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कोविड: मोदी सरकार के दो पर्याय—आपराधिक लापरवाही और बदइंतज़ामी
दूसरी लहर से निपटने में सरकार समाधान ढूँढते समय अनाड़ियों की तरह अंधेरे में तीर चलाती रही और जो भी समाधान पेश किए वे या तो अपर्याप्त थे या फिर उनमें काफी देर की गई।
सुबोध वर्मा
19 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
modi
फ़ोटो साभार: बिजनेस टुडे

लगभग डेढ़ महीने पहले 1 मार्च 2021 को, भारत में कोविड के 12,286 मामले दर्ज़ किए गए थे। 16 अप्रैल को नए मामलों की संख्या बढ़कर 2.34 लाख हो गई थी। छह सप्ताह में यह लगभग 20 गुना की बढ़ोतरी है। महामारी की इस दूसरी लहर की उग्रता के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। यह पिछले साल सितंबर में दर्ज किए गए रिकॉर्ड डेली मामलों के आंकड़ों से दोगुने से भी अधिक हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर न्यूज़क्लिक डेटा एनालिटिक्स टीम ने आंकड़ों की तुलना/मिलान किया है। नीचे चार्ट देखें)

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महामारी शुरू होने के बाद से आज तक मरने वालों की कुल संख्या 1.75 लाख पहुंच गई है, जबकि सक्रिय मामलों की संख्या 16 अप्रैल को लगभग 14 लाख बताई गई है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इस अप्रत्याशित संकट का बेहतर ढंग से जवाब दिया है? या जिस उत्साह से प्रधानमंत्री, उनके गृह मंत्री और विभिन्न सत्तारूढ़ पार्टी के दिग्गज पश्चिम बंगाल के उन्मादी विधानसभा चुनाव में प्रचार कर रहे हैं, इसको देख कर आप को यदि सब कुछ नियंत्रण में दिखाई पड़ता है, तो ऐसा सोचने के लिए आपको एक बार माफ किया जा सकता है।

सरकार की कारगुजारियों में कई किस्म के गलत अनुमान और शायद उभरते संकट की अनदेखी देखी जा सकती है। याद रखें कि कोविड के मामले मार्च की शुरुआत से ही खतरनाक गति से साथ बढ़ रहे थे और इसका अंदाज़ा आप ऊपर दिए गए चार्ट से लगा सकते हैं।

छह सप्ताह का समय एक लंबा समय होता है, खासकर जब आप देख पा रहे हैं कि पूरी दुनिया महामारी की नई घातक लहर का सामना कर रही है। लेकिन मोदी सरकार- जैसा कि पिछले साल हुआ था– वह बड़े ही गैर-उत्साहित ढंग से इस ताजा चुनौती का मुक़ाबला करने की तैयारी कर रही थी। यहां उनके द्वारा अपनाए कुछ ऐसे तरीको के विवरण हैं जिनमें वे भयंकर ढंग से विफल हुए हैं और जिसकी वजह से लोगों को बीमारी के जाल में धकेल दिया है।

टीके की लड़खड़ाहट

हमेशा से यह भ्रम रहा है कि टीके से कोविड संकट का समाधान हो जाएगा। कोरोनवायरस पर जीत हासिल करने या उसे काबू में लाने के लिए भारतीयों को पर्याप्त संख्या में टीकाकरण करने के लिए बड़ी मात्रा में वैक्सीन खुराकों की जरूरत थी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि डबल डोज टीकाकरण के लिए विशाल मानवशक्ति और अन्य संसाधनों की बड़ी जरूरत थी ताकि इस कार्यक्रम को हफ्तों में समाप्त किया जा सके। यह बात ध्यान रखने वाली है कि टीका वायरस के प्रभावों को कम कर सकेगा लेकिन वायरस को खत्म नहीं कर पाएगा।

बावजूद इसके मोदी सरकार ने जो कदम उठाए वे घनघोर रूप से काफी दोषपूर्ण थे। सबसे पहला दोष, मोदी सरकार ने दुनिया के विभिन्न देशों को वैक्सीन की लगभग 65 मिलियन खुराक का निर्यात किया या उपहार में दी, जिससे सरकार की उदारता की प्रशंसा की गई। अब, वही सरकार देश की जरूरत को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से टीके आयात करने की कोशिश कर रही है। इस तरह का बेतकल्लुफ़ रवैया दुनिया में कहीं भी देखा या सुना नहीं गया है।

