NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
इस वर्ष का प्रवासी संकट: ‘हाथ में कोई काम नहीं, पैसा नहीं, भोजन नहीं...सिर्फ बढ़ती चिंता’
पिछले साल के विपरीत इस साल 5 किलो अनाज के अलावा, इन श्रमिकों को किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष राहत उपाय अभी तक केंद्र की तरफ से घोषित नहीं किया गया है, जिन्हें कोविड-19 के एक बार फिर से उभार के बीच खुद के हाल पर छोड़ दिया गया है।
रौनक छाबड़ा
08 May 2021
प्रवासी
चित्र साभार: बिज़नेस स्टैण्डर्ड 

“इन दिनों, मैं डरा हुआ हूँ। हमेशा डर लगा रहता है।”

ये सज्जन मिथुन कुमार थे, जो कि बिहार के खगड़िया से फोन पर तनावपूर्ण आवाज में बात कर रहे थे। कोविड-19 मामलों में दोबारा से उभार के बीच एक और लॉकडाउन से खौफजदा इस 26 वर्षीय युवक ने अप्रैल के मध्य में हरियाणा के ऑटोमोटिव हब मानेसर से पलायन कर लिया था। 

इस महीने जब हरियाणा सरकार ने सारे राज्य में एक सप्ताह के लिए लॉकडाउन घोषित कर दिया तो अधिकांश औद्योगिक गतिविधियों पर अचानक से रोक लग गई, तो ऐसे में कुमार की आशंकाएं सच साबित हो गईं। लेकिन पिछले साल की तकलीफों की तुलना में उन्हें इस साल राहत महसूस हुई, क्योंकि पिछले वर्ष लाखों की संख्या में प्रवासी श्रमिक पैसे, रोजगार और भोजन के बगैर फंसे हुए थे।

लेकिन कुमार का “अपने परिवार के साथ” “सुरक्षित” होने का भ्रम, जैसा कि वे इसका वर्णन कर रहे थे, वह कुछ ज्यादा दिन नहीं टिक पाया। चार लोगों के उनके परिवार में – उनकी पत्नी, दो बच्चे और माँ के बीच में वे ही एकमात्र कमाने वाले थे। अब उनके पास कोई काम नहीं है और जो थोड़ी बचत भी थी, वह “लंबे समय के लिए” नाकाफी है।

कुमार, जो कि मानेसर के एक ऑटोमोटिव पार्ट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, जिसका नाम उन्होंने नहीं बताया, में ठेका श्रमिक के तौर पर कार्यरत थे, ने बताया “मुझे नहीं मालूम कि मुझे अप्रैल की तनख्वाह मिलेगी या नहीं – कम से कम उतने दिनों की जितने दिन मैंने काम किया था। कंपनी ने मुझे अभी तक उसका भुगतान नहीं किया है और आगे के महीनों की कुछ भी रकम मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।”

यह सब पिछले साल वाली स्थिति की पुनरावृत्ति की ही तरह है, जब 25 मार्च को कोविड-19 मामलों में उछाल के मद्देनजर अचानक से राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू कर दी गई थी। उस आघात से गुजरने के बाद कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कुमार और उनके जैसे कई अन्य लोग, जिनमें से अधिकतर प्रवासी हैं, संक्रमण की दूसरी लहर के बीच “डरे हुए” हैं। फ़िलवक्त सिर्फ “स्थानीय स्तर पर” ही तालाबंदी जैसे उपाय अपनाए गए हैं।  

हरियाणा स्थित ट्रेड यूनियन, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन (एआईसीडब्ल्यूयू) के श्याम भी इसकी पुष्टि करते हैं। इसके साथ जोड़ते हुए उनका कहना है कि गुरुग्राम जैसे शहरों में रेलवे स्टेशनों और अंतर-राज्यीय बस टर्मिनल्स में अप्रैल की शुरुआत से ही अपने-अपने घरों की ओर जाते प्रवासियों की भीड़ लगी हुई है।

श्याम इसकी मुख्य वजह प्रवासी श्रमिकों को बताते हैं। उनका कहना था कि उनके लिए यह तय कर पाना बेहद “कठिन” है कि पिछले महीने की पूरी मजदूरी का भुगतान किया जायेगा या नहीं। जब न्यूज़क्लिक ने शुक्रवार को उनसे बातचीत की थी तो श्याम खुद कोविड जैसे लक्षणों के साथ बीमार पड़े थे।

