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‘हवा का बदलता रुख़’: ब्रिगेड रैली में उमड़ा जनसैलाब बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस-आईएसएफ गठबंधन को लेकर उत्साहित
पश्चिम बंगाल भर से लाखों लोगों का कोलकाता स्थित ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वाम मोर्चा, कांग्रेस और आईएसएफ की संयुक्त रैली के समर्थन में आना, टीएमसी और भाजपा के खिलाफ एक सशक्त विरोध की संभावना पैदा कर रही है।
अरित्री दास
03 Mar 2021
Brigade Rally

कोलकाता: 28 फरवरी को समूचे बंगाल से 10 लाख से भी अधिक की संख्या में लोगों का जन-समूह, वाम मोर्चे के आह्वान के साथ-साथ इसके गठबंधन सहयोगियों कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट की पहलकदमी पर ब्रिगेड परेड ग्राउंड में उमड़ पड़ा। जैसा कि इन तीनों दलों ने इस चुनावी राज्य में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से मुकाबले के लिए ‘संयुक्त मोर्चे’ का गठन किया है, वे इस चुनावी मैदान के बीच में कूद पड़े हैं, जिसे अभी तक सिर्फ टीएमसी और भाजपा के बीच की लड़ाई के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा था।

सुबह रेड रोड के किनारे-किनारे और कोलकाता के सबसे बड़े खुले मैदान, ब्रिगेड परेड ग्राउंड की ओर जाती हुई सड़क वाम मोर्चे के विभिन्न दलों के लाल झंडों से अटी पड़ी थी। इसके साथ ही साथ वाम दलों के नए सहयोगी आईएसएफ और कांग्रेस के भी कुछ दल ब्रिगेड मैदान में बेहद उत्साह के साथ मिनी ट्रकों में आये हुये थे। कई लोग जो दूर-दराज के जिलों से आये थे वे पहले से ही शनिवार की रात को यहाँ पहुँच चुके थे और उन्होंने रैली स्थल पर ही अपना डेरा डाल लिया था। बाकी के लोगों ने सुबह से ही बसों और ट्रेनों में आना शुरू कर दिया था, जिसने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता मोहम्मद सलीम की भविष्यवाणी को यथार्थ में बदल दिया था कि ‘पीपल्स ब्रिगेड’ ‘सभी रैलियों की माँ’ साबित होने जा रही है।

शहर के कई प्रमुख स्थलों से ब्रिगेड की ओर आने वाले लोगों का मार्च लाल झंडों और बैनरों से शुरू हो रहा था, जो लोकप्रिय राजनीतिक गीतों और पैरोडी पर नाच रहे थे। उनके थैलों में दिन भर में खाने के लिए मुरमुरे की छोटी सी पोटली और जमीन पर बैठने के लिए अखबार मिलेगा। जैसे ही वाम समर्थकों का रेला सियालदाह और हावड़ा के मुख्य रेलवे जंक्शनो की रेलगाड़ियों से उमड़ना शुरू हुआ, इसने इलाकों को लाल रंग से सराबोर कर डाला और वहां से विशाल मार्च निकलते हुए ब्रिगेड ग्राउंड पहुंचा।

लोग अपने परिवारों के साथ यहां पर पहुंचे हुए थे, जिसमें उनके बच्चे और यहां तक कि बुजुर्ग लोग भी शामिल थे, जो आजीवन वाम समर्थक रहे हैं। जो लोग दूर-दराज के इलाकों से एक दिन पहले ही यहां पर पहुंचे थे, उन्होंने ग्राउंड के आखिर में पेड़ों की छांव  तले अपना डेरा डाला हुआ था। हालाँकि इस दफा जो रोचक पहलू नजर आया, वह थी भारी तादाद में नौजवान समर्थकों की भागीदारी, जिन्होंने भीड़ में उर्जा और उत्साह का संचार कर रखा था। इन युवा प्रतिभागियों में से अधिकतर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से सम्बद्ध डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ़ इंडिया और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के कार्यकर्त्ता थे। अपने हाथों में अपने क्रन्तिकारी आदर्श चे ग्वेरा के चेहरे के साथ विशाल लाल झंडे को लहराते हुए लेफ्ट की ब्रिगेड रैलियों में नियमित तौर पर हिस्सा लेने वाले मिराजुल हक़ (40) के अनुसार “मैं लंबे समय से ब्रिगेड की रैलियों में आ रहा हूँ, लेकिन मैंने कभी भी नौजवानों को, विशेषकर 20 से लेकर 25 तक की उम्र के युवाओं को इतने विशाल पैमाने पर भागीदारी करते नहीं देखा है।”

