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भारत
राजनीति
विश्लेषण: मोदी सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र
पैसा जुटाने के बहुत सारे तरीके हैं लेकिन मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को यह कहकर बेचती है कि वह इससे पैसा जुटाएगी। लेकिन आर्थिक तौर पर इस रणनीति की छानबीन करने पर इस रणनीति का कोई तुक नहीं निकलता है। 
प्रभात पटनायक
30 Mar 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
modi
Image Courtesy: The Indian Express

मोदी सरकार ने इसे छुपाने की कोई कोई कोशिश नहीं की है कि उसका इरादा भारत के सार्वजनिक क्षेत्र को अपने चहेते कार्पोरेट घरानों और विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों के हवाले करने का है। और इस फैसले के पीछे कोई आर्थिक तर्क या औचित्य नहीं है। इसके पीछे तो सिर्फ इसकी आकांक्षा है कि इस रास्ते से सरकार के लिए राजस्व जुटाया जाए। इस तरह यह अर्थशास्त्र के उसके घोर अज्ञान को भी दिखाता है और उसके हर कीमत पर अपने गोदी कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने की कसम खाकर बैठे होने को भी दिखाता है।

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र, उसके उपनिवेशविरोधी संघर्ष में से निकला है। उपनिवेशवाद का अर्थ सिर्फ एक विदेशी ताकत का राजनीतिक शासन भर नहीं था बल्कि उसका अर्थ राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों पर विदेशी पूंजी का नियंत्रण होना भी था।

उपनिवेशीकरण से छुटकारा पाने का मतलब भी सिर्फ राजनीतिक तौर पर अंग्रेजों के चंगुल से बाहर निकलना नहीं था  बल्कि इससे भी बढ़कर आर्थिक तौर पर अंग्रेजों के कब्जे से आजाद होना था। इसके तहत समग्रता में जनता की ओर से विदेशी पूंजी के हाथों से अपने संसाधनों पर नियंत्रण वापस छीनना था। सार्वजनिक क्षेत्र को समग्रता में जनता का प्रतिनिधि होना था। वास्तव में और कोई संस्था थी ही नहीं, जो इस भूमिका को अदा कर पाती।

इसी प्रकार, अगर समग्रता में जनता के हित में, देश की अर्थव्यवस्था को विकसित दुनिया की पूंजी के शिकंजे से छुड़वाना था तो सार्वजनिक क्षेत्र ही ऐसी संस्था थी जो उसकी जगह ले सकती थी। यह तथ्य तो बिल्कुल साफ ही था कि भारत का निजी क्षेत्र महानगरीय या विकसित दुनिया की पूंजी की जगह लेने की स्थिति में कहीं से भी नहीं था। 

वह तो ज्यादा से ज्यादा यही कर सकता था कि विकसित दुनिया की उधार की प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करता और उसके साथ संयुक्त उद्यमों के जरिए काम करता। इस तरह वह अपने लिए तो थोड़ी-बहुत गुंजाइश बना सकता था, लेकिन वह विकसित दुनिया की पूंजी के वर्चस्व को हटा नहीं सकता था। फिर भी सार्वजनिक क्षेत्र के अस्तित्व के औचित्य का यह परिस्थिति संयोगगत तर्क तो फिर भी एक हाशियावर्ती तर्क ही है। इसका असली तर्क तो सिद्घांतों से जुड़ा हुआ है। संसदीय निगरानी के आधीन सार्वजनिक क्षेत्र ही है, जो समग्रता में जनता के हित में काम कर सकता है।

राष्ट्रीयकरण के बाद से बैंकों का आचरण इसी का एक उदाहरण है। जाहिर है कि राष्ट्रीयकरण के बाद ये बैंक अपने मालिक व्यापारिक घरानों के लिए महज संसाधन जुटाने वाले नहीं रह गए थे। इसके बजाए ये बैंक जमाओं के विशाल हिस्से को जुटाने वाले और लघु उत्पादकों के विशाल तबके के लिए ऋण के वितरक बन गए, जिसमें किसान भी शामिल हैं, जो इससे पहले तक संस्थागत ऋणों के दायरे से बाहर ही रहे थे। 

