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नेताजी! ज़रा संभल कर, हमारे बच्चों की ज़बान ख़राब हो रही है!!
समाजशास्त्री मानते हैं जो भाषा आज मंच से बोली जा रही है वह कल समाज में बोली जाएगी जिससे देश, समाज, लोकतंत्र सबका नुकसान होगा।
असद रिज़वी
09 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : Navodaya Times

भारत के लोकसभा चुनाव 2019 में भाषा का स्तर इतना नीचे गिर जायेगा सोचा भी नहीं जा सकता था। आने वाले कल में इसका समाज पर बहुत ग़लत प्रभाव पड़ेगा। आज नेता जो भाषा मंच से बोल रहे हैं, कल के समाज में वो आम बोलचाल की भाषा होगी!

किसी पार्टी का कोई नेता अगर असभ्य भाषा का प्रयोग करे तो उसकी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों का कर्तव्य है कि उसकी ग़लती को सुधारें ताकि समाज में ग़लत संदेश न जाये। लेकिन अगर देश का प्रधानमंत्री ही अपनी भाषा पर संयम न रख सके तो सोचिए स्तर कितना नीचे आ चुका है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी को “भ्रष्टाचारी नम्बर वन” कहा। यह भाषा मोदी ने एक ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयोग की जो अब हमारे बीच नहीं है और उसकी मौत एक दर्दनाक आतंकवादी हमले मे हुई थी।

हिमाचल प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष ने चुनावी मंच से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गाली दी। रफ़ाल मामले पर प्रधानमंत्री का बचाव करते हुए सतपाल सत्ती ने 15 अप्रैल को एक चुनावी मंच से राहुल गांधी के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने भाजपा उम्मीदवार जया प्रदा पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। फ़िल्म अभिनेत्री जयाप्रदा रामपुर से बीजेपी के टिकट पर आज़म खान के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। एक दूसरे बयान मे आज़म खान ने सरकारी अफसरों से जूते साफ करवाने को कहा।

ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब नेताओं ने मंच से आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया है। विडंबना यह है कि यह सिर्फ़ छोटे नेताओं की बात नही है, बल्कि प्रधानमंत्री की भी अभद्र भाषा के लिये आलोचना हो रही है। 

तहज़ीब और तमद्दुन (शालीनता-सभ्यता) हिंदुस्तानी संस्कृति की विशेषता रही है। राजनीति में नेताओं द्वारा प्रयोग की जा रही अभद्र (आपत्तिजनक) भाषा हमें असली मुद्दों से भटका रही है। शायद नेताओं का मक़सद भी यही होता है। सभा समाप्त होने के बाद नेताओं की भाषा पर ज़्यादा मुद्दों पर कम चर्चा होती है।

समाजशास्त्री मानते हैं जो भाषा आज मंच से बोली जा रही है वह कल समाज में बोली जाएगी। डॉक्टर प्रदीप शर्मा नेताओं के भाषा के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि अगर नेताओं की भाषा का स्तर ऐसा ही रहा तो समाज में असहिष्णुता बढ़ेगी। वह मानते हैं जो भाषा आज राजनीतिक मंच से बोली जा रही है अगली पीढ़ी उसको समाज में इस्तेमाल करेगी। 

डॉ. प्रदीप शर्मा के अनुसार अगर राजनीतिक मंचों से ऐसी भाषा का प्रयोग होता रहा तो लोग राजनीतिक विरोध को शत्रुता समझेंगे और राजनीतिक संवाद ख़त्म हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो लोकतंत्र का एक बड़ा नुक़सान होगा।

लेकिन नेताओं के साथ आलोचना उनकी भी करनी होगी जो लोग मंच के नीचे से अभद्र भाषा सुनकर भी तालियां बजाते हैं। कम से कम ऐसी भाषा सुनकर जनता तालियां न बजाय ताकि नेता को एहसास हो कि उसने कुछ ग़लत बोला है। इसको भारतीय राजनीति का दु:खद दौर भी कहा जा सकता है, क्योंकि कबीर,ग़ालिब,तुलसी और अनीस के देश में भाषा का स्तर गिरता जा रहा है। शायद भारत में अब से पहले ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।

2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha elections
Narendra modi
Yogi Adityanath
AZAM KHAN
Non-parliamentary Language
Mischief
bad behaviour

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