मनोरंजन और हास्य 

रैली में मनोरंजन एक प्रमुख हिस्से के तौर पर था जिसमें इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन और अन्य संगीतकारों ने मंच पर सुप्रसिद्ध सलिल चौधरी द्वारा रचित तूफानी ‘गणसंगीत’ (लोगों के गानों) की धुनों के साथ मंचन किया।

यहां तक कि चिलचिलाती धूप होने के बावजूद कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों के उत्साह को बरकारार रखा था, वहीं कई लोगों द्वारा बांग्ला में लाल अक्षरों में लिखे ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गठबंधन को वोट करें’ वाले विशालकाय सफेद बैनर को थामे इस भारी भीड़ के बीच में एक लहर की तरह चक्कर लगाया जा रहा था।

मैदान में जहां लोगों की भीड़ जमा थी, वहां कई बैनरों और तख्तियों पर टीएमसी और भाजपा को लेकर कई मनोरंजक व्यंग्य प्रदर्शित किये गए थे। एक समूह ‘मोदी गैस’ नामक एक लाल एलपीजी सिलिंडर के आकार के ढाँचे के साथ चक्कर काट रहा था। खाना पकाने की गैस की कीमतों में तीव्र बढ़ोत्तरी को संदर्भित करते हुए सिलिंडर के दूसरे हिस्से में विज्ञापन दिया हुआ था – ‘जल्द ही मैं 1000 रूपये पर पहुंचने वाला हूं’।

(ब्रिगेड रैली में वाम समर्थकों का एक समूह एलपीजी सिलिंडर के आकार का ढांचा लिए हुए। साभार: अभिजीत दत्ता) 

एक अन्य व्यक्ति ने लोगों के ध्यान को एक बड़े प्लेकार्ड पर खींच रखा था, जिस पर मुकेश अंबानी, नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी की कठपुतलियों जैसी आकृतियाँ एक के बाद एक रखी गई थीं। इसमें जब अंबानी के हाथ हिलते थे, तो उसी के मुताबिक अन्य दो के भी हिलने लगते थे। खुद का नाम बताने से इंकार करने वाले व्यक्ति ने जिसने इसे तैयार किया था, उसने कहा कि वह दिखाना चाहता था कि ये सभी लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मोदी जहाँ अंबानी द्वारा नियंत्रित थे, वहीं बनर्जी को मोदी द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था।

(कोलकाता ब्रिगेड रैली में एक व्यक्ति अंबानी, मोदी और ममता की आपस में जुड़ी हुई कठपुतलियों के साथ एक प्लेकार्ड लिए हुए। साभार: अरित्री दास)

आम लोगों के मुद्दे बनाम धर्म और क्षेत्रीयतावाद 

रैली में दिए गए अपने भाषणों में राजनीतिक दलों के नेताओं ने टीएमसी के क्षेत्रीयतावाद पर आधारित बंगाली पहचान और भाजपा के धर्म आधारित राजनीति से खुद को दूर रखा। इसके बजाय उन्होंने उन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जो आम लोगों को प्रभावित कर रहे हैं - जैसे कि अन्य बातों के अलावा महँगाई, बेरोजगारी, किसानों का संघर्ष इत्यादि। सीपीआई(एम) महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि बंगाल के लोग ‘जनहित की सरकार’ को देखना चाहते हैं, न कि उन्हें जो लोगों के साथ लूटपाट कर रही हो, और उन्हें सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने की कोशिश में हो। वहीं दूसरी ओर सीपीआई नेता स्वपन बनर्जी ने इस बात को रेखांकित किया कि श्रमिकों, किसानों, छात्रों और युवाओं ने मिलकर राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ शासनों के खिलाफ लड़ाई को आरंभ कर दिया है। 

रैली को संबोधित करने वाले गठबंधन के नेताओं ने भी अपने दावों में जोर दिया कि भाजपा और तृणमूल दोनों ही एक जैसे हैं, और इस प्रकार वे ‘बीजेमूल’ हैं, जिनके खिलाफ मोर्चा लड़ाई जारी रखेगा।

