NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
विशेषज्ञों के मुताबिक़ कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति अपने कगार पर है
जम्मू-कश्मीर में तनाव से मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका बड़ा कारण साल 2019 में हटाई गई धारा 370 को मुख्य माना जा रहा है, खुद को कैदी जैसा महसूस कर रहे जम्मू-कश्मीर के लोगों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है...
सुहैल भट्ट
27 Dec 2021
kashmir jammu
प्रतीकात्मक चित्र

कश्मीर बेहद चिंताजनक मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है क्योंकि पिछले दो वर्षों से आत्महत्याओं की दर में भारी बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। विशेषज्ञों का दावा है कि निरंतर राजनैतिक अनिश्चितता और अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के दुष्प्रभाव ने लोगों की मानसिक स्थिति पर भारी असर डाला है।

माना जा रहा है कि कश्मीर के लोगों की मानसिक स्थिति पर तब ज्यादा असर पड़ना शुरू हुआ जब भाजपा की सरकार ने 2019 में जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य वाले दर्जे को रद्द कर दिया और दो केंद्र शाषित भागों में बांट दिया। इस फैसले के साथ ही कई महीनों तक संचार माध्यमों को प्रतिबंधित कर दिया गया था, और लोगों की आवाजाही भी काफी हद तक प्रतिबंधित थी, जिससे लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर काफी भारी दबाव पड़ा। इस प्रभाव को 2020 के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के निष्कर्षों में देखा जा सकता है, जो साल भर में 284 आत्महत्याओं के साथ 13.9% की वृद्धि का संकेत देता है। तब से इस ग्राफ में बढोत्तरी की ही प्रवत्ति बनी हुई है।

न्यूज़क्लिक ने एक आत्महत्या के प्रयास से उबरने वाली महिला से बातचीत की, जिसने श्रीनगर में एक पुल से कूदकर अपनी जान देने की कोशिश की थी। उसका कहना था, “जब मैं पुल से कूदने की कोशिश कर रही थी, तो उस दौरान पुलिस ने मेरी जान बचाई।”

बेहद निराशाजनक एवं अंतहीन पीड़ा ने 29 वर्षीया सना (बदला हुआ नाम) को अपनी इहलीला समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। पुलिस द्वारा उसके पति को 2019 में गिरफ्तार किये जाने के बाद, जो पेशे से ड्राईवर हैं, जब वे पंजाब से कश्मीर लौट रहे थे, के बाद से उसके पास आय का कोई साधन नहीं रह गया था।

सना कहती हैं, “मुझे नहीं पता कि उन्हें किस वजह से गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे पास उनसे मिलने के लिए जेल जाने की स्थिति नहीं थी। उसने बताया कि उसके बाद से, “हर गुजरते दिन के साथ जिंदगी बद से बदतर होती चली गई। मेरे ससुराल वालों ने मेरी 2 साल की बेटी के साथ मुझे घर से निकाल दिया था। मेरे भाइयों ने भी मुझे स्वीकार करने से इंकार कर दिया, जिसके कारण मुझे किराए पर घर लेकर अकेले रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।” उसे किराया चुकाने और अपनी बच्ची का पेट भरने के लिए बेहद जद्दोजहद से गुजरना पड़ा।

न्यूज़क्लिक के साथ अपनी बातचीत में उसने बताया, “कुछ दिनों तक तो मैंने लोगों से पैसे उधार लेकर काम चलाया। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने भी पीठ दिखा दी, और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पाई और मैंने आत्महत्या की कोशिश की।”

हालांकि, इसके बाद कुछ लोगों के आगे आने और पैसे दान करने के बाद उसकी जिंदगी में कुछ बदलाव आया। वह कहती हैं, “मैं अब अपने पति की रिहाई के लिए वकील रख सकती हूँ या कम से कम जेल में जाकर उनसे मुलाक़ात कर सकने में सक्षम हूं। मैं उसे अपनी बेटी दिखा सकती हूं।”

जिंदगी की राह अभी भी उसके लिए मुश्किल भरी है, लेकिन अब उसने इससे निपटना सीख लिया है। उनका कहना है, “मैं अपने पिता के साथ किराये के मकान में रह रही हूं। हालात अभी भी खराब हैं, लेकिन अब मुझमें उनसे लड़ने का हौसला है। लोगों की मदद से मेरी मानसिकता में बदलाव आया है। किसी को भी इस तरह का कदम नहीं उठाना चाहिए।”

मानसिक स्वास्थ्य डाक्टरों के अनुसार, कश्मीर में आत्महत्याओं की दर में जिस प्रकार की वृद्धि हुई है वह आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक या अनिश्चित राजनीतिक परिदृश्य के बारे में अंतर्निहित चिंताओं की वजह से है, जो कि एक खतरनाक स्थिति का संकेत बयां करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च मानसिक विकार संघर्ष के क्षेत्रों में आत्महत्या की दर में अपना योगदान करते हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर आघात के शारीरिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित होने के कारण अनदेखा कर दिया जाता है।