इस तरह ये बैंक इस या उस कार्पोरेट घराने का पुंछल्ला बने रहने की जगह पर, एक ऐसे वित्तीय ताने-बाने के घटक बन गए, जिसके जैसा वित्तीय ताना-बाना इससे पहले दुनिया में कभी बना ही नहीं था। इस ताने-बाने की असाधारणता व्यक्तिगत रूप से किसानों और लघु उत्पादकों की इतनी विशाल संख्या को ऋण दिए जाने में थी। इसी ने हरित क्रांति को संभव बनाया और देश को एक हद तक खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करायी।

बेशक यह सब तो सब को पता होना चाहिए और वास्तव में सब को इसका पता भी था। लेकिन भाजपा के लिए इसे दोहराना जरूरी है, जो न तो भारत के उपनिवेशविरोधी संघर्ष में शामिल रही थी और न खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के महत्व को जानती तथा मानती है। 

उसके खाद्य सुरक्षा के महत्व को ही नहीं समझने का साफ सबूत उसका नये कृषि कानूनों के जरिए देश की अर्थव्यवस्था के द्वार विकसित दुनिया के ‘खाद्य साम्राज्यवाद’ के लिए खोलने की कोशिशों में जुटा होना है। यह भी एक जानी-मानी बात है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के काफी पहले से नवउदारवादी नीतियों के लागू किए जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका मकसद ही सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर करना था और उसने वही किया भी था।

इसके लिए जमीन तैयार की थी इस दलील ने कि सार्वजनिक क्षेत्र ‘अक्षम’ है क्योंकि वह निजी क्षेत्र की तरह मुनाफे नहीं बनाता है। यह दलील अपने आप में, सार्वजनिक क्षेत्र के अस्तित्व के बुनियादी तर्क की समझ के ही अभाव को दिखाती है, हालांकि यह कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र को हमेशा घाटे में ही चलना चाहिए।

इसके अलावा यह पूरी तरह से बेतुकी तथा ऊटपटांग दलील यह सुनने को मिल जाती है कि सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सा पूंजी की बिक्री से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल, ऐसे तरीके से सरकार के खर्चों की वित्त व्यवस्था के लिए किया जा सकता है, जो ‘सुरक्षित’ होगा और जिससे राजकोषीय घाटे का सहारा लेने की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। 

ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने इस दलील को निगल लिया और वह सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े-बड़े अंशों का यह सोचकर निजीकरण करने में लगी है कि इसे हथियार बनाकर वह उस राजकोषीय दुविधा से निकल सकती है, जिसमें वह खुद को फंसा हुआ पा रही है।

बहरहाल इस दलील का बेतुकापन इस तरह समझा जा सकता है। जब सरकार, मिसाल के तौर पर शुरूआत के तौर पर बैंक से कर्जा लेकर 100 रु0 का अतिरिक्त खर्चा करती है, तो सकल मांंग के स्तर में और इसलिए उत्पाद तथा आय दोनों में ही इसी के हिसाब से बढ़ोतरी होती है। उदाहरण की सरलता की खातिर हम विदेशी सौदों को अगर छोड़ देते हैं तो अतिरिक्त आय पैदा करने की यह प्रक्रिया तब तक निरंतर जारी रहेगी जब तक इस अतिरिक्त आय से पैदा होने वाली निजी अतिरिक्त बचत और इसलिए निजी निवेश के ऊपर (जिसे हम इस अवधि में अपरिवर्तित मानकर चल रहे हैं)अतिरिक्त निजी बचतों में बढ़ोतरी, ठीक 100 रु0 के बराबर नहीं हो जाती है।

इसलिए, सरकार अगर चाहे तो शुरूआती निवेश की 100 रु0 की राशि बांड जारी करने के जरिए उधार ले सकती है और बैंकों का पैसा लौटा सकती है। सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री के मामले में भी हम उसी प्रक्रिया की ठीक-ठीक पुनरावृत्ति देश सकते हैं। 