ब्रिगेड रैली में मौजूद लोगों ने भी इस सेंटिमेंट को प्रतिध्वनित किया।

आसनसोल में पश्चिमी बर्दवान से आये सुब्रत मंडल जो आसनसोल में बीबी कॉलेज में व्याख्याता हैं, ने कहा “टीएमसी और बीजेपी दोनों में ही वैचारिक दिवालियापन है और उनके नेता एक-दूसरे की पार्टियों में स्थानांतरित हो रहे हैं। इनकी मंशा सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की है जबकि स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और कृषि क्षेत्र का हाल बेहद खराब हालत में है। वाम मोर्चा, कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दल नौकरियों, भोजन और शिक्षा की खातिर लड़ाई को सुनिश्चित करेंगे।”

भाजपा-आरएसएस के हिंदुत्व और बंगाली हिन्दुओं के बीच में फर्क को रेखांकित करते हुए मंडल का कहना था “हम जन्म से हिन्दू हैं, लेकिन हमारा धर्म मानवतावाद का है। लेकिन भाजपा का हिंदुत्व लोगों को एकजुट नहीं होने देता। इसके बजाय यह लोगों को आपस में बांटता है और दिलोदिमाग में संकीर्णता को पैदा करता है।”

पहली दफा वाले 

आईएसएफ समूहों में ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के नौजवान शामिल थे, जिनमें से अधिकांश गरीब परिवारों से आते हैं। अपने समाज के हाशिये पर खड़े इन लोगों में से तकरीबन किसी ने भी ब्रिगेड ग्राउंड में आजतक एक भी रैली में शिरकत नहीं की थी। साबिर अली सरदार, जो कि आईएसएफ का झंडा लिए मंच के पास बैरिकेड के किनारे खड़े थे, एक ऐसे प्रतिभागी हैं जो साउथ 24 परगना के उस्ती से रैली में पहुंचे थे। न्यूज़क्लिक  से अपनी बातचीत में सरदार ने बताया “यहाँ पर आकर काफी अच्छा महसूस हो रहा है, इस सबका हिस्सा बनकर मैं बेहद गर्व को महसूस कर रहा हूँ।”

आईएसएफ नेता अब्बास सिद्दीकी का जिक्र करते हुए उनका कहना था वे यहाँ पर ‘भाईजान’ की खातिर आये थे। सरदार ने कहा “भाईजान हम लोगों के साथ खड़े हैं जो गरीब हैं, और जिन्हें समाज द्वारा पीछे छोड़ दिया गया है।” उन्होंने आगे कहा कि इससे पहले उन्होंने अपना वोट और समर्थन टीएमसी को दिया था, लेकिन उनके विचार में वे बंगाल को क्षति पहुंचा रहे थे। आईएसएफ के प्रति अपने अडिग समर्थन को रेखांकित करते हुए उनका कहना था कि वे ब्रिगेड परेड ग्राउंड में तब भी नहीं आते थे जब उन्होंने टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा वहां पर आयोजित रैलियों का समर्थन किया था।

सरदार ने अपनी आशंका व्यक्त करते हुए आगे कहा था कि यदि राज्य में भाजपा सत्ता में आती है तो यह पार्टी नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करेगी, जो कि उनके लिए एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है, क्योंकि न तो उनके या उनके पिता के पास ही अपनी नागरिकता को साबित करने के लिए 1971 के समय के दस्तावेज हैं।

दिलावर हुसैन गाज़ी जो कि 20 साल की उम्र में पहली बार मतदान करने जा रहे हैं, वे सरदार के साथ अपनी पहली यात्रा पर ब्रिगेड रैली में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। यह बताते हुए कि सिद्दीकी ने उनके पिछड़े समुदाय के विकास करने में मदद की है, गाज़ी ने जोर देते हुए कहा कि लेफ्ट-कांग्रेस-आईएसएफ गठबंधन इस चुनाव में विजयी होने जा रहा है।

लोगों का मूड 

रैली के एक किनारे में खड़े मीडियाकर्मियों से बात करते हुए वाम नेता और सीपीआई(एम) विधायक तन्मय भट्टाचार्य ने बताया “2021 के चुनाव में कोई गुंडा-बदमाश बूथ पर कब्जा करने की हिमाकत नहीं कर सकता है। बंगाल के लोग जागरूक हो चुके हैं। लोग अपने लोकतान्त्रिक अधिकार का इस्तेमाल करेंगे और जब ऐसा होगा तो कोई भी ताकत लेफ्ट-कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक गठबंधन को सरकार बनाने से नहीं रोक सकती है।”