एक प्रमुख मनोचिकित्सक शेख शोइब ने न्यूज़क्लिक को बताया, “पिछले तीन दशकों से हम घाटी में काफी तकलीफों के बीच से गुजरे हैं। हाल के वर्षों में संचार पर प्रतिबंधों, लॉकडाउन और स्कूलों के बंद होने से यहां के लोगों पर भारी मनोवैज्ञानिक असर पड़ा है।”

डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स द्वारा 2015 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, तकरीबन 15 लाख कश्मीरी मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। इमहंस और एक्शन ऐड के अनुमानों के मुतबिक, 2016 में कुल आबादी का 11.3% हिस्सा मानसिक रोगों से ग्रस्त था।

शोइब का कहना था, “मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो, आत्महत्या के जरिए ही ज्यादातर लोगों की मौत हुई है। यह एक अन्तर्निहित मानसिक स्वास्थ्य की दशा लक्षण है। अध्ययन के मुतबिक, आत्महत्या का प्रयास करने वाले या आत्महत्या के चलते मरने वाले 90% लोगों में अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं पाई जाती हैं।”

विशेषज्ञों का मानना है कि घाटी क्षेत्र पिछले दो सालों से लगातार दो लॉकडाउन के संयुक्त प्रभाव से पीड़ित है। कश्मीर चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के अनुसार, अनुच्छेद 370 को निरस्त किये जाते वक्त लगाये गये लॉकडाउन की वजह से लगभग 4,000 नौकरियों का नुकसान हुआ था। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के अनुसार, कोविड-19 ने व्यवसायिक क्षेत्र को पूरी तरह से तबाह कर डाला है, जिसके चलते समग्र बेरोजगारी दर 22% से उपर जा चुकी है, जो कि राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 7.1% से कई गुना अधिक है।

कश्मीर चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष, शेख़ आशिक ने न्यूज़क्लिक को बताया, “बेरोजागारी वर्तमान में अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, क्योंकि पिछले तीन वर्षों से इस क्षेत्र में काम-धंधे अपने वजूद को बचाए रखने की स्थिति पर पहुंच चुके हैं, जिसके चलते बेरोजगारी अपने चरम पर है। रोजगार में वृद्धि तभी संभव है जब निजी क्षेत्र पूरी तरह से चालू स्थिति में पहुंच जाए। व्यवसायिकों की बैलेंस शीट से पता चलता है कि चीजें ठीक दिशा में नहीं जा रही हैं।”

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि और भी कड़े कानूनों की जरूरत है और दवा वितरण नियमों को सख्ती से लागू किये जाने से इस प्रकार की घटनाओं की संख्या को कम करने में मदद मिल सकती है।

एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर, जो अपनी पहचान को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे, ने कहा, “कई तनावों के पीछे की एक बड़ी वजह गरीबी रही है, और कुछ स्थितियों में इसकी वजह से आत्महत्याएं भी हुई हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि अनिश्चित भविष्य को देखते हुए किशोरों में, विशेषकर छात्रों के बीच में बेहद तनाव की स्थिति बनी हुई है। कोविड-19 के परिणामस्वरूप ऐसा हुआ है, इसमें संदेह है। लोग अपनी नौकरियां खोते जा रहे हैं, बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, और विश्वविद्यालय अपने दरवाजे बंद कर रहे हैं। किशोरों में हमें आत्मघाती व्यवहार देखने को मिल रहा है, जैसे जानबूझकर खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति। तनाव से छुटकारा पाने के लिए वे खुद को काट देते हैं। तनाव से निपटने का यह खराब तरीका है, जो कि नशीली दवाओं के इस्तेमाल के समान है।”

आत्महत्या और मादक द्रव्यों के सेवन का आपस में अटूट संबंध है

मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. यासिर राथेर के मुताबिक, “यदि आप मुझसे आत्महत्या में किसी दो कारकों के योगदान के बारे में पूछेंगे, तो मेरा जवाब होगा मादक द्रव्यों का सेवन और गंभीर अवसाद।” उनका दावा है कि मादक पदार्थों की लत के आंकड़े बेहद ग़मगीन तस्वीर को दर्शाते हैं। उन्होंने विस्तार से इस बारे में बताया कि वे ओपीडी में हर रोज कम से कम 50-60 नशे के आदी रोगियों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं से दो चार होते देखते हैं। इनमें से 90% हेरोइन लेते हैं और उनमें से अधिकांश नशों में (इंट्रावेनस) इंजेक्शन (आईवी) लेते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों के दौरान मादक द्रव्यों के सेवन का उपचार चाहने वाले मरीजों की संख्या में 1,500% से अधिक की वृद्धि हुई है। 2016 में इमहंस को जहाँ 489 नशे का इस्तेमाल करने वालों की सूचना प्राप्त हुई थी; 2019 में यह संख्या बढ़कर 7,420 पहुँच गई थी। कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से 2020 में यह संख्या घटकर 3,536 तक सिमट गई थी।