इसमें एक ही भिन्नता होगी कि सरकार शुरूआती निवेश के 100 रु0 जुटाने के लिए बांड जारी करने के बजाए  सरकारी क्षेत्र की परिसंपत्तियां बेच रही होगी।

इस तरह इन दोनों उदाहरणों में इसके सिवा कोई अंतर नहीं है कि निवेश के लिए उक्त संसाधन जुटाने के लिए निजी क्षेत्र को सरकार द्वारा एक मामले में तो अपने बांड बेचे जा रहे होंगे जबकि दूसरे मामले में वह अपनी हिस्सा पूंजी ही बेच रही होगी। 

इसलिए अपने वृहदार्थिक प्रभाव के लिहाज से राजकोषीय घाटे से वित्त पोषित सरकारी खर्चे में और सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निजीकरण से वित्त पोषित सरकारी खर्चे में कोई अंतर ही नहीं होता है। लेकिन बाद वाले मामले में वह बाकी सब कुछ के ऊपर से अर्थव्यवस्था के नाजुक क्षेत्र बढ़ते पैमाने पर घरेलू तथा विदेशी कार्पोरेट कुलीनों के हवाले भी कर रही होगी।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वित्तीय पूंजी आम तौर पर वित्त जुटाने के इन दो तरीकों के बीच अंतर को फिर भी पहचानते हैं। वे सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों की बिक्री को राजकोषीय घाटे के हिस्से के तौर पर नहीं देखते हैं। लेकिन इसकी वजह यह है कि ऐसा करने में उनका निहित स्वार्थ है। 

वे ऐसा कोई आर्थिक तर्क से संचालित होकर नहीं करते हैं बल्कि विचाराधारा से संचालित होकर करते हैं। वे तो सार्वजनिक क्षेत्र को ही खत्म कराना चाहते हैं, जिसका निर्माण साम्राज्यवाद के खिलाफ एक रक्षा-आधार के तौर पर हुआ था और जिसमें आज भी प्रतिरोध के ऐसे आधार की भूमिका अदा करने की संभावनाएं छुपी हुई हैं, हालांकि नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने ने उसे अपने पहले रूपाकार की परछाईं मात्र बना दिया है।

कुछ सरकारी प्रवक्ताओं ने यह दिखाने की कोशिश की है कि सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री जैसा ‘ऋण पैदा न करने वाला’ संसाधन संग्रह, संसाधन जुटाने का किसी न किसी प्रकार से श्रेष्ठïतर तरीका है। 

लेकिन इस बात की कोई तुक ही नहीं बनती है। सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री का मतलब होता है, संंबंधित परिसंपत्तियों से भविष्य में पैदा होने वाले राजस्व की धारा को खो देना और यह पूरी तरह से राजस्व घाटे की भरपाई के लिए जारी किए जाने वाले बांडों के ही समकक्ष होता है।

वास्तव में राजकोषीय घाटे के सहारे सरकारी खर्च के लिए वित्त व्यवस्था के साथ समस्या वह नहीं है जो वित्तीय पूंजी के प्रवक्ता अक्सर उसकी समस्या बताते हैं। इसके बजाए इसके साथ असली समस्या यह है कि इससे निजी संपदा में करीब-करीब मुफ्त में ही इजाफा होता है। पीछे दिए गए उदाहरण में जब सरकार 100 रु0 खर्च करती है और बांड जारी करती है ताकि अपने इस खर्च से निजी हाथों में आयी अतिरिक्त बचतों को बटोर सके, तो निजी बचतकर्ताओं के हाथों में उक्त अतिरिक्त बचतें वास्तव में उनकी किसी करनी से नहीं आयी होती हैं। ये अतिरिक्त बचतें तो बस आंधी के आम की तरह उनकी टोकरी में आ गिरी होती हैं। ये बचतें निजी संपदा में इजाफा करती हैं यानी अमीरों की दौलत बढ़ाती हैं क्योंकि मेहनतकश तो जितना भी कमाते हैं उसमें से कमोबेश सारे  ही उपभोग कर लेते हैं और शायद ही कोई बचत कर पाते हैं।

