NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
मसूद अज़हर परियोजना को छोड़ो! ज़िंदगी की सच्चाई कुछ और है
जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक 'वैश्विक आतंकवादी' के रूप में घोषित करने में चीन द्वारा अटकल लगाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हाल के दिनों में यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका रुख अज़हर के मामले में अपरिवर्तित है, चाहे भारत में मीडिया कुछ भी क़यास लगाती रहे।
एम. के. भद्रकुमार
15 Mar 2019
Translated by महेश कुमार
मसूद अज़हर परियोजना को छोड़ो! ज़िंदगी की सच्चाई कुछ और है
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सत्र

जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक 'वैश्विक आतंकवादी' के रूप में  घोषित करने में चीन द्वारा अटकल लगाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने हाल के दिनों में यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका रुख अज़हर के मामले में अपरिवर्तित है, चाहे भारत में मीडिया कुछ भी क़यास लगाती रहे।

चीन के रुख के पीछे तर्क को समझने के लिए रॉकेट साइंस जानने की ज़रूरत नहीं है। पाकिस्तान चीन का एक प्रमुख सहयोगी है। और शायद, एकमात्र स्थिर सहयोगी। और बीजिंग अपने 'लौह भाई' के प्रति आभारी है। इसके अलावा, मौजूदा और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में, चीन-पाकिस्तान गठबंधन ने एक वैश्विक चरित्र ग्रहण कर लिया है। निश्चित रूप से, यह 'भारत केंद्रित' अब नहीं रहा है। चीन का समर्थन पाकिस्तान की रणनीतिक स्वायत्तता को मज़बूत करता है। और बीजिंग सोचता है कि यह चीन के हित में है।
व्यावहारिक रूप से, बीजिंग चीन-पाक गठबंधन के पक्ष में है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कोई परोपकारी सिद्धांतों के आधार पर काम करने के लिए नहीं जाना जाता है और राजनीति तो ओर भी मुश्किल काम है।
दरअसल, आतंकवाद के मुद्दे पर दोहरी मार पड़ी है। पी-5 के भीतर पश्चिमी ट्रोइका, जिसने अज़हर मामले को तूल दिया है, वह लिली के फूल की तरह सफ़ेद नहीं है। उसके सीरिया और लीबिया की जिहादी नस्ल सहित आतंकवादी समूहों के साथ काफ़ी घनिष्ठ संबंध के उदाहरण मौजूद हैं।
अज़हर के मामले में, यह भी तथ्य स्पष्ट है कि चीन-भारत संबंधों की हालिया सकारात्मक प्रवृत्ति पश्चिम के लिए आंख की किरकिरी बन गयी है, एशिया-पैसिफ़िक की सुरक्षा के लिए इसके गहरे निहितार्थ मौजूद हैं। दूसरी ओर, तीन नाटो देश जो पी-5 से संबंधित हैं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गहराई से यह बात जानते हैं कि पाकिस्तान अफ़गानिस्तान में सुलह के लिए मुख्य हितधारक है, और इस मौक़े पर इस्लामबाद को नाराज़ करना उनके हित में नहीं है।
इसका कुल योग यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस सच्चाई को छिपा रहे हैं – और भारत के साथ दौड़ लगा रहे हैं (भारत के निवेदन और शांत करके) जबकि शिकारी कुत्ते के साथ शिकार भी कर रहे हैं (पाकिस्तान को कम़जोर बताकर)
वास्तव में, भारत ख़ुद को एक अवांछनीय स्थिति में खड़ा पाता है। क्योंकि भारत ने नए शीत युद्ध की स्थिति में 'पी -3' (अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस) के चरणों में ख़ुद को एक कोने में खड़ा कर दिया है, जबकि वह यह भी जानता है कि ये पश्चिमी शक्तियाँ किसी भी तरह से भारत की 'प्राकृतिक सहयोगी' नहीं हैं ख़ासकर सीमा पार आतंकवाद के ख़िलाफ़ उसके संघर्ष में। भारतीय विदेश नीति की स्थापना यह जानती है कि पश्चिम की ‘अधिकतम दबाव’ की रणनीति कभी भी बीजिंग के साथ काम नहीं करेगी। और यक़ीनन यह काम करने के लिए है भी नहीं।
कहा जाए तो, मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट नहीं हैं। निश्चित रूप से, यह कोई बड़ी बात नहीं है भले ही संयुक्त राष्ट्र मसूद अज़हर को 'वैश्विक आतंकवादी' कहे। अफ़गानिस्तान के अतीत के समान क़िस्म के विचित्र सज्जन जो वैश्विक आतंकवादियों की संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल थे, आजकल कतर में अमेरिका के विशेष दूत ज़ल्माय खलीलज़ाद के साथ संरचित वार्ता कर रहे हैं। और ऐसा उन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगी यात्रा प्रतिबंध के बावजूद हो रहा है। दरअसल, अमेरिका ने उनमें से 5 को ग्वांतानामो बे के एक क़ैदी एक्सचेंज के रूप में रिहा किया था, जिसने उन्हें दोहा में अमेरिका की ओर से वार्ताकारों के रूप में इस्तेमाल करने के लिए सक्षम बनाया। और, इसमें कोई ग़लती न हो, ये समझ लिया जाना चाहिए कि वे कट्टर आतंकवादी थे। ये कड़वा सच है।
अंत में, दिल्ली को नैदानिक रूप से आश्वस्त होना चाहिए कि क्या वह जम्मू और कश्मीर में संकट की स्थिति में किसी भी सुधार की वैधता की उम्मीद कर सकता है, भले ही अज़हर के आवागमन को प्रतिबंधित कर दिया जाए।  सारे संकेत यही बताते हैं कि अज़हर इतना गंभीर रूप से बीमार है कि वह अपने घर के बाहर भी निकलने में असमर्थ है। यह एक कड़वी लेकिन सच्ची कहानी है।
बहरहाल, अगर मोदी सरकार का ये अनुमान है कि अज़हर परियोजना को संयुक्त राष्ट्र सूप्रीम कोर्ट 1276 समिति में लॉन्च करना सामरिक रूप से लाभप्रद है, तो यह सिर्फ़ इसलिए हो सकता है क्योंकि इस परियोजना से देश के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा इसमें दिलचस्पी रखता है। (और अज़हर के मामले को लेकर विश्व समुदाय अपनी नींद ख़राब करेगा यह अपने आप में संदिग्ध बात है।)
निश्चित रूप से, एक अन्य भाजपा सरकार ने लगभग 20 साल पहले अज़हर को भारतीय जेल से मुक्त कराकर कंधार के हवाई अड्डे पर उतारा था और उसे सुरक्षित (वीआईपी एस्कॉर्ट के साथ) पाकिस्तानी आईएसआई को सौंप दिया था। यह शर्मनाक विरासत भाजपा को परेशान करती है और उसके हिंदू फ़ौलादी-राष्ट्रवाद का मज़ाक़ उड़ाती है और राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य के प्रेटोरियन गार्ड के रूप में इसकी पदस्थापना करती है।

