NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
विश्लेषण: कोवैक्स का भ्रम, मोदी सरकार की झूठी कवायद और वैक्सीन को लेकर हाहाकार
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया की 50 फ़ीसदी से अधिक आबादी के पास वैक्सीन का 83 फ़ीसदी जखीरा है और दुनिया की शेष 50 फ़ीसदी आबादी के पास केवल 13 फ़ीसदी हिस्सा है। यानी ख़तरनाक किस्म की असमानता। 
अजय कुमार
19 May 2021
vaccine

अगर आप न्यूज़क्लिक के लेखों और वीडियो के निरंतर पाठक और दर्शक हैं तो आपने जरूर देखा होगा कि प्रबीर पुरकायस्थ और सत्यजीत रथ की जोड़ी ने कई बार यह बात कही थी कि यकीनन वैक्सीन बनाना बहुत मुश्किल काम है लेकिन इससे भी ज्यादा मुश्किल काम दुनिया में इसका सही ढंग से बंटवारा करना है। इस तरह का बंटवारा कि सभी देशों तक जरूरी मात्रा में वैक्सीन पहुंच पाए। एक बार जब वैक्सीन बन जाएगा उसके बाद अमीर देशों और वैक्सीन कंपनियों का वह कुरूप चेहरा सामने आएगा जो हर वक्त मौजूद रहता है लेकिन साफ तौर पर दिखता कभी-कभार है। 

 असल में बात यह है की कोरोना वायरस की प्रकृति ही ऐसी है कि यह पूरी दुनिया में फैल चुका है। दुनिया के किसी भी कोने में अगर बड़ी मात्रा में उसकी मौजूदगी रहेगी तो मतलब यह है कि पूरी दुनिया कोरोना के संक्रमण के खतरे में रहेगी। कब कहां से फैल जाए इसकी आशंका हमेशा बनी रहेगी। इसलिए दुनिया की बेहतरी के लिए सबसे अच्छा तरीका यह होता कि दुनिया महामारी से निपटने के लिए पूरी दुनिया को ग्लोबल यूनिट के तौर पर मानती। दुनिया का बंटवारा भारत, नेपाल, अमेरिका, अफ्रीका में करके न देखा जाता।  इस हिसाब से पूरी दुनिया को मिलकर साझा प्रयास करना चाहिए था। साझी संस्था होनी चाहिए थी।

 दुनिया में सबसे तंग इलाका कौन है? सबसे अधिक खतरा किस उम्र के लोगों को है? किन जगहों पर कोरोना के फैलने की संभावना सबसे अधिक है? इस तरह के पैमानों के आधार पर वैक्सीन का बंटवारा करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

 हुआ यह कि दुनिया के सामने यह भ्रम पैदा करने के लिए कि दुनिया के अमीर और सशक्त देश दुनिया के गरीब मुल्कों का भी ध्यान रखते हैं इसलिए कोवैक्स नाम की एक संस्था बनी। Covax यानी द  covid-19 ग्लोबल एक्सेस इनीशिएटिव। 

 लेफ्ट और समाजवादी रुझान रखने वाली अमेरिका की जैकोबिन पत्रिका में कोवैक्स पर एक लेख छपा है। जिसका सार है कि दुनिया के अमीर मुल्कों ने मिलकर डब्ल्यूटीओ में मेडिकल क्षेत्र से जुड़े पेटेंट के कानून को महामारी के दौरान निरस्त नहीं करवाया। बल्कि यूरोप यूनाइटेड किंगडम कनाडा ऑस्ट्रेलिया जैसे मजबूत मुल्क अपने देश की मेडिकल क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के अकूत मुनाफे को बचाए रखने के लिए डब्ल्यूटीओ में पेटेंट के कानून को बचाए रखने की पैरवी कर रहे हैं। अगर पेटेंट का कानून भी है और कोवैक्स जैसी संस्था भी है। तो इसका मतलब यह है कि पूरी दुनिया को यह दिखाना है कि हम गरीब मुल्कों की मदद के लिए कोवैक्स को कोरोना का वैक्सीन दे रहे हैं। और कोवैक्स के जरिए पूरी दुनिया के उन कोनों में भी कोरोना के वैक्सीन पहुंचा रहे हैं, जो खुद से उत्पादन करने में सक्षम नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि पेटेंट कानून की वजह से दुनिया की बहुत सारी वैक्सीन उत्पादन से जुड़ी कंपनियां वैक्सीन नहीं बना बना पा रही है। 

 इसे पढ़ें: पेटेंट बनाम जनता

 वैक्सीन न बनने की वजह से जितनी वैक्सीन दुनिया को इस समय चाहिए, उतनी नहीं मिल पा रही है। कुछ अमीर देश जैसे अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, चीन  को छोड़ दिया जाए तो दुनिया के बहुत सारे मुल्क अपनी जरूरत के हिसाब से वैक्सीन ना होने की परेशानी से जूझ रहे हैं। अगर पेटेंट का कानून न होता तो कोवैक्स तक बड़ी मात्रा में वैक्सीन पहुंचता और कोवैक्स के जरिए पूरी दुनिया में वैक्सीन पहुंच रहा होता। 

 अब तक के हालात यह हैं कि दुनिया के 130 देशों में वैक्सीन का एक भी डोज नहीं पहुंचा है। जबकि अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपने लोगों तक ठीक-ठाक संख्या में वैक्सीन पहुंचा चुके है। 

 दुनिया के अमीर मुल्क अपने देश के बच्चों को वैक्सीन पहुंचाने जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष ने दुनिया के अमीर मुल्कों के इस कदम को नैतिक तौर पर भ्रष्ट आचरण कह कर संबोधित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि दुनिया के अमीर मुल्कों की नैतिकता अजीब है। दुनिया के कई इलाकों में उन लोगों तक वैक्सीन नहीं पहुंची है, जो दिन रात एक कर के लोगों को बचाने का काम कर रहे हैं। कई गरीब मुल्कों के डॉक्टर, हेल्थ वर्कर फ्रंटलाइन वर्कर को वैक्सीन नहीं मिली हैं। कई इलाकों के उम्र दराज लोग जिन पर कोरोना का सबसे अधिक खतरा है उन्हें वैक्सीन नहीं मिला है। ऐसे में अमीर मुल्क अगर बच्चों के लिए वैक्सीन बना रहे हैं तो इसे नैतिक तौर पर भ्रष्ट ही कहा जाएगा। 

 विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया की 50 फ़ीसदी से अधिक आबादी के पास वैक्सीन का 83 फ़ीसदी जखीरा है और दुनिया की शेष 50 फ़ीसदी आबादी के पास केवल 13 फ़ीसदी हिस्सा है। यानी खतरनाक किस्म की असमानता। 

 इन सारी बातों का क्या मतलब है? पहला तो यह की दुनिया ने ईमानदारी से ऐसा कोई साझा प्रयास नहीं किया कि दुनिया के गरीब मुल्कों को भी सही समय पर वैक्सीन मिल पाए और दूसरा यह की कोवैक्स नामक संस्था अभी तक काफी हद तक नाकाम रही है। उन कंपनियों के फायदे के लिए बनी है जो खूब लाभ कमाने के लिए कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी जैसी अवधारणाओं में इन्वेस्ट करते हैं। ताकि दुनिया जब भी सवाल पूछे तो वह बता कर भ्रम में डाल सकें कि वह अपना काम भी कर रहे थे और परोपकार भी कर रहे थे।

 अब आते हैं भारत पर। जहां यह लगता है कि भारत ने दूसरे देशों को वैक्सीन दी लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है। हकीकत यह है कि कोवैक्स जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था कई देशों के फंडिंग पर बनी है। भारत की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में भी कोवैक्स का पैसा लगा है। इसलिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया बाध्य है कि वह पहले उन्हें वैक्सीन दे जिनका आर्डर पहले आया है और जिनसे पहले पैसा मिला है। और ऐसा कोई तरीका नहीं है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोवैक्स से अपना करार तोड़ दे।

मोदी सरकार और सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के बीच के करार के 5 महीने पहले अगस्त 2020 में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और कोवैक्स के बीच 100 मिलियन वैक्सीन देने का करार हो चुका था। उसके बाद सितंबर 2020 में कोवैक्स ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ फिर से करार किया और यह करार भी 100 मिलियन वैक्सीन देने का था। 

 इस पर कोई अफरा-तफरी नहीं मची। क्योंकि बीच में मोदी सरकार इस नशे में डूब चुकी थी कि थाली बजाने के चलते भारत से कोरोना भाग गया है। इस मौके का फायदा नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री कहां छोड़ने वाले। वह भी खूब ढिंढोरा पीट रहे थे की आपदा के समय वह दूसरे देशों की मदद कर रहे हैं। 

 लेकिन जैसे ही महामारी का प्रकोप हिंदुस्तान पर मंडराने लगा। थाली पीटना और पिटवाना ऑक्सीजन की कमी से मरते हुए लोगों के कारण के रूप में तब्दील हो गया, तब वैक्सीन के खराब प्रबंधन की पोल खुल गई। अगर सब कुछ सरकार के बस में होता   तो वह सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के करार को रोक देती। लेकिन नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चल रही भारत सरकार के बस में न यह पहले था और न अब है। 

दूसरे देशों को वैक्सीन पहुंचाने के नाम पर जो हुआ है वह केवल सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और कोवैक्स के बीच के करार का परिणाम है। इसमें नरेंद्र मोदी की कोई सहभागिता नहीं। उन्होंने केवल इसे भुनाकर पहले अपनी छवि चमकाई और कुछ नहीं और अब सवालों से भागने की कोशिश कर रहे हैं। 

 इन सभी बातों का कहीं से भी है मतलब नहीं है कि भारत को दूसरे देशों को वैक्सीन नहीं देना चाहिए। अगर बीमारी सरहदों को नहीं देखती तो बीमारी के उपचार के लिए भी सरहदों की बाधाएं नहीं होनी चाहिए। 

लेकिन समझने वाली बात यह है कि इस तरफ  ईमानदार कदम बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि पूरी दुनिया मिलकर महामारी के वक्त के लिए पेटेंट कानूनों से राहत पा ले। 

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चल रही भारत की सरकार वैक्सीन उत्पादन की अपने सार्वजनिक क्षेत्र की तरफ ध्यान दें। इस समय केवल दो ही कंपनियां भारत में वैक्सीन उत्पादन कर रही हैं। जबकि भारत के पास 20 वैक्सीन उत्पादन केंद्र हैं। जो सरकारी मदद के अभाव में पूरी तरह से खाली बैठे हैं।

इसलिए प्रबीर पुरकायस्थ अपने लेख में लिखते हैं कि अगर भारत के सब टीका उत्पादन केंद्र काम करते तो भारत आसानी से अपनी टीका उत्पादन क्षमता 4 अरब टीका तक बढ़ा सकता था और चालू वर्ष में ही जरूरी 2 अरब से ज्यादा टीका खुराकें बना सकता था। इस तरह, भारत आराम से अपनी लक्ष्य आबादी का पूरी तरह से टीकाकरण कर सकता था। इसके बावजूद दूसरे देशों को टीका भी दे सकता था। लेकिन ऐसा करने के लिए एक ऐसी सरकार चाहिए जो लोक कल्याण के मकसद से काम करती हो, जिसके दावे खोखले न हों, जिसकी पूरी परियोजना महज अपनी छवि चमकाने और मीडिया मैनेज कर केवल चुनाव जीतने की न हो।

COVAX
Vaccine Patents
Serum Institute of India
WHO

Related Stories

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

कोविड-19 महामारी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में दुनिया का नज़रिया नहीं बदल पाई

WHO की कोविड-19 मृत्यु दर पर भारत की आपत्तियां, कितनी तार्किक हैं? 

हासिल किया जा सकने वाला स्वास्थ्य का सबसे ऊंचा मानक प्रत्येक मनुष्य का मौलिक अधिकार है

क्या बूस्टर खुराक पर चर्चा वैश्विक टीका समता को गंभीर रूप से कमज़ोर कर रही है?

यात्रा प्रतिबंधों के कई चेहरे

दो टूक: ओमिक्रॉन का ख़तरा लेकिन प्रधानमंत्री रैलियों में व्यस्त

ओमीक्रॉन को रोकने के लिए जन स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाजिक उपाय तत्काल बढ़ाने की ज़रूरत : डब्ल्यूएचओ

ओमिक्रॉन से नहीं, पूंजी के लालच से है दुनिया को ख़तरा

अब कोविड-19 के नए स्वरूप ‘ओमीक्रॉन’ का डर, दुनियाभर के देशों ने लगायी यात्रा पाबंदियां


बाकी खबरें

  • nonaligned movement
    एन.डी.जयप्रकाश
    गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को कैसे बदला? : भाग 1
    20 Nov 2021
    उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का संगठित विरोध 1920 के दशक के अंत में शुरू हुआ था। जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के ज़रिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
  • Farmers Protest
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसानों की जीत: “यह आज़ादी का दूसरा आंदोलन रहा है”
    20 Nov 2021
    शुक्रवार, 19 नवंबर को गुरु नानक जी की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा की और कहा कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इन तीनों कानूनों को निरस्त करने की…
  • Srinagar Encounter
    अजय सिंह
    मुद्दा: कश्मीर में लिंचिंग के दिन आने वाले हैं
    20 Nov 2021
    पिछले दिनों चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सेना, नौसेना व वायुसेना के मुखिया) जनरल बिपिन रावत ने जो सार्वजनिक बयान दिया, वह बहुत चिंताजनक है।
  • farmers
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    MSP और लखीमपुर खीरी के किसानों के न्याय तक जारी रहेगा आंदोलन, लखनऊ में महापंचायत की तैयारी तेज़
    20 Nov 2021
    विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त किये जाने की घोषणा के बावजूद, किसानों के द्वारा उत्तर प्रदेश में आगामी महापंचायतों के मद्देनजर लामबंदी और तैयारी जारी है।
  • farmers celebrating
    विक्रम सिंह
    किसान जानता है कि फसल पकना तो शुरुआत है, मंडी में दाम मिलने तक उसका काम पूरा नहीं होता
    20 Nov 2021
    मोदी जी ने तो अपने चिरपरिचित अंदाज़ में किसानों से घर वापस जाने के लिए कहा परन्तु किसान जानता है कि खेत में फसल पकना तो शुरुआत है लेकिन जब तक फसल का मंडी में उचित मूल्य नहीं मिल जाता तब तक काम पूरा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License