नेताओं के साथ-साथ रैली में शामिल आम लोगों ने भी यह विश्वास जताया कि संयुक्त मोर्चा, मार्च में शुरू होने जा रहे आगामी चुनावों को जीतने जा रही है। 32 वर्षीय चाँद मलिक जो कि नादिया जिले के कालीगंज निर्वाचन क्षेत्र के गाँव से आये अन्य स्थानीय लोगों के साथ सभास्थल पर खड़े थे, का कहना था कि “भाजपा केंद्र में बैठी है, उनके पास गाँव स्तर पर अपने खुद के सदस्य नहीं हैं। हम मोर्चा के उम्मीदवार को अपना वोट देंगे और उन्हें विजयी बनायेंगे।” ब्रिगेड ग्राउंड तक पहुँचने के लिए उन्होंने बसों से 150 किलोमीटर से अधिक का सफर किया था। उन्होंने यह भी बताया कि कार्यक्रम स्थल तक पहुँचने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि पुलिस भीड़ को कम करने के उद्देश्य से ब्रिगेड में आने वाली बसों और ट्रकों को रोक रही थी। स्थानीय मीडिया की सूचना के अनुसार दांकुनी के पास दुर्गापुर एक्सप्रेसवे पर बसों और ट्रकों की लाइनें को लंबे समय से जाम में फंसी हुई थीं। मलिक ने आगे बताया कि उनकी हाल की स्मृति में इतनी विशाल ब्रिगेड रैली नहीं हुई थी।

नॉर्थ  24 परगना के अशोकनगर से पहुंचे सीपीआई(एम) कार्यकर्ता, मिराजुल हक़ ने अपने सवालिया जवाब में कहा “वर्तमान में पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का ह्रास हो चुका है। 2018 के पंचायत चुनावों में टीएमसी ने करीब 34% सीटों पर उम्मीदवारों को अपना नामांकन दाखिल करने से रोक दिया था। ममता बनर्जी कह रही हैं कि उन्होंने विकास किया है; यदि ऐसा है तो वे क्यों उम्मीदवारों को निष्पक्ष तरीके से चुनावों में नहीं लड़ने दे रही हैं?”

उन्होंने बताया कि उनके लिए इस चुनाव में बेरोजगारी एक अहम मुद्दा है। खासकर हाल ही में 30 वर्षीय मैदुल मिद्या की मौत के बाद से, जिनकी कथित तौर पर बेरोजगारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में मौत हो गई थी। हक़ के अनुसार “पिछले 10 सालों से एसएससी की परीक्षाएं आयोजित नहीं की गई हैं। ग्रामीण इलाकों में रह रहे कई प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को, जो हमारी तरह ही गरीब हैं, को टीईटी (टीचर एलीजीबिलटी टेस्ट) परीक्षा के जरिये नौकरी हासिल नहीं हो पाई है। लोग अब शोषण और भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं।” न्यूज़क्लिक ने इससे पूर्व की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस प्रकार से उच्च न्यायालय द्वारा टीईटी 2014 की चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं का हवाला देते हुए इसे दरकिनार कर दिया था। 

भाजपा के ‘सोनार बांग्ला’ अभियान की आलोचना करते हुए उनका कहना था कि अगर उनकी पार्टी ने केंद्र में ‘सोने का भारत’ बनाया होता तो राज्य भी स्वाभाविक तौर पर इसका हिस्सा होता। हक़ का कहना था कि “सांप्रदायिकता का सहारा लेकर ‘सोनार बांग्ला’ नहीं बनाया जा सकता है।”

हावड़ा के कानपुर ग्राम पंचायत से पहुंचे अर्नब जन का कहना था कि “टीएमसी के आतंक के बावजूद हम करीब 150 लोग बेरोजगारी और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए यहां पहुंचे हैं। हमारे यहां सुबह के वक्त टीएमसी का और रात के दौरान भाजपा का आतंक छाया रहता है। लेकिन हवा का रुख बदल रहा है। किसानों के एक बड़े हिस्से से भी वाम गठबंधन को वोट मिलने जा रहा है। भले ही अभिषेक बनर्जी (टीएमसी नेता) और दिलीप घोष कुछ भी कहें, उनकी जीत का सपना सिर्फ सपना बनकर ही रह जाने वाला है, और 2021 में गठबंधन सत्ता में आ रही है।” जन ने बताया कि वे खुद भी बेरोजगारी की मार को झेल रहे हैं, और कालेज स्तर की शिक्षा के बावजूद वे बच्चों को एक प्राइवेट ट्यूटर के तौर पर पढ़ाने का काम कर रहे हैं। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

https://www.newsclick.in/massive-brigade-rally-bengal-assembly-election-left-alliance

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