द स्ट्रैंडेड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान), एक स्वयंसेवी समूह जो कि पिछले साल लॉकडाउन से उत्पन्न प्रवासी संकट के प्रतिउत्तर में सक्रिय हुई थी, ने बुधवार को एक विज्ञप्ति में कहा कि इस वर्ष भटकती श्रमिक आबादी को सहायता पहुँचाने के अपने काम को दोबारा शुरू करते हुए उन्होंने पाया है कि, 68% श्रमिकों को अप्रैल माह की पूर्ण या आंशिक मजदूरी प्राप्त हुई है। स्वान के अनुसार सिर्फ 18% ने बताया है कि जबसे “काम अवरुद्ध है” तबसे उनके नियोक्ताओं से उन्हें कोई भुगतान नहीं किया गया है।

समूह के वालंटियर्स ने जिन श्रमिकों से बातचीत की उनमें से करीब 81% ने सूचित किया है कि “स्थानीय स्तर पर घोषित लॉकडाउन” के कारण औसतन “19 दिनों के लिए” उनका दैनिक कार्य “ठप पड़ गया” है। पिछले दो सप्ताह से करीब 150 प्रवासी परिवारों के साथ बातचीत के आधार पर इस विज्ञप्ति को जारी किया गया है।

इन श्रमिकों में से अधिकांश दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में थे। उपरोक्त सभी राज्यों में वर्तमान में लॉकडाउन जैसे उपाय अपनाए गए हैं।

स्वान के वालंटियर्स में से एक 21 वर्षीय ज़िल गाला, जो कि 21 अप्रैल के बाद से ही संकट में घिरे लोगों के फोन काल्स उठा रही हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार प्रवासी श्रमिकों के बीच में कहीं ज्यादा “चिंता” देखने को मिल रही है।

उनका कहना था कि “पिछले साल, सब कुछ अचानक से हो गया था – एक अल्पावधि के नोटिस पर लोगों के आवागमन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। कारखानों को अचानक से बंद कर दिया गया था और श्रमिकों ने खुद को बिना किसी सहायता के संकट में फंसा पाया। लेकिन इस बार संकट कहीं अधिक गहन चरित्र लिए हुए है।”

कुछ इसी प्रकार की राय को दिल्ली-एनसीआर स्थित ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, छात्रों और श्रमिकों के देशव्यापी नेटवर्क, माइग्रेंटस वर्कर्स सॉलिडेरिटी नेटवर्क (एमडब्ल्यूएसएन) की शौर्या मजूमदार ने भी साझा किया। हाल ही में इस समूह ने पिछले साल की तरह ही प्रवासी श्रमिकों के लिए अपनी हेल्पलाइन को एक बार फिर से शुरू कर दिया है, जब यह देश भर में “प्रवासी श्रमिकों के प्रतिरोध” का लेखाजोखा रखने में लगा हुआ था। 

मजूमदार के अनुसार “वायरस की इस दूसरी लहर में प्रवासी श्रमिकों को पूरी तरह से खुद के भरोसे आश्रित रहने के लिए छोड़ दिया गया है।” इस बार सरकारों द्वारा कोई सक्रिय पहल नहीं ली गई है। हालाँकि सरकार ने पिछले साल की तरह इस बार भी 5 किलो अतिरिक्त अनाज देने की घोषणा की है, लेकिन मजूमदार का कहना है कि दीर्घ काल के लिए इस प्रकार के उपायों से “कुछ ख़ास राहत” नहीं मिलने जा रही है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार ने काफी विलंब के बाद पिछले साल प्रवासियों के संकट को कम करने के उद्येश्य से कई घोषणाएं की थीं। इनमें अन्य के साथ सीमित अवधि के लिए मुफ्त राशन योजना (जिसे इस वर्ष भी घोषित किया गया है) एवं श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की घोषणा की गई थी। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार की ओर से वन नेशन, वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) योजना की शुरुआत के साथ-साथ  छंटनी और वेतन में कटौती के खिलाफ “एडवाइजरी” भी जारी की गई थी। 

लेकिन इस साल कुछ नकद सहायता की बढती मांग के बावजूद अभी तक 5 किलो राशन के आवंटन के सिवाय कोई भी महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा नहीं की गई है। ओएनओआरसी भी कथित तौर पर एक “मृगमरीचिका” ही बनी हुई है।

मजूमदार ने बताया “जिस पैमाने पर यह संकट बना हुआ है, उसे देखते हुए इस प्रकार की घोषणाएं किस प्रकार से बेहद नाकाफी हैं, इसे भलीभांति सूचीबद्ध किया गया है। लेकिन पिछले साल कम से कम केंद्र को कुछ वादों को पूरा नहीं कर पाने के लिए जवाबदेह तो ठहराया जा सका था।”