hijak kandhar.jpg

अपहृत तर्क: कंधार हवाई अड्डे में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान IC 814 जहां अपहृत यात्रियों की रिहाई के लिए मसूद अज़हर का आदान-प्रदान किया गया था। 22 दिसंबर, 1999

सीधे शब्दों में कहा जाए तो अज़हर परियोजना मोदी सरकार के प्रायश्चित का एक तरीक़ा है। दूसरी बात यह है कि अज़हर परियोजना जम्मू-कश्मीर में पूर्ण नीतिगत विफ़लता से ध्यान हटाने में भी मदद करती है, जो कि सीमा पार आतंकवाद के लिए उस राज्य में संकट की स्थिति का एकमात्र कारण है। जबकि, भारतीय सुरक्षा विश्लेषक, जो खूफ़िया और रक्षा प्रतिष्ठान में आधिकारिक पदों पर रहे हैं, ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में ज़मीनी हालात का फ़ायदा उठाता है, लेकिन उग्रवाद आज भी काफ़ी हद तक स्वदेशी है और लोगों और भारतीय राज्य के बीच गहरा मतभेद बरक़रार है।
तीसरी बात जो कि पर्याप्त रूप से विरोधाभासी है, अज़हर परियोजना, जो कि कुर्सी के बाद्शाह रणनीतिकारों के समान है, जो इसे  (पाकिस्तान के खिलाफ) 'निष्क्रिय रक्षा' कहेंगे, सरकार की सबसे हालिया 'सक्रिय रक्षा' रणनीति (पूर्व-निर्धारित कार्रवाई पर केंद्रित) है, जिसे पाकिस्तान के बालाकोट पर हमला करके अंज़ाम दिया गया है। अब जब न्यू यॉर्क में अज़हर परियोजना औंधे मुहँ गिर गयी है, तो हमारी समग्र शब्दावली कमज़ोर पड़ गई है क्योंकि हमारी रणनीतिक शब्दावली चौपट हो गई है।
ज़ाहिर है, यूएन सुरक्षा परिषद में अज़हर परियोजना का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं है। यह चीन के साथ भारत के संबंधों को अनावश्यक रूप से जटिल कर रहा है, जिसमें पाकिस्तान स्थित आतंकवादी के भाग्य को तय करने पर ज़्यादा ज़ोर है। फिर से, इसने भारत को नाराज़ कर दिया, विश्व समुदाय के शब्द का उपयोग करने से बच सकता है, लेकिन हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे उप-महाद्वीप में आतंकवाद के मूल कारण से अनजान है।
लब्बोलुआब यह है कि मोदी सरकार ने 2014 में पीएम के नाते एक धमाकेदार शुरुआत की थी, जिसमें भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता सुरक्षित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से पहल की शुरुआत की गई थी और बीमार आतंकी को उसके सूर्यास्त के क़रीब पहुँचाने के लिए संघर्ष किया था जिसमें उसे वैश्विक आतंकवादी के रूप में ब्रांडेड करना था। भारत की कूटनीति में उद्देश्य की कमी है। यह तब होता है जब विदेशी नीति घरेलू दर्शकों को लुभाने की भव्यता का सामान बन जाती है।

unsc
UNO
China
America
Pakistan
Masood Azhar
Jaish-e-Mohammad
pulwama attack
Narendra modi
Narendra Modi Government

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License