यह रिपोर्ट किया गया है कि सरकार ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए और टिकाकरण को मजबूती प्रदान करने में एस्ट्राज़ेनेका/कोविशिल्ड वैक्सीन को लेकर बातचीत में देरी की थी। उसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) जो भारत में एस्ट्राज़ेनेका/कोविशिल्ड वैक्सीन सप्लाई करने वाली मूल कंपनी है, उसके साथ मूल्य को लेकर बातचीत काफी देरी कर दी थी। रॉयटर्स के अनुसार ऐसा लगता है कि कोविशिल्ड को भारतीय नियामकों द्वारा मंजूरी दिए जाने के दो हफ्ते बाद अंतिम खरीद का आदेश दिया गया था।

इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका ने वैक्सीन निर्माण के लिए जरूरी विभिन्न घटकों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था और इसके चलते एसआईआई को आदेशों को पूरा करने में कठिनाई आने लगी। 

रेमेडिसविर की गफ़्लत  

वाइरल के खिलाफ काम करने वाली दवाई रेमेडिसविर का इस्तेमाल कोरोनोवायरस को आंशिक रूप से मुक़ाबला करने के लिए किया जाता है क्योंकि नैदानिक अनुभव से पता चला है कि यह दवा इलाज़ में कुछ हद तक मदद करती है। दवा कोई इलाज नहीं है लेकिन उन रोगियों के लिए मददगार है जो ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत जहां इस दवा का उत्पादन स्थानीय रूप से किया जाता है  वहाँ भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसके उत्पादन की योजना  या इसके सरकारी विनियमन या निगरानी की कोई योजना नहीं थी। जैसा कि न्यूज़क्लिक ने रिपोर्ट किया था कि दवा बनाने वाली कंपनी के पास आवश्यक सामग्री खत्म हो गई थी जबकि कालाबाजारी करने वाले अनुचित लाभ कमाने के लिए इसे बाज़ार में बेच रहे थे। 

चूंकि मार्च की शुरुआत से ही मामले लगातार बढ़ रहे थे और सरकार के पास पिछले साल का अनुभव भी था इसलिए उसे हालात पर नजर रखनी चाहिए थी और पहले से अधिक उत्पादन की  योजना बनानी चाहिए थी। अब सरकार किसी तरह हालात पर काबू पाने के लिए हाथ-पांव मार रही है।

ऑक्सीज़न गड़बड़झाला 

पिछले साल ऑक्सीजन की कमी के अनुभव के बावजूद मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ावा देने की भी कोई योजना प्रभावी रूप से नहीं बनाई गई। फिर, जैसे-जैसे मामले नियंत्रण से बाहर होते गए, ऑक्सीजन भी काला बाज़ार की जरूरी चीज़ बन गई। यदपि पीएम मोदी ने कुछ दिन पहले ही ऑक्सीजन की स्थिति की समीक्षा करने के लिए एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक के बाद घोषणा की गई कि ऑक्सीजन के उत्पादन में वृद्धि की जाएगी। टैंकरों द्वारा इसके परिवहन को आसान बनाया जाएगा।  50,000 टन आयात किया जाएगा और इसी तरह की अन्य बातें भी की गईं थीं। यह सब करने की जरूरत है - लेकिन संकट के चरम पर पहुँचने के बाद ही क्यों?

जैसा कि न्यूज़क्लिक ने रिपोर्ट किया था कि मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पिछले साल के संकट के मद्देनजर एक नए ऑक्सीजन संयंत्र की स्थापना की घोषणा की थी लेकिन संयंत्र को उत्पादन शुरू करने में अभी भी वर्षों लग सकते हैं। संकटों से निपटने का एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेशन प्रोसेस) कुछ ऐसा नज़र आता है कि लोगों को आश्वस्त करने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणा करो और जब मामला शांत हो जाए तो फिर से आप अपने ’धंधे में व्यस्त’ हो जाओ।

बोर्ड इम्तिहान का झमेला 

कक्षा 10 और 12 की परीक्षाएं, जो मुख्य रूप से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और विभिन्न राज्य बोर्डों द्वारा आयोजित की जाती हैं, वे इस साल 4 मई से शुरू होनी थीं। ये सभी परीक्षाएँ काफी महत्वपूर्ण होती हैं। विशेष रूप से कक्षा 12वीं, जो छात्रों का करिअर और आगे की ज़िंदगी तय करती है।

7 अप्रैल को प्रधानमनमंत्री मोदी ने वर्चुअल ढंग से ‘परिक्षा पर चर्चा’ आयोजन किया था। इसमें उन्होनें छात्रों को परीक्षा संबंधित तनाव से निपटने के टिप्स दिए और माता-पिता और शिक्षकों को इस तनाव को कम करने के बारे में उपदेश दिए। वह भी महामारी की दूसरी लहर के बीच परीक्षा के स्थगित होने के बढ़ते खतरे के बीच ऐसा किया गया। फिर एक हफ्ते बाद 14 अप्रैल को पीएम मोदी ने शीर्ष शिक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों की एक बहुप्रचारित बैठक बुलाई और कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया और कक्षा 12वीं की परीक्षाओं को स्थगित करने की घोषणा कर दी गई। 

यह निर्णय एक बार फिर तैयारियों में कमी को दर्शाता है। वास्तव में इससे दूरदर्शिता में कमी भी नज़र आती है, जो इस सरकार के हर कदम पर दिखाई देती है। वैसे इस कदम का ज्यादातर छात्रों और अभिभावकों ने स्वागत किया है, लेकिन सरकार इस यातना से बच गई होती अगर वे पहले से इस बारे में सोच लेती। 

यह रवैया, पिछले पूरे एक साल में सरकार ने जो शिक्षा के प्रति दृष्टकोण अपनाया था, उसी सिलसिले की एक और कड़ी है जिसके कारण लाखों बच्चों को बिना किसी योजना या विचार के ऑनलाइन क्लास के सहारे छोड़ दिया गया था। 

कुंभ की अव्यवस्था

उत्तराखंड के हरिद्वार में विशाल कुंभ के आयोजन और उसे संभालने के मामले में सरकार ने शायद खुद के निर्देशों उल्लंघन करने का गंभीर दुस्साहस किया है। मुख्य रूप से भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा आयोजित हिंदू भक्तों के सबसे बड़े जमावड़े में तीन करोड़ से अधिक लोगों के पवित्र स्थल पर एकत्रित होने की सूचना मिली है।

व्यापक रूप से ऐसा रिपोर्ट किया गया है कि भक्तों और आयोजकों ने कोविड के बचाव की सभी  सावधानियों को ताक पर रख दिया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि कोविड से डरने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि गंगा नदी का पानी संक्रमण को रोक सकता है। केंद्र सरकार जो अभी तक बाकी जगह प्रतिबंधों के उल्लंघनकर्ताओं को दंड देने में हिचकती नहीं थी, वह कुंभ के नाम पर हो रही अराजकता पर चुप्पी साधी बैठी है और एक तरह से राज्य सरकार का समर्थन करती रही है।

जब पता चला और रिपोर्ट किया गया कि हिंदू अखाड़ों के वरिष्ठ संत काफी संख्या में संक्रमित हो गए हैं और कोविड से एक की मृत्यु भी हो गई है, तो पीएम मोदी ने 16 अप्रैल को अचानक ट्वीट किया कि कुंभ में अब केवल प्रतीकात्मक स्नान करना बेहतर होगा! इस बीच, 2,000 से अधिक भक्तों को आधिकारिक तौर पर संक्रमित पाया गया है। लेकिन संभावना है कि अब तक लाखों लोगो को वायरस ने पकड़ लिया होगा और वे लोग इसे पूरे देश में दूर-दराज़ के गांवों तक ले जाएंगे। 

ये कुछ ऐसे गलत फ़ैसले हैं जिनकी वजह से मोदी सरकार दूसरी लहर से निपटने में नाकामयाब रही है। पिछले साल की विनाशकारी प्रबंधन के संदर्भ में देखा जाए तो बिना सोचा-समझा लॉकडाउन, प्रवासी संकट, लोगों को आर्थिक सहायता प्रदान करने से इंकार, ठप्प आर्थिक गतिविधि और विनाश आदि से जनता के खिलाफ सरकार के अत्याचार और पापों का घड़ा भरता जा रहा है। 

 [पुलकित शर्मा ने कोविड मामले के आंकड़ों का मिलान/तुलना की है] 

 

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