मजूमदार और गाला दोनों का ही कहना था कि पिछले साल की तरह ही इस बार भी प्रवासी श्रमिकों की ओर से एसओएस कॉल्स आ रही हैं, जिसमें उनकी ओर से और अधिक सूखे राशन, आय राहत, और यात्रा की व्यवस्था को लेकर मांग की जा रही हैं। मजूमदार का कहना था कि “पिछले साल की तुलना में इस साल हमें मेडिकल आपूर्ति की अपेक्षाकृत ज्यादा मांग आ रही हैं, जो कि इस बार प्रवासियों के बीच में संक्रमण के व्यापक स्तर पर प्रसार में तब्दील होकर बेहद चिंताजनक स्थिति को बयां कर रही है।”

हालाँकि, हरि कुमार सिंह के लिए संक्रमित हो जाना कोई बड़े खतरे वाली बात नहीं है, क्योंकि वे अन्य लोगों के विपरीत अपनी “नियमित ड्यूटी” को बचा पाने के मामले में खुशकिस्मत रहे हैं। बिहार के नालंदा जिले के 32 वर्षीय हरि, इस समय मानेसर में एक प्राइवेट सिक्यूरिटी सर्विसेज में सिक्यूरिटी गार्ड के तौर पर कार्यरत हैं।

शुक्रवार को न्यूज़क्लिक से अपनी बातचीत में सिंह ने बताया कि मानेसर में शिकोहपुर गाँव में उनके आवासीय भवन में अधिकांश साथी श्रमिक अपने घरों के लिए पलायन कर गए हैं। “वे क्यों नहीं जाते” पूछते हुए वे कहते हैं “पिछले एक महीने से यहाँ रसोई गैस की कीमतें और सब्जियां महँगी हो चुकी हैं।”

लॉकडाउन की वजह से दैनिक आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने सिंह की मुश्किलों को सिर्फ घनीभूत करने का ही काम किया है, जिनकी जिंदगी सिर्फ अपने अस्तित्व को ही बचा पाने तक सीमित हो चुकी है। उनकी दुर्दशा इस हद तक बढ़ चुकी है कि वे अपने तीन लोगों के परिवार के साथ “स्थायी तौर पर” अपने गाँव वापस जाने पर विचार कर रहे हैं।

उनका कहना था “यहाँ पर रहकर कोई बचत नहीं हो पा रही है। पिछली बार तो मैं और मेरा परिवार किसी तरह गुजारा चलाने में कामयाब रहे, लेकिन हर साल किसी का इम्तिहान नहीं लिया जा सकता। यदि चीजें इसी प्रकार बनी रहीं, तो खुद का अस्तित्व बचाए रख पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।”

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Migrant Distress This Year: ‘No Work, No Money, No Food…More Anxiety’

COVID-19
Haryana
Manesar
Automobile Industry Contract Workers Union
Stranded Workers Action Network
Migrants Worker Solidarity Network
Delhi
Uttar pradesh

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • International Women's Day
    सोनिया यादव
    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं के संघर्ष और बेहतर कल की उम्मीद
    08 Mar 2022
    श्रम आंदोलन से उपजे इस आयोजन के केंद्र में प्रदर्शन की अहमियत रही है, लिहाज़ा आज महिलाओं के संघर्ष ने एक लंबा सफ़र तय किया है और इसमें उनका अपने ह़क़ और हुक़ूक के लिए आवाज़ बुलंद करना, सड़कों पर धरने…
  • School teachers
    पीपुल्स डिस्पैच
    हंगरी: देशभर के स्कूल शिक्षकों ने बड़े विरोध प्रदर्शन के लिए कसी कमर
    08 Mar 2022
    विक्टर ओरबान की अगुवाई वाली हंगरी की रूढ़िवादी सरकार कोविड-19 संकट का हवाला देते हुए स्कूलों में अनिवार्य शिक्षण सेवाओं को लेकर एक विशेष फ़रमान जारी करते हुए शिक्षकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने की…
  • Atoms for Peace
    एम. के. भद्रकुमार
    ईरान पर विएना वार्ता गंभीर मोड़ पर 
    08 Mar 2022
    ईरान उन देशों में से एक है जिसमें अमेरिका के "डॉलर रूपी हथियार" का मुकाबला करने के लिए "परमाणु रूपी हथियार" का सहारा लेने की कई संभावनाएं मौजूद हैं।
  • women's day
    राज वाल्मीकि
    दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल
    08 Mar 2022
    यदि हमारे भारतीय समाज से लैंगिक-ग़ैर बराबरी और जातिवाद का ख़ात्मा हो जाए, जो कि वैज्ञानिक शिक्षा से संभव है, तभी इस देश की दलित और आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार समाप्त हो सकेगा।
  • कुमुदिनी पति
    महिला दिवस विशेष : लड़ना होगा महिला अधिकारों और विश्व शांति के लिए
    08 Mar 2022
    अंतराष्ट्रीय महिला दिवस एक औपचारिकता मात्र न बन कर रह जाए इसके लिए औरतों को लगातार सजग रहना होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License