इसलिए अगर इस 100 रु0 को कर के जरिए बटोर भी लिया जाता है तो भी, अमीरों की संपदा ठीक उतनी ही रहेगी, जितनी कि इस चक्र की शुरूआत में रही होगी यानी उसमें कोई भी कमी नहीं होगी।

ठीक यही तब भी होता है, जब राजकोषीय घाटे के जरिए वित्त जुटाने के बजाए, सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपा जाता है। इस सूरत मेें भी मुफ्त में अतिरिक्त संपदा अमीरों के हाथ में दी जा रही होगी और इस तरह वे पहले से ज्यादा धनी हो जाएंगे और आय की असमानता और बढ़ जाएगी।

बेशक इस सब से बचा जा सकता है, बशर्तें इस 100 रु0 को कर लगाकर उनसे वसूल कर लिया जाए। वास्तव में निजी क्षेत्र के हाथों में सार्वजनिक परिसंपत्तियां पकड़ाना तो निजी क्षेत्र को बांड बेचने से भी ज्यादा असमानता बढ़ाने वाला है। इसकी सीधी सी वजह यह है कि ऐसी परिसंपत्तियां अपरिहार्य रूप से मिट्टी के मोल पर बेची जाती हैं।

तीसरी दुनिया के किसी देश की सरकार के लिए, जहां पहले ही संपदा की असमानता बहुत ही ज्यादा है, यह शर्मनाक है कि संपदा कर लगाकर संसाधन जुटाने के बजाए, सरकारी खर्च के लिए संसाधन जुटाने के लिए सार्वजनिक परिसंपत्तियों को बेचा जाए और इसके जरिए असमानता और बढ़ायी जाए। 

और अगर सरकार संपत्ति कर नहीं लगाना चाहती है, तो भी वह कम से कम मुनाफे पर कर की दर में तो बढ़ोतरी कर ही सकती है, जिससे संपत्ति की असमानता पर कुछ तो अंकुश लगेगा।

और अगर सरकार मुनाफे पर कर दर भी बढ़ाने की हिम्मत नहीं कर सकती है, तब भी वह राज्यों के साथ मशविरा कर के, ऐशो-आराम की चीजों पर (जिन चीजों का उपभोग पूंजीपतियों तथा उनके लग्गे-भग्गों द्वारा ही ज्यादा किया जाता है) जीएसटी की दरें तो बढ़ा ही सकती है। 

इससे वास्तविक मूल्य के लिहाज से, पूंजीपतियों तथा उनके लग्गे-भग्गों के उपभोग की वस्तुओं के मूल्य सूचकांक को हिसाब में लेकर, उनके मुनाफे तो पहले जितने ही बने रहेंगे और इसके बावजूद सरकार के पास खर्च करने के लिए संसाधन आ जाएंगे।

लेकिन, ऐसा किया जाता है तो पूंजीपतियों को इससे कोई अतिरिक्त लाभ हासिल नहीं हो रहा होगा, जैसा अतिरिक्त लाभ उन्हें राजकोषीय घाटे का सहारा लिए जाने पर भी मिलता है और इसके विकल्प के तौर पर सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बेचे जाने से भी मिलता है। इसलिए, सार्वजनिक परिसंपत्तियों का निजीकरण करने की मोदी सरकार की ललक, राष्ट्रीय हितों की नजर से तो एक रणनीतिक गलती है ही साथ ही सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने के लिए जो आधार पर करती है वह भी आर्थिक तौर पर औचित्य पूर्ण नहीं दिखते। उनका कोई आर्थिक तुक नहीं निकलता?

(लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री और राजीतिक विश्लेषक हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Modi Govt’s Move to Sell PSU Assets and not Impose Wealth Tax is Shameful

PSU Privatisation
Public Sector
PSU Asset Sale
crony capitalism
Modi government
Fiscal Squeeze

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