इसी प्रकार से इमाहंस में इस बीच नशीले पदार्थ प्रतिस्थापन उपचार (ओएसटी) पंजीकरण में भी आश्चर्यजनक वृद्धि देखी गई है। 2012 से 2015 के बीच में जहाँ उपचार के लिए अनुरोध करने वाले 139 मरीज थे, जो 2016 से 2019 के बीच बढ़कर 309 हो चुके हैं। हालांकि इस बीच इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, 2020 में 495 मरीजों ने इमहंस नशामुक्ति केंद्र में खुद को दर्ज कराया था, जो कि इस वर्ष के सिर्फ पहले पांच महीने में बढ़कर 500 हो चुकी है।

2016 से 2019 के बीच आये 309 मरीजों में से 47% से अधिक लोग शहरी क्षेत्रों से थे, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले 52% से उपर थे।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी केंद्रीकृत और तृतीयक संस्थानों तक ही सीमित हैं, क्योंकि अभी भी कश्मीर में मनोचिकित्सकों, क्लिनिकल मनोवैज्ञानिकों एवं मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं जैसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बेहद कमी बनी हुई है।

एक डॉक्टर ने इस बारे में बताया, “हालाँकि हम अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर काम कर रहे हैं, लेकिन मनोचिकित्सक सिर्फ जिला अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं, जो कि पर्याप्त नहीं हैं। हमें नैदानिक मनोवैज्ञानिकों, मानसिक स्वास्थ्य सामजिक कर्मियों, मनोचिकित्सकों और सामुदायिक सलाहकार जैसी अतिरिक्त पराचिकित्सा सेवाओं की भी आवश्यकता है।”

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी काम किये जाने की जरूरत को स्वीकारते हुए कश्मीर में स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, मुश्ताक अहमद ने इस मुद्दे से निपटने के लिए कई कदम उठाये जाने का दावा किया है।

उनका कहना था कि, “मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहला कदम मातहत डाक्टरों को प्रशिक्षित करना था, जो मेरी समझ में आगे चलकर काफी योगदान देगा। एक बार उन्हें इसके प्रति संवेदित बना देने के बाद, वे इसमें भारी मदद कर सकते हैं। समस्या पर यदि केवल चर्चा भी की जाती है तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है। कोई भी व्यक्ति सलाहकार हो सकता है।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

Mental Health is on the Brink in Kashmir, say Experts

Mental health
COVID-19
Kashmir
Article-370
lockdowns
Suicide Rates

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी


बाकी खबरें

  •  Punjab security lapse
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब में पीएम की "सुरक्षा चूक" पर पूरी पड़ताल!
    06 Jan 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे में आज अभिसार शर्मा चर्चा कर रहे प्रधानमंत्री के पंजाब दौरे की। साथ ही वे नज़र डाल रहे हैं कि किस तरह मीडिया द्वारा किसानों को टारगेट किया जा रहा है
  • fact check
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेक : संबित ने जर्जर स्कूलों को सपा सरकार का बताया, स्कूल योगी सरकार के निकले
    06 Jan 2022
    एक बार फिर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने ट्विटर पर फ़ेक न्यूज़ के ज़रिये विपक्ष पर निशाना साधने की कोशिश की है।
  • jnu
    रवि कौशल
    जेएनयू हिंसा के दो साल : नाराज़ पीड़ितों को अब भी है न्याय का इंतज़ार 
    06 Jan 2022
    ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की जांच भटक चुकी है। अब तक दोषियों की पहचान तक नहीं की जा सकी है।
  • punjab security
    शंभूनाथ शुक्ल
    'सुरक्षा चूक' की आड़ में राजनीतिक स्टंट?
    06 Jan 2022
    प्रधानमंत्री को एयरपोर्ट में पंजाब के अधिकारियों को दिए बयान से बचना चाहिए था। और जो कुछ करना था, वह सीधे गृह मंत्रालय के आला अधिकारी करते तो भविष्य में ऐसी किसी भी चूक से प्रशासन सतर्क रहते। तथा…
  • election
    सौरभ शर्मा
    यूपी: युवाओं को रोजगार मुहैय्या कराने के राज्य सरकार के दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं!
    06 Jan 2022
    लगभग 43 उम्मीदवारो को उत्तर प्रदेश में पिछले साल विभिन्न चिकित्सा विभागों द्वारा विभिन्न कोरोना लहरों के दौरान में रोजगार पर रखा गया था। बाद में इन्हें काम से मुक्त कर दिया गया। उन्होंने इस कदम के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License