिज है जो रेत, चट्टान, और खनिज अवयव जैसे कि क्वार्ट्ज़ का हिस्सा होता है। यह ज़्यादातर श्रमिकों को खनन, कांच निर्माण और फ़ाउंड्री जैसे व्यवसायों में सिलिका धूल के संपर्क में आने से प्रभावित करता है।

पन्ना शहर के बाहरी इलाक़े में स्थित माँझा गांव, डेलन चौकी पंचायत के अंतर्गत आता है। गाँव में 200 से अधिक परिवार हैं जो पिछले 15 वर्षों से सरकारी ज़मीन पर रह रहे हैं। लगभग किसी के पास भी एक पक्का या सुसज्जित घर नहीं है, और सभी लोग मिट्टी की छतों वाले मिट्टी के घरों में रहते हैं। इस गाँव में ज़्यादातर आदिवासी हैं।

सिलिकोसिस के अलावा, गाँव में कुपोषण के लगभग आधा दर्जन मामले भी मौजूद हैं।

जब न्यूज़क्लिक ने माँझा का दौरा किया, तो एक चौंकाने वाली सामने आई, कि गांव में शायद ही कोई पुरुष बचा था। इसके पीछे का कारण पूछने पर, गांव के निवासी 65 वर्षीय कल्याण सिंह यादव ने बताया कि ज़्यादातर लोग सिलिकोसिस से मर गए हैं, और जो बच गए, वे नौकरी के लिए दूसरे शहरों में चले गए हैं। उन्होंने कहा, "केवल महिलाएं और बच्चे यहां रहते हैं या वे पुरुष जो बीमार हैं या फिर बूढ़े हैं।"

कल्याण सिंह पिछले 15 सालों से सिलिकोसिस के मरीज़ हैं, लेकिन खनन की नौकरी छोड़ देने की वजह से बच गए। "मैं जीवित हूं क्योंकि मैंने पत्थर खनन का काम छोड़ दिया है और डॉक्टरों द्वारा मुझे टीबी और सिलिकोसिस होने की संभावना के बारे में सूचित करने के बाद मैंने ड्राइविंग शुरू कर दी है। मेरे दोस्त और साथी मज़दूर जिन्होंने पत्थर खनन नहीं छोड़ा था, वे 40-45 साल की उम्र में मौत के हवाले हो गए थे।”

सरस्वती, जो कल्याण सिंह के क़रीब ही खड़ी थी, ने न्यूज़क्लिक को बताया, “मेरे पति केशु भी सिलिकोसिस के रोगी हैं। वह पत्थर खनन का काम करता था और अब उसे ख़ून की उल्टी हो रही है। वह केवल 34 साल का है। एक एनजीओ की मदद से, हमने बीमारी की पहचान की और वे उसके इलाज में मदद कर रहे हैं।”

एनजीओ पृथ्वी ट्रस्ट और राज्य स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के बीच लंबी लड़ाई के बाद, सरस्वती के पति को सिलिकोसिस रोगी के रूप में स्वीकार किया गया था। अब, वह नवगाँव के सरकारी अस्पताल में उपचाराधीन है।

जब न्यूज़क्लिक ने उनसे पूछा कि वे पत्थर खनन की खदानों में क्यों काम करते हैं - यह जानने के बावजूद कि वहां सबको सिलिकोसिस होने का ख़तरा है – वह भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (MGNREGS) के तहत नौकरी मांगने के बजाय, तो महिलाओं में से एक ने कहा, “शुरुआत में 60-70 दिन  काम मिलता था, लेकिन वह भी अब 20-30 दिन तक सिकुड़ कर रह गया है। इसके अलावा, ठेकेदार सप्ताह के भीतर मज़दूरी का भुगतान नहीं करते हैं। हमारे पास खदानों में काम करने के अलावा कोई चारा नहीं है।"

मनरेगा वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अभी भी पन्ना ज़िले में मज़दूरों को कुल 40 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया गया है।

सिलिकोसिस ने कई गांवों के पुरुषों का जीवन समाप्त कर दिया है।

हालत बडोर और रानीगंज गांव में लगभग समान है जो शहर से 5 से 15 किमी की दूरी पर है। एक सामाजिक कार्यकर्ता छत्रसाल पटेल ने बताया कि "इन गांवों में हर तीसरी महिला विधवा है, उनके पति सिलिकोसिस के कारण बहुत कम उम्र में मर गए।"

Badore village_0.jpg

बडोर गाँव की महिलाएँ

मनरेगा वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पन्ना 1.4 लाख मज़दूरों का घर है। उनमें से, 2 प्रतिशत से कम कुशल मज़दूर हैं। इस जिले में दर्जनों क़ानूनी और अवैध पत्थर और हीरे की खदानें हैं जहां हज़ारों मज़दूर रोज़ काम करते हैं।

एक सामाजिक कार्यकर्ता यूसुफ़ बेग़, जो पन्ना में एनजीओ पृथ्वी ट्रस्ट चलाते हैं और एक दशक से सिलिकोसिस रोगियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं ने बताया, “पन्ना में हज़ारों सिलिकोसिस रोगी हैं, लेकिन राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने कभी भी यहाँ सर्वेक्षण कराने की जुर्रत नहीं की ताकि उनका मर्ज़ पहचाना जाता और उनके इलाज के लिए स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया जाता। इतना ही नहीं, विभाग ने यहां ऐसी किसी भी बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया।”

बेग़ ने दावा किया कि उन्होंने एक दिन के स्वास्थ्य शिविर के भीतर क़रीब 172 सिलिकोसिस रोगियों की पहचान की है और रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंप दी है। उसके बाद ही विभाग सिलिकोसिस के अस्तित्व पर सहमत हुआ है।

“माँझा जैसे कई गाँव हैं, जो सिलिकोसिस के कारण विधवाओं के गाँव में तब्दील हो गए हैं। राज्य सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, अन्यथा, यह बीमारी हर साल हज़ारों लोगों के जीवन को समाप्त कर देगी।"

दिल्ली के एक सामाजिक कार्यकर्ता आर. श्रीधर, जिन्होंने मध्य प्रदेश में सिलिकोसिस रोगियों के साथ काम किया है, ने कहा, “यह एक महामारी है, जिसे राज्य सरकारों ने काफ़ी हद तक नज़रअंदाज़ किया है। राज्य में लगभग 2 लाख से अधिक सिलिकोसिस के मरीज़ हैं।”

श्रीधर के एनजीओ, एनवाईरोनिक ट्रस्ट ने सरकार के नोटिस में बीमारी को लाने के लिए 2011 से 2017 के बीच विदिशा, पन्ना, भिंड और राज्य के अन्य इलाक़ों में कई स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए हैं।

संपर्क करने पर, पन्ना के ज़िला मजिस्ट्रेट, करमवीर शर्मा ने कहा, “हम सिलिकोसिस रोगियों की पहचान करने और उन्हें हर संभव मदद देने के लिए एक सर्वेक्षण करने की कोशिश कर रहे हैं।” उन्होंने कहा, "मैंने यह आग्रह विभाग के अधिकारियों के साथ हाल मे की गई बैठक में किया है। मैंने सभी अफ़सरों से सरकारी योजनाओं में सिलिकोसिस रोगियों को प्राथमिकता देने के लिए कहा है।”

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