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मुबारक़ हो बीजेपी! आपकी चाल सफ़ल हो रही है
पिछले पाँच साल की बीजपी की सरकार जो कि ज़ाहिरी तौर पर एक हिंदुवादी संगठन का व्यापक रूप लगता है, ने देश में मुसलमानों के प्रति इस नफ़रत को ज़ोर शोर से बढ़ाने का काम किया है। यही वजह है कि गुरुवार को गुड़गाँव में हुई घटना दुर्भाग्यवश हमें हैरान नहीं करती है।
सत्यम् तिवारी
23 Mar 2019
मुबारक़ हो बीजेपी! आपकी चाल सफ़ल हो रही है
Image Courtesy: Social Media

अंग्रेज़ों ने जो 'डिवाइड एंड रूल' के तहत पहले देश में हिन्दू-मुसलमानों को बांटा था, और फिर जो देश का बंटवारा किया था, उस नफ़रत की जड़ें ही नहीं, बल्कि पूरे के पूरे पेड़ आज भी भारत में मौजूद हैं, और दिन ब दिन उन पेड़ों को और बड़ा किया जा रहा है। पिछले पाँच साल की बीजपी की सरकार जो कि ज़ाहिरी तौर पर एक हिंदुवादी सनगठन का व्यापक रूप है, ने देश में मुसलमानों के प्रति इस नफ़रत को ज़ोर शोर से बढ़ाने का काम किया है। यही वजह है कि गुरुवार को गुड़गाँव में हुई घटना दुर्भाग्यवश हमें हैरान नहीं करती है। बल्कि इस तरह की घटनाएँ हमारे लिए एक "नॉर्मल" घटना के रूप में सामने आती हैं।

बता दिया जाए कि गुरुवार को गुड़गाँव के धमसपुर गाँव में एक मुस्लिम परिवार पर क़रीब 25 युवकों ने हमला किया। परिवार के बच्चों को डंडों से और रोड से मारा गया और "पाकिस्तान जा कर खेलो" की बात कही गई। ये हमला तब हुआ जब छह साल से गुड़गाँव में रह रहे मुहम्मद साजिद के छह बच्चों और उनका भतीजा दिलशाद घर के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। दिलशाद ने पुलिस को बताया कि जब वो और उसके भाई क्रिकेट खेल रहे थे, 2 बाइकसवार आए और उन्हें चिल्ला कर "यहाँ क्या कर रहे हो, पाकिस्तान जा कर खेलो" कहा। जब मुहम्मद साजिद बीच में आए तो एक बाइकसवार ने उन्हें थप्पड़ मारा। इसके बाद सब घर कि तरफ़ भागे जिसके बाद क़रीब 25 लोग बाइक पर और पैदल भाले, लाठी और तलवार ले कर आए और आदमियों को घर से बाहर निकालने के लिए कहने लगे। जब कोई बाहर नहीं गया तो सब अंदर आए और बच्चों को, दिलशाद को मुहम्मद साजिद को घर से बाहर निकाला और उन्हें मारने लगे। घर की महिलाओं को ऊपर भेज दिया गया था, जहाँ से एक लड़की ने इस हमले का विडियो बनाया जो कि सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। ये भी बताया गया है कि हमलावरों ने घर के पुरुषों को मारा, घर पे हमला किया और क़ीमती सामान चुरा कर भाग गए। 
हालांकि इस पूरे मामले पर गुड़गाँव पुलिस के प्रवक्ता सुभाष बोकन ने वही बात कही है जो हर धार्मिक हमले के बाद बोली जाती है। उन्होंने कहा कि ये लड़ाई क्रिकेट खेलने की जगह को ले कर हुई थी और इस मामले का कोई धार्मिक पहलू नहीं है। अगर इस बयान की बात करें तो हमें अख्लाक़, पहलू ख़ान, जुनैद समेत उन तमाम धार्मिक हिंसा की घटनाओं की याद आती है जिनके बारे में भी ठीक यही बात कही गई थी, लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही थी। 

जब इस घटना को एक 'नॉर्मल' घटना कहते हैं तो हम पिछले पाँच साल में देश भर हुई धार्मिक हत्याओं, हिंसाओं का हवाला देते हुए ये बात कहते हैं। हिंदुवादी मोदी सरकार के आने के बाद से इस तरह की घटनाओं में तेज़ी से एक उछाल आया है जिसकी वजह साफ़ तौर पर बीजपी का और बीजपी के नेताओं-मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों का मुस्लिम विरोधी नज़रिया है। इतिहास को देखें तो ये भी एक सच है कि 2014 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश बीजेपी की जीत की बड़ी वजह 2013 में हुए मुजफ़्फ़रनगर दंगे थे, जिन्हें भड़काने का काम बीजेपी के तमाम नेताओं ने अपने भाषणों के ज़रिये किया था। बीजेपी का ये मुस्लिम विरोधी रवैया नया नहीं है और उसके गठन के समय से ही चला आ रहा है। 1992 का बाबरी विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे बीजेपी की मुस्लिमों के प्रति नफ़रत के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जिनमें सीधे तौर पर या एक माध्यम के तौर पर बीजेपी के तमाम नेताओं का हाथ था। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों पर इन हमलों का फ़ॉर्म बादल गया है। अब ये हमले छोटे-छोटे स्तर पर हो रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या कहीं ज़्यादा है और अब ये काफ़ी मुखरता से हर त्योहार पर देखने को मिलते हैं। त्योहारों, गणतन्त्र दिवस पर हिंदुवादी संगठनों द्वारा धर्म के देश के नाम पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की घटनाएँ अब आम तौर पर हो रही हैं। दादरी, उना, फ़रीदाबाद, राजसमंद और ना जाने कितनी ही जगहों पर इस तरह की घटनाएँ हुई हैं, और लगातार हो रही हैं। 2017 तक के आंकड़ों को देखा जाए तो पता चलता है कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद यानी 2014 के बाद से धार्मिक हिंसा में 28% बढ़ोत्तरी हुई है। इन चार सालों में धार्मिक हिंसा के 3000 मामले सामने आए हैं, जिनमें क़रीब 400 लोगों की मौत हुई है और 9000 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। 

"पाकिस्तान चले जाओ" 
जैसा कि गुड़गाँव की घटना में हुआ है, मुस्लिमों को पाकिस्तान चले जाने की बात करना कोई नया नहीं है। देखा गया है कि बीजेपी के नेताओं द्वारा लगातार मुसलमानों को, बुद्धिजीवियों को पाकिस्तान चले जाने की बात कही गई है। ये बात शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं से भी कही गई है। ये आम बोलचाल की भाषा में तो बाद में आया है, इसकी शुरुआत हुई है नेताओं ने, जिन्होंने पिछले पाँच साल में टीवी की डिबेट में बैठ कर लगातार मुस्लिम विरोधी बातें की हैं। कई चैनल जो कि पाँच साल से हिन्दू-मुस्लिम डिबेट के नाम पार देश में मुस्लिम विरोधी विचारधारा को ज़ोर-शोर से बढ़ाने का काम कर रहे हैं, वो भी इसकी बड़ी वजह साबित होते हैं। बीजेपी के प्रवक्ताओं द्वारा, विपक्ष को बेशर्मी से "मौलाना" "कठमुल्ले" कहना, इन बहसों में आम तौर पर देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा की कोई भी डिबेट देखी जा सकती है। इसके अलावा पिछले पाँच सालों में बीजेपी के तमाम नेताओं जैसे साक्षी महाराज, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, हरी ओम पांडे आदि ने लगातार अपने भाषणों में पाकिस्तान विरोधी बातों के नाम पर मुस्लिम विरोधी बातें की हैं। 

नेता आम जनता को बरगलाने का काम कर रहे हैं 
ये एक सच है कि दंगे, लिंचिंग कोई भी नेता ख़ुद नहीं करता है। राजनीतिक फ़ायदों के लिए ही इस तरह की बहसों को आम जनता तक पहुँचाया जाता है। और अंत में एक नेता के समर्थन में, एक धर्म के समर्थन में, एक समुदाय के समर्थन में या किसी धर्म, समुदाय के विरोध में आम जनता इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने का काम करती है। इसका सबसे बड़ा पहलू ये है कि मरने वाला और मारने वाला एक आम इंसान होता है। ज़ाहिर बात है कि इन आम से दिखने वाले इन्सानों का किसी राजनीतिक दल से लेना-देना होता ही है। ये भी देखा गया है धार्मिक या राजनीतिक संगठन इस तरह कि हिंसा को बढ़ाने के लिए आम जनता को बरगलाने का काम करते ही रहते हैं। हालांकि मारने वाले का कोई सीधे तौर राजनीतिक फ़ायदा नहीं होता, ये हत्याएँ बस एक जुनून का सबब होती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण राजसमंद, राजस्थान की घटना है जिसमें शंभुलाल नाम के एक आदमी ने मुहम्मद अफ़रज़ुल को ज़िंदा जला दिया था, जिसकी वजह तथाकथित "लव जिहाद" था। 
नेताओं को ज़ाहिर तौर पर ये घटनाएँ अपनी राजनीतिक उपलब्धि लगती होंगी, लेकिन सच ये है कि नेताओं के भाषण, बयान, और उनके द्वारा फैलाई जा रही इस नफ़रत की राजनीति ने ही आज आम से दिखने वाले, हमारे बीच में रहने वाले लोगों को हत्यारा, दंगाई बना दिया है। देखने वाली बात ये भी है कि जो नेता पिछले पाँच साल तक टीवी बहसों में इस तरह की नफ़रत फैला कर मशहूर हुए हैं, वो आगामी लोकसभा चुनाव में सीटों से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। आप ख़ुद ही सोच सकते हैं कि धार्मिक राजनीति करने वालों को धर्म से कितना सरोकार है। 

हमें ये समझने की ज़रूरत है कि किस तरह से हर बड़े-छोटे स्तर राजनीतिक दल, धार्मिक दल, धार्मिक संगठन आम लोगों को अपने हथियार की तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं। और धार्मिक उन्माद फैला कर वही काम कर रहे हैं जो कि दशकों पहले अंग्रेज़ों ने